Thursday, November 5, 2009

पत्रकारिता के एक युग का अंत


अम्बरीश कुमार
जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी नहीं रहे .जनसत्ता जिसने हिंदी पत्रकारिता की भाषा बदली तेवर बदला और अंग्रेजी पत्रकारिता के बराबर खडा कर दिया .उसी जनसत्ता को बनाने वाले प्रभाष जोशी का कल देर रात निधन हो गया । दिल्ली से सटे वसुंधरा इलाके की जनसत्ता सोसाईटी में रहने वाले प्रभाष जोशी कल भारत और अस्ट्रेलिया मैच देख रहे थे । मैच के दौरान ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा । परिवार वाले उन्हें रात करीब 11.30 बजे गाजियावाद के नरेन्द्र मोहन अस्पताल ले गए , जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया । प्रभाष जोशी की मौत की खबर पत्रकारिता जगत के लिए इतनी बड़ी घटना थी कि रात भर पत्रकारों के फोन घनघनाते रहे । उनकी मौत के बाद पहले उनका पार्थिव शरीर उनके घर ले जाया गया फिर एम्स । इंदौर में उनका अंतिम संस्कार किया जाना तय हुआ है , इसलिए आज देर शाम उनका शरीर इंदौर ले जाया जाएगा ।
प्रभाष जोशी जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे। मूल रूप से इंदौर निवासी प्रभाष जोशी ने नई दुनिया से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। मूर्धन्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी उनके समकालीन थे। नई दुनिया के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े और उन्होंने अमदाबाद और चंडीगढ़ में स्थानीय संपादक का पद संभाला। 1983 में दैनिक जनसत्ता का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसने हिन्दी पत्रकारिता की भाषा और तेवर बदल दिया ।

इसे कैसा संयोग कहेंगे की ठीक एक दिन पहले लखनऊ में उन्होंने हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए कहा -मेरा तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार ही घर बनेगा .इंडियन एक्सप्रेस से उनका सम्बन्ध कैसा था इसी से पता चल जाता है . प्रभाष जोशी करीब 3० घंटे पहले चार नवम्बर की शाम लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के बीच थे .आज यानी छह नवम्बर को तडके ढाई बजे दिल्ली से अरुण त्रिपाठी का फोन आया -प्रभाष जी नहीं रहे .मुझे लगा चक्कर आ जायेगा और गिर पडूंगा .चार नवम्बर को वे लखनऊ में एक कर्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे .मुझे कार्यक्रम में न देख उन्होंने मेरे सहयोगी तारा पाटकर से कहा -अम्बरीश कुमार कहा है .यह पता चलने पर की तबियत ठीक नहीं है उन्होंने पाटकर से कहा दफ्तर जाकर मेरी बात कराओ .मेरे दफ्तर पहुचने पर उनका फोन आया .प्रभाष जी ने पूछा -क्या बात है ,मेरा जवाब था -तबियत ठीक नहीं है .एलर्जी की वजह से साँस फूल रही है .प्रभाष जी का जवाब था -पंडित मे खुद वहां आ रहा हूँ और वही से एअरपोर्ट चला जाऊंगा .कुछ देर में प्रभाष जी दफ्तर आ गये .दफ्तर पहली मंजिल पर है फिर भी वे आये .करीब डेढ़ घंटा वे साथ रहे और रामनाथ गोयनका ,आपातकाल और इंदिरा गाँधी आदि के बारे में बात कर पुराणी याद ताजा कर रहे थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ संसकरण के संपादक वीरेंदर कुमार भी आ गए जो उनके करीब ३५ साल पराने सहयोगी रहे है .प्रभाष जी तब चंडीगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे .एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट ,संजय सिंह ,दीपा आदि भी मौजूद थी .
तभी प्रभाष जी ने कहा .वाराणसी से यहाँ आ रहा हूँ कल मणिपुर जाना है पर यार दिल्ली में पहले डाक्टर से पूरा चेकउप कराना है.दरअसल वाराणसी में कार्यक्रम से पहले मुझे चक्कर आ गया था .प्रभाष जोशी की यह बात हम लोगो ने सामान्य ढंग से ली .पुरानी याद तजा करते हुए मुझे यह भी याद आया की १९८८ में चेन्नई से रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जोशी से मिलने को भेजा था तब मे बंगलोर के एक अखबार में था ..पर जब प्रभाष जोशी से मिलने इंडियन एक्सप्रेस के बहादुर शाह जफ़र रोड वाले दफ्तर गया तो वहां काफी देर बाद उनके पीए से मिल पाया .उनके पीए यानि राम बाबु को मैंने बतया की रामनाथ गोयनका ने भेजा है तो उन्होंने प्रभाष जी से बात की .बाद बे जवाब मिला -प्रभाष जी के पास तीन महीने तक मिलने का समय नहीं है ..ख़ैर कहानी लम्बी है पर वही प्रभाष जोशी बुधवार को मुझे देखने दफ्तर आये और गुरूवार को हम सभी को छोड़ गए .
लखनऊ के इंडियन एक्सप्रेस की सहयोगियों से मैंने उनका परिचय कराया तभी मौलश्री की तरफ मुखातिब हो प्रभाष जोशी ने कहा था -मेरा घर तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार में ही है .हम सब कुछ समझ नहीं पाए .उसी समय भोपाल से भास्कर के पत्रकार हिमांशु वाजपई का फोन आया तो हमने कहा-प्रभाष जी बात कर रहा हु कुछ देर बात फोन करना . काफी देर तक बात होती रही पर आज उनके जाने की खबर सुनकर कुछ समझ नहीं आ रहा .भारतीय पत्रकारिता के इस भीष्म पितामह को हम कभी भूल नहीं सकते .मेरे वे संपादक ही नहीं अभिभावक भी थे..यहाँ से जाते बोले -अपनी सेहत का ख्याल रखो .बहुत कुछ करना है.प्रभाष जी से जो अंतिम बातचीत हुईं उसे हम जल्द देंगे .प्रभाष जोशी का जाना पत्रकारिता के एक युग का अंत है .
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Thursday, October 29, 2009

क्या न्यायाधीश महोदय की संवेदनाएं शून्य हो गई हैं?

वीना करीब डेढ़ दशक तक दिल्ली और लखनऊ से निकलने वाले अखबार से जुडी रही है और अब स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लिख रही है .हाल ही में जब दिल्ली के एक अखबार में इन्होने अपना लेख भेजा तो छापना तो दूर जवाब भी बहुत अपमानजनक तरीके से दिया गया .यह वही अखबार है जो आजकल बाबा रामदेव के बाद जोर शोर से समाज बदलने में जुटा है . बीना के जीवनसाथी और राजेंद्र तिवारी अमर उजाला ,भास्कर के विभिन्न संस्करण के संपादक रहे है और अब हिन्दुस्तान के झारखण्ड के संस्करणों के संपादक बनाये गए है.
क्या न्यायाधीश महोदय की संवेदनाएं शून्य हो गई हैं?
वीना
महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में कमी तो आ नहीं रही है अलबत्ता कठोर
सजा मिलने की अपेक्षा सजा कम जरूर हो रही है। आज ही यह खबर छपी है कि
दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या, बलात्कार, हत्या के प्रयास, और लूटपाट करने
वाले एक नौकर को निचली अदालत से मिली मौत की सजा को जघन्यतम अपराध न होने
के कारण 25 साल के सश्रम कारावास में तब्दील कर दिया गया है।

क्या माननीय हाई कोर्ट इस पर प्रकाश डाल सकता है कि जघन्यतम अपराध कौन से
हैं? एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म, 4 साल के छोटे से बच्चे की हत्या
क्या जघन्य अपराध नहीं है। हां इससे ज्यादा जघन्य ये होता कि जब दुष्कर्म
के बाद उस लड़की की हत्या कर दी जाती और फिर छोटी बेटी के साथ भी यही
होता। क्या न्यायाधीश महोदय की संवेदनाएं शून्य हो गई हैं? या अपराधी के
वकील के अपनी कोई बेटी या बेटा नहीं है। क्या वकील को उन मां-पिता की
आंखों का दर्द या आंसू नहीं दिखे। जिसने अपना इकलौता बेटा खोया है, अपनी
बेटी के जीबन के साथ खिलवाड़ देखा है उनके या अन्य किसी के लिए भी इससे
ज्यादा जघन्य और क्या हो सकता है? वकील साहब ने तो मोटी रकम ली होगी। मगर
ऊपर की अदालत में ये रकम काम नहीं आएगी और न वो घर, न बीवी-बच्चे जिनके
लिए ये सब किया और खुद के लिए भी किया है तो भी इसकी सजा स्वयं भुगतनी
होगी। एक लड़के ने जघन्य अपराध किया उलकी सजा दिलवाकर कम से कम उन
माता-पिता को थोड़ी शांति तो दे दी होती कि उनके परिवार को बिखेरने वाले
को मौत की सजा मिली। वो केवल यहां की अदालत में बचा है ईश्वर की अदालत
में उसे कौन बचाएगा? अगर उसे मौत की सजा मिलती तो शायद कोई तो इस तरह का
अपराध करने से पहले सोचता। दुष्कर्म जैसे अपराध के लिए तो केवल एक ही सजा
होनी चाहिए मौत की सजा. ताकि नारी कि इज्जत को खिलौना समझने वाले ये जाने
कि वो भी बचेंगे नहीं। मैं इस फैसले को जरूर पढ़ूंगी।

यही नहीं मणिपुरी युवती की हत्या का केस भी इसी दिशा की तरफ जा रहा है,
उसे भी थोड़ी सी सजा मिल जाएगी क्योंकि अभी से अखबार में ये आने लगा कि
अपराधी आई. आई. टी. छात्र पुष्पम का व्यवहार ठीक नहीं था और इसी का लाभ
उठाकर वकील उसे बचाएगा, कोर्ट थोड़ी सजा देकर मुक्त हो जाएगा लेकिन उसके
घरवालों के बारे में कोई नहीं सोचेगा और जेल से बाहर आकर वो अपराधी फिर
किसी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करेगा और हत्या करेगा।

राजा-महाराजाओं के समय ठीक होता था जो कठोर दंड होते थे। अमानवीय थे
लेकिन फिर किसी और की वो अपराध दोबारा करने की हिम्मत नहीं होती थी। अब
जरूरत ऐसे ही फैसलों की है जिससे समाज में महिलाओं के प्रति बढ़ रहे
अपराधों पर अंकुश लग सके। आज 6 माह की, ढाई साल, 8 साल की बच्ची, किशोरी,
युवा, प्रौढ़ा यहां तक वृद्धा तक सुरक्षित नहीं है। जिस घर में बेटी होती
है उस घर की मां की, महिलाओं की नींद उड़ी रहती है। बेटी की वजह से नहीं
बल्कि उसकी सुरक्षा को लेकर और समाज में पल रहे दरिंदों को लेकर।


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Tuesday, October 27, 2009

मै अखबार का नाम नहीं लेना चाहती

वीना
मैं अपने नए ब्लाग शिकंजी के साथ अपने ब्लाग मित्रों के बीच हूं । इसमें आपको कुछ मीठी-कुछ खट्टी टिप्पणियों के साथ समाज की वास्तविकता भी देखने को मिलेगी। हौसलाफजाही के रूप में आप की राय व टिप्पणियां भी मिलती रहीं तो मनोबल तो बढ़ेगा साथ ही मैं और भी बेहतर कर सकूंगी।
`सच का सामना', आपने ठीक समझा यह उसी कार्यक्रम के बारे में है जो स्टार प्लस पर प्रसारित हुआ था। उसकी आखिरी कड़ी के दो-तीन दिन बाद आपकी अदालत में रजत शर्मा ने सच का सामना के प्रस्तुतकर्ता राजीव खंडेलवाल, प्रश्न तैयार करने वाले सिद्धार्थ बसु और कुछ प्रतिभागियों को बुलाया था। उसके बाद मैने यह लेख लिखा था और 29 सितम्बर को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हिंदी अखबार को ई.मेल द्वारा भेजा था, 24 अक्टूबर को जब मैने उनसे फोन पर बात की तो उनका जवाब था कि मेरे पास रोज इतने लेख आते हैं सबको देखना बहुत मुश्किल है। इसके लिए तो एक आदमी रखना पड़ेगा।
अखबार से पाठक नहीं होते बल्कि पाठकों से अखबार होता है। ना तो मै अखबार का नाम लेना चाहती नहीं व्यक्ति विशेष का। मैं हिंदी अखबारों में चल रही अव्यवस्था के खिलाफ बताना चाह रही हूं। मैंने भी 11-12 साल अखबार में काम किया है। तब शायद इतनी खराब व्यवस्था नहीं थी, पाठकों से इस तरह बात नहीं की जाती थी। आज क्या वजह है जो पाठकों से इस तरह से बात की जाती है कि इसके लिए हमें एक आदमी रखना पड़ेगा। यह समस्या पाठकों की नहीं है अखबार की है, वो कितने व्यक्ति रखे। लेखों की भी श्रेणी होती है जिनमें कुछ सम-सामयिक होते हैं और कुछ समय बाद उनकी उपयोगिता ही खत्म हो जाती है। ऐसे लेखों को पहले छापना होता है या उपयोगी न होने पर वापस कर दिया जाता है। अब तो ई.मेल का युग है कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। लिखने वाले हजारों होते हैं अखबार को अनेक लेख मिलते हैं लेकिन लिखने वाले के लिए उसका अपना ही लेख होता है जिसमें उसकी भावनाएं होती हैं जो वह बांटना चाहता है। उम्मूद है अखबार में काम करने वाले पत्रकार भाई पाठकों की भावनाओं का ध्यान रखेंगे। वह लेख ब्लाग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है।
सच का सामना
जिंदगी जीने का सबका अपना अंदाज होता है। अंदाज के साथ उसका अधिकार भी है ऐसे में किसी के भी अधिकार या अंदाज पर दखल देना कहां तक उचित है या उचित है भी या नहीं। जहां तक मैं समझती हूं और शायद ठीक ही समझती हूं किसी भी व्यक्ति के पास अपने जीवन के अलावा कुछ भी निजी नहीं है। उस पर भी मीडिया सेंध मार चुका है। बची-खुची कसर हम लोग आपस में ही टांग खीचकर पूरी कर लेते हैं। मुद्दे पैदा करना और उलटी दिशा में चलना हमारी फितरत बन चुकी है। किसी का सही या गलत होना या हमारी सोच में सही-गलत का फैसला दोनों बातें अलग हैं। गलत को तो गलत ठहराया ही जाना चाहिए लेकिन दुख वहां होता है जहां केवल अड़ंगे लगाने के लिए,टांग खीचने के लिए सही को भी गलत ठहराया जाता है। अभी टी.वी.के स्टार प्लस चैनल पर एक कार्यक्रम प्रसारित हुआ `सच का सामना’। इसके साथ ही शुरू हुई मुद्दों की श्रंखला। पहला मुद्दा सामाजिक मान्यता बना। हम किन सामाजिक मान्यताओं की बात करते हैं जो हमने अपनी सोच और फायदे के अनुसार निर्धारित की है। इधर आने वाले सभी सीरियलों में किन सामाजिक मान्यताओं का ध्यान रखा जाता है। विवाह पूर्व व विवाह के बाद संबंधों को दिखाना आम बात है। शादी के कुछ वर्षों कहीं से एक लड़का या लड़की का आना और घर की शालीन व प्रिय बहू का बेटा या बेटी होने का दावा करना, जो बाद में सही निकलता है। शादी के बाद प्रेम संबंधों का होना कुछ नया नहीं। रजत शर्मा ने भी सच का सामना को लेकर`आपकी अदालत’ में यही मुद्दे बार-बार उठाए। बच्चा गिराना, गर्भवती होना जैसे शब्दों को और उनके बारे में आज छोटे-छोटे बच्चे भी जानते हैं। छठी-सातवीं में पढ़ने वाले बच्चे सेक्स करते हैं। टीवी पर दिखाई एक रिपोर्ट में जब लड़कों से पूछा गया कि आप लोग सैक्स करतें हैं तो उनका जवाब था`हां, जब ये पूछा गया कि क्या लड़कियों के साथ आप जबरदस्ती करते हैं या बहलाते-फुसलाते हैं। तो उन्होने कहा वो अपनी मर्जी से करती हैं हम जबरदस्ती नहीं करते और लड़कियों से पूछने पर उन्होंने धड़ल्ले से कहा जब लड़के कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं, गोया ये कोई प्रतियोगिता है या कंधे से कंधा मिलाकर चलने की प्रतिबद्धता। ये हैं हमारे आज के समाज के बच्चे। कहां गईं सामाजिक मान्यताएं। जब टी.वी. चैनल पर दिल्ली के ही कुछ स्कूलों के बारे में ये रिपोर्ट दिखाई गई तब रजत शर्मा ने उन स्कूलों के प्रधानाचार्य या प्रबंधन को आपकी अदालत में क्यों नहीं घसीटा ? जिन स्कूलों में शिक्षक छात्र-छात्राओं का यौन शोषण करते हैं उन स्कूलों के प्रबंधन को क्यों कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता। जहां तक `सवाल सच‘ का सामना का है उसका समय भी रात दस बजे का था जब बच्चों के सोने का समय होता है उस दौरान स्क्रीन पर लगातार चलता है कि अविभावकों की निगरानी आवश्यक है और यदि बच्चे कहना नहीं मानते तो आप उन्हें क्या सीख देंगे और बाद में उसका समय 11 बजे कर दिया गया।
अब जरा उस कार्यक्रम पर भी चर्चा करें। उस कार्यक्रम में हमें क्या परोसा जा रहा था। सच का सामना करने वाले हर व्यक्ति से शारीरिक संबंधों के बारे में जरूर पूछा गया। महिला से उसके पति के सामने पूछा गया कि कहीं और शादी होती तो आप ज्यादा खुश होतीं? क्या तलाक हो चुका है? ये कैसा जीवन है जहां शादी के डेढ़ साल बाद गुपचुप ढंग से तलाक ले लिया जाता है और घर वालों को पता भी नहीं चलता। इसके बावजूद साथ रहें और गर्ल फ्रैंड छूटने का इंतजार रहे। जहां हुसैन साहब जैसे कलाकार अपनी बेटी से छोटी उम्र की लड़की से शारीरिक संबंधों को स्वीकार करें। जहां व्यक्ति विशेष ये बताए कि जरूरत के लिए उसने समलैंगिक संबंध बनाए, पैसों के लिए शादीशुदा महिलाओं से संबंध बनाए। योगा सिखाने के बहाने उसने अपने क्लाइंट्स को सेक्स वर्कर् उपलब्ध करवाए और ये सब अपने माता-पिता, भाई की मौजूदगी में स्वीकार करे। क्या यही सामाजिक मान्यता है, लिहाज है। इतना सब जानने के बाद माता-पिता कैसे गले से लगा सकते हैं और वो कैसे उनकी नजरों का सामना कर सकता है। क्या यही शिक्षा हमें दी जाती है कि एक दिन इस तरह हम घरवालों का नाम रोशन करें, सबके सामने शर्मसार करें? बाबी डार्लिंग ये खुलासा करे कि उसके पुरुष मित्रों ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने चाहे। जहां धड़ल्ले से स्वीकार किया जाए कि शादी के बाद उनके शारीरिक संबंध कहीं और हैं। इस कार्यक्रम के जरिए लोगों को क्या संदेश दिया गया कि समाज में सैक्स ही सबकुछ है। किसी भी स्तिथि में, किसी भी उम्र में, इस भूख की न कोई सीमा है न अंत, न रिश्ते हैं न शर्म। ये आम चलन है आप भी सारी सामाजिक मान्यताओं को ताख पर रखकर बिंदास होकर सैक्स करिए और फिर रुपयों की खातिर रिश्तों को तार-तार करिए। उस मंच पर ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का स्वागत हुआ जो किसी न किसी रूप से अनेक के साथ शारीरिक संबंधों से जुड़ा रहा। ये तो खुला आमंत्रण है जिसने जितने ज्यादा पाप किए हों (क्योंकि ये पुण्य तो हो नहीं सकता, हां, करने वालों की नजर में सही जरूर है क्योंकि ये उनका नजरिया है) आफिस में घपले किए हों, नकली व घटिया सामान सप्लाई किया हो और जो बेशर्मी से रुपयों के लिए सबके सामने स्वीकार कर सकता हो हां, मैने सारे गलत काम किए हैं और ये कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि ये सारे काम भी रुपयों के लिए ही किए गए। यानि जीवन का एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण रुपया कमाना है। ये तो गलत काम को पुरुस्कृत करना जैसा हुआ। हो सकता है सीजन टू में वो महिलाएं आएं जो देह व्यापार करती हों और जिनको लोग पहचानते हैं उन्हें सबके सामने आकर स्वीकार करने से क्या गुरेज होगी?
आज से बीस साल पहले मैं एक ऐसी लड़की को जानती थी जिन्होने कई बार अपने शरीर का सौदा किया था। मैने उन्हें हमेशा दीदी कहा। आज भी मैं उनकी इज्जत करती हूं। हम लोग उस समय लखनऊ शिफ्ट हुए थे। मुझे मना किया गया था कि उनसे दूर रहूं। हालांकि मेरी मां भी उन्हें दोषी नहीं मानती थीं लेकिन बदनामी की हवा से सभी दूर रहना चाहते हैं। मैं छोटी जरूर थी मगर इतनी भी नहीं कि चीजें नहीं समझती थी। अगर मेरे जाने के बाद ये घटता तो मैं जरूर उनका साथ देती। उन्होने जो किया रुपए कमाने के लिए नहीं बल्कि अपनी बहन की जान बचाने के लिए। पहली बार वो पचास रुपए के लिए बिकी थीं, वो भी अपने चचेरे चाचा के हाथ। पिता ने लाखों की जायदाद बर्बाद कर दी थी। उनकी दो छोटी बहनें और एक पागल भाई था। बड़ी मुश्किल से वो इंटर कर पाई थीं। घर चलाने के लिए दीदी मोहल्ले के छोटे से स्कूल में पढ़ाती थीं। एक बार उनकी सबसे छोटी बहन को बुखार चढ़ा। वो बुखार से तप रही थी दवा के लिए रुपए नहीं थे। वो स्कूल के प्रिंसिपल के पास रुपए मांगने गई तो उन्होंने उनसे कीमत मांगी और दीदी खरी-खोटी सुनाकर वापस आ गईं लेकिन रात में उसकी तबियत बिगड़ गई और वो मदद मांगने अपने चचेरे चाचा के पास गईं और वहां उनके जीवन की पहली रात घटी जिसने फिर ऐसी कई रातें दीं। जिस लड़के को चाहती थीं उसने सब जानते हुए अपनाना चाहा लेकिन होने वाली सास के कारण उन्होने शादी नहीं की। फिर जब उन्हें पता चला कि उसी चाचा की गंदी नजरें उनकी छोटी बहन पर पड़ रही हैं तो अपनी बहन को बचाने के लिए लड़का ढूंढा और कम उम्र में ही उन्होने उसकी शादी कर दी ताकि उसकी इज्जत बच सके। लड़के का एक पैर जरूर खराब था लेकिन परिवार बहुत सम्पन्न था उन्होने अपनी बहन को इज्जत के साथ विदा किया। उनके बेशर्म पिता उनकी कमाई खाते रहे। पागलपन में भाई की मृत्यु हो गई। बीमारी में सबसे छोटी बहन चल बसी। उसके बाद पता चला कि उस लड़के ने उनसे शादी कर ली और उसके बाद उस मोहल्ले में कभी नहीं आई। अब पता नहीं वो किस गुमनामी के अंधेरे में गुम हो गई। खुद मजबूरी को भोगा मगर बहन को बचाया, जब दोनो भाई-बहन की मृत्यु हो गई तो खुद फाके किए मगर फिर बिकी नहीं। आज वो हैं भी या नहीं। मैं नहीं जानती मगर मैं उनको सलाम करती हूं। उन्होने हार नहीं मानी थी। उस प्रिंसिपल के आगे वो झुकी नहीं लेकिन तबियत बिगड़ने पर वो अपने चाचा के पास ही गईं थी और लूटने वाला अपना ही निकला। फिर भी उन्होने अपनी बहन पर आंच नहीं आने दी। छोटे भाई-बहन की मृत्यु के बाद उन्होने वह जगह ही छोड़ दी। वो कोई अकेली ऐसी लड़की नहीं हैं, बहुत होंगी जिन्होने अपने परिवार के लिए अपनी इज्जत का सौदा किया होगा क्योंकि बच्चे पैदा करने के बाद गरीबी के कारण माता-पिता पढ़ा नहीं पाते और हमारा तथाकथित समाज इन्हीं बातों का फायदा उठाकर लड़कियों को शिकार बनाता है। शायद भगवान ने बड़ी बहन को ये जज्बा देकर भेजा है कि छोटे भाई-बहनों के लिए वो कुरबान हो जाएं। लेकिन इसके बाद वो परिवार को शर्मसार नहीं करतीं लेकिन सेक्स वर्कर उपलब्ध कराना तो दलालों का काम है, धंधा है उनका। इसमें झूठ-सच क्या। क्योंकि वो दस लाख-पच्चीस लाख जीत रहे हैं तो माता-पिता दलाली जैसे गुनाह माफ कर रहे हैं। अगर वाकई में शर्मिंदगी है तो पहले अपने माता-पिता के सामने सच क्यों नहीं कुबूल किया। क्यों अब तक छुपाए रखा। ये भी सच है कि किसी को जबरदस्ती नहीं बुलाया गया था लेकिन ये कौन सा जौहर दिखाने का मंच था जहां पर उसके साहस या गुणों को परखा जा रहा था। जहां तक सामाजिक मान्यताओं और संस्कृति की बात है तो हमें रिश्तों का और महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है। मंजिल पाने के लिए गलत रास्ता नहीं चुनने की सलाह दी जाती लेकिन शो का उद्देश्य क्या था कि जो जितने ज्यादा कपड़े उतारेगा, उतने ज्यादा रुपए ले जाएगा। जो नंगा हो जाएगा उसे एक करोड़ मिलेगा। ये तो कपड़े उतारने-उतरवाने का शो था। इससे ज्यादा कुछ नहीं।

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Sunday, October 18, 2009

गोयनका के तोपची भी इसी रास्ते पर चले थे

अम्बरीश कुमार
बहस संवादाता के अति उत्साह या खबरों की कुलबुलाहट पर चली तो संपादको की भूमिका को भी दायरे में ले लिया गया है .मीडिया संस्थानों की राजनेतिक भूमिका से उसका पत्रकार कैसे अछूता रह सकता है .जो राजनितिक धारा संस्थान की होगी खबरे भी उसी चरित्र की मिलेंगी .कोलकोता की पत्रकार ने जो किया उसमे उनके संस्थान और संपादक की कितनी भूमिका थी नहीं पता .ममता से कुछ बुलवा लिया जाये यह तो जरुर कहा जा सकता है पर उसके लिए ममता बनर्जी के काफिले में वाहन घुसा दिया जाये यह तो नहीं कहा जा सकता .
पर संस्थान के राजनितिक दबाव का असर पत्रकार पर भी पड़ता है जिसके चलते कोई भी अपनी सीमा लाँघ जाये तो हैरान नहीं होना चाहिए .
एक उदाहरण इंडियन एक्सप्रेस के उस दौर का दे रहा हूँ जब रामनाथ गोयनका केंद्र में वीपी सिंह की सरकार बनवाने की मुहीम में जुटे थे.रामनाथ जी हमेशा सत्ता के खिलाफ मुखर रहे और आपातकाल में उन्होंने ही मीडिया की तरफ से सीधा लोहा लिया था पर राजनीती में उनका दखल हमेशा रहा .जाहिर है उनके संपादक भी इससे अछूते नहीं रहते.तब जनसत्ता में प्रभाष जोशी और एक्सप्रेस में अरुण शौरी कमान संभाले हुए थे.मुझे हरियाणा के दौरे पर भेजा गया था .अचानक रोहतक में सन्देश मिला की देवीलाल का इंटरव्यू लेना है .जब देवीलाल के पास पंहुचा तो वहा प्रभाष जोशी और बोफोर्स पर एक्सप्रेस की तरफ से मोर्चा लेने वाले गुरुमूर्ति भी मौजूद थे . इंटरव्यू लेकर मैंने दे दिया .जब छपा तो हेडिंग थी -चंद्रशेखर का बिना नाम लिए देवीलाल ने कहा -वीपी के रास्ते में जो आएगा वह बाहर कर दिया जायेगा . यह इंटरव्यू इंडियन एक्सप्रेस में भी छपा. अपने सहयोगियों से कहा -देवीलाल ने यह बात तो कही नहीं थी क्योकि पूरा इंटरव्यू मेने छोटे टेप रिकॉर्डर से टेप भी कर लिया था .पूरी कहानी काफी रोचक है जिसे मेरी पुस्तक -हमारे संपादक और हमारे सहयोगी ,में विस्तार से दिया जा रहा है.पर मेरी प्रतिक्रिया के बाद मुझे डेस्क पर रहते रिपोर्टिंग का जो मौका दिया जा रहा था वह कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया . इस घटना से अखबार या मीडिया संस्थान के राजनैतिक सरोकार के दबाव को आसानी से समझा जा सकता है.एक्सप्रेस समूह और देवीलाल के बीच जब टकराव हुआ तो रविवार की कवर स्टोरी थी -गोयनका के तोपचियों के निशाने पर देवीलाल.
मामला यही तक सीमित नहीं है संस्थान और संपादक में टकराव हुआ तो संपादक का जाना तय है .मंडल के खिलाफ अरुण शौरी के इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर जब मंडल विरोधी छात्र नेताओ का अड्डा बना और एक्सप्रेस ने मंडल के खिलाफ मोर्चा खोला तो रामनाथ गोयनका को यह रास नहीं आया और उनकी एक्सप्रेस से विदाई हो गई .
सिर्फ एक्सप्रेस समूह ही नहीं देश के ज्यादातर मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनेतिक दल के साथ खड़े नज़र आते है ऐसे में उसके पत्रकार की घोषित राजनितिक धारा भी वही मानी जाती है अब संवाददाता क्या करे . कोलकोता की घटना को इस नज़रिए से भी देखना चाहिए .
दूसरा उदहारण ,छत्तीसगढ़ में जब इंडियन एक्सप्रेस में मैंने बालको आन्दोलन की खबरे दी तो उन्हें कोई जगह नहीं मिली पर जन आन्दोलन को लेकर कुछ विवाद हुआ तो एक्सप्रेस में काफी प्रमुखता दी गई क्योकि यह उनकी उदारीकण की धारा को मजबूत करती थी .अखबार या मीडिया संस्थान के अंदरूनी दबाव पर भी विचार करना होगा जिसे हर पत्रकार झेलता है.

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Thursday, March 19, 2009

वाम राजनीती में हाशिये पर गई महिला

रीता तिवारी  
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की चुनावी ट्रेन एक बार फिर छूट गई है। महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देने वाले विधेयक की पुरजोर वकालत करने वाले वामपंथी दलों ने राज्य की 42 लोकसभा सीटों पर महज दो महिलाओं को ही टिकट दिया है, जो पिछली बार के मुकाबले आदे से भी कम है। कहां तो अबकी बीते चुनावों के मुकाबले इसकी तादाद बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन उसमें भी कटौती हो गई है। चौदह सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस ने दो महिलाओं को टिकट दिया है। भाजपा ने एक महिला को मैदान में उतारा है। दूसरी ओर, नंदीग्राम व सिंगुर जैसे मुद्दों और कांग्रेस के साथ तालमेल व फिल्मी सितारों के सहारे मैदान में उतरी तृणमूल कांग्रेस ने 28 में से पांच सीटों पर महिलाओं को मैदान में उतारा है। राज्य में सत्तारूढ़ वाममोर्चा के नेता महिला उम्मीदवारों का टोटा होने का रोना रो रहे हैं।
वाममोर्चा ने वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में पांच महिलाओं को टिकट दिया था। इनमें से तीन चुनाव जीत गई थी। लेकिन अबकी उनमें से भी एक का पत्ता साफ हो गया है। 42 में 32 सीटों पर लड़ने वाली माकपा ने पिछली बार जीतने वाली तीन में दो महिलाओं को दोबारा टिकट दिया है। इनमें से ज्योतिर्मयी सिकदर कृष्णनगर और सुष्मिचता बारूई विष्णुपुर आरक्षित सीट से लड़ेंगी। पिछली बार जीतने वाली मिनती सेन को अबकी टिकट नहीं दिया गया है। मोर्चा के बाकी तीन घटकों-आरएसपी, फारवर्ड ब्लाक और भाकपा ने तो दस में किसी भी सीट पर किसी महिला को टिकट नहीं दिया है। विडंबना यह है कि राज्य में माकपा के महिला सदस्यों की तादाद 30 हजार से ऊपर है। लेकिन पार्टी के नेताओं की दलील है कि उनको कोई योग्य महिला उम्मीदवार ही नहीं मिली।
माकपा के वरिष्ठ नेता व राज्यसभा सदस्य श्यामल चक्रवर्ती की दलील है कि हर सीट का महत्व है। इसलिए हमने उम्मीदवारों के चयन में काफी सावधानी बरती। वे कहते हैं कि काफी विचार-विमर्श के बाद जीत सकने लायक उम्मीदवारों को ही टिकट दिए गए। पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं कि राज्य में ऐसी योग्य महिलाओं की कमी है जो लोकसभा चुनाव लड़ कर जीत सकें। उनकी दलील है कि विधानसभा, नगर निगम व पंचायत चुनावों में इसकी भरपाई कर दी जाएगी। पिछली बार जीतने वाली माकपा की महिला नेता मिनती सेन, जिनको अबकी टिकट नहीं मिला है, ने कहा है कि उको टिकट नहीं देने का फैसला पार्टी का है। लेकिन वे कहती हैं कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए। 
माकपा के नेता भले कुछ भी दलील दें, यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच प्रस्तावित तालमेल से वोट घटने के अंदेशे के चलते ही माकपा ने कम से कम महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला किया। यह सही है कि तालमेल बाद में हुआ और मोर्चा के उम्मीदवारों की सूची पहले जारी हुई। लेकिन उस समय तक तालमेल की संभावना तो बढ़ ही गई थी और पार्टी के तमाम नेता इसके चलते वोट और सीटें घटने का अंदेशा जता रहे थे।
कांग्रेस ने जिन दो महिलाओं को टिकट दिया है उनमें से एक दीपा दासमुंशी को तो अपने पति के कोटे के तहत ही रायगंज से टिकट मिला है। रायगंज प्रिय रंजन दासमुंशी की पारंपरिक सीट रही है। दीपा भी उसी लोकसभा क्षेत्र के तहत पड़ने वाली विधानसभा सीट से पिछली बार चुनाव जीत चुकी हैं। अपनी लंबी बीमारी की वजह से दासमुंशी अबकी चुनाव लड़ने की हालत में नहीं हैं। इसलिए वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस ने उनके बदले उनकी पत्नी को टिकट दियाा है। इसके अलावा बर्दवान-दुर्गापुर सीट से नरगिस बेगम को टिकट दिया गया है। भाजपा ने प्रदेश महिला शाखा की प्रमुख ज्योत्सना बनर्जी को कोलकाता दक्षिण संसदीय सीट पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के खिलाफ मैदान में उतारा है। बीते चुनावों में भाजपा व तृणमूल साथ थी। लेकिन अब दोनों के रास्ते अलग हो गए हैं। इसलिए भाजपा ने ममता के खिलाफ एक महिला को ही उतार दिया है।
जहां तक तृणमूल कांग्रेस की बात है उसमें ममता के अलावा फिल्मी अभिनेत्री शताब्दी राय मैदान में हैं। डा.काकोली घोष दस्तीदार भी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ेंगी। कांग्रेस के साथ तालमेल के तहत 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी ने पांच महिलाओं को मैदान में उतारा है। ममता कहती हैं कि हमारी कथनी व करनी में फर्क नहीं है। हमारी सूची में लगभग 15 फीसद महिलाओं के नाम हैं। लेकिन वाममोर्चा ने तो आधे फीसद से भी कम महिलाओं को टिकट दिया है। पार्टी की दलील है कि कांग्रेस के साथ तालमेल के बाद दोनों की सूची को जोड़ने पर कुल 42 में से सात सीटों पर महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं। जबकि वाममोर्चे ने इतनी ही सीटों पर दो महिलाओं को टिकट दिया है। यानी हमने मोर्चा के मुकाबले साढ़े तीन गुना ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया है।

Wednesday, March 18, 2009

बिहार की हालत में पहुंच जाएगी उत्तर प्रदेश कांग्रेस

जनादेश ब्यूरो 
लखनऊ,  मार्च। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बिहार के पर है। कांग्रेस के आधारहीन नेताओ के चलते पार्टी को यहाँ झटका लग सकता है।  उत्तर प्रदेश की ८0 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के रवैये से आजिज आकर अंतत: कुछ 5 सीटें ऐसी छोड़ी जिस पर वह उम्मीदवार नहीं खड़ा करेगी। किसी भी राष्ट्रीय दल की ऐसी दुर्गति पहले कभी नहीं हुई। इसका संदेश अब उत्तर प्रदेश में नीचे तक जा  रहा है और माना जा  रहा है कि कांग्रेस को इस बार कहीं और तगड़ा ङाटका न लग जए। 
यह तब हुआ है जब केन्द्र में लगातार पांच साल तक उपलब्धियां गिनाने वाली उसकी सरकार रही है। कांग्रेस ने अगर गठबंधन धर्म का सबक नहीं लिया तो इस बार वह सत्ता से बाहर भी जा सकती है। कमोवेश सभी राज्यों में क्षेत्रीय दल इस राष्ट्रीय दल पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। गठबंधन न होने की दशा में पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में तगड़ा ङाटका लग सकता है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की चर्चा से जो माहौल बना, उसका फायदा अब कांग्रेस के बजय समाजवादी पार्टी को ज्यादा हो सकता है। उत्तर प्रदेश से करीब तीन दजर्न सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हैं। राज्य की ज्यादातर सीटों पर बहुजन समाज पार्टी से वह सीधा मुकाबला करने जा रही है। पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने आज सपा मुख्यालय में जुटे उलेमा से कम से कम ५0 सीटें जिताने की अपील की। 
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन में कांग्रेस को १७ सीटें देने के लिए मुलायम सिंह तैयार हो चुके थे और इसमें भी बढ़ोत्तरी की गुंजइश का संकेत दिया था। पर इसी बीच कांग्रेस ने २४ उम्मीदवारों की सूची जरी कर सपा नेतृत्व को भड़का दिया। इस सूची में आधा दजर्न उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी हार सुनिश्चित है। बाकी बचे १८ जिसके लिए सपा कमोवेश तैयार थी। पर यह गठबंधन दोनों पार्टियों के नेताओं की मूंछ की लड़ाई के चलते लटकता नजर आ रहा है। बिहार में सहयोगी दलों से मिली न्यूनतम सीटों के बावजूद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। बिहार की तीन सीटों के मुकाबले उत्तर प्रदेश की १८ सीटों का हिस्सा सम्मानजनक माना जता। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत की संभावनाओं पर कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा-पार्टी ने जो २४ सीटें घोषित की हैं, उसमें दो-तिहाई पर हमारी जीत तय है। 
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा-एक तरफ बिहार कांग्रेस को उसके सहयोगी दल तीन सीट दे रहे हैं, वहीं हम उत्तर प्रदेश में १७ सीटें देने का पहले ही एलान कर चुके थे। बिहार में इन दोनों दलों के नेता लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान केन्द्र सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे। तब यह हिस्सा मिला है। दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव जिन्होंने सरकार बचाई, उसकी उदारता की तरफ किसी कांग्रेसी का ध्यान नहीं जता। सपा धर्म निरपेक्ष वोटों का बंटवारा रोकने के लिए गठबंधन पर जोर दे रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन न होने की दशा में इन दोनों पार्टियों का नुकसान भी तय है। आमतौर पर कांग्रेस की दो सीटें यहां पर पूरी तरह सुरक्षित मानी जती हैं। ये सीटें हैं सोनिया गांधी की रायबरेली और राहुल गांधी की अमेठी। इसके बाद खुद कांग्रेसी जीतने वाली सीटों के रूप में दस से ज्यादा संसदीय सीट का नाम नहीं बता पाते। कांग्रेस नेता फिलहाल जिन सीटों पर जीत का दावा कर रहे हैं, उनमें शामिल प्रतापगढ़ की सीट पिछली बार सपा के अक्षय प्रताप सिंह ने जीती थी। सुल्तानपुर की सीट भी सपा के ताहिर खान के खाते में गई थी। पडरौना की सीट नेलोपा के बालेश्वर यादव के खाते में गई थी। रामपुर की सीट से सपा की जयाप्रदा जीती थी। कांग्रेसी इन्हें अपनी मजबूत सीटों में गिन रहे हैं। इनके अलावा कांग्रेसी बाराबंकी, बरेली, फतेहपुर सीकरी, गोंडा, कानपुर और बांसगांव आदि की सीट पर पहले या दूसरे नंबर पर आने की बात कह रहे हैं। दूसरी तरफ वाराणसी, मथुरा और हापुड़ की जीती हुई सीटें कांग्रेस इस बार अलग-अलग वजहों से गंवा सकती है। कांग्रेस के आंकलन को मान लें तो करीब दजर्न भर सीटें वह जीत सकती है। ऐसे में यदि गठबंधन गया तो कांग्रेस की सीटों में तीन-चार सीट का और इजफा हो सकता है। यदि गठबंधन नहीं हुआ तो पार्टी को तीन-चार सीट का नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश में नौ-दस और बिहार में तीन सीटें मिल भी जएं तो आने वाले समय में इन दोनों प्रदेशों में पार्टी का जनाधार और गिर जएगा। पार्टी को जहां धीरे-धीरे अपनी सीटों की संख्या बढ़ानी चाहिए, वहीं वह उत्तर प्रदेश में ज्यादा संख्या के चक्कर में मात खा सकती है तो बिहार में मात खा चुकी है। अगली बार उत्तर प्रदेश में भी उसके सहयोगी दल बिहार वाली संख्या पर पहुंचा दें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

ममता बनर्जी भी फ़िल्मी सितारों के सहारे

रीता तिवारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को सिर्फ कांग्रेस के साथ तालमेल से ही संतोष नहीं है। इस लोकसभा चुनाव में अपने सितारे चमकाने के लिए वे फिल्मी सितारों के सहारे मैदान में उतरी हैं। वैसे, सितारों की सहारा लेना उनकी फितरत रही है। बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने जाने-माने बांग्ला अभिनेता तापस पाल को चुनाव लड़ाया और जिताया था। पाल के अलावा ममता ने माधवी मुखर्जी और नयना दास जैसी अभिनेत्रियों को भी टिकट दिया था। इस बार उन्होंने तापस पाल को तो मैदान में उतारा ही है, जानी-मानी बांग्ला अभिनेत्री शताब्दी राय और गायक कबीर सुमन को भी चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया है। ममता ने अपर्णा सेन और पेंटर शुभप्रसन्न को भी टिकट देने की पेशकश की थी। लेकिन बात नहीं बनी।
दरअसल, दो साल पहले नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग के खिलाफ ममता के साथ सड़क पर उतरने वालों में बुद्धिजीवियों, कलाकारों और गायकों का एक बड़ा तबका शामिल था। उसके बाद ममता से इन सबकी नजदीकियां बढ़ीं। उन्होंने शताब्दी राय को बीरभूम संसदीय सीट से मैदान में उतारा है। राय ने तारापीठ में दर्शन-पूजन के बाद अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया है। शताब्दी का कहना है कि वे एक व्यक्ति व नेता के तौर पर ममता की इज्जत करती हैं। ममता राज्य के लोगों के जीवन में बदलाव का प्रयास कर रही हैं। इसलिए उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुरोध किया तो वेइंकार नहीं कर सकीं। शताब्दी कहती हैं कि वे लोकप्रियता हासिल करने के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं। एक अभिनेत्री के तौर पर यह तो मुझे पहले से ही हासिल है। अब अपनी इस लोकप्रियता को मैं आम लोगों के हित में इस्तेमाल करना चाहती हूं।
गायक कबीर सुमन ने भी ममता के अनुरोध पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। वे कहते हैं कि चुनाव जीत कर अब राज्य में बदलाव का प्रयास करेंगे। विधायक तापस पाल भी कृष्णनगर सीट से किस्मत आजमा रहे हैं। फिल्म निर्माता अपर्णा सेन को भी तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली इस निर्देशिका ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अपर्णा ने साफ कह दिया कि सक्रिय राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है।
सिंगुर में किसानों की जमीन लौटाने की मांग में दिसंबर 2006 में ममता ने जब 26 दिनों तक अनशन किया था तब शतब्दी, कबीर समुन और तापस पाल वहां लगातार मौजूद रहे थे। अभिनेता तापस पाल तो तृणमूल के टिकट पर अलीपुर से विधानसभा चुनाव भी जीत चुके हैं। पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री माधवी मुखर्जी ने वर्ष 2001 में कोलकाता की यादवपुर विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लेकिन हार गई थीं। एक और अभिनेत्री नयना 2001 में चुनाव जीती थी। लेकिन लोकसभा चुनावों में कलाकारों और फिल्मी हस्तियों को पहली बार मैदान में उतारा है ममता ने।
शताब्दी ने तपन सिन्हा की फिल्म आतंक के जरिए 1986 में अपना फिल्मी सफर शुरू किया था। उनकी फिल्में खासकर बंगाल के ग्रामीण इलाकों में काफी हिट रही हैं।
ममता को पिछले लोकसभा चुनावों में महज एक सीटें मिली थीं। लेकिन अबकी वे इसकी तादाद बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इसलिए कांग्रेस के साथ तालमेल हो या फिर सितारों को मैदान में उतारना, वे कोई भी मौका नहीं चूक रही हैं। 
ममता की इस रणीनिति की सत्तारूढ़ वाममोर्चा ने कड़ी आलोचना की है। माकपा के वरिष्ठ नेता श्यामल चक्रवर्ती ने कहा है कि इस फैसले से साफ हो गया है कि तृणमूल कांग्रेस राजनीतिक दिवालिएपन की शिकार हो गई है। उसके पास ढंग के उम्मीदवारों का टोटा है। इसलिए अपनी किस्मत चमकाने के लिए वे फिल्मी सितारों का सहारा ले रही हैं। 
वैसे, यह सितारें जीते या नहीं, लेकिन उनके चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ जुट रही है। अपने चहेते कलाकारों को देखने के लिए। ममता के विरोधी चाहे कुछ भी कहें, कई सितारों को मैदान में उतार कर ममता ने अबकी लोकसभा चुनावों में ग्लैमर के रंग तो घोल ही दिए हैं।