Tuesday, November 1, 2011

सच्चर ब्रह्मास्त्र के चुनावी खेल में फच्चर की आशंका

अंबरीश कुमार
लखनऊ , नवंबर । मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने के लिए कांग्रेस जिस सच्चर कमेटी की सिफारिशों को चुनावी ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है उसमे फच्चर लग सकता है । सारा खेल मुसलमानों के वोट को लेकर है जिसकी बड़ी दावेदार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी है । केंद्रीय कानून और अल्पसंख्यक मामलों के मानती सलमान खुर्शीद ने कल लखनऊ में सच्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को नौकरियों में छह फीसद आरक्षण की बात कह कर राजनीति में हलचल मचा दी थी । समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने आज साफ़ कहा -सच्चर कमेटी की सिफारिशें ज्यों की त्यों लागू की जाए।
कांग्रेस के इस खेल से धर्मनिरपेक्ष तकते सतर्क हो गई है। राजनैतिक दल इसे कांग्रेस का चुनावी हथकंडा मान रहे है । भाकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा -कांग्रेस अपनी फटी चादर में इस तरह के पैबंद लगा क़र चुनावी वैतरणी पर करना चाहती पर यह संभव नहीं है । सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने में जो देरी हो रही है उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है । जो हर काम चुनावी फायदे के लिहाज से करती है । सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशो को लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न राजनैतिक दल लगातार मांग करते रहे है पर कोई पहल होती नजर नहीं आई । समाजवादी पार्टी से लेकर बसपा ,वाम दल ,पीस पार्टी और जन संघर्ष मोर्चा आदि इसे जल्द से जल्द लागू करने की बात कहते रहे है ।पर अब तक इसे लागू करने के आसार नजर नही आ रहे थे । पर सोमवार को सलमान खुर्शीद ने दो महीने के भीतर पिछड़े मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण का एलान कर उन सभी दलों को झटका दिया जिनका मुस्लिम जनाधार है ।
वैसे भी राजनैतिक विश्लेषक मान रहे है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव में एक के बाद एक राजनैतिक हथियारों का इस्तेमाल कर माहौल अपने पक्ष में करने का प्रयास करेगी । जिसकी शुरुआत मुस्लिम आरक्षण से हो सकती है । बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी इसकी मांग कर चुकी है ।
उत्तर प्रदेश में विधान सभा की करीब बीस फीसद सीटें मुस्लिम बहुल है जिसकी वजह से वे एक बड़ी राजनैतिक ताकत भी है ।यह बात अलग है कि उनकी पहचान एक वोट बैंक के रूप में ज्यादा रही और उनके विकास के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुई ।
इसी मुद्दे को राजनैतिक दल कांग्रेस के खिलाफ एक औजार की तरह इस्तेमाल करते रहे है। कांग्रेस अब सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कर राजनैतिक लाभ लेना चाहती है पर विपक्षी दल इन सिफारिशों को ज्यों का त्यों लागू करने की मांग कर कांग्रेस की घेरेबंदी भी कर रहे है । समाजवादी पार्टी के मुस्लिम चेहरे के रूप में मशहूर आजम खान ने कहा -छह फीसद आरक्षण की बात कर कांग्रेस ने मुसलमानों को जलील किया है ,इसके लिए पार्टी को माफ़ी मांगनी चाहिए । आजम खान कके तेवर से साफ़ है कि मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा अब गरमा सकता है । कांग्रेस के लिए भी यह राजनैतिक चुनौती के रूपमे सामने आ सकता है क्योकि आरक्षण का सवाल काफी संवेदनशील मुद्दा माना जाता रहा है ।jansatta

Monday, October 31, 2011

गागा को तालियां,किसानो को गालियां



अंबरीश कुमार
लखनऊ । पिछले चौबीस घंटे में गोरखपुर में जापानी बुखार से तीन बच्चों की मौत के साथ ही इस वर्ष गोरखपुर में इस बीमारी से मरने वालों की संख्या पांच सौ तक पहुँच गई । पूर्वांचल में जापानी बुखार और जल जनित बीमारियों से हर साल की तरह इस बार भी मौत का सिलसिला जारी है । इसकी मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकार की बेरुखी और स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर पर्याप्त पैसा न दिया जाना है । दूसरी तरफ ग्रेटर नोयडा में फार्मूला -१ रेस के लिए अरबो रुपए फूंक दिए गए और दलितों की सबसे बड़ी नेता और देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री मायावती भी इसमे शामिल हुई । बाद में लेडी गागा का कार्यक्रम हुआ । शैम्पेन ,शराब और शबाब का दौर चला और लोग भूल गए कि यह वाही राज्य है जहाँ कुछ घंटे पहले ही करछना में किसानो पर लाठी गोली चली और गालियों से नवाजा गया । यह वही राज्य है जिसके एक छोर पर बच्चों की मौत का सिलसिला इसलिए नहीं थम पा रहा है क्योकि उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं है । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस विरोधाभास पर कहा -यह चिंतनहीन राजनीति की अय्यासी का अय्यासी का दौर है जो मध्यकाल के सुल्तानों को भी मात कर रहा है । समाजवादी पार्टी ने इसे दलितों के नाम पर क्रूर मजाक बताया और एलान किया कि सत्ता में आने पर इसकी जाँच करई जाएगी।
दरअसल इस खेल में जिस तरह सत्तारूढ़ दल ने दिलचस्पी दिखाई है उससे राजनैतिक हलकों में हैरानी जताई जा रही है । भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा -यह वोट की राजनीति और भ्रष्टाचार की काली कमाई का नतीजा है । इस सरकार को समाज का यथार्थ नहीं दिखता,गरीबी और भुखमरी नहीं दिखती । यह बात कभी हदतक सही भी नजर नजर आती है । पूर्वांचल में जिस तरह स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बच्चे मर रहे है उसे देखते हुए ग्रेटर नोयडा का कार्यक्रम किसी के गले के नीचे नहीं उतरपा रहा है । इस आभिजात्य वर्गीय खेल को लेकर प्रदेश का जेपी समूह भी फिर विपक्ष के निशाने पर आ गया है। विपक्ष का आरोप है कि एक तरफ यह समूह किसान की जमीन छीनकर सरकार के जरिए निहत्थे किसानो पर लाठी गोली चलवाता है तो दूसरी तरफ गरीबों का मजाक उड़ाते हुए पैसे का भौंडा प्रदर्शन इस तरह के खेल के नाम पर करता है ।फार्मूलावन रेस की तैयारी के साथ शनिवार को करछना (इलाहाबाद) में प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए जमीन लिए जाने का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस ने जमकर लाठियां चलाई और फायरिंग भी की। महिलाओं और बच्चों पर भी जुल्म ढाये गए। क्षेत्र के आठ गांव इस योजना से प्रभावित होने जा रहे है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - कल फार्मूला-1 सत्र की 17वीं और भारत की पहली रेस सिनेसितारों और पाप सिंगर लेडी गागा की उपस्थिति में सम्पन्न हुई और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी रेस की दर्शकों में रहीं। उनके द्वारा पुरस्कार भी बांटे गए। इस रेस के आयोजन पर 20 अरब रूपए से ज्यादा खर्च हुए हैं। रेस खत्म होने पर शराब और शबाब का खुलकर प्रदर्शन हुआ। भारत में, जहां 80 प्रतिशत आबादी आज भी 20 रूपए रोज पर गुजर-बसर करती है, दो जून पेट भरने लायक जिसकी कमाई नहीं, उस देश-प्रदेश मे राजसी खेल का आयोजन शमशान में शाही दावत के इंतजाम जैसा है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश की मुख्यमंत्री की दौलतमंदों के खेल में दिलचस्पी दलितों के साथ क्रूर मजाक है। झुग्गी-झोपड़ी में बीमारी, तंगहाली और कर्ज के शिकार दलितों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेंमाल करनेवाली मुख्यमंत्री ने बड़े पूंजीघरानों से दोस्ती के लिए ही इस खेल में सक्रिय दिलचस्पी ली है। इसमें उनकी ओर से भी लम्बी रकम का पूंजीनिवेश किया गया है। उनके इस खेल प्रेम की बलि चढ़े है ग्रेटर नोएडा के वे किसान जिनकी 875 एकड़ जमीन जबरन छीनकर फार्मूला वन रेस की सर्किट तैयार की गई है। इन गांवों के बुजुर्ग हतप्रभ थे कि ये क्या हो रहा है, यह कोई खेल है या अमीरो की चोंचलेबाजी। उनसे जबरन छीनी जमीन पर विदेशी कारों का फर्राटा और साथ में नशे में झूमती युवतियां। jansatta

सौ चिठ्ठियों के जवाब में एक ख़त

अंबरीश कुमार
लखनऊ । उतर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रधानमंत्री के नाम लिखे सौ से ज्यादा पत्रों के जवाब में कांग्रेस के एक पत्र ने सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाल दिया है । यह सौ सुनार की बनाम एक लुहार की वाली कहावत को चरितार्थ भी करता है । इस पत्र के साथ ही विधान सभा चुनाव की तैयारी में जोर शोर से जुटी कांग्रेस मायावती को बचाव की मुद्रा में लाती दिख रही है ।सत्ता में आने के बाद मायावती ने अबतक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को करीब सौ पत्र लिख चुकी है पर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के पत्र ने मायावती की राजनैतिक घेरेबंदी कर दी है। जयराम रमेश का यह पत्र राजनैतिक मकसद में कामयाब होता नजर आ रहा है। किसी भी प्रदेश में किसी घोटाले की सीबीआई जांच सत्तारूढ़ दल के लिए परेशानी का सबब बन जाती फिर जब मामला उत्तर प्रदेश का हो जहां सभी दल चुनावी तैयारी में जुटे हों तो उसके राजनीति मायने भी होते है।उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ,सांसदों और मंत्रियों से जुड़े कई मामले जांच के घेरे में है जिनमे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम का बड़ा घोटाला भी है जिसमे एक हिस्ट्रीशीटर सांसद,दो दागी मंत्री के साथ कई और नेता भी घेरे में है। पर मनरेगा का घोटाला विधान सभा चुनाव के मद्देनजर ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि इसका दायरा काफी बड़ा है और इसका राजनैतिक असर भी ज्यादा पड़ेगा ।
इस समय करीब दर्जन भर जिलों से मनरेगा को लेकर गंभीर शिकायते सामने आई है और चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी लूट का मुद्दा कांग्रेस जोर शोर से उठाएगी । यही सवाल सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाले हुए है जिसका जनाधार राजनीति के अपराधीकरण के साथ राजनैतिक लूट और वसूली के चलते खिसक रहा है । मायावती वर्ष २००७ में जब २०६ सीटों के साथ सत्ता में आई थी तो बसपा को ३०.४३ फिसद वोट मिला था पर उसके बाद कांग्रेस ने बढ़त ली और २००९ के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक तीन फीसद गिरकर २७.४२ फीसद पर पहुँच गया था। विधान सभा की सीटों में इसे तब्दील करने पर लोकसभा चुनाव में बसपा अपनी आधी क्षमता पर पहुँच चुकी थी । ऐसे में बसपा का संकट बढ़ सकता है। अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जो कांग्रेस पहले पशोपेश में थी अब आगे बढ़ कर सत्तारूढ़ दल पर हमला कर रही है। यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा भी है । कांग्रेस की मीडिया कमेटी के प्रभारी राजबब्बर ने कहा -पहले की तुलना में कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव आया है ,अब कांग्रेस चुनावी संघर्ष में आ चुकी है । लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जिस तरह लोगों को चौकाया था वैसे ही नतीजे विधान सभा चुनाव के होंगे। सरकारी लूट खसोट और राजनैतिक गुंडागर्दी के खिलाफ कांग्रेस गांव गांव तक लोगों को लामबंद करेगी । यह सवाल उठाएगी कि गैर कांग्रेसी दलों ने इस प्रदेश को किस जगह पहुंचा दिया है ।
फिलहाल मुद्दा मायावती और केंद्र के बीच चिठ्ठी पटरी को लेकर शुरू हुए विवाद का है। मायावती अबतक अपने राजनैतिक एजंडा को लेकर पत्र भेजती रही है। चाहे उत्तर प्रदेश के बंटवारे का मामला हो या फिर बुंदेलखंड पॅकेज का मामला या फिर विभिन्न समुदायों के आरक्षण का मुद्दा हो इनका मकसद कांग्रेस की राजनैतिक घेरेबंदी ज्यादा रहा है। आज मायावती मीडिया को लेकर जो आरोप जयराम रमेश पर लगा रही है वे खुद यह करती रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राजबब्बर ने कहा - मीडिया को तो मायावती पहले पत्र देती है फिर प्रधानमंत्री को भेजती है । मायावती ने जब भी प्रधानमंत्री को ख़त लिखा मीडिया को जानकारी दी गई और आमतौर पर प्रेस कांफ्रेंस कर यह जानकारी दी जाती रही है । आज वे इस तरह का आरोप लगा रही यह उन्हें शोभा नहीं देता ।
जाहिर है अब कांग्रेस मायावती के राजनैतिक हथियारों से ही मुकाबला कर रही है। जयराम रमेश के पत्र के बाद जिस तरह उत्तर प्रदेश सरकार में बैठको का सिलसिला चला और मनरेगा को लेकर विभिन्न जिलों से जानकारिय जुटाई गई वह सरकार की बेचैनी को दर्शाता है । सरकार यह भी नहीं चाहती कि इस घोटाले को लेकर सीबीआई जांच तक मामला पहुंचे वर्ना सत्तारूढ़ दल की मुश्किलें बढ़ सकती है इसलिए मायावती जयराम रमेश के पत्र के बावजूद केंद्र से कोई टकराव लेने के मूड में नहीं है । जिसका राजनैतिक फायदा कांग्रेस को मिलता नजर आ रहा है । जनसत्ता

Thursday, October 20, 2011

कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है अन्ना आंदोलन


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश के कई जन संगठन आगामी विधान सभा चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों को हराओ का की अपील करेंगे। उत्तर प्रदेश केविधन सभा चुनावों में बड़े पैमाने पर बाहुबली और दागी उम्मीदवार खड़े होने वाले है । जिसके चलते अगर बड़े स्तर पर बाहुबली और दागी नेताओं के खिलाफ माहौल बना तो राजनीति का काफी कचरा साफ़ हो जाएगा । इन जन संगठनों का यह भी मानना है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का जिस तरह राजनैतिक रूप ले रहा है उससे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हराओं के नारे का अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा जैसे दलों को होगा इसलिए चुनाव सुधार की मूल अवधारणा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रखने के लिए बिना किसी दल के साथ या विरोध में खड़े हुए समाज को जागरूक करना होगा। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े कई जन संगठन और नेताओं ने टीम अन्ना की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि जब भी जन संगठन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे तो वे हाशिए पर चले गए। उसके लिए अलग राजनैतिक ओउजार बनाना चाहिए । भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत लाखो की रैली करते थे पर राजनीति में आए तो कोई चुनाव नहीं जीता पाए ।कर्णाटक में रैय्यत संघ और महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन उदाहरण है। इसलिए टीम अन्ना को कोर कमेटी की बैठक बुलाकर इस पर अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए। हिसार में राजनैतिक दखल के चलते ही एकता परिषद के पीवी राजगोपाल और जल बिरादरी के राजेंद्र सिंह अलग हो चुके है और कई लोग विरोध जता चुके है। वाराणसी के सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज ने चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों के खिलाफ अभियान छेड़ने साथ टीम अन्ना से कहा है कि वह भी कोर कमेटी में यह मुद्दा उठाकर चुनाव सुधर के अपने वायदे पार आगे बड़े और किसी एक दल का समर्थन या विरोध न करे ।
गौरतलब है कि राजनैतिक दखल को लेकर टीम अन्ना और उनके समर्थकों में भी मतभेद सामने आ चुके है । हालाँकि टीम अन्ना के कोर कमेटी के एक सदस्य सुनीलम ने कहा - चुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील का वे ही लोग विरोध कर रहे है जो या तो कांग्रेस के समर्थक है या सरकार की कमेटियों में बैठे है या फिर कोई लाभ ले रहे है। जबकि आंदोलन के दूसरे सहयोगी संदीप पांडेय ने कहा- जन संगठनों और जन आंदोलनों के तौर तरीको से उलट अन्ना आंदोलन अब कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है।लोकतांत्रिक तरीके से कोई फैसला नहीं हो रह़ा । कुछ लोग फैसले करते है तो उसकी जानकारी नहीं मिलती। फिर हिसार में कांग्रेस हराने का फैसला कोर कमेटी का का नहीं था । ऐसी ही कुछ मुद्दों को लेकर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय के राष्ट्रीय समन्वय यानी एनएपीएम ने अन्ना के आंदोलन को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया है । बेहतर तो यह हो कि उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चलते हुए दागी और बाहुबली उम्मीदवारों को हराने की अपील की जाए ।
इसी तरह गांधीवादी नेता और सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज भी हताश नजर आए।वे भी एक पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ने के पक्ष में नहीं है बल्कि चुनाव सुधारों का एजंडा लागू करने के समर्थक है । राम धीरज ने कहा - जो लोग भी जन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे वे हाशिये पर चले गए और एक सीट नही जीत पाए। चाहे लाखों की रैली करने वाले महेंद्र सिंह टिकैत हो या शेतकरी संगठन के शरद जोशी या फिर बकर्णाटक में रैय्यत संघ के नंजदुंग स्वामी ।ऐसे में आंदोलन को राजनैतिक दखल से पहले विचार विमर्श करना चाहिए था । इस मुद्दे पर एकता परिषद जैसा बड़ा जन संगठन अलग हो गया ,राजेंद्र सिंह की जल बिरादरी अलग हो गई। उसके बाद उत्तर प्रदेश में भी वही नारा दिया जा रहा है । राजनीति करनी है तो जन उम्मीदवार उतारे । पिछली बार लखनऊ में जन आंदोलनों के जन उम्मीदवार को लोकसभा में ४२१ वोट मिले थे। क्या यही हश्र अन्ना आंदोलन के को इतने बड़े आंदोलन का करना चाहते है ।
संघर्ष वाहिनी मंच के राजीव ने कहा -हम लोग तो शुरू से बाहुबलियों को हराने की अपील करते रहे है और फिर करेंगे । पर कांग्रेस पर दबाव बहुत जरुरी है क्योकि यह पार्टी बहुत शातिर पार्टी है और लोकपाल बिल लाएगी इस पर हमें संदेह है ।
ऎसी ही राय कई अन्य जन संगठनों के लोगो की थी । दरअसल कोई भी आंदोलन कई दशक बाद खड़ा होता है पर कुछ समय तक उसका असर समाज पर बना रहता है। जेपी आंदोलन से वीपी सिंह का आंदोलन उदाहरण है । कई दशक बाद अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते देश का मध्य वर्ग बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरा था ,यह टीम अन्ना का बड़ा योगदान है पर आंदोलन की दृष्टि , विचारधारा और ठोस कार्यक्रम के अभाव में इसी मध्य वर्ग का मोहभंग होने लगा है। जन संगठनों का मानना है कि जिस देश के अस्सी फीसद गांवों और छोटे शहरों में बिजली न आती हो उस देश में सिर्फ सोशल नेट वर्किंग ,फेस बुक ,ई मेल और एसएमएस व अन्य संचार साधनों से बड़े आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते है। इसके लिए प्रतिबद्ध जमीनी कार्यकर्ताओं की कतार तैयार करना जरुरी है ।
अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी के प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास ने जनसत्ता से कहा -अन्ना आंदोलन के दौरान देश का एक बड़ा तबका सड़क पर आया था ।पर उसके बाद जिस तरह के सवाल खड़े हुए उसका असर यकीनन जन मानस पर पड़ेगा।पर हम नए सिरे से प्रयास कर रहे है । जबकि मनीष सिसोदिया ने कहा-अन्ना का आंदोलन किसी राजनैतिक दल के खिलाफ नही है । कांग्रेस के खिलाफ जन दबाव इसलिए बनाया जा रहा है क्योकि वह केंद्र की सत्ता में है । यह बिल भाजपा , बसपा या समाजवादी दल अपने बूते पास नहीं करा सकते है । इसी वजह से हम कांग्रेस पर ज्यादा दबाव बना रहे है । उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में प्रदेश सरकार पर जो आरोप लग रहे है उससे टीम भी पूरी तरह सहमत है । हमने बांदा में भ्रष्टाचार का जो मुद्दा उठाया वह प्रदेश सरकार से ही जुड़ा हुआ था । आगे भी हम राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे । हमारा मानना है कि बसपा ,सपा ,कांग्रेस और भाजपा सभी में भ्रष्ट लोग मौजूद है इसलिए किसी एक दल को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता ।
जनसत्ता

Wednesday, October 19, 2011

हजारे के आंदोलन से दूर जा रहे है जन संगठन

अंबरीश कुमार
लखनऊ 19,अक्तूबर। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन संगठनों और आमजन का मोहभंग होता नजर आ रहा है । टीम अन्ना के वैचारिक भटकाव और बिखराव के चलते अब उसे वह समर्थन नहीं मिल रहा जो अगस्त में मिला था।इसका अहसास उत्तर प्रदेश के दौरे पर निकली टीम अन्ना के सदस्यों को भी होने लगा है। अगस्त में अन्ना के अनशन के दौरान जो लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे थे उनके लिए सैलाब और जन सैलाब जैसे विशेषण का इस्तेमाल किया गया था पर पिछले दो दिन में उत्तर प्रदेश में पश्चिम से पूरब तक का दौरा करने वाली टीम अन्ना की सभाओं में कही पांच सौ लोग आए तो कही हजार। यह अगस्त क्रांति का दूसरा पहलू है।बांदा,कानपुर,लखनऊ ,फैजाबाद से लेकर गोरखपुर टीम अन्ना ने दौरा किया और कांग्रेस विरोध की मजबूरी भी बताई साथ ही सपा ,बसपा और भाजपा पर भी निशाना साध कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि वे किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं खड़े है। अन्ना समर्थको का नया नारा है -न हाथ न हाथी ,हम है अन्ना के साथी । न साइकिल न कमल ,हम करेंगे अन्ना पर अमल । पर हिसार में जो गलती टीम अन्ना ने की उसका खामियाजा सामने आने लगा है । मंगलवार को जिस झूलेलाल पार्क में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का कार्यक्रम हुआ वह लखनऊ विश्विद्यालय समेत तीन बड़े और ऐतिहासिक कालेजों और दर्जन भर छात्रावासों से घिरा हुआ है । पर शाम छह बजे भी सारी कुर्सियां नहीं भर पाई थी । अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता मुन्ना लाल शुक्ल जो पिछली बार आमरण अनशन पर बैठे थे इस बार हताश थे । मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता से कहा - सौ बच्चों को तो मै हरदोई से लाया था पर फिर भी पांच सौ कुर्सियां नहीं भर पाई क्योकि हमारे नेता कई खेमे में बंट गए है। सौरभ ने तो एलान कर रखा था कि अगर सक्सेना के लोगों ने मंच पर जाने की कोशिश की तो हमारे लड़के उन्हें तोड़ डालेंगे ।वैसे भी वह गांधी की अहिंसा और मद्य निषेध आदि को फालतू मानता है,कहता है आजादी तो गरम दल वालों ने दिलवाई थी। यह बानगी है आंदोलन का संचालन करने वाले नेताओं की दृष्टि की।
अन्ना आंदोलन के एक नेता ने नाम न देने क शर्त पर कहा -अगस्त में जब अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ तो सभी विचारधाराओं के लोग उसमे शामिल हुए और बड़ी संख्या में जन संगठनों के कार्यकर्त्ता थे। पर जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ा आंदोलन में शामिल नेताओ का टकराव और वैचारिक संकट भी बढ़ा। पहली आपति आंदोलन के तौर तरीकों को लेकर हुई। आंदोलन और नेता को एक एकरांड बनाने के सवाल पर पहला मतभेद हुआ तो दूसरा विचारधारा को लेकर । वंदेमातरम के नारे से लेकर दक्षिणपंथी ताकतों से संबंधो पर अगर पहले सफाई दे दी जाती तो आंदोलन पर संघ का ठप्पा तो नहीं लगता। दूसरे चुनावी दखल से हर हालत में बचाना चाहिए था क्योकि यह लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की थी किसी दल को हराने की नहीं।jansatta

किरण बेदी ने छूट की टिकटों पर संस्थाओं से वसूले पूरे पैसे


अजमेर सिंह
नई दिल्ली,अक्तूबर। संसद सदस्यों को अपने रामलीला घुंघट के अभिनय से चिढ़ाने वाली और अण्णा टीम की सबसे मुखर सदस्य किरण बेदी को कुछ स्पष्टीकरण देना पड़ सकता है। मसला है सेमिनार और सभाओं के लिए बुलाए जाने पर एनजीओ और संस्थाओं से यात्रा खर्च बढ़ाकर वसूलने का।
द इंडियन एक्सप्रेस के पास उपलब्ध बिलों,रसीदों और चैक की प्रतिलिपियों के रिकार्ड बताते हैं कि बहादुरी पुरस्कार प्राप्त बेदी को एअर इंडिया की टिकटों के किराए में छूट मिलती है, इसके बावजूद उन्होंने मेजबान संस्थाओं से पूरे पैसे वसूले। यही नहीं इकानामी क्लास में सफर कर उन्होंने बिजनेस क्लास का किराया भी वसूला।द इंडियन एक्सप्रेस के पास ऐसे 12 उदाहरणों के रिकार्ड हैं। इनमें से कई पुराने 2006 के भी हैं जब बेदी आईपीएस अधिकारी के रूप में सेवारत थीं।

उनकी हाल की ऐसी यात्रा का बिल 29 सितंबर को भेजा गया, जिसमें किराए की रकम बढ़ा कर दी गई है।
इन किराए के चैकों का भुगतान एनजीओ इंडिया वीजन फाउंडेशन को किया गया, बेदी इसकी प्रमुख हैं। उसके चार्टर्ड एकाउंटेंट सुरेश व्यास ने कहा कि जिसे आप गड़बड़ी कह रहे हैं, वह दरअसल उनकी ‘बचत’ है, क्योंकि बेदी ने उससे कम खर्च किया जितना उनको भुगतान किया गया। इस रकम का उपयोग मुद्दों से जुड़ी उन यात्राओं पर किया जाता है जिसके लिए बेदी को कोई भुगतान नहीं होता।
फरवरी, 2001 के सरकारी दिशानिर्देश के मुताबिक बहादुरी पुरस्कार विजेताओं को एअर एंडिया के विमान के इकानामी क्लास के टिकटों पर 75 फीसद की छूट मिलेगी। बेदी को 1979 में बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया था। उनका जीए(बहादुरी पुरस्कार) क्रमांक 433 है।जनसत्ता से

सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ


अंबरीश कुमार
लखनऊ अक्टूबर। असरार उल मजाज अगर जिंदा होते तो जिंदगी के सौंवे साल में आज कदम रखते, जिसे आमतौर पर आदमी की उम्र का पूर्णांक माना जाता है। लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह सुब्ह-ए-नौ मनाने की तैयारी शुरू हो गई है । इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। लखनऊ मजाज के जीवन के सौ साल पर उन्हें याद करने जा रहा है जिन मजाज लखनवी को जिंदगी से सिर्फ 44 साल ही मिल सके। इसके बावजूद मजाज़ लखनवी को उर्दू अदब में उनके दीर्घायु होकर रूखसत हुए तरक्कीपसंद समकालीनों फैज अहमद फैज,अली सरदार जाफरी,और मजरूह सुल्तानपुरी आदि के बराबर या कई मायनों में अधिक रूतबा हासिल है।
खुद फैज अहमद फैज उर्दू के तरक्कीपसंद इंकलाबी शायरों में मजाज़ को सबसे अनोखा और सहज मानते थे। मजाज़ के एकमात्र काव्य संग्रह आहंग की भूमिका में फैज अहमद फैज ने मजाज के बारे में लिखा है- ‘मजाज़ की इन्कलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इन्कलाब को लेकर गरजते हैं,सीना कूटते हैं इन्कलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वे इन्कलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते’ आज भले ही फैज अहमद फैज को बीसवी सदी के सबसे लोकप्रिय उर्दू शायर के रूप में पहचाना जाता हो लेकिन उर्दू के सभी जानकार इस बात को मानते हैं कि अपनी जिंदगी में जो लोकप्रियता मजाज़ लखनवी को हासिल थी वैसी तबतक किसी दूसरे शायर के हिस्से में नहीं आई थी। मजाज की इस लोकप्रियता के साथ उनके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दिनों की कहांनियां भी जुड़ी हैं जिनके बारे में इस्मत चुगताई और अली सरदार जाफरी समेत उर्दू के तमाम बड़ी हस्तियों ने लिखा है। १९ अक्टूबर १९११ को बाराबंकी के रूदौली कस्बे में जन्मे असरार उल हक मजाज ने लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़नी तब शुरू की जब वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे। बेहद कम उम्र में मजाज़ लखनवी ने जिस तरह साम्राज्यवाद,पूंजीवाद के विरोध में और स्त्री-मुक्ति के विषय में जैसी नज्में कहीं उसने जानकारों को हैरत में डाल दिया। मजाज के बारे में आलोचकों की ये हैरत आज भी कायम है।मजाज़ के साथ कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके चुनिंदा लोगों में से एक प्रो. शारिब रूदौलवी ने कहा- ‘यकीनन अगर मजाज को उतनी उम्र मिली होती जितनी जोश,फिराक, फैज या जाफरी को मिली तो न जाने वे उर्दू को और क्या क्या दे चुके होते.’ मजाज के बारे में ये बात भी चौंकाती है कि कालजयी इंकलाबी नज्मों के रचयिता होने के साथ ही उनकी शायरी की रूमानियत भी इतनी गहरी है कि उन्हे उर्दू शायरी का कीट्स भी कहा जाता है। यहां ये जान लेना जरूरी है कि मजाज़ के अविस्मरणीय होने की वजह सिर्फ उनकी शायरी ही नहीं बल्कि उनकी हाजिरजवाबी भी है जिसकी मिसालें उनके शहर लखनऊ में आज भी सुनने को मिल जाती हैं। गौरतलब है कि लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह, सुब्ह-ए-नौ आगामी २४ अक्टूबर को भारतेंदु नाट्य अकादमी के सभागार में मनाया जाएगा। इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। समारोह का आयोजन लखनऊ सोसाइटी की तरफ से किया जा रहा है जो कि लखनऊ की तहजीब के प्रति युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से काम कर रही है। संस्था के सदस्य आरजू ने बताया- ‘मजाज लखनवी का मकाम उर्दू साहित्य में बहुत बड़ा है लेकिन दुर्भाग्य से आज युवा पीढ़ी उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती। जन्मशताब्दी वर्ष में भी युवाओं में उनको लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं दिख रही। इस आयोजन के जरिए मजाज को श्रद्धांजलि देने के साथ ही लोगों में उनके प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश होगी।’ कार्यक्रम का शीर्षक मजाज के लखनऊ पर कहे गए मशहूर शेर से निकलता है- ‘अब इसके बाद सुब्ह है और सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ’ ।jansatta

Monday, October 17, 2011

मायावती सरकार के भ्रष्टाचार पर टीम अन्ना की ख़ामोशी


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर।टीम अन्ना ने आज उत्तर प्रदेश के बांदा से अपना अभियान शुरू किया पर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मायावती सरकार के खिलाफ कोई एलान नहीं किया। इस पर उत्तर प्रदेश के राजनैतिक दलों के साथ उत्तर प्रदेश में अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता राम धीरज ने भी हैरानी जताई है।समाजवादी पार्टी ने साफ़ कहा कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी मायावती सरकार से डर कर अन्ना हज़ारे भाग गए। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई मायावती सरकार के खिलाफ कोई कार्यक्रम लिए बिना अधूरी है और ऎसी लड़ाई पाखंड मानी जाएगी । बांदा में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस के खिलाफ अपना अभियान जारी रखते हुए लोगों से अपील की कि जन लोकपाल बिल अगर शीतकालीन सत्र में पास नहीं होता है तो कांग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए। ख़ास बात यह थी कि जिस बांदा से टीम अन्ना ने अपना अभियान शुरू किया वहा पर सत्तारूढ़ दल के असरदार मंत्री के भ्रष्टाचार के चलते एक पुल भी टूट चूका है और एक स्कूल की छत भी । पर टीम अन्ना ने इस सबको नजरंदाज कर दिया जिससे विपक्ष हैरान था ।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - यह टीम अन्ना क्या होती है ,जो कुछ है अन्ना हजारे है और वे मायावती सरकार से डर कर भाग चुके है । भ्रष्टाचार की कोई लड़ाई इस तरह के पाखंड से नहीं होती है । हम लोग यहाँ लाठी गोली खाकर भ्रष्टाचार से लड़ रहे है । इस लड़ाई की कीमत समाजवादी कार्यकर्ताओं ने प्रदेश की सड़कों पर निकल कर चुकाई है । हमारे नौजवान नेताओं के सर पर पुलिस अफसरों ने बूट रखकर कुचला है । हम हवा हवाई लड़ाई नहीं लड़ते है । इस बीच जयप्रकाश आंदोलन के नेता और अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सर्वसेवा संघ के सचिव राम धीरज ने टीम अन्ना के कांग्रेस विरोध पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है । राम धीरज ने जनसत्ता से कहा -अगर भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो किसी एक पार्टी के खिलाफ ही अभियान क्यों । उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के खिलाफ जन आक्रोश बढ़ रहा है और अगर हमारे साथी सिर्फ कांग्रेस के विरोध की बात करेंगे तो हां सब की साख ख़त्म हो जाएगी। बेहतर तो यही होगा कि आमजन को हर भ्रष्ट नेता के खिलाफ लामबंद किया जाए । इस बात से अन्ना आंदोलन के कई साथी सहमत भी है । जन संघर्ष मोर्चा ने भी टीम आन्ना के एक तरफ़ा कांग्रेस विरोध पर हैरानी जताई है । मोर्चा के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा -अन्ना के आंदोलन को बड़ा समर्थन मिला था पर अब उसकी दिशा बदल रही है जिससे आंदोलन और बदलाव की ताकतों को धक्का लगा है ।
इस बीच कांग्रेस ने भी टीम अन्ना के रुख पर हैरानी जताई है । प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि अन्ना हजारे की टीम उत्तर प्रदेश में यदि आती है तो कांग्रेस पार्टी उनका स्वागत करती है, लेकिन टीम अन्ना को प्रदेश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करना होगा, जिससे प्रदेश की जनता त्रस्त है और कांग्रेस पार्टी उस भ्रष्टाचार के विरोध में संघर्ष कर रही है। उन्होने कहा कि यदि टीम अन्ना बसपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगी तो कांग्रेस पार्टी और प्रदेश की जनता टीम अन्ना का समर्थन करेगी। उन्होने कहा कि स्वयं अन्ना हजारे के जरिए यह संदेश आया है कि यदि संसद शीतकालनी मजबूत जनलोकपाल बिल आती है तो वह कांग्रेस के साथ काम करेंगे। ऐसे में अन्ना टीम को मायावती जी के भ्रष्टाचार के विरोध में ध्यान केन्द्रित करना करना चाहिए।
जनसत्ता

Saturday, October 15, 2011

टीम अन्ना मुश्किल में ,कांग्रेस के तेवर बदले


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर। कार्नाटक के मुख्यमंत्री यदयुरप्पा के जेल जाते ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को नई उर्जा मिल गई है । बदलते राजनैतिक माहौल से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर उम्मीद नजर आने लगी है जो भ्रष्टाचार को लेकर चारो और से घिरी हुई थी ।एक तरफ टीम अन्ना तो दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था । भ्रष्टाचार के मामले में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री यदयुरप्पा को जेल और उत्तर प्रदेश में फीकी पड़ी आडवाणी की रथ यात्रा के बाद बचाव की मुद्रा में चल रही कांग्रेस अब आक्रामक हो गई है ।कांग्रेस ने आज कहा -भ्रष्टाचार पर भाजपा की कलई खुल गई है। भ्रष्टाचार पर भाजपा का बड़ा नेता जेल जाता है और आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ उत्तर प्रदेश में अभियान छेड़ने का आवाहन करते है । प्रदेश की जनता सब देख रही है। इस मामले से राजनैतिक एजंडा में फंसी टीम अन्ना की भी मुश्किलें बढ़ गई है जो उत्तर प्रदेश में अभियान छेड़ने की तैयारी में है क्योकि भजनलाल की संसदीय सीट रही हिसार में कांग्रेस का विरोध बहुत आसान था पर उत्तर प्रदेश की राजनीति काफी जटिल है। यहां अन्ना की टीम भी कई खेमो में बंटी है और नेताओं का अपना कोई जनाधार भी नहीं है। हिसार चुनाव में दखल देने पर टीम अन्ना के उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश के नेता भी काफी खरी खरी सुना चुके है । संतोष हेगड़े और मेधा पाटकर का विरोध भी सार्वजनिक हो चुका है ।इन सबके चलते कांग्रेस को ज्यादा राहत मिली है ।
कांग्रेस को ज्यादा दिक्कत भाजपा समर्थक अगड़ी जातियों के साथ समाजवादी पार्टी की तरफ बढ़ते मुस्लिम समुदाय को लेकर थी ।भाजपा की रथ यात्रा को ज्यादा समर्थन न मिलने से कांग्रेस ने राहत की सांस ली है । पर मुस्लिम समुदाय को लेकर पार्टी अभी निश्चिन्त नहीं है । हालांकि पीस पार्टी के जरिए समाजवादी पार्टी के मुस्लिम जनाधार को में सेंध लगाने की कोशिश भी हो रही है जिसे परदे के पीछे से शह भी दी जा रही है।इस सबके बावजूद राहुल गांधी ने बुंदेलखंड से दोबारा जो अभियान शुरू किया है उससे भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को काफी ताकत मिली है।इस बीच भाजपा की रथ यात्रा को कोई बड़ा जन समर्थन न मिलने से भी कांग्रेस का राजनैतिक फायदा हुआ है । दरअसल भाजपा और कांग्रेस का वोट बैंक मिला जुला है और एक फायदा दूसरे के नुकसान की कीमत पर होता है । इसी वजह से कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाली टीम अन्ना के साथ भाजपा पर और आक्रामक हो गई है ।
पार्टी महासचिव और प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे को उत्तर प्रदेश में आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करने की लगातार चुनौती देते रहे है पर इसे कोई स्वीकार नहीं कर रहा। राजनैतिक टीकाकार सीएम शुक्ल ने कहा -दरअसल हिसार चुनाव जहां कांग्रेस की हार पहले से तय मानी जा रही थी वहां पर टीम अन्ना का कांग्रेस हराओ का नारा लोगों को कुटिल राजनैतिक चाल जैसा लगा जिसमे कांग्रेस के हारते ही श्रेय मिल जाता। जबकि बच्चा बच्चा जनता है कि भजनलाल की सीट पर उनके पुत्र के जितने की संभावना सबसे ज्यादा होगी। इसी मुद्दे पर अन्ना की टीम भी बंट गई । अब उत्तर प्रदेश में मायावती को छोड़ अगर कांग्रेस को हराने का नारा दिया जाता तो और फजीहत होती । दूसरी तरफ कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा -भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वालों की कलई खुल गई है। यदयुरप्पा के जेल जाने के बाद कसी ने भाजपा के खिलाफ भी अनशन का एलान नहीं किया । आडवाणी रथयात्रा निकाल रहे है और उनके आभियान की कमान जिनके हाथों में है वे भ्रष्टाचार को लेकर ही मंत्रिमंडल से हटाए गए थे । आने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा और उनके समर्थको को भी पता चल जाएगा जो संघ के साथ आंदोलन कर रहे थे ।
साफ़ है कि कांग्रेस नए हालात में भाजपा के साथ टीम अन्ना पर भी निशाना जरुर साधेगी । यह भी संयोग है कि इतने बड़े विवाद के छिड़ते ही अन्ना ने मौन व्रत धारण कर लिया है । वैसे भी कर्नाटक के बारे में उन्होने कोई टिपण्णी से इनकार कर दिया था । जनसत्ता

Friday, October 14, 2011

रथ यात्रा को लेकर उत्साह नही

अंबरीश कुमार
मिर्जापुर , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री पद के मुख्य दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा बिना कोई राजनैतिक असर डाले चली गई। रथ यात्रा को लेकर आमजन में तो कोई उत्साह नही ही था पार्टी कार्यकर्ताओं का भी उत्साह पहले जैसा नहीं रहा । इसका बड़ा श्रेय उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेताओं का टकराव ,अंह और राजनैतिक प्रबंधन को भी जाता है। ख़ास बात यह है कि आडवाणी की यात्रा उत्तर प्रदेश के एक किनारे से बाहर निकल गई वरना और फजीहत होती । मुगलसराय ,वाराणसी और फिर मिर्जापुर में आडवाणी की जन सभा हुई पर उस काशी में मंदिर आंदोलन के नायक की सभा फ्लाप हो जाना जो पार्टी के एजंडा में रहा है सभी को हैरान करने वाला है । वाराणसी के सांसद भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी है तो पार्टी के दो मौजूदा विधायक भी यही के है। अफसरों से गाली गलौच के साथ बात करने वाला बिगडैल मेयर भी भाजपा का है । इस सबके बावजूद बनारस के भारत माता मंदिर परिसर में आडवानी की जन सभा में करीब चार हजार लोगों का इकठ्ठा हो पाना जन चेतना यात्रा की हवा बिगाड़ने के लिए काफी है।यह संख्या भी कुछ ज्यादा मानी जा रही है । गनीमत यह हुई की मिर्जापुर में बहुजन समाज पार्टी की तरफ से दागी मंत्री रंगनाथ मिश्र का टिकट कर एक मुस्लिम उम्मीदवार को दे दिया गया जिसके चलते मजहबी ध्रुवीकरण और बसपा के बागी नेता व उनके समर्थकों ने परदे के पीछे से आडवाणी की सभा को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई । इससे यह भी साबित होता है कि पार्टी के नेता अगर ताकत लागाते तो काशी से आडवाणी का बड़ा राजनैतिक संदेश जाता।
उत्तर प्रदेश में आडवाणी की मुगलसराय में होने वाली जन सभा को लेकर दिन भर नाटक चला क्योकि प्रशासन ने पहले रेलवे मैदान में जन सभा की इजाजत दी फिर रद्द कर दी अंततः दबाव बढ़ने पर इजाजत देनी पड़ी । इस सबके चलते लोग उस जन सभा में पहुंचे भी। पर काशी से आडवाणी जिस जोश खरोश के साथ समूचे देश को राजनैतिक संदेश देना चाहते थे वह नही हो पाया । शहर के बीच में जन सभा रखी गई जिसमे आम लोग कम और पार्टी कार्यकर्त्ता ज्यादा थे । मुरली मनोहर जोशी यहाँ के सांसद तो है ही साथ ही पार्टी पर भी उनका काफी असर है ।वे भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाते है । दबी जबान में भाजपा के नेता इशारा भी करते है कि जोशी ने कोई दिलचस्पी इस यात्रा के कार्यक्रम में नही ली । भाजपा के एक नेता ने नाम न देने की शर्त पर कहा -उत्तर प्रदेश में हर बड़ा नेता जब एक दूसरे की टांग खीचेगा तो क्या होगा । सभी जानते है कि जनसभा में भीड़ लाना एक राजनैतिक प्रबंधन का काम होता है जो सभी दल करते है । फिर भीड़ लेन बाद वह उसे कुछ देर बैठाने का इंतजाम करना पड़ता है । यहां तपती धूप में न तो शामियाना लगाया गया और न पानी का इंतजाम था । यह सब तो भाजपा के स्थानीय नेताओं को करना था और इसकी निगरानी कार्यकर्ताओं के पैसे पर पलने वाले संगठन मंत्रियों को करनी थी । यह सब नहीं किया गया वर्ना काशी की सभा फ्लाप नहीं होती ।
पर इससे बड़ा सवाल यह भी खड़ा हुआ कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवाणी की रथ यात्रा को कोई बड़ा जन समर्थन क्यों नहीं मिला । अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी उत्तर प्रदेश में उस तरह का जन उभार सामने नही आया था जिस तरह दिल्ली में दिखलाया जा रहा था। उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल बन रहा है जिसमे भाजपा और कांग्रेस सपा-बसपा से पीछे है। मुख्य लड़ाई सपा और बसपा में मानी जा रही है और यही दोनों दल जमीन पर टकरा रहे है ऐसे में कांग्रेस और भाजपा की राजनैतिक जगह काफी कम होती जा रही है। फिर उत्तर प्रदेश की राजनैतिक लड़ाई में जाति और संप्रदाय की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है । फिलहाल कोई मजहबी टकराव का माहौल नहीं है इसलिए भाजपा की कोई बड़ी भूमिका नहीं बन पा रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के राजनैतिक माहौल पर भाजपा के नेताओं का कोई ज्यादा असर भी नहीं पड़ पा रहा है। मिर्जापुर की जनसभा में आए एक बुजुर्ग सूरज प्रसाद ने कहा - आडवाणी कई बार रथ यात्रा कर चुके और उनसे एक वर्ग की यह अपेक्षा थी कि वे अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण करा देंगे जो उनका नारा और वादा था। पर जब यह नहीं हो पाया तो मान लिया गया कि सत्ता में आने के लिए पार्टी ने राम के नाम का इस्तेमाल किया। इसीलिए आडवाणी या किसी भी भाजपा नेता की रथ यात्रा का अब असर होता दिखाई नहीं पड़ता । दूसरे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने से पहले आडवानी को पार्टी से भ्रष्ट नेताओं को बाहर करना होगा । दोहरे मानदंडों की वजह से ही पार्टी की साख खराब हुई है जिसके चलते लोगों का आडवाणी से भी मोहभंग हुआ है ।
वाराणसी के बाद आडवानी जब मिर्जापुर में बोले तो फिर मंदिर के मुद्दे पर भी लौट आए। मिर्जापुर काफी समय से भाजपा का गढ़ रहा है जिसके चलते यहां आडवाणी को लोग सुनने भी पहुंचे । दूसरे बसपा ने दागी मंत्री रंगनाथ मिश्र का टिकट काट कर मुस्लिम उम्मीदवार को दे दिया जिसकी प्रतिक्रिया भी हुई। इस मामले में मिर्जापुर को संवेदनशील भी माना जाता है । यह स्थानीय वजह है जिससे कोई राजनैतिक आकलन करना उचित नहीं होगा ।पर कुल मिलकर आडवाणी की रथ यात्रा का उत्तर प्रदेश के राजनैतिक अरिद्रिश्य पर कोई असर पड़ता नजर नहीं आता है ।

Thursday, October 13, 2011

यह यात्रा निर्माण के लिए -आडवाणी


अंबरीश कुमार
वाराणसी , अक्तूबर । करीब दो दशक पहले अपनी रथयात्रा के चलते बाबरी ढांचे को ध्वंस के मुकाम तक पहुंचाने वाले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने आज यहां साफ किया कि यह यात्रा निर्माण के लिए है । आज यहां भारत माता मंदिर परिसर में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि जन चेतना यात्रा भारत निर्माण के लिए है । उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने आज काशी से भाजपा के चुनाव अभियान का शुभारंभ किया । प्रदेश में विधान सभा चुनाव की तैयारियों के बीच आडवाणी की जन चेतना यात्रा आज जब वाराणसी पहुंची तो उसका राजनैतिक और धार्मिक विस्तार होता नजर आया ।
भाजपा प्रतीकों के राजनैतिक इस्तेमाल में माहिर है और अब भ्रष्टाचार ,अपराध से लेकर विकास तक के मुद्दे को अयोध्या ,मथुरा और काशी के साथ जोड़ रही है । आज यहां आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा का यह नया अभियान शुरू हुआ । आडवाणी जन चेतना पर सवार होकर जयप्रकाश नारायण के गांव से उत्तर प्रदेश होते हुए देश के दूसरे हिस्से में जा रहे है तो कलराज मिश्र काशी से और राजनाथ सिंह मथुरा से जन स्वाभिमान रथयात्रा कर अयोध्या पहुंचेगे । देश और प्रदेश की इन यात्राओं मकसद राजनैतिक है जिसके केंद्र में फिलहाल उत्तर प्रदेश का चुनाव है । आज यहां भारत माता मंदिर परिसर में भाजपा की जनसभा में दिग्गज भाजपाई जुटे,हर हर महादेव का नारा भी गूंजा पर राम लला हम आएंगे..... वाला उत्साह नजर नहीं आया । इस मौके पर आडवाणी ने कहा -यह यात्रा किसी राजनैतिक मकसद के लिए नहीं बल्कि महान भारत के निर्माण के लिए है । इसके पहले कल उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश पहुंचने के बाद अपनी पहली जनसभा में मायवती सरकार पर भी निशाना साधा था । उन्होने कहा कि यह यात्रा उनकी या भाजपा की नहीं बल्कि घोर भ्रष्टाचार पर सरकार की चुप्पी से निराश जनता को मायूसी से उबारकर उसमें नया विश्वास पैदा करने की यात्रा है।
आडवाणी ने कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन और राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटालों से देश का आत्मविश्वास हिल गया है। जनता इस बात से चिंतित है कि सरकार इतने भयंकर घोटालों पर कुछ कर क्यों नहीं रही है। इसके कारण निराशा छाई है। हमें भारत के एक-एक नागरिक को इस घोर निराशा से उबारकर उसमें आत्मविश्वास पैदा करना है। उन्होंने कहा कि जन चेतना यात्रा का लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा से कोई संबंध नहीं है। यह यात्रा मूलत: इस कल्पना से जुड़ी है कि किसी देश में अगर इस तरह का भ्रष्टाचार चलता रहे और उस देश का इतना धन विदेशी बैंकों में पड़ा रहे तो क्या असीमित संभावनाओं वाला वह देश आगे बढ़ सकता है। आडवाणी ने कहा कि भ्रष्टाचार ही महंगाई का प्रमुख कारण है। हम विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे और देश के छह लाख गावों को बिजली, पानी, सड़क और स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाओं से युक्त किया जाएगा। जो देश आज निर्धन लगता है, वह धनवान हो जाएगा। हमें यह काम करके दिखाना है। उन्होने ने कहा कि हमें 1947 में आजादी मिली थी । देश को आजाद करवाने वाले महात्मा गाधी, पंडित नेहरू और सरदार भगत सिंह जैसे लोगों ने सोचा था कि कुछ ही सालों में देश की तस्वीर बदल जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने कहा कि मैं देश को यह संकल्प लेते देखना चाहता हूं कि भ्रष्टाचार मिटाएंगे, नया भारत बनाएंगे।
भाजपा भी आडवाणी की इस जन चेतना यात्रा के जरिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछले दिनों सामने आए जन उभार की दिशा को अपनी तरफ मोड़ना चाहती है । वहीँ दूसरी तरफ पार्टी अपने पुराने एजंडा से दूर भी नहीं होना चाहती है इसलिए राजनैतिक यात्राओं के इस नए पैकेज में सब शामिल है । भ्रष्टाचार ,काला धन ,मान,सम्मान,स्वाभिमान के साथ अयोध्या ,मथुरा और काशी भी । यही वजह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने के दो दिन के भीतर ही आडवाणी काशी विश्वनाथ के मंदिर पहुंचे तो कलराज मिश्र की काशी से अयोध्या की जन स्वभिमान यात्रा को हरी झंडी भी दी । आडवाणी अब वाराणसी से मिर्जापुर होते हुए मध्य प्रदेश जा रहे है । आडवाणी उत्तर प्रदेश से बाहर दूसरे राज्यों में जाएंगे पर कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह काशी ,मथुरा से अयोध्या तक पार्टी के पक्ष में माहौल बनाएंगे । आज भारत माता मंदिर परिसर में हुई भाजपा की जनसभा में आई भीड़ को लेकर पार्टी के दिग्गज नेता मायूस जरुर हुए । मंदिर परिसर का मैदान काफी छोटा है । फिर भी पूरा नहीं भर पाया हालांकि भाजपा नेताओं ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा कि कड़ी धूप के चलते लोग वहां रुक नहीं पा रहे थे ।
इस बीच उमा भारती ने प्रधान मंत्री पद के लिए लाल कृष्ण आडवाणी को योग्य उम्मीदवार बता कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नई चुनौती दे दी। उमा भारती ने कहा कि वर्तमान चुनौतियों से निपटने में आडवाणी ही सक्षम हैं। उमा ने वाराणसी के हवाले से कहा कि वाराणसी की धरती पर जो आता है वो पीएम तक बनता है। उन्होंने कहा कि आडवाणी की रथयात्रा देश की राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन लाएगी। उमा भारती का ये भी कहना है कि सरकार को चुनौती देने में सिर्फ आडवाणी ही सक्षम हैं। काशी विश्वनाथ की नगरी से जो निकलता है वो भ्रष्टाचार का सफाया करता ही हैं साथ ही वो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचता है। वहीँ कलराज मिश्र ने जनसत्ता कहा- स्वाभिमान यात्रा आमजन के स्वाभिमान को बचाने के लिए हो रही है । उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के साथ कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है । सत्तारूढ़ दल के विधायक से लेकर मंत्री तक तरह तरह के अपराधों में लिप्त हो चुके है । हत्या ,बलात्कार ,वसूली और जमीन पर कब्ज़ा जैसे मामलों में मंत्री विधायक जब जेल में जाने लगे तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है । कलराज मिश्र ने यह भी साफ़ किया कि अयोध्या ,मथुरा और काशी का मुद्दा पार्टी से दूर नही गया ।जनसत्ता

Sunday, October 9, 2011

अन्ना हजारे के आंदोलन की फसल काटने में जुटी भगवा ब्रिगेड

हमारी भाषा ही बोल रहे है हजारे और केजरीवाल -मोहन भागवत
अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की फसल काटने के लिए भगवा ब्रिगेड पूरी तरह तैयार हो गई है । गोरखपुर में संघ प्रमुख मोहन भगवत ने हजारे के आंदोलन को लेकर पूछे गए सवाल पर साफ़ कहा कि अन्ना हजारे और केजरीवाल वही कह रहे है जो मै अपने भाषणों में कहता रहा हूँ । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के अभियान का संघ ने समर्थनकिया था । जबकि भाजपा १३ अक्तूबर से भ्रष्टाचार-अपराध मुक्त और विकास युक्त उत्तर प्रदेश के नारे के साथ पांच हजार किलोमीटर की जन स्वाभिमान यात्रा काशी से शुरू करने जा रही है। इसी दिन लाल कृष्ण आडवाणी का रथ भी काशी पहुंचेगा और भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल की धार तेज करेगा ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का उत्तर प्रदेश के कुछ शहरी इलाकों में भी असर पड़ा था पर आगे का कोई कार्यक्रम न होने और प्रदेश में अन्ना की कमजोर और कई धडों में बंटी टीम अन्ना के चलते आंदोलन से बने माहौल को भुनाने में भाजपा जुट गई है । यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों में संघ ने अन्ना के आंदोलन में पूरी ताकत भी झोंकी थी । कई शहरों में उन स्कूलों के बच्चों ने ज्यादा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जो संघ कार्यकर्ताओं के थे । यह लखनऊ से लेकर गोरखपुर तक हुआ । इसलिए मोहन भागवत जो कह रहे है उसे पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता । अब संघ परिवार और भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन को एक राजनैतिक मुकाम तक पहुंचाने में जुट गई है । आडवाणी की रथ यात्रा १३ अक्तूबर को काशी पहुंचेगी और उसी के साथ राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र की यात्रा शुरू हो जाएगी । भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से समाज में एक चेतना विकसित हुई है । भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ पहले से अभियान छेड़े हुए है और अब पार्टी इस आंदोलन को और तेज कर रही है । प्रदेश में १३ अक्तूबर से शुरू होने वाले कार्यक्रम इसी दिशा में है । इस बीच भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि राजनाथ सिंह कलराज मिश्र के नेतृत्व में दीनदयाल धाम, मथुरा एवं भारत माता मंदिर , काशी से शुरु होने वाली लगभग पांच हजार किलोमीटर की जन स्वाभिमान यात्रा उत्तर प्रदेश के 62 जिलों के साथ तीन सौ सत्तर विधान सभा क्षेत्रो से गुजरते हुए भ्रष्टाचार-अपराध मुक्त एवं विकास युक्त उत्तर प्रदेश के संदेश को घर-घर तक पहुंचाएगी । केन्द्रीय चुनाव प्रबंधन और समन्वय के मुखिया नकवी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के छह करोड़ मतदाताओं तक अपना संदेश पंहुचाने के लक्ष्य के साथ जन स्वाभिमान यात्रा के दौरान सम्पर्क संवाद, समाधान कार्यक्रम के तहत एक हजार से ज्यादा सभाएं, संवाद चौपालें, संकल्प पंचायतों, समरसता भोजों एवं विजय संकल्प समागम के प्रभावी कार्यक्रम होंगे ।
जन स्वाभिमान यात्रा का पहला चरण आगामी 13 अक्टबूर से 22 अक्टूबर तक मथुरा से खीरी तक और वाराणासी से जालौन तक होगा, वहीं दूसरा चरण 9 नवम्बर से बहराईच से अयोध्या,हमीरपुर से अयोध्या तक होगा, 17 नवम्बर को दोनों यात्राएं अयोध्या में एकत्रित होगी जहां विजय संकल्प समागम के तहत बड़ा कार्यक्रम होगा। इन यात्राओं में मुरली मनोहर जोशी , उमा भारती, विनय कटियार, मुख्तार अब्बास नकवी, सूर्यप्रताप शाही, ओमप्रकाश सिंह, हुकुम सिंह, लाल जी टंडन, अशोक प्रधान रामनाथ कोविद आदि अलग-अलग स्थानों पर यात्रा के साथ रहेंगें।
नकवी ने बताया कि 13 अक्टूबर को मथुरा से शुरु होने वाली राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली जन स्वाभिमान यात्रा के शुभआरम्भ के अवसर पर एनडीए संयोजक शरद यादव, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, विनय कटियार, हुकुम सिंह, अशोक प्रधान, रामनाथ कोविद, रमापति राम त्रिपाठी आदि मथुरा में मौजूद रहेंगे, वहीं काशी से शुरु हो रही कलराज मिश्र की यात्रा का लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी , आशीवाद और तिलक लगाकर शुभारम्भ करेंगें। कलराज मिश्र 13 अक्टूबर को वाराणसी से मिर्जापुर होते हुए मध्यप्रेदश सीमा तक लालकृष्ण आडवाणी की जन चेतना यात्रा के साथ रहेंगें। जनसत्ता

Saturday, October 8, 2011

बाहुबलियों का नया गुरुकुल बन रही है पीस पार्टी


अंबरीश कुमार

लखनऊ , अक्तूबर । पूर्वी उत्तर प्रदेश में काफी जोर शोर से आगे बढ़ रही पीस पार्टी जिसे लोग वोट कटवा पार्टी कहते थे अब बाहुबलियों का गुरुकुल बनती नजर आ रही है । प्रदेश की दो बहुबालियों के बाद अब तीसरे की बारी है । रायबरेली के माफिया डान अखिलेश सिंह पार्टी के महासचिव है । फैजाबाद के बाहुबली और विधायक जितेन्द्र सिंह उर्फ़ बबलू को बसपा ने किनारे लगाया तो वे भी पीस पार्टी में शामिल हो गए । अब जौनपुर के बाहुबली और सांसद धनंजय सिंह की बारी मानी जा रही है जिनके पिताजी राजदेव सिंह का टिकट बसपा ने काट दिया था । वे भी पीस पार्टी के उम्मीदवार बन सकते है । करेला और नीम चढ़ा की तर्ज पर पीस पार्टी का पूर्वांचल के बाहुबली मुख्तार अंसारी और अफजाल अंसारी के कौमी एकता दल से चुनावी तालमेल है । विभिन्न दलों के करीब डेढ़ दर्जन विधायक पीस पार्टी में शामिल होने वाले है जिनमे बाहुबल वाले भी है । पीस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर अब्दुल मन्नान ने जनसत्ता कहा -हमारी पार्टी गोरखपुर से गाजियाबाद तक मजबूती से लड़ने जा रही है । बसपा तो सौ सीटों के भीतर ही सिमट जाएगी और समाजवादी पार्टी को कई जिलों में हम शिकस्त देंगे । फिलहाल कांग्रेस से बात चल रही है । अगर वे सौ सीटें दे दे तो बात बन जाएगी ।
पूर्वांचल में बाहुबलियों की राजनीति का दबदबा रहा है और कई जगहों पर वे अपनी ताकत और दबदबे की वजह से ही जीत जाते है । पिछली बार लोकसभा के चुनाव के दौरान बाहुबली धनंजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रहे इंडियन जस्टिस पार्टी के उम्मीदवार बहादुर सोनकर की हत्या कर उसे बबूल के पेड़ पर टांग दिया गया था और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने दूसरे दिन ही जौनपुर में यह मामला उठाया पर मायावती ने तब कोई कार्यवाई नहीं की । इससे धनंजय सिंह के दबदबे का अंदाजा लगाया जा सकता है । बाहुबली धनंजय सिंह का आशीर्वाद इस पीस पार्टी को मिल गया है । यही वजह है कि पूर्वांचल में पीस पार्टी के बढ़ते असर से लोगों को शांत माहौल में खलल पड़ने का अंदेशा सताने लगा है।जब मुख्तार अंसारी से से लेकर जितेंद्र सिंह बबलू ,अखिलेश सिंह और धनंजय जैसे बाहुबली एक साठ खड़े होंगे तो अन्य दलों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है ।
पीस पार्टी भी उसी फार्मूले पर चल रही है जिसपर मायावती चलती रही है । पीस पार्टी मुस्लिम जनाधार वाली पार्टी के रूप में उभर रही है और उसके ज्यादातर मजबूत उम्मीदवार हिन्दू होंगे जिनका अपने क्षेत्र में असर रहा है । ऐसे में पार्टी कई सीटों पर जीत सकती है। बसपा ने अपने दलित वोटबैंक के साथ जनाधार बढ़ाने के लिए बाहुबलियों का बड़े पैमाने सहयोग लिया और बाद में छवि खराब होने पर उनसे किनारा करना शुरू किया। पर इससे उसके दलित वोट बैंक पर ज्यादा असर नहीं पड़ा । पीस पार्टी इसी फार्मूले को अपना रही है जिसके चलते पीस पार्टी की पहले ही चरण में छवि दरकने लगी है। राजनैतिक विश्लेषक राजेश कटियार ने कहा - अब लोग इसे फीस पार्टी कहने लगे है क्योकि इस पार्टी में भी टिकट के नाम पर लेनदेन शुरू हो चुका है। वैसे भी राजनैतिक हलकों में यह चर्चा काफी समय से चल रही है । पर असली मुद्दा राजनीति के अपराधीकरण का है । जिस तरह एक के बाद एक अपराधी छवि वाले लोग पार्टी में आ रहे है उससे यह पार्टी बाहुबलियों का नया गुरुकुल बनती नजर आ रही है । जबकि समाजवादी पार्टी से लेकर बसपा तक बाहुबलियों से किनारा करती जा रही है । पीस पार्टी के प्रवक्ता युसूफ अंसारी ने इस पर सफाई देते हुए कहा -दरअसल ये बाहुबली ज्यादातर सिटिंग विधायक है जो दूसरे दलों से आए है । इनके आने का एक बड़ा फायदा हमें यह हो रहा है कि अब कोई पीस पार्टी को वोट कटवा पार्टी नही कहेगा। दूसरे हमारी राजनैतिक ताकत भी बढ़ेगी ।
पर पीस पार्टी के नए तेवर से वे लोग असमंजस में है जो इसका भविष्य देख रहे थे । दरअसल पहले ही दौर में इसे राजनैतिक दलों ने अगर गुदे बदमाशों की पार्टी घोषित कर दिया तो इसका आगे का रास्ता आसान नहीं होगा । दूसरे सपा और बसपा का एक साथ विरोध भी पार्टी को महंगा पड़ सकता है। मायावती सरकार अगर मुक़दमे हटवा सकती है तो पुराने मामले खुलवा भी सकती है । फिर भ्रष्टाचार के साथ राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा भी पीस पार्टी को भारी पड़ सकता है । जनसत्ता

Wednesday, October 5, 2011

हजारे के दौरे से पहले ही टीम अन्ना तीन धडों में बंट गई !


अंबरीश कुमार

लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश में भष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने जा रहे अन्ना हजारे के लखनऊ दौरे से पहले ही यहां टीम अन्ना तीन धडों में बंट गई है । जिससे अन्ना आंदोलन के समर्थक आहत है । ख़ास बात यह है कि अब अन्ना आंदोलन के सभी गुट खुलकर सामने आ गए है और बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे है । इस टकराव के मूल में लाखों का चंदा और गैर गांधीवादी तरीके से आंदोलन को चलाना रहा है ।इससे अन्ना के अभियान को झटका लग सकता है । प्रदेश की राजधानी में अन्ना आंदोलन यहां तीन चार लोगों की टीम संचालित कर रही थी जिसमे जयप्रकाश आंदोलन के अखिलेश सक्सेना और राजीव हेम केशव के अलावा बैंक यूनियन के नेता आरके अग्रवाल ,मुन्ना लाल शुक्ल और सौरभ उपाध्याय आदि शामिल थे । मंगलवार को टीम अन्ना के एक धड़े ने प्रेस कांफ्रेंस करके दूसरे धड़े पर कई तरह की अनियमितताओं का आरोप लगाया था तो आज टीम अन्ना के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल मुन्ना लाल शुक्ल ने अन्ना आंदोलन के नाम पर चंदे में लाखों के घोटाले का आरोप लगाया ।शुक्ल के आरोप से पहले अन्ना आंदोलन समिति के संयोजक और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के मुख्य कर्ताधर्ता अखिलेश सक्सेना ने समिति के दो प्रमुख सहयोगियों आरके अग्रवाल और सौरभ उपाध्याय को गंभीर अनियमितताओं और अनुशासनहीनता के आरोप में अपनी समिति से निलंबित करने का एलान किया । अखिलेश सक्सेना ने जनसत्ता से कहा - हमने मजबूर होकर यह कदम उठाया है । हम काफी समय से चंदे के पैसे का हिसाब मांग रहे थे जो नही दिया गया । जब अन्ना का आंदोलन चल रहा था तो एक नेता अन्ना टोपी पहन कर अनशन स्थल पर ही शराब का दौर चलाते थे ।गांधी की फोटो लाकर इस तरह के आचरण पर हमने इन नेताओं को कई बार आगाह किया पर वे नहीं माने । हम तब भी चुप रहे कि सुधर जाएंगे । बाद में हमने अन्ना हजारें को भी यह जानकारी दी थी । पर अब जब पानी सर से ऊपर निकलने लगा तो हमने मीडिया को यह जानकारी देना जरुरी समझा ।

दूसरी तरफ आरके अग्रवाल ने अपने निलंबन को अवैध बताते हुए कहा - उन्हें यह अधिकार ही नहीं है ।अन्ना की वेब साईट पर हमारा ही नाम है इसलिए हम ही वास्तविक नेता है । अखिलेश सक्सेना के बारे में आप मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय से बात कर लें सब पता चल जाएगा ।लाखों के चंदे की बात बेमानी है सिर्फ ढाई लाख रुपए जमा हुए थे ।पर अखिलेश सक्सेना ने कहा -सरकारी एजंसी ने करीब सत्रह लाख रुपए के चंदे का अनुमान लगाया था इसलिए इसमे बहुत ज्यादा फर्क नहीं होना चाहिए । यह जनता का धन है जो अन्ना हजारे के नाम पर लोगों ने दिया है इसलिए इसका ब्यौरा वेब साईट पर देना चाहिए था ।
दरअसल उत्तर प्रदेश की राजधानी में अन्ना आंदोलन शुरू से दो खेमों मे बंटा रहा जिसमे एक का नेतृत्व अखिलेश सक्सेना करते थे तो दूसरे का आरके अग्रवाल । अखिलेश सक्सेना के मुताबिक उनका जोर समर्पण और सादगी पर था जबकि आरके अग्रवाल और सौरभ उपाध्याय आदि ट्रेड यूनियन वाले तेवर में चल रहे थे ।इसी को लेकर पहला टकराव तब हुआ जब पिछले दिनों गांधी के प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए आंदोलन और अनशन शुरू हुआ । एक धड़ा रात होते ही अनशन स्थल के पास मदिरा का दौर शुरू कर देता जिसपर कुछ अनशनकारियों ने एतराज किया । इनमे अखिलेश सक्सेना भी थे ।गौरतलब है कि अन्ना के अनशन के दौरान अखिलेश सक्सेना और मुन्ना लाल शुक्ल भी अनशन पर बैठ गए थे जिससे इन लोगों का आभामंडल भी बना ।
संदीप पांडेय के साथ काम कर चुके मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता कहा - अन्ना आंदोलन में शामिल दोनों गुट पैसे के चलते पूरे आंदोलन को तोड़ रहे है । इसी वजह से हमने मनीष सिसोदिया से कहा कि अब तो तीसरा मोर्चा बनाना पड़ेगा तो उन्होंने भी सहमती जताई । आंदोलन के दौरान लाखों रुपए चंदा आया पर कहा गया पता नहीं । एक हम जैसे कार्यकर्त्ता है जिसके पास अन्ना के गांव तक जाने का पैसा नहीं है । जो साधन संपन्न है वह जाकर चिठ्ठी ले आता है पर अब हम भी जा रहे है अन्ना को सब साफ़ साफ़ बताने कि कौन क्या क्या धंधा कर रहा है । इस मामले में कोर कमेटी के सदस्य और सर्वव सेवा संघ के सचिव राम धीरज से बात करने पर उनका जवाब था -आप संजय सिंह से बात करे जो प्रभारी है । पर बहुत प्रयास के बाद भी संजय सिंह ने फोन नहीं उठाया । ख़ास बात यह है कि आरोप टीम अन्ना के ही लोगों ने एक दूसरे पर लगाए है किसी राजनैतिक दल के लोगों ने नही ।जनसत्ता

Tuesday, October 4, 2011

अन्ना हजारे के चुनावी एजंडा से भाजपा बमबम


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । अन्ना हजारे के चुनावी एजंड से उत्तर प्रदेश में भाजपा बम बम है । प्रदेश में विधान सभा चुनाव से पहले कुछ जिलों का दौरा और लखनऊ में तीन दिन अनशन पर बैठ कर अन्ना हजारे जो माहौल बनाएंगे उसका सीधा फायदा भाजपा को होगा और जो कुछ भी नुकसान होगा वह कांग्रेस को होगा । हजारे उत्तर प्रदेश में वाराणसी ,इलाहाबाद ,लखनऊ ,कानपूर और गोरखपुर जिसे कुछ महत्वपूर्ण जिलों का दौरा करेंगे ।यह बात अलग है कि इन जिलों में कांग्रेस कोई बड़ी ताकत मानी भी नहीं जाती है । उत्तर प्रदश में हजारें के समर्थक करीब दस बारह जिलों में हजारे का दौरा कराकर माहौल बनाना चाहते है पर फिलहाल आधा दर्जन जिलों के दौरे पर अन्ना हजारे राजी हो रहे है । टीम अन्ना की कोर कमेटी के सदस्य और सर्व सेवा संघ के सचिव रामधीरज ने यह जानकारी दी । पर हजारे के दौरे से पहले ही
राजनैतिक पेशबंदी शुरू हो गई है । कांग्रेस ने भी आक्रामक तेवर अपना लिया है ।
देश के कई हिस्सों की तरह अन्ना हजारे के आंदोलन का ज्यादा असर मध्य वर्ग और अगड़ी जातियों पर हुआ था जो परंपरागत रूप से कांग्रेस और भाजपा की समर्थक रही है। इनमे एक हिस्सा ऐसा भी है जो वोट डालने भी मुश्किल से जाता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के चुनाव में हजारे के कांग्रेस विरोध का फायदा भाजपा को ही ज्यादा मिलने वाला है जिसकी वजह से धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए ज्यादा मुश्किल खड़ी होगी । हजारे के चुनावी दखल के एलान के साथ ही उत्तर प्रदेश में राजनैतिक सरगर्मी बढ़ गई ।हजारें ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के पत्र और समर्थन की बात भी कही थी । जिसके बाद हजारे समर्थकों ने अपने नेताओं से पूछना शुरू किया कि क्या आने वले चुनाव में भाजपा का समर्थन करना है । इससे माहौल का अंदाजा लगाया जा सकता है । पर कांग्रेस ने हजारे के सामने भाजपा राज वाली सरकारों के भ्रष्टाचार का भी सवाल रख दिया है
बाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा - हजारे के जन लोकपाल अभियान का भाजपा शुरू से समर्थन करती रही है ।अब वे उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले जो अभियान शुरू करेंगे उसका भी पहले की तरह पुरजोर समर्थन किया जाएगा । हजारे एक बड़ी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है और पार्टी पुरी ताकत से उनके इस अभियान का समर्थन करेगी । दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने कहा -पार्टी नेतृत्व मजबूत लोकपाल बिल लाने के लिए प्रतिबद्ध है। अन्ना हजारे और उनकी टीम के सुझावों के अलावा भी अन्य लोगों ने जो सुझाव दिया है, जो स्टैंडिंग कमेटी के सामने है और इस कमेटी में सभी दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। बिल पेश करना सरकार का काम है। बिल को पारित करना सभी दलों तथा संसद की जिम्मेदारी है। स्टैंडिंग कमेटी में सभी दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं, उन्हें अपनी संस्तुतियां शीघ्र भेजनी चाहिए। रीता बहुगुणा जोशी ने आगे कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव, तीन प्रदेशों उतराखंड , उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने जा रहे हैं। उतराखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार में बुरी तरह डूबी हुई है। वहां उच्च न्यायालय ने भी मुख्यमंत्री के निर्णयों को उलटा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा की संयुक्त सरकार ने भष्टाचार और भारी लूट का शासन चलाया है । उत्तर प्रदेश में पिछले 22 वर्षों में लगातार इन्हीं दलों ने राजनीति का अपराधीकरण और भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि जहां 1989 में कांग्रेस शासनकाल में उत्तर प्र्रदेश विकास के पायदान में 6वें नम्बर पर था, वहीं 22 सालों में गिरकर 23वें-24वें नम्बर पर आ गिरा है। ऐसे में अन्ना हजारे को उक्त पार्टियों के खिलाफ राज्यों में मुहिम छेड़नी चाहिए। उन्होने कहा कि हजारे का बयान एक राजनैतिक प्रश्न को जन्म देता है। प्रश्न है कि अन्ना हजारे जी भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं या कांग्रेस से।
राजनैतिक टीकाकार सीएम शुक्ल ने कहा - अगर हजारे के चुनावी अभियान से बंगारू और यदुरप्पा की पार्टी को फायदा हो तो उनके आंदोलन पर गंभीरता से सोचना होगा ।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का माहौल कुछ अलग है । यहां की राजनीति पर जातियों की गोलबंदी का ज्यादा असर पड़ता है । यहां मुख्यमंत्री मायावती ने पहले हजारे का समर्थन किया था पर बाद में विरोध कर यह भी आरोप लगाया कि दलित और वंचित तबका इससे अलग है । उत्तर प्रदेश के कई मुस्लिम संगठनों ने भी हजारे का विरोध किया और इसे कट्टरपंथी ताकतों को हवा देने वाला बताया था । जनसत्ता

Monday, October 3, 2011

माओवाद के नाम पर फिर निशाना बन सकते है मानवाधिकार कार्यकर्त्ता


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर। उत्तर प्रदेश में माओवाद के नाम पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीडन की आशंका फिर बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ की पुलिस ने जिस तरह आज सुबह राजस्थान में जाकर पीयूसीएल की सचिव कविता श्रीवास्तव के घर पर धावा बोला और उनके परिवार के साथ अभद्रता की उससे प्रदेश के मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं उत्तर प्रदेश में भी ऎसी घटनाओं की आशंका जताई है । उत्तर प्रदेश की जेलों में करीब पचास लोग माओवादी या नक्सली होने के आरोप में बंद है जिनमे ज्यादातर को न तो माओ के बारे में कुछ पता है और न लेनिन के बारे में । ये वे आदिवासी है जो पुलिस के उत्पीडन का निशाना बनाए गए है।दूसरी तरफ दर्जन भर से ज्यादा मानवाधिकार कार्यकर्त्ता है जिनके पास से माओ ,मार्क्स और लेनिन का वह साहित्य बरामद हुआ है जो देश के किसी भी विश्विद्यालय के राजनीति शास्त्र के छात्र के पास भी मिल सकता है ,ऐसे लोगों को पुलिस के विद्वान अफसरों ने माओवादियों का सहयोगी बताकर जेल में डाल रखा है ।पीयूसीएल की पदाधिकारी सीमा आजाद भी इनमे शामिल है । यह वही पीयूसीएल है जिसके पदाधिकारी विनायक सेन को छत्तीसगढ़ की पुलिस बुरी तरह प्रताड़ित कर चुकी है । ख़ास बात आत यह है कि छतीसगढ़ की पुलिस अब दूसरे राज्यों में दखल देने लगी है यह आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आशंकित कर रहा है । छत्तीसगढ़ की सीमा उत्तर प्रदेश से लगी हुई है और इस सीमा से जुड़े जिलों में माओवाद के नाम पर कई बेगुनाहों को जेल में भेजा जा चुका है । मानवाधिकार कार्यकर्त्ता रोमा को भी नक्सली बताकर उनपर एनएसए लगा दिया था जिसकी खबर जनसत्ता में आने के बाद खुद मुख्यमंत्री मायावती ने पहल की और वे नक्सली होने के आरोप और जेल दोनों से मुक्त हुई ।पर अब तो दूसरे राज्य की पुलिस का खतरा मंडरा रहा है । पीयूसीएल के महासचिव चितरंजन सिंह ने कहा -छतीसगढ़ पुलिस का यह कारनामा शर्मनाक है जिसका हम लोग पूरे देश में विरोध जताएंगे । यह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सबक सिखाने और उन्हें डराने की कार्यवाई है जो रमण सिंह सरकार पहले भी कर चुकी है । पर अशोक गहलौत जैसे संवेदनशील नेता के राज में ऎसी घटना का होना हैरान करने वाला है । इस मामले में उन्हें प्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सुरक्षा का भरोसा देना चाहिए ।
चितरंजन सिंह ने आज यहां इस घटना का ब्यौरा देते हुए कहा -आज सुबह जयपुर में पीयूसीएल की सचिव कविता श्रीवास्तव के घर छतीसगढ़ पुलिस ने स्थानीय पुलिस को साथ लेकर छापा मारा । ऊनका आरोप था कि कविता के घर में कुछ संदिग्ध माओवादी घुसे हुए है । एक घंटे की इस तलाशी के दौरान उनको कुछ तो मिला नहीं लेकिन उन्होनो पूरा घर के सामानों को तितर बितर कर दिया। इतना ही नही कविता के घर वालों से भी अभद्रता की गई । हम लोग इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने जा रहे है । अब मामला सिर्फ छतीसगढ़ तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश में ज्यादा बड़ा खतरा मंडरा रहा है जहां दर्जनों लोग नक्सली होने के आरोप में जेलों में बंद है ।
इस बीच जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ( एनएपीएम) ने इस घटना की कड़ी निंदा की है । एनएपीएम ने छत्तीसगढ़ सरकार से यह मांग की कि इस तरह के हरकतों से बाज आए। संगठन के प्रमुख कार्यकर्त्ता मधुरेश ने कहा - पूरा देश जानता है की पिछले दो दशकों से कविता ने भोजन और जीविका के अधिकार के लिए, नारीवादी और शांति आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है. पिछले पांच सालों में निरंतर छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के ऊपर हो रहे पुलिसिया जुल्म और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता जैसे बिनायक सेन, कोपा कुंजम (दोनों अभी बेल पैर रिहा है), कर्तम जोग और अन्य के रिहाई को लेकर आंदोलनरत रही है । इसी वजह से छतीसगढ़ सरकार ने उन्हें सबक सिखाने के लिए यह हथकंडा अपनाया है ।
उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार का सवाल उठाने वाले राजीव यादव ने कहा -आज छत्तीसगढ़ पुलिस ने जयपुर में यह काम किया है तो कल वह उत्तर प्रदेश में भी आ सकती है जहां पहले से ही बहुत से लोग माओवाद के नाम पर जेल में बंद है । सीमा आजाद का उदाहरण सामने है जो अभी भी जेल में बंद है । मानवाधिकार कार्यकर्त्ता कट्टरपंथी ताकतों के साथ पुलिस के निशाने पर पहले से है । अब तो भाजपा सरकार की तरह कांग्रेस सरकार वाले राज्यों में इस तरह की घटना होना साफ़ करता है कि विकास की तरह मानवाधिकार के मामले में भी दोनों पार्टियां साथ साथ है ।jansatta

दलित एजंडा पर लौटती मायावती

अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती बहुजन के साथ सर्वजन की बढ़ती दूरी को महसूस करने के बाद फिर दलित एजंडा पर लौटती नजर आ रही है । दलितों को लेकर उत्तर प्रदेश में जिस तरह कांग्रेस ,समाजवादी पार्टी और भाजपा दलितों को लेकर नए सिरे से पेशबंदी कर रही है उससे भी मायावती की दिक्कते बढ़ रही है । कांग्रेस ने दलित नेता पीएल पुनिया के जरिए मायावती के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है जो बार बार दलितों की उपेक्षा और उत्पीडन का मुद्दा उठा रहे है । भाजपा ने कल ही दलित सम्मलेन कर मायावती की दलित राजनीति पर निशाना साधा था । समाजवादी पार्टी का दलितों में बढ़ते आधार का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि प्रदेश से सबसे ज्यादा दलित संसद इसी पार्टी में है । यही वजह है कि मायावती ने दलित और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच अपना जनाधार मजबूत करने के लिए आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनके आरक्षण की मांग की ।
उत्तर प्रदेश में बसपा अपने राजनैतिक समीकरण को लेकर चिंतित है । इस बार बहुजन के साथ सर्वजन उस तरह नहीं खड़ा है जैसे पिछले विधान सभा चुनाव में खड़ा था । ब्राह्मण नेताओं के साथ राजपूत और बनिया बिरादरी के नेता भी हाशिए पर जा रहे है । तीन मंत्री राजेश त्रिपाठी ,सुभाष पांडे औए अंतू मिश्र का हाल सामने है । राजपूतों में धनंजय सिंह ,अशोक चंदेल और जितेंद्र सिंह उर्फ़ बबलू निपटाए जा चुके है । जितेंद्र सिंह ने तो बयान भी दिया कि बसपा में राजपूतों को प्रताड़ित किया जा रहा है । दूसरी तरफ दलित वोट बैंक में भी सेंध लग रही है । कांग्रेस ने पीएल पुनिया के जरिए सीधी चुनौती दे राखी है । भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -मायावती को अब दलितों की चिंता सता रही है । आज प्रधानमंत्री को लिखी चिठ्ठी इसका सबूत है । पर वे घडियाली आंसू बहा रही है । सरकारी नौकरी में तो वे दलितों की भर्ती का कोटा पूरा नहीं कर पी और अब निजी क्षेत्र की बात कर रह है ।
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने आज केंद्र सरकार से अनुसूचित जाति-जनजाति के वर्तमान आरक्षण कोटे को बढ़ाने तथा इन वर्गों को निजी क्षेत्र व न्यायपालिका के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी आरक्षण की सुविधा देने की मांग की है । मायावती ने कहा कि समय के साथ अनुसूचित जाति-जनजाति वर्गों की आबादी में वृद्धि होने के बावजूद इन वर्गों का आरक्षण कोटा आज तक यथावत् बना हुआ है । इसमें अभी तक कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। इसलिए इन वर्गों को यह सुविधा देना जरुरी है।
मायावती ने प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह को इस संबंध में लिखे अपने पत्र में कहा है कि देश में अनुसूचित जाति-जनजाति की सूची में अन्य पिछड़े वर्गों की जिन भी जातियों को शामिल किया जाए। उन सभी का आरक्षण का कोटा बढ़ाने व उनकी आबादी के हिसाब से उनका अलग से कोटा निर्धारित करने की शर्त शामिल हो ।साथ ही साथ उनके आरक्षण की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
मायावती ने प्रधानमंत्री से इस मामले में जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया है । तथा उन्हें यह भी अवगत कराया है कि देश में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लोग गैर बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था के कारण सदियों से उपेक्षा के शिकार रहे हैं। इसी का परिणाम था कि इन वर्गों के लोगों को समस्त लाभों से वंचित किया गया है अभी तक । जिसके चलते इनकी सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति खराब बनी रही है । उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद डा भीमराव अम्बेडकर के अथक प्रयासों के चलते ही भारतीय संविधान में इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी ।मायावती ने यह भी लिखा है कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्गों के लोग खुश हैं। क्योंकि यहां की बीएसपी सरकार ने इन वर्गों के हितों के लिए प्रदेश स्तर पर अनेकों महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय लिये हैं। जो कि पूर्व की सरकारों ने नहीं लिये थे। उन्होंने कहा कि अभी तक ऐसे फैसले को पूरे देश में लागू करने के सम्बन्ध में भारत सरकार ने भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया है ।
अनूसूचित जाति-जनजाति वर्गों के उत्थान व कल्याण के लिए प्रदेश सरकार के लिये गये कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के बारे में मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री जी अवगत कराते हुए लिखा है। उनकी सरकार ने वर्ष 2007 में सत्ता में आते ही वर्षों से सरकारी नौकरियों में खाली पड़े अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षित पदों के बैकलाग को विशेष भर्ती अभियान चलाकर पूरा किया। इसके अलावा इन वर्गों के गरीब लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 25 लाख रूपये तक के सरकारी ठेकों में आरक्षण की एक नई व्यवस्था पहली बार लागू की है। इसके अलावा उनकी सरकार ने सरकारी विभागों, निगमों व परिषदों आदि में आउट सोर्सिंग के जरिए कराए जा रहे कार्य में भी सरकारी नौकरियों की तरह आरक्षण व्यवस्था को लागू किया है।

मायावती ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री का ध्यान राज्य सरकार की नई आर्थिक नीति की तरफ आकृष्ट कराते हुए यह भी लिखा कि राज्य सरकार की सहायता से निजी क्षेत्र में स्थापित की जाने वाली औद्योगिक इकाईयों, शैक्षिक प्रतिष्ठानों, अवस्थापना सुविधाओं, सर्विस सेक्टर की परियोजनाओं, तथा विनिवेशित इकाईयों आदि में सृजित होने वाले कुल रोजगार का 10 प्रतिशत अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित करने की व्यवस्था इस नीति में की गई है।
उन्होने ने यह भी अवगत कराया कि प्रदेश सरकार ने फैसला लिया कि पीपीपी माडल पर विकसित उद्यमों में उसी प्रकार नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था रखी जाएगी। जिस प्रकार राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को अभी तक आरक्षण देती रही है। अर्थात कुल सृजित रोजगार की संख्या का 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 02 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तथा 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को दिया जाएगा। इसके अलावा प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में डा अम्बेडकर ग्राम सभा विकास योजना तथा शहरी क्षेत्रों में कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना व कांशीराम शहरी दलित बाहुल्य बस्ती समग्र विकास योजना संचालित की जा रही हैं।jansatta

अखिलेश यादव की रैलियों में उमडती भीड़ ने राजनैतिक दलों की नींद उड़ाई

अंबरीश कुमार
शाहजहांपुर , सितंबर।समाजवादी पार्टी के युवा चेहरे अखिलेश यादव की रैलियों और क्रांति रथ यात्रा में बढ़ती भीड़ ने राजनैतिक दलों की नींद उड़ा दी है । बुंदेलखंड के बाद मध्य उत्तर प्रदेश में भी वैसी ही भी और कुछ जगहों पर तो अप्रत्याशित भीड़ । करीब पचास विधान सभा क्षेत्रों के दौरे के बाद अखिलेश यादव अब नए विकल्प के रूप में उभरते नजर आ रहे है । समाजवादी पार्टी का समूचे प्रदेश में मजबूत राजनैतिक ढांचा है पर सिर्फ उसके चलते इतनी भीड़ जुटाना पार्टी के लिए संभव नही था। अखिलेश यादव भ्रष्टाचार और कुशासन का सवाल उठाने के साथ खेत ,किसान और खाद पानी की बात भी कर रहे है जो नौजवान नेताओं के एजंडा से बाहर होता जा रहा है । उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले इस तरह की भीड़ का उमड़ना बदलाव का आभास तो दे ही रहा है साथ ही अन्य दलों को चिंतित भी कर रहा है । ख़ास बात यह है कि पहले जहां समाजवादी पार्टी की रैलियों में जब भीड़ होती थी तो उसका श्रेय अमर सिंह के साथ आने वाले फ़िल्मी सितारों को जाता था । पर अब समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में एक मजबूत प्रचारक भी मिल गया है जिसका जमीन से नया रिश्ता बनता नजर आ रहा है ।समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान ने जनसत्ता से कहा -इस यात्रा का मकसद सिर्फ सियासी फतह नही है बल्कि आम आदमी की तकलीफों को समझकर उसका समाधान करना भी है । अखिलेश यादव समाज के वंचित तबके लोगोंास जाकर उनका दुखदर्द महसूस कर रहे है ।
समाजवादी क्रांति रथ यात्रा के तीसरे चरण के अंतिम दिन आज समाजवादी पार्टी के प्रदेष अध्यक्ष अखिलेश यादव का तिलहर, कटरा (जैतीपुर) और जलालाबाद विधानसभा क्षेत्रों के दर्जनों स्थानों पर जोरदार स्वागत किया गया। भारी संख्या में महिलाओं, अल्पसंख्यकों ने उनकी अगवानी की । ख़ास बात यह थी कि नौजवान जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे लगाते हुए रथ के साथ दूर तक दौड़ते रहे। जगह-जगह हार-फूल मालाएं लिए समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की टोलियां भी उनको रोक-रोककर अभिनन्दन करती रही ।इस मौके पर अखिलेश यादव ने कहा - जब मुख्यमंत्री और बसपा सरकार की जमीन दरकने लगी है तो झूठी और जनता को बरगलाने वाली घोषणाएं की जा रही हैं। पहले से बनाए जिलों में अभी तक बुनियादी ढांचा नहीं बन पाया है। यह सरकार काम करने के बजाए चिट्ठी पत्री और जिलों के बंटवारे के सहारे दिन काट रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि बसपा सरकार ने जनहित में कुछ नहीं किया है। इसने सभी वर्गो को उत्पीड़ित एवं अपमानित किया है। इसने अपने कार्यकाल में सिर्फ लूट मचाई है। सरकार साढ़े चार साल में बिजली, पानी, सड़कों, का इंतजाम कर सकती थी। लेकिन चूंकि पत्थरों से कमीशन खाना था इसलिए पत्थरों का ही साम्राज्य खड़ा करने में मुख्यमंत्री की दिलचस्पी रही। इस सरकार ने किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। पहले सूखा फिर बाढ़ में किसान की फसल नष्ट हो गई। किसानों को मुआवजा तक नहीं मिला है। किसानों को समय से खाद, बिजली, सिचाई के लिए पानी और बीज की व्यवस्था नहीं हुई है। नौजवान बेरोजगारी के शिकार हैं। अस्पतालों में इलाज और स्कूल-कालेजों में फीस मंहगी हो गई है।उन्होंने कहा कहा कि मंहगाई ,लूट और भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस और बसपा दोनों की ही सरकारें जिम्मेदार हैं।
अखिलेश यादव ने अभी सिर्फ पचास विधान सभा क्षेत्रों का दौरा किया है पर शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में जिस तरह लोग निकल कर आ रहे है वह हैरान करने वाला है क्योकि अखिलेश कोई करिश्माई नेता नहीं रहे है और न ही बहुत धाकड़ वक्ता रहे है । यह जरुर है कि प्रदेश के अन्य नेताओं के मुकाबले वे कम उम्र के है और धर्मनिरपेक्ष छवि वाले है। उनकी रथयात्रा को मुलायम सिंह यादव और आजम खान जैसे नेताओं ने हरी झंडी दिखाई थी । अब तक अखिलेश का रथ जहां जहां से निकला है वहां पिछड़ों ,अगड़ों के साथ मुस्लिम नौजवान बड़ी संख्या में निकले है । यह समीकरण उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर भारी भी पड़ता है । इसी वजह से राजनैतिक दलों के लोगों की नींद उड़ रही है । अखिलेश यादव की रैलियों में उमडती भीड़ ने राजनैतिक दलों की नींद उड़ाई
अंबरीश कुमार
शाहजहांपुर , सितंबर।समाजवादी पार्टी के युवा चेहरे अखिलेश यादव की रैलियों और क्रांति रथ यात्रा में बढ़ती भीड़ ने राजनैतिक दलों की नींद उड़ा दी है । बुंदेलखंड के बाद मध्य उत्तर प्रदेश में भी वैसी ही भी और कुछ जगहों पर तो अप्रत्याशित भीड़ । करीब पचास विधान सभा क्षेत्रों के दौरे के बाद अखिलेश यादव अब नए विकल्प के रूप में उभरते नजर आ रहे है । समाजवादी पार्टी का समूचे प्रदेश में मजबूत राजनैतिक ढांचा है पर सिर्फ उसके चलते इतनी भीड़ जुटाना पार्टी के लिए संभव नही था। अखिलेश यादव भ्रष्टाचार और कुशासन का सवाल उठाने के साथ खेत ,किसान और खाद पानी की बात भी कर रहे है जो नौजवान नेताओं के एजंडा से बाहर होता जा रहा है । उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले इस तरह की भीड़ का उमड़ना बदलाव का आभास तो दे ही रहा है साथ ही अन्य दलों को चिंतित भी कर रहा है । ख़ास बात यह है कि पहले जहां समाजवादी पार्टी की रैलियों में जब भीड़ होती थी तो उसका श्रेय अमर सिंह के साथ आने वाले फ़िल्मी सितारों को जाता था । पर अब समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में एक मजबूत प्रचारक भी मिल गया है जिसका जमीन से नया रिश्ता बनता नजर आ रहा है ।समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान ने जनसत्ता से कहा -इस यात्रा का मकसद सिर्फ सियासी फतह नही है बल्कि आम आदमी की तकलीफों को समझकर उसका समाधान करना भी है । अखिलेश यादव समाज के वंचित तबके लोगोंास जाकर उनका दुखदर्द महसूस कर रहे है ।
समाजवादी क्रांति रथ यात्रा के तीसरे चरण के अंतिम दिन आज समाजवादी पार्टी के प्रदेष अध्यक्ष अखिलेश यादव का तिलहर, कटरा (जैतीपुर) और जलालाबाद विधानसभा क्षेत्रों के दर्जनों स्थानों पर जोरदार स्वागत किया गया। भारी संख्या में महिलाओं, अल्पसंख्यकों ने उनकी अगवानी की । ख़ास बात यह थी कि नौजवान जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे लगाते हुए रथ के साथ दूर तक दौड़ते रहे। जगह-जगह हार-फूल मालाएं लिए समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की टोलियां भी उनको रोक-रोककर अभिनन्दन करती रही ।इस मौके पर अखिलेश यादव ने कहा - जब मुख्यमंत्री और बसपा सरकार की जमीन दरकने लगी है तो झूठी और जनता को बरगलाने वाली घोषणाएं की जा रही हैं। पहले से बनाए जिलों में अभी तक बुनियादी ढांचा नहीं बन पाया है। यह सरकार काम करने के बजाए चिट्ठी पत्री और जिलों के बंटवारे के सहारे दिन काट रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि बसपा सरकार ने जनहित में कुछ नहीं किया है। इसने सभी वर्गो को उत्पीड़ित एवं अपमानित किया है। इसने अपने कार्यकाल में सिर्फ लूट मचाई है। सरकार साढ़े चार साल में बिजली, पानी, सड़कों, का इंतजाम कर सकती थी। लेकिन चूंकि पत्थरों से कमीशन खाना था इसलिए पत्थरों का ही साम्राज्य खड़ा करने में मुख्यमंत्री की दिलचस्पी रही। इस सरकार ने किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। पहले सूखा फिर बाढ़ में किसान की फसल नष्ट हो गई। किसानों को मुआवजा तक नहीं मिला है। किसानों को समय से खाद, बिजली, सिचाई के लिए पानी और बीज की व्यवस्था नहीं हुई है। नौजवान बेरोजगारी के शिकार हैं। अस्पतालों में इलाज और स्कूल-कालेजों में फीस मंहगी हो गई है।उन्होंने कहा कहा कि मंहगाई ,लूट और भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस और बसपा दोनों की ही सरकारें जिम्मेदार हैं।
अखिलेश यादव ने अभी सिर्फ पचास विधान सभा क्षेत्रों का दौरा किया है पर शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में जिस तरह लोग निकल कर आ रहे है वह हैरान करने वाला है क्योकि अखिलेश कोई करिश्माई नेता नहीं रहे है और न ही बहुत धाकड़ वक्ता रहे है । यह जरुर है कि प्रदेश के अन्य नेताओं के मुकाबले वे कम उम्र के है और धर्मनिरपेक्ष छवि वाले है। उनकी रथयात्रा को मुलायम सिंह यादव और आजम खान जैसे नेताओं ने हरी झंडी दिखाई थी । अब तक अखिलेश का रथ जहां जहां से निकला है वहां पिछड़ों ,अगड़ों के साथ मुस्लिम नौजवान बड़ी संख्या में निकले है । यह समीकरण उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर भारी भी पड़ता है । इसी वजह से राजनैतिक दलों के लोगों की नींद उड़ रही है । vv

Monday, September 26, 2011

घटता सरोकार,बढ़ता प्रसार



अंबरीश कुमार
भूख, भुखमरी और कर्ज में डूबे किसानों का सवाल हो या फिर जल, जंगल, जमीन के मुद्दे, अखबारों में इनकी जगह कम होती जा रही है। अस्सी के दशक में जब हमने पत्रकारिता शुरू की थी तो उस समय समाज के बारे में, जन आंदोलनों के बारे में लिखने का रूझान था। आपातकाल के बाद छात्र आंदोलन खासकर जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े नौजवानों का एक वर्ग पत्रकारिता में भी आया। इसका सकारात्मक असर भी दिखा। अस्सी के दशक में ही हिन्दी पत्रकारिता की याचक व सुदामा वाली दयनीय छवि को पहले रविवार ने तोड़ा फिर जनसत्ता के उदय ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उससे पहले हिन्दी पत्रकार का वह रूतबा नहीं होता था जो अंग्रेजी के पत्रकार का होता था। सन १९८४ के दंगों में सिखों के कत्लेआम की खबरें जनसत्ता ने जिस अंदाज में दीं, उसने इस अखबार को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। इसके बाद के राजनैतिक घटनाक्रम और मीडिया कवरेज में हिन्दी मीडिया की भूमिका बदली। उस समय तक दिल्ली की पत्रकारिता में अंग्रेजी का वर्चस्व था।
इसी दौर में राजनैतिक घटनाओं की कवरेज हिन्दी मीडिया ने अंग्रेजी मीडिया से लोहा भी लिया। उस दौर में प्रसार संख्या का वह दबदबा नहीं था जो आज है। यह भूमंडलीकरण के पहले के दौर की बात है। तब किसी अखबार में प्रबंधक यह नहीं समझ सकता था कि कैसी खबरें लिखी जाएं? पर नब्बे के दशक के बाद हालात तेजी से बदले। पहले मंडल फिर कमंडल ने मीडिया को भी विभाजित कर दिया। सन १९९२ में बाबरी मस्जिद ध्वंस के साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाली खबरें थीं तो दूसरी तरफ सांप्रदायिकता का मुकाबला करने वाले पत्रकार थे। उत्तर प्रदेश में कुछ अखबारों की प्रसार संख्या उसी दौर में तेजी से बढ़ी भी। इसके बाद उदारीकरण का नया दौर शुरू हुआ और सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरें हाशिए पर जने लगीं। नब्बे के दशक के बाद से ही संपादक नाम की संस्था खत्म होने लगी। प्रबंधन तंत्र में मार्केटिंग विभाग का दबदबा बढ़ने लगा। अब प्रबंधन संपादकों को प्रसार और विज्ञापन बढ़ाने के नए तौर-तरीकों पर फोकस करने का दबाब डालने लगा।
उसी दौर में हमारे नए संपादक ने बैठक कर सवाल किया कि हमारे अखबार की यूएसपी क्या है? यूएसपी जैसा शब्द सुनकर संपादकीय विभाग के पुराने लोग कुछ समझ नहीं पाए। तब बताया गया कि इस शब्द के मायने यूनिक सेलिंग प्वाइंट यानी अखबार को बेचने की खासियत क्या होगी? उसके बाद राजनैतिक और सामाजिक सवालों को किनारे कर प्रसार और विज्ञापन बढ़ाने वाले कवरेज पर ध्यान देना शुरू किया गया। मसलन, दिल्ली के बाजार में सबसे ज्यादा चाट बेचने वाले व्यवसायी के बारे में क्यों न लिखा जए। इसके बाद सनसनीखेज खबरों और समाज के अभिजात्य वर्गीय लोगों के बारे में कवरेज पर जोर दिया जाने लगा। उसी दौर से पेज-थ्री की नई परिकल्पना शुरू हो गई जो आज और समृद्ध हो चुकी है। पहले अंग्रेजी मीडिया ने इसे ज्यादा तबज्जो दी पर धीरे-धीरे हिन्दी में भी इसने पैर जमा लिए।
इस बीच हिन्दी और भाषाई मीडिया ने प्रसार के मामले में अंग्रेजी अखबारों को पीछे ढकेल दिया। जनकारी के मुताबिक-हिन्दी मीडिया में दैनिक जगरण, भास्कर, अमर उजला और हिन्दुस्तान अंग्रेजी अखबारों से काफी आगे निकल गए। दैनिक जगरण ५३६ लाख, भास्कर ३०६ लाख, अमर उजला २८२ लाख पाठकों के साथ अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया के १३५ लाख पाठकों के मुकाबले काफी आगे जा चुके हैं। जबकि क्षेत्रीय अखबार भी अंग्रेजी अखबारों को पीछे छोड़ चुके हैं। तमिल अखबार डेली थांती २०९ लाख पाठकों के साथ सबसे ऊपर आ चुका है। उसके बाद मराठी अखबार लोकमत २०७ लाख पाठकों के साथ दूसरे नंबर पर जा पहुंचा जबकि बंगाल का आनंद बाजर पत्रिका १५८ लाख, तेलगू का इनाडु १४२ लाख पाठकों के साथ अंग्रेजी अखबारों से आगे हैं। एकल संस्करण के मामले में बंगाल का आनंद बाजार पत्रिका १२,३४,१२२ प्रसार संख्या के साथ पहले नंबर पर है जबकि दूसरे नंबर पर द हिन्दू ११,६८,०४२ पाठकों के साथ है।
बढ़ती प्रसार संख्या के बावजूद इन अखबारों में सामाजिक सरोकार घटता जा रहा है। अंग्रेजी अखबार अभिजात्य वर्गीय समाज पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। हिन्दी मीडिया भी इसी रास्ते पर है। सामाजिक सरोकार के मामले में भी अंग्रेजी मीडिया ने जो रास्ता अपनाया, हिन्दी उसी राह पर चलती दिख रही है। विदर्भ की बात छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की दशा कहीं ज्यादा खराब है। बुंदेलखंड में पिछले छह साल से सूखा है और कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी का सिलसिला रूक नहीं रहा है। पर ज्यादातर हिन्दी या अंग्रेजी अखबारों ने अपने संवाददाताओं को बुंदेलखंड का दौरा करने नहीं भेज। राहुल गांधी जब बुंदेलखंड गए तो जरूर कुछ वरिष्ठ पत्रकार वहां पहुंचे। इन अखबारों में देश में सबसे ज्यादा बिकने का ढिढोरा पीटने वाले अखबार हैं तो आजादी के आंदोलन से निकले अखबार समूह भी हैं। संपादक को छोड़ भी दें तो अखबारों के ब्यूरो चीफ, विशेष संवाददाता और राजनैतिक संपादकों ने भी ऐसे इलाकों में जाने की जहमत नहीं उठाई। यह अखबारों की बदलती प्राथमिकता का नया पहलू है।
बुंदेलखंड में पानी के लिए जंग शुरू हो चुकी है। कई जिलों में आए दिन मारपीट और हंगामे हो रहे हैं। बरसाती नदियां तो पहले ही सूख गईं। तेज प्रवाह वाली बेतवा से लेकर केन नदी तक की धार कमजोर हो गई है। सूखे और पानी के संकट के चलते ३५ लाख से ज्यादा लोगों का पलायन हो चुका है लेकिन लखनऊ के अखबारों में पहले पेज पर आईपीएल मैच की रंगीन फोटो व खबरें छपती हैं। भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर में मालिक से लेकर संपादक तक सभी की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। यही वजह है कि पत्रकारिता में आने वाले नए लोगों के लिए भी समाज खासकर गांव का समाज कोई मायने नहीं रखता है। वे सरकार के विभिन्न विभागों की कवरेज करते हैं, नेताओं की प्रेस कांफ्रेंस कवर करते हैं या फिर पांच सितारा होटलों में चमचमाते सितारों की खबर लाते हैं। आज अखबार के लिए खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण पैसा है, जो खबर पैसा लाने में मददगार हो, वही खबर बन रही है।
सामाजिक सरोकार के संदर्भ में ऐसी ही स्थिति जल, जंगल और जमीन की है। कृषि का रकबा कम हो रहा है और जंगल कट रहे हैं। वन्य जीवों का सफाया हो रहा है। सरिस्का की राह पर उत्तर प्रदेश का दुधवा राष्ट्रीय उद्यान भी जा रहा है। अचानक किसी दिन खबर आएगी कि अब दुधवा में बाघ नहीं रहे लेकिन इस बारे में समय रहते खबर नहीं बनती। जिला के स्तर पर माफिया, पुलिस और अफसर के गठजोड़ में जाने अंजाने पत्रकार भी होता जा रहा है। यही वजह है कि न तो सामाजिक सरोकार की खबरें आती हैं और न ही जन आंदोलनों की। हम राष्ट्रीय अखबारों की बात कर रहे हैं। ढाई कोस पर बोली बदलती थी पर अब तो ढाई कोस पर अखबारों के संस्करण भी बदल जाते हैं। राष्ट्रीय अखबारों के अब जिले के संस्करण निकलने लगे हैं जो जिलों के लोगों का दायरा जिले से बाहर जाने नहीं देते। उदाहरण के लिए गोरखपुर के पाठक को फैजबाद जिले तक की जनकारी अखबारों में नहीं मिलती। दूसरे छोटे-छोटे राजनैतिक दलों खासकर वामपंथी दलों के बारे में मीडिया की भूमिका और रोचक है। एक अंग्रेजी अखबार के संपादक ने मेरे सामने ही सीपीआई एमएल के आंदोलन की खबर लेकर आए एक संवाददाता से पूछा-इनकी फालोइंग कितनी है, संवाददाता का जबाब था-ज्यादा नहीं है, सर। इस पर संपादक महोदय ने खबर फेंकते हुए कहा-फिर क्यों जगह खराब कर रहे हो?
मीडिया में पहले दो वर्ग थे. आज तीन हो गए हैं.रेल सेवा के तीसरे, दूसरे और पहली श्रेणी की तरह. इनमें पहला भाषाई प्रिंट मीडिया है, दूसरा अंग्रेजी का प्रिंट मीडिया है और तीसरा अभिजात्य वर्ग है इलेक्ट्रानिक मीडिया.वेतन-भत्तो और सुख-सुविधाओं के लिहाज से यह तीसरा वर्ग सब पर भारी है। दूसरे इसका नजरिया भी अन्य वर्गो के प्रति हिकारत वाला है। हालांकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में गए सभी लोग प्रिंट के कभी दूसरे या तीसरे दर्जे के पत्रकार होते थे। पर आज वेतन और चैनल की चमक-दमक के चलते ये अपने आप को सबसे अलग मानते हैं। यह बात अलग है कि आज भी खबरों के नाम पर नब्बे फीसदी प्रिंट मीडिया का फालोअप ही उनके पास होता है। अपवाद एक दो चैनल हैं पर सामाजिक सरोकार की बात करें तो इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल प्रिंट से ज्यादा बदहाल है। यह तो पूरी तरह बाजार की ताकतों से संचालित होता है।
(काफी पहले लिखा गया मीडिया पर यह लेख दोबारा दिया जा रहा है ,प्रसार के आंकड़े पुराने है )

Saturday, September 24, 2011

जंगलों के पार आदिवासी गांवों में



अंबरीश कुमार
नागपुर से छिंदवाडा के भी आगे जाने के लिए बुधवार की सुबह मेधा पाटकर का इंतजार कर रहे थे । वे चेन्नई से बंगलूर और फिर नागपुर आ रही थी ।एक दिन पहले भी कई गांवों की ख़ाक छानते हुए होटल द्वारका पहुंचे तो रात के बारह बज चूके थे।प्रताप गोस्वामी की मेहरबानी से खाने पीने का प्रबंध हो गया था वर्ना बारह बजे के बाद कुछ मिलना संभव नहीं था।उन गांवों में गए जो पेंच परियोजना के चलते डूब क्षेत्र में आने वाले है । साथ में नर्मदा बचाओ आंदोलन के मधुरेश और किसान नेता विनोद सिंह भी थे । गांवों में कई सभाएं देखी और गांवालों ने उपहार में जो कच्ची मूंगफली दी वह लखनऊ तक ले आए । बहुत ही हरा भरा और खुबसूरत इलाका है यह ।रास्ते में घने जंगल है और पहाड़ियां ऊंचाई तक ले जाती है । करीब आधे घंटे तक यह अहसास होता है कि किसी हिल स्टेशन पर है ।
यह एक दिन पहले की बात है । करीब नौ बजे मधुरेश का फोन आता है कि नीचे रेस्तरां में में आ जाएँ मेधा पाटकर पहुँच गई है और वे भी कमरे से पांच मिनट में
में वहां पहुँच जाएगी । नीचे पहुंचा तो सभी इंतजार कर रहे थे । नाश्ता कर दो गाड़ियों से रवाना हुए । कई साल बाद मेधा पाटकर के साथ फिर लंबी यात्रा कर रहा था । छूटते बोली -अंबरीश भाई बस्तर की यात्रा और जो हमला हुआ वह सब याद है । करीब आठ साल पहले जब जनसत्ता का छत्तीसगढ़ संस्करण देख रहा था तब नगरनार प्लांट इ विरोध में चल रहे आंदोलन को देखने मै जा रहा था । संयोग से मेधा पाटकर भी जाने वाली थी और उन्हें मेरे जाने की जानकारी मिली तो वे भी साथ चली । बाद में जगदलपुर के सर्किट हाउस में जहाँ मै रुका था दुसरे दिन सुबह जब मेधा पाटकर आई तो कांग्रेस के लोगों ने नगरनार प्लांट का विरोध करने के लिए मेधा पाटकर पर हमला कर दिया । अपने स्थानीय संवाददाता वीरेंद्र मिश्र और एनी लोगों के चलते बड़ी मुश्किल से बेकाबू कांग्रेसियों पर नियंत्रण पाया गया था । यह तब जब मेधा पाटकर खुद अजित जोगी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में रही थी । रात में अजित जोगी से जब उनकी मुलाकात हुई तो जोगी ने उनके दौरे पर नाराजगी भी जताई थी । वह सब याद आया ।
मेधा पाटकर से रास्ते में लंबी चर्चा हुई खासकर अन्ना आंदोलन को लेकर । पर यह सब निजी जानकारी के लिए । मेधा बिसलरी का पानी नही पीती है इसलिए छिंदवाडा के जंगलों से पहले एक ढाबे में उनके लिए नल का पानी लिया गया तो उन्होंने चाय पीने की भी इच्छा जताई । वे जन आंदोलनों में सालों से शिरकत कर रही है और जो भी रास्ते में मिलता है खा लेती है और नल का पानी पीती है । हम लोग ऐसे जीवन के अभ्यस्त हो चुके है जहाँ अब यह सब संभव नहीं है । रास्ते में उन्होंने अपने मित्र अरुण त्रिपाठी के लेखन पर दोबारा एतराज जताते हुए कहा -मेरे ऊपर किताब का दूसरा संस्करण भी प्रकाशित कर दिया पर एक बार भी बात नही की । यह किताब अभय कुमार दुबे के संपादन में लिखी गई थी जिसमे मैंने भी एक पुस्तक लिखी थी । मैंने मेधा जी बताया कि अरुण त्रिपाठी का कहना है कि उन्हें आपने बातचीत का समय नहीं दिया ।खैर जनसभा बहुत सफल रही और फिर लौटने की जल्दी हुई क्योकि साढ़े छह बजे नागपुर में प्रेस कांफ्रेंस थी तो उसके बाद अन्ना टीम की बैठक और रात में ही उन्हें जबलपुर निकलना था । पांच घंटे का रास्ता काफी तेज रफ़्तार से तय करना पड़ा । फिर भी साढ़े सात बजे प्रेस क्लब पहुंचे तो मीडिया इंतजार में था । वे मीडिया को लेकर कुछ आशंकित भी थी पर दूसरे दिन भूमि अधिग्रहण का मुद्दा सरे अख़बारों में प्रमुखता से आया था । महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के दौरे से क़ल लौटा तो खबरों में उलझ गया । इस बीच अपना ब्लॉग विरोध डिलीट हो गया तो जनादेश पर शिफ्ट हो रहा हूँ ।

Friday, September 23, 2011

कंपनी सरकार किसानो की खेती की जमीन छीन रही



अंबरीश कुमार
मोहगांव, सितंबर । आज इस गांव में हुए किसान पंचायत में सर्वसम्मत से फैसला किया कि किसी भी तरह कि परियोजना के लिए अब आस पास के किसान एक इंच भी जमीन नहीं देंगे | नागपुर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा जिले के इस आदिवासी अंचल में आज पांच राज्यों के किसान संघटनों के प्रतिनिधियों के अलावा हजारों कि संख्या में किसान जुटे । इस मौके पर नर्मदा बचाओ आंदोलन कि नेता मेघा पाटकर ने खेती कि जमीन लुटने कि साजिश से किसानों को आगाह किया ।
मेघा पाटकर ने आगे कहा - देश के विभिन्न राज्यों में कंपनी सरकार किसानो की खेती की जमीन छीन रही है। जिसके खिलाफ अब बड़ी लड़ाई लड़नी होगी । उन्होंने कंपनी सरकार शब्द की व्याख्या करते हुए कहा की वह सरकार जो कंपनियों से सांठ - गांठ करके चलती हो उसे कंपनी सरकार मानना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि कंपनी सरकार कि यह प्रवृति अब सर्वदलीय हो रही है । मेघा पाटकर ने खेती कि जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ नवम्बर से राष्ट्रीय किसान यात्रा अभियान शुरू करने का एलान किया जिसमे देश के विभिन्न जन संघटन,किसान संघटन,आदिवासी व मजदूर संगठन भी शिरकत करेंगे । गौरतलब है कि इस इलाके में पेंच राष्ट्रीय पार्क है जिसका दक्षिणी हिस्सा नागपुर के जंगल में पड़ता है और वहां अडानी की बिजली परियोजना के खिलाफ जब आंदोलन हुआ तो उन्हें काम बंद करना पड़ा । जबकि दूसरा सिरा छिंदवाडा के इस अंचल में पड़ता है और यहां के किसान इस परियोजना के खिलाफ आंदोलनरत है |इसके अलावा इस छेत्र में एसकेएस पावर प्रोजेक्ट, मेक्सो प्रोजेक्ट, पेंच डाई वर्जन प्रोजेक्ट और एसइजेड के लिए किसानो की जमीन ली जा रही है | इसको लेकर काफी नाराजगी है । किसानों की यह नाराजगी आज की किसान पंचायत में उभर कर सामने आई है । किसान पंचायत ने जो प्रस्ताव पास किया है । उसमे कहा गया है कि राज्य सरकार ने 1985 -86 में जो जमीन बिजली घर बनाने के नाम पर पांच से दस हजार एकड़ में ली गई थी । अब वही जमीन अडानी समूह को बिजली घर बनाने के लिए साढ़े तेरह लाख रूपए एकड़ के भाव बेचीं गई है । पूरे खेल में राज्य कि भाजपा और केंद्र की कांग्रेस सरकार कंधे से कंधा मिला कर चल रही है ।
आज की किसान पंचायत में पुलिस की रोक टोक के बावजूद हजारों की संख्या में किसानों का पहुंचना एक बड़े किसान आंदोलन की जमीन तैयार करना नजर आ रहा है । इस किसान पंचायत में महिलाओं की जबरदस्त हिस्सेदारी थी । जैसे ही मेघा पाटकर, किसान मंच के नेता विनोद सिंह और इंडियन सोशल एक्सन फोरम के महासचिव चितरंजन सिंह मोहगांव पहुंचे नगाड़े और पटाखों से उनका स्वागत किया गया । गांव की महिलाएं अपने घरों से बहार निकल आई और वे नारे लगाते हुए मेघा पाटकर के साथ पंचायत स्थल पर पहुंची । इस मौके पर नारा लग रहा था - जब तक जेल में चना रहेगा आना जाना लगा रहेगा, जमीन हमारी आपकी - नहीं किसी के बाप की जैसे कई नारे गूंज रहे थे । जिला मुख्यालय से करीब 35-40 किमी दूर इस गांव में पुलिस का जबरदस्त बंदोबस्त था । इस इलाके में पहली बार किसान आक्रामक तेवर के साथ गोलबंद होते नजर आ रहे थे । इस मौके पर बोलते हुए किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह ने दादरी आंदोलन से सबक लेते हुए किसानों से लम्बी लड़ाई के लिए तैयार रहने को कहा । उन्होंने कहा कि विपक्ष में मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानो का गुस्सा बढ़ रहा है| इस बात को राज्यों व सरकार को समझना चाहिए वरना जिस तरह दादरी आंदोलन के चलते मुलायम सिंह की सरकार गई उसी तरह यह सरकारें भी सत्ता से बेदखल हो जाएंगी | इंसाफ के महासचिव चितरंजन सिंह ने केंद्र सरकार को आगाह करते हुए कहा कि अगर छिंदवाड़ा को नक्सल प्रभावित क्षेत्र घोषित करने की कोशिश की गई तो इसका अंजाम भुगतना होगा | उन्होंने इस महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक बिजली घरों के नाम पर सवा लाख एकड़ से ज्यादा जमीन छिनने की साजिश पर सरकार को आगाह किया | उन्होंने कहा कि अब जमीन की यह लूट ज्यादा दिन नहीं चल पाएगी|
इस मौके पर किसान संघर्ष समिति के संयोजक डा सुनील ने कार्पोरेट क्षेत्र को चुनौती देते हुए कहा कि अगर खेती की जमीन ली गई तो किसान आर पार की लड़ाई लड़ने को मजबूर होंगे | अब यह लड़ाई गांव से लेकर दिल्ली तक होगी | jansatta

सवा लाख एकड़ जमीन पर संकट के बादल

अंबरीश कुमार
वर्धा, सितंबर । महात्मा गांधी की कर्मभूमि में सवा लाख एकड़ खेती की जमीन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं । वर्धा में पचासी थर्मल पवार प्रोजेक्ट परियोजना प्रस्तावित हैं ।इन परियोजनाओं में अमरावती जिले की सोफिया बिजली परियोजना,यवतमाल की जिम्मूविश परियोजना, वर्धा लेनको बिजली परियोजना,गोंदिया की अदानी परियोजना व चंद्रपुर की बिजली परियोजना का विस्तारीकरण भी शामिल है । जिसमे दर्जन भर से ज्यादा परियोजनाओं पर काम शुरू हो चुका है । जिसके चलते किसानों की पचास हजार हेक्टेयर जमीन इन परियोजनाओं की भेंट चढ़ने वाली है । ख़ास बात यह है की .समूचे महाराष्ट्र में बिजली की समस्या से निजात पाने के लिए 7000 मेगावाट बिजली की अतिरिक्त जरुरत है पर योजनाएं पचपन हजार मेगावाट उत्पादन की बनाई जा रही है । नतीजन आने वाले समय में इस अंचल में पानी का घनघोर संकट तो पैदा होगा ही साथ ही साथ पर्यावरण को भी बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ेगा । इन बिजली घरों से चार लाख सड़सठ हजार मेट्रिक टन फ्लाई ऐश निकलेगा जिसे खपाते खपाते यहां का पर्यावरण चौपट हो जाएगा । मामला सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है बल्कि सीमापर मध्यप्रदेश तक पहुंच चूका है । इन बिजली परियोजनाओं को लेकर जो राजनीति चल रही है उसके परिणाम घातक हो सकते हैं । यही वजह है कि वर्धा यवतमाल से लेकर छिंदवाडा तक बड़ी बिजली परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलन गरमाने लगा है। आज अदानी समूह की बिजली परियोजना को लेकर छिंदवाडा के आदिवासी अंचल में खेत बचाओ जमीन बचाओ यात्रा का समापन हुआ तो कल राष्ट्रीय किसान पंचायत भूलामुह गांव में होने जा रही है । मेघा पाटकर कल नागपुर पहुंच रही है जहां वह किसानो के सवाल पर बैठक करेंगी तो दूसरी तरफ वे भूलामुह गांव की किसान पंचायत में हिस्सा लेंगी । यह किसान पंचायत नागपुर से एक सो पचास किलो मीटर दूर मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले के एक आदिवासी गांव भूलामुह में हो रही है । इस किसान पंचायत में हिस्सा लेने के लिए कई जन संघटन और किसान संघटन के प्रतिनिधि आज नागपुर पहुंच गए हैं । किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह , मेघा पाटकर के सहयोगी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के मधुरेश आज खेती बचाओ जमीन बचाओ यात्रा के समापन में शामिल हुए । इस यात्रा का नेतृत्व किसान संघर्ष समिति के मुखिया डा सुनीलम कर रहे है । डा सुनीलम ने जनसत्ता से कहा-इस अदानी पावर प्रोजेक्ट के अलावा एसकेएस पावर जनरेशन और पेंच परियोजना को लेकर किसानो का आंदोलन जोड़ पकड़ता जा रहा है । इस अंचल की जमीन काफी उपजाऊ है जिसके चलते अगर खेती की जमीन इन परियोजनाओं के लिए ली गयी तो हजारो किसान बर्बाद हो जाएंगे ।jansatta

मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में घमासान


अंबरीश कुमार
लखनऊ , सितंबर । उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव को लेकर सत्ता की दौड़ से बाहर जाती दोनों राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की होड़ बढ़ती जा रही है । भारतीय जनता पार्टी में जहां इसे लेकर टकराहट अब कड़वाहट में बदल रही है वही कांग्रेस में भी गोलबंदी तेज हो गई है । भाजपा में तो इस दौड़ में कई राष्ट्रीय नेता शामिल है तो कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री तक । भाजपा के राष्ट्रीय नेता इस अभियान को और हवा दे रहे है ।मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में राजनाथ सिंह ,कलराज मिश्र ,विनय कटियार ,लालजी टंडन जैसे नेता भाजपा के है तो कांग्रेस में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा , श्रीप्रकाश जायसवाल ,आरपीएन सिंह जैसे पिछड़ी जातियों के नेता से लेकर अगड़ी जातियों में रीता बहुगुणा जोशी ,प्रमोद तिवारी ,जगदंबिका पाल ,जितिन प्रसाद, ,संजय सिंह और दलित नेताओं मी पीएल पुनिया का नाम शुमार किया जा रहा है । यह बात अलग है कि अपने बूते पर यह पार्टिया तीसरे और चौथे नंबर की लड़ाई लडती नजर आ रही है ।
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इस अभियान को यह कर कर गर्म किया कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का नाम तय है तो पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल बरेली में कहा -उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए नाम तय हो चुका है पर यह समय आने पर ही बताया जाएगा । पार्टी के एक कार्यकर्त्ता प्रकाश सिंह ने कहा - मुख्यमंत्री का नाम छुपा कर क्यों रखना चाहते है राजनाथ सिंह । पार्टी के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र पहले ही यह चुके है कि मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर चुनाव लड़ना चाहिए । सपा और बसपा के मुख्यमंत्री पद के नाम पहले से तय होते है । ऐसे में इनसे मुकाबला करने
जा रही भाजपा को भी अपने मुख्यमंत्री का ना नाम प्रोजेक्ट करना चाहिए । गौरतलब है कि भाजपा एक बार फिर कल्याण सिंह को लेकर विवाद में घिरी हुई है जो पार्टी के तीन में से एक पूर्व मुख्यमंत्री है । पिछली बार उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया पर उनके समर्थको का आरोप है कि टिकट बंटवारे में उनकी नहीं चली और पार्टी सत्ता की दौड़ में पिछड़ गई । उनके अलावा राजनाथ सिंह दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री है जिन्हें एक तबका मुख्यमंत्री पद का अघोषित दावेदार माना जा रहा है । यही वजह ही कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की टकराहट बढ़ रही है ।
कोंग्रेस का हाल भी ठीक नहीं है । प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन करते हुए पार्टी के एक नेता ने कहा - कांग्रेस में यह परंपरा रही है कि चुनाव अभियान जिस अध्यक्ष के नेतृत्व में चलता है उसे ही सफलता मिलने पर कमान सौपी जाती है । अशोक गहलौत से लेकर दिग्विजय सिंह उदहारण है । कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी का इस पद के लिए दावा करने का कोई औचित्य ही नहीं है । वे तो सालों से से कांग्रेस में इस पद पर है पार्टी का क्या हाल है सबके सामने है । फिर दावेदारों की कमी कहाँ है । पिछड़े तबके में बेनी प्रसाद वर्मा ,श्रीप्रकाश जायसवाल और आरपीएन सिंह है तो राजपूत नेताओं में संजय सिंह ,जगदंबिका पाल और राजकुमारी रत्ना सिंह है । दलित बिरादरी से पीएल पुनिया है । इसलिए उनलोगों को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखना चाहिए जो पार्टी को पीछे ले जा चुके है । jansatta

Wednesday, April 6, 2011

यह चौहत्तर आंदोलन की वापसी है !


अंबरीश कुमार
लखनऊ ,अप्रैल । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन को जयप्रकाश आंदोलन की ताकतों ने समर्थन कर इसे चौहत्तर आंदोलन की वापसी बताया है । उत्तर प्रदेश की राजधानी समेत कई जिलों में अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में अभियान शुरू हो गया है । अब विश्वविद्यालयों में इसकी आंच पहुंचने लगी है । अन्ना हजारे के आंदोलन और जयप्रकाश आंदोलन में कई समानताएं भी है । तब भी केंद्र में कांग्रेस थी और आज भी कांग्रेस है । चौहत्तर में जयप्रकाश नारायण तिहत्तर के थे तो मंगलवार को दिल्ली में धरना पर बैठने वाले अन्ना हजारे बहत्तर साल के है । न तो जेपी चुनाव लड़े और न ही अन्ना । भ्रष्टाचार के खिलाफ जेपी ने ही सबसे पहले १९७४ में स्वीडन की तर्ज पर भारत में लोकपाल की बात कही तो आज अन्ना भी लोकपाल की मांग कर रहे है । यह वह बातें है जो यहां गोमती नदी के किनारे अन्ना आंदोलन के समर्थन में चल रहे धरना में चर्चा का विषय बनी हुई है । यहाँ आज धरना पर वकीलों और डाक्टरों का भी एक जत्था पहुंचा जिनकी एकता से यह आंदोलन और तेज होने वाला है । लखनऊ में जो लोग धरना पर बैठे है उनमे दो लोग १९७४ आंदोलन में भूमिगत होकर काम कर रहे थे । इनमे एक राजीव हेम केशव है जो उस दौर में आईआईटी की शिक्षा छोड़ आंदोलन में कूद गए और बाद में जयप्रकाश नारायण की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े । इसी तरह चौहत्तर आंदोलन के ही अखिलेश सक्सेना भी कई दशक बाद फिर उस दौर को याद करते हुए धरना पर बैठे हुए है । मामला सिर्फ यही तक नही सीमित है बल्कि और आगे जाने वाला है भले ही दिल्ली में सरकार से बातचीत होकर यह आंदोलन समाप्त हो जाए । इसकी मुख्या वजह यह है कि देश के विभिन्न इलाकों में चल रहे आंदोलन को अब एक नया और मजबूत चेहरा मिल गया है अन्ना हजारे का ।जेपी आंदोलन से निकले छात्र युवा संघर्ष समिति के आंदोलनकारियों ने इस साल के शुरू में जो संघर्ष वाहिनी मंच बनाया था उसने समूचे देश में अपने कार्यकर्ताओं से अन्ना हजारे के समर्थन में धरना और प्रदर्शन का एलान किया है । मंच के प्रतिनिधि के रूप में राकेश रफीक खुद अन्ना हजारे के साथ दिल्ली में धरना पर बैठे हुए है । मंच की ११ अप्रैल को बिहार के मुज्जफरपुर में होने वाली बैठक में इस आंदोलन को लेकर चर्चा भी होगी और आगे की रणनीति बनाई जाएगी ।दूसरी तरफ वाम तकते भी इस आंदोलन से जुड़ गई है । जन संघर्ष मोर्चा ने कई जिलों में अन्ना हजारे के समर्थन में धरना दिया और आगे भी जारी रखने का एलान किया है । मंच के संयोजक अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने कहा - अन्ना हजारे की मांग पर केंद्र सरकार का नजरिया अलोकतांत्रिक है । केंद्र का जवाब संसदीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने वाला है ।
लखनऊ के झूलेलाल पार्क स्थित धरना स्थल पर अन्ना हजारे के समर्थन में नौजवान से लेकर बुजुर्ग तक शामिल है । इनमे ज्यादातर विश्विद्यालय के शिक्षक ,छात्र ,वकील ,सरकारी कर्मचारी ,डाक्टर और सामाजिक कार्यकर्त्ता है जिन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लडाई से उम्मीद की नई किरण नजर आ रही है । लखनऊ विश्विद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव राजेंद्र बहादुर सिंह धरना पर बैठे है और उन्हें आंदोलनों का दौर याद आ रहा है । अस्सी के दशक में लखनऊ विश्विद्यालय थिंकर्स काउंसिल ने बदलाव की जो राजनीति शुरू की उसमे बड़ी संख्या में छात्र और छात्राए जुड़ी । तब कई आंदोलन भी हुए पर बाद में छात्र राजनीति में अपराधियों की दखल बढ़ी और इस तरह की गतिविधिया बंद हो गई ।इसमे भाजपा से लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सभी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया । अन्ना हजारे के आंदोलन से फिर छात्रों में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है । यदि परिसर में इम्तहान न चल रहे होते तो माहौल और गर्म हो जाता ।सिर्फ लखनऊ ही नहीं कई जिलों में अन्ना हजारे को लेकर आंदोलन शुरू हुआ है ।गोरखपुर ,वाराणसी ,इलाहाबाद जैसे कई शहरों से आंदोलन की ख़बरें आ रही है । दरअसल देश को जिस एक चेहरे की तलाश थी वह सामने आ चुका है । जेपी आंदोलन के राजीव हेम केशव जो इस समय संघर्ष वाहिनी मंच के राष्ट्रीय संयोजक है वे अन्ना हजारे और जयप्रकाश आंदोलन में कई समानताए देख रहे है । राजीव ने कहा - जयप्रकाश नारायण १९७४ में अगस्त के महीने में जब लखनऊ आए तो उनकी दो सभाएं हुई जिनमे एक लखनऊ विश्विद्यालय छात्र संघ भवन परिसर में तो दूसरी बेगम हजरत महल पार्क में जिसमे काफी लोग आए थे । तब भी जेपी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए स्वीडेन के ओम्बड्समैन की तर्ज पर लोकपाल की बात कही थी ।आज अन्ना हजारें ने भी यह मुद्दा उठाया है जिसको उसी तरह से व्यापक समर्थन मिल रहा है । बिहार में नितीश कुमार की सरकार की छवि अलग है इसलिए यह मुद्दा वहा उस तरह से नहीं उठ रहा जैसे अन्य राज्यों में उठ रहा है ।इसे चौहत्तर आंदोलन की वापसी मानना चाहिए जो इस बार और आगे तक जा सकता है । क्योकि उत्तर से दक्षिण तक भ्रष्टाचार का सवाल लोगों को मथ रहा है ।अन्ना हजारे ठीक जेपी की तरह सामने आए है जिससे लोगों को काफी उम्मीद भी नजर आ रही है ।
विभिन्न जन संगठन अन्ना के आंदोलन को ताकत देने में जुट गए है तो राजनैतिक दलों को भी देर सबेर सामने आना ही पड़ेगा । उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और वसूली के चलते कुछ जान दे रहे है तो कुछ की जान ले ली जा रही है। ऐसे में कर्मचारियों से लेकर छात्र ,शिक्षक ,डाक्टर ,वकील और सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं का एक मंच पर आना एक बड़े आंदोलन का साफ़ संकेत दे रहा है । यह कांग्रेस के साथ बसपा के लिए भी खतरे की घंटी है ।

Monday, March 21, 2011

राख में बदल गया बारूद


अंबरीश कुमार
लोधी रोड के शमशान घाट में आलोक तोमर को अंतिम विदाई के लिए पहुंचा तो जाम के चलते कुछ देर हो गई थी . उनकी चिता से लपटे निकल रही थी .वही खड़ा रह गया .करीब बीस साल का गुजरा वक्त याद आ गया .जनसत्ता में प्रभाष जोशी के बाद अगर कोई दूसरा नाम सबसे ज्यादा चर्चित रहा तो वह आलोक तोमर का था .जनसत्ता ने उन्हें बनाया तो जनसत्ता को भी आलोक तोमर ने शीर्ष पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .वे जनसत्ता रूपी तोप के बारूद थे.वह भी आज वाला जनसत्ता नही दो दशक पहले का जिसकी धमक और चमक के आगे अंग्रेजी मीडिया बौना पड़ गया था .शाम को देव श्रीमाली बोले - अब न तो वैसी हेडिंग आती है न भाषा में आक्रामकता है कुछ अपवाद छोड़कर .लगता है .मेरा जवाब था -यह समय का फेर है ,प्रभाष जोशी के समय की तुलना नही की जा सकती है .उन्होंने आलोक तोमर को तलाशा और तराशा भी .प्रभाष जोशी के बाद अब आलोक तोमर भी चले गए . बीस दिन पहले ही बात हुई तो उनकी तकलीफ को देखते हुए आगे बात करने से मना किया और कहा , सुप्रिया जी को सब बता दूंगा जो आपको समझा देंगी आपको बात करने के लिए काफी जोर डालना पड़ रहा है .वे कालाहांडी की मौजूदा हालत के बारें में मेरी जानकारी पर सवाल खड़ा कर बहस कर रहे थे .अंतत मैंने हथियार डाल दिए और उन्होंने चार पांच दिन में लिखने का वादा किया . फिर आलोक से बात नही हो पाई जो कहना होता था सुप्रिया से कहा जाता और उन्ही के जरिए जवाब मिल जाता .राख में बदलते आलोक तोमर को हाथ जोड़ पीछे लौटा तो सुप्रिया देखते ही फफक कर बोली -अब हम कभी रामगढ नही जा पाएंगे .हमारा घर नही बन पाएगा .देखिए आलोक चले गए .सुनता रहा बोलने को कुछ था ही नही .शमशान घाट से घर पहुंचे तो सुप्रिया का हाल और बुरा था .आलोक की फोटों को देख बार बार उन्हें आवाज दे रही थी .कुछ देर बैठा फिर बाहर निकल आया .छतीसगढ़ के वरिष्ठ अफसर आलोक अवस्थी ,हरीश पाठक ,देव श्रीमाली ,आलोक कुमार ,मयंक सक्सेना और राहुल देव आदि थे .करीब दो घंटे बाद कृष्ण मोहन सिंह के साथ दोबारा पहुंचा तो पद्मा सचदेव ,प्रणव मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा और टीवी के कुछ पत्रकार मौजूद थे .दो अप्रैल के कार्यक्रम पर बात हो रही थी .आलोक तोमर के वेब साईट डेटलाइन इंडिया को जल्द अपडेट करने पर पर भी चर्चा हुई .आलोक तोमर का मोबाइल फोन पहले से ही बंद कर दिया गया है और सुप्रिया का फोन फिलहाल अनिल गुप्ता के पास है और वही बात भी करेंगे क्योकि सुप्रिया सभी से बात कर सके यह संभव भी नही है .कुछ कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर बात होते होते अचानक सुप्रिया का ध्यान आलोक तोमर की फोटो पर जाता और वे फिर उन्हें पुकारने लगती .पद्मा सचदेव के सुप्रिया को गले से लगाकर कहा -आलोक कही नही गया है वह हम सबके साथ है .फिर उन्होंने आलोक तोमर के कई संस्मरण सुनाए और कहा -शादी के दौरान मैंने मजाक में कहा था मुझे बंगाली बहू नही चाहिए तो आलोक का जवाब था अब आपकी बहू तो यही बनेगी .
सुप्रिया बोली -ज्योतिष के जानकारों को आलोक झूटा साबित कर चले गए .आखिरी तक उनकी कलम चलती रही .१७ मार्च को उन्होंने जो लेख लिखा उसी के बाद बत्रा गए और फिर हमेशा के लिए चले गए . चितरंजन खेतान पिछले महीने जब विदेश जाने से पहले मिलने आए तो एक कविता लिखी जो अंतिम कविता बन गई .इस कविता की फोटो कापी अनिल गुप्ता ने कराकर सभी को दी .रात आठ बजे जब चलने को उठा तो सुप्रिया की आँखे फिर भर आई और बोली -दो अप्रैल को आ रहे है ना , मैंने इशारे से कहा हाँ .कुछ बोला नही गया .सामने बैठे आलोक तोमर के पिताजी को नमस्कार किया और फिर कमरे से बाहर आ गया .कृष्ण मोहन सिंह और विजय शुक्ल साथ थे . कुछ समझ में नही आ रहा था .समय ही हर घाव को भरता है और यहाँ भी यही होगा यह सोचकर दिलासा दे रहा हूँ .