Monday, December 27, 2010

विनायक सेन की रिहाई के लिए आंदोलन


लखनऊ दिसम्बर। पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन की रिहाई के लिए उत्तर प्रदेश प्रदेश के कई जिलों में आज धरना , प्रदर्शन कर विरोध जताया गया है । इलाहाबाद, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर समेत कई जिलों में बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठनों और छात्र-युवा संगठनों ने प्रदर्शन कर विनायक सेन की रिहाई की मांग की । इलाहाबाद में जहां असहमति दिवस मनाया गया तो वहीं वाराणसी में विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लोकतंत्र की अवमानना मानते हुए विरोध प्रदर्शन हुए। इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने विनायक सेन को सजा दिए जाने का विरोध करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया । उन्होंने कहा - जिस देश में तरह तरह के अपराधी छुट्टा घूम रहे हो वहां विनायक सेन को सजा दिया जाना लोकतंत्र का उपहास उड़ाने जैसी घटना लगती है जिसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए ।
इलाहाबाद के सिविल लाइन्स, सुभाष चौराहे पर आयोजित धरने को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध गांधीवादी डाक्टर बनवारीलाल शर्मा ने कहा कि विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सरकार के उस व्यापक प्रचार कार्यक्रम का हिस्सा है जिसमें वह निर्दोष विनायक सेन पर राष्ट्द्रोह के आरोप के शोर में जल-जंगल-जमीन की लूट के मुद्दे को खामोश कर देना चाहती है। हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन ने फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए राजनीतिक दबाव में दिया गया फैसला कहा। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका द्वारा दिया गया यह फैसला सिर्फ और सिर्फ जनतांत्रिक आवाजों को दबाने वाला फैसला है। डीवाइएफआई के प्रदेश सचिव सुधीर सिंह ने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार व नागरिक आजादी पर कुठाराघात है तो वहीं आइसा के प्रदेश सचिव रामायन राम ने कहा कि विकास के हत्यारे माडल और दमन के खिलाफ लड़ते हुए लोकतंत्र और मानवाधिकार की जिस लड़ाई को आगे बढ़ाया उसकी सजा विनायक सेन को दी गई है। कवि अंशु मालवीय ने कविता के माध्यम से कहा कि विनायक ने अलिफ के बजाय बे से शुरु किया था और सबसे पहले जनता के अधिकारों के लिए सलवा जुडूम के खिलाफ बगावत की थी।
काशी के बुद्धिजीवियों ने विनायक सेन की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा है कि 31 तारीख को बीएचयू गेट से लेकर चितरंजन पार्क तक एक मौन जुलूस निकाल इस फैसले का वे विरोध करेंगे। वाराणसी कचहरी में धरने को संबोधित करते हुए पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि न्यायालय ने फैसले के माध्यम से तमाम जनतांत्रिक आवाजों को यह चेतावनी दी है कि अगर राज्य के लूट तंत्र के खिलाफ वह आवाज उठाएंगे तो उनका हश्र भी यही होगा। इस प्रतिरोध में फादर आनंद, सुनील सहस्त्रबुद्धे, बल्भाचार्य, लेनिन रघुवंशी समेत अनेक संगठनों ने शिरकत की। डीबेट सोसाइटी की गुंजन सिंह ने बताया कि सभी ने एक स्वर में छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जैसे असंवैधानिक कानूनों को रद्द करते हुए विनायक सेन को तत्काल रिहा करने की मांग की।
पत्रकार संगठन जेयूसीएस ने भी अपील जारी करते हुए कहा कि विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। विनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं। आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों के उत्तपीड़न के मरकज बन गए आजमगढ़ के लोग भी विनायक सेन पर देशद्रोह के आरोप के खिलाफ संजरपुर में सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों के लोगों ने बैठक कर इस मानवाधिकार विरोधी फैसले के खिलाफ ‘न्याय के सवाल पर’ राष्ट्रीय स्तर का मानवाधिकार सम्मेलन करने की घोषणा की। मानवाधिकार नेता मसीहुद्दीन संजरी और तारिक शफीक ने कहा कि जब एक मानवाधिकार नेता का मानवाधिकार सुरक्षित नहीं रह सकता तो आम आदमी को आतंकवाद के फर्जी मुकदमों में फसाकर उसके जीवन को बर्बाद करना देना तो मामूली बात है। इसी क्रम में बलिया और गाजीपुर में बैठक कर इस फैसले का विरोध किया गया।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत विनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। विनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है। जनसत्ता

क्योकि वे गरीबों के पक्षधर हैं


एमजे अकबर
मैं बिनायक सेन के राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत दोहरे मापदंडों वाले लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है।
भारत एक अजीब लोकतंत्र बनकर रह गया है, जहां बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है और डकैत खुलेआम ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं। सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी सरकार को खासी तैयारी करनी पड़ती है। जब आखिरकार उन पर ‘धावा’ बोला जाता है, तब तक उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका होता है कि वे तमाम सबूतों को मिटा दें। आखिर वह व्यक्ति कोई मूर्ख ही होगा, जो तीन साल पहले हुए टेलीकॉम घोटाले के सबूतों को इतनी अवधि तक अपने घर में सहेजकर रखेगा। तीन साल क्या, सबूतों को मिटाने के लिए तो छह महीने भी काफी हैं। क्योंकि इस अवधि में पैसा या तो खर्च किया जा सकता है, या उसे किसी संपत्ति में परिवर्तित किया जा सकता है या विदेशी बैंकों की आरामगाह में भेज दिया जा सकता है। राजनेताओं-उद्योगपतियों का गठजोड़ कानून से भी ऊपर है। अगर भारत का सत्ता तंत्र बिनायक सेन को कारावास में भेजने के बजाय उन्हें फांसी पर लटका देना चाहे, तो वह यह भी कर सकता है।
बिनायक ने एक बुनियादी नैतिक गलती की है और वह यह कि वे गरीबों के पक्षधर हैं। हमारे आधिपत्यवादी लोकतंत्र में इस गलती के लिए कोई माफी नहीं है। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और यकीनन रमन सिंह के लिए इस बार का क्रिसमस वास्तव में ‘मेरी क्रिसमस’ होगा। कांग्रेस और भाजपा दो ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो फूटी आंख एक-दूसरे को नहीं सुहाते। वे तकरीबन हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत हैं। लेकिन नक्सल नीति पर वे एकमत हैं। नक्सल समस्या का हल करने का एकमात्र रास्ता यही है कि नक्सलियों के संदेशवाहकों को रास्ते से हटा दो।
मीडिया इस गठजोड़ का वफादार पहरेदार है, जो उसके हितों की रक्षा इतनी मुस्तैदी से करता है कि खुद गठजोड़ के आकाओं को भी हैरानी हो। गिरफ्तारी की खबर रातोरात सुर्खियों में आ गई। प्रेस ने तथ्यों की पूरी तरह अनदेखी कर दी। हमें नहीं बताया गया कि बिनायक सेन के विरुद्ध लगभग कोई ठोस प्रमाण नहीं पाया गया था। अभियोजन ने गैर जमानती कारावास के दौरान बिनायक के दो जेलरों को पक्षविरोधी घोषित कर दिया था। सरकारी वकीलों की तरह जेलर भी सरकार की तनख्वाह पाने वाले नुमाइंदे होते हैं। लेकिन दो पुलिसवालों ने भी मुकदमे को समर्थन देने से मना कर दिया। एक ऐसा पत्र, जिस पर दस्तखत भी नहीं हुए थे और जो जाहिर तौर पर कंप्यूटर प्रिंट आउट था, न्यायिक प्रणाली के संरक्षकों के लिए इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित हुआ कि बिनायक सेन उस सजा के हकदार हैं, जो केवल खूंखार कातिलों को ही दी जाती है।
बिनायक सेन स्कूल में मेरे सीनियर थे। वे तब भी एक विनम्र व्यक्ति थे और हमेशा बने रहे, लेकिन वे अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रति भी हमेशा प्रतिबद्ध रहे। मैं उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत धीरे-धीरे दोहरे मापदंडों वाले एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है। जहां विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए हमारा कानून उदार है, वहीं वंचित तबके के लोगों के लिए यही कानून पत्थर की लकीर बन जाता है।
यह विडंबनापूर्ण है कि बिनायक सेन को सुनाई गई सजा की खबर क्रिसमस की सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर थी। हम सभी जानते हैं कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था। चौथी सदी में पोप लाइबेरियस द्वारा ईसा मसीह की जन्म तिथि 25 दिसंबर घोषित की गई, क्योंकि उनके जन्म की वास्तविक तिथि स्मृतियों के दायरे से बाहर रहस्यों और चमत्कारों की धुंध में कहीं गुम गई थी। क्रिसमस एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार इसलिए बन गया, क्योंकि वह जीवन को अर्थवत्ता देने वाले और सामाजिक ताने-बाने को समरसतापूर्ण बनाने वाले कुछ महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य हैं शांति और सर्वकल्याण की भावना, जिसके बिना शांति का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। सर्वकल्याण की भावना किसी धर्म-मत-संप्रदाय से बंधी हुई नहीं है। क्रिसमस की सच्ची भावना का सबसे अच्छा प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध के दौरान कुछ ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने किया था, जिन्होंने जंग के मैदान में युद्धविराम की घोषणा कर दी थी और एक साथ फुटबॉल खेलकर और शराब पीकर अपने इंसान होने का सबूत दिया था। अलबत्ता उनकी हुकूमतों ने उन्हें जंग पर लौटने का हुक्म देकर उन्हें फिर से उस बर्बरता की ओर धकेल दिया, जिसने यूरोप की सरजमीं को रक्तरंजित कर दिया था।
यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी। ब्रिटिश राज में गांधीवादी आंदोलन के दौरान ऐसा ही एक नारा दिया गया था। यह संदर्भ सांयोगिक नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार भी नक्सलवाद के प्रति साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक रवैया अख्तियार करने लगी है।


लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।

Friday, December 24, 2010

धसकने वाले है टिहरी के गाँव


आशुतोष सिंह
लखनऊ , दिसंबर । टिहरी बांध के आसपास के दर्जनों गाँव कभी भी धसक कर बांध की झील में समा सकते है । सितम्बर में हुई तेज बारिश के बाद टिहरी बांध के जलाशय में पानी का स्तर काफी ज्यादा बढ़ा और कई गाँव डूब क्षेत्र में आ गए । साथ ही कई गाँव में जबरजस्त भूस्खलन की चपेट में आए पर अब यह खतरा और बढ़ता जा रहा है । कई जगह पहाड़ धसक रहे है और जमीन फट रही है । बीते सत्रह दिसंबर को मलबा गिराने से टिहरी बांध में बिजली के उत्पादन पर भी असर पड़ चुका है । यह बात पूर्वांचल ग्रामीण विकास संस्थान की पत्रिका ' डिजास्टर मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट , की कवर स्टोरी से सामने आई है । यह पत्रिका प्राकृतिक और मानवीय आपदा के साथ जलवायु परिवर्तन , पर्यावरण ,जल ,जंगल और जमीन के सवाल पर फोकस करेगी । यह जानकारी पूर्वांचल ग्रामीण विकास संस्थान के सीईओ और प्रबंध संपादक एपी सिंह ने यहाँ दी । पत्रिका के प्रधान संपादक डाक्टर भानु है जो पिछले दो दशक से डिजास्टर यानी आपदा खासकर बाढ़ आपदा के क्षेत्र
में काम कर रहे है । पत्रिका के पहले अंक की कवर स्टोरी धसकते पहाड़ और फटती जमीन में नई टिहरी में भूस्खलन का जायजा लेते हुए लिखा गया है -उप्पू गाँव तक पहुँचते पहुँचते टिहरी बांध से बनी झील के किनारे लगे पहाड़ पर बसे गांवों में रहने वालों की त्रासदी समझ में आ जाती है । कई गाँव झील में समा चुके है तो कई गाँव झील में समाने वाले है । नाकोट गाँव में बड़ा पुल बन रहा है जो झील के उस पार बसे लोगों को इधर आने का रास्ता देगा । फिलहाल वे मोटर बोट से आते जाते है । नाकोट गाँव के गजेंद्र रावत ने उस पर बसे गांवों की व्यथा सुनाते हुए कहा - बांध बनाने से पहले ये लोग पुरानी टिहरी के पुल से पंद्रह बीस मिनट में नई टिहरी वाली सड़क पर आ जाते थे पर अब सड़क के जरिए आने जाने में कई घंटे लग जाते है । पर समस्या यही ख़त्म नही होती । खेत झील के पानी में समा चुका है और गाँव पर खतरा मंडरा रहा है । जब लगातार बरसात हुई तो लोगों की रातों की नींद हराम हो गई । कब कौन सा घर झील में गिर जाए यह पता नहीं था । सामने देखिए गाँव के जो घर है उनके ठीक नीचे से पहाड़ धसक कर झील में जा चुका है । ऐसे गाँव ७० से ज्यादा है जिनपर खतरा मंडरा रहा है ।
टिहरी बांध के विनास का यह नया आयाम है जिसपर किसी का ध्यान नही गया है । जिस तरह जमीन धसक रही है उससे देर सबेर दर्जनों गाँव झील में समा जाएंगे। बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले माटू संगठन का मानना है कि इस क्षेत्र में ७५ गांवों पर खतरा मंडरा रहा है और इस सिलसिले में जल्द कोई पहल नही हुई तो अगली बारिश में हालत गंभीर होंगे । छाम गाँव के रहने वाले पूरण सिंह राणा बांध की वजह से भूस्खलन और विस्थापित हुए लोगों का सवाल उठाते है और अब खुद भी विस्थापितों के लिए हरिद्वार में बसाए गाँव में रहते है क्योकि उनका घर नही बचा । बाद में दूसरे भाइयों ने और ऊँचाई पर घर बनाया जहाँ वे जाते रहते है ।
रपट में टिहरी बांध के आसपास बसे गांवों पर भूस्खलन के बढ़ते खतरे को बताया गया है । टिहरी बांध को लेकर शुरू से ही विरोध होता रहा है और पर्यावरण का सवाल उठाने वाले इसे जोखम वाला बांध मानते रहे है । बीते सत्रह दिसंबर को जिस तरह मलबा गिरने के बाद बांध का कामकाज प्रभावित हुआ इससे बांध विरोधी आंदोलनकारियों की बात सही भी साबित होती है ।
पत्रिका की दूसरी विशेष रपट में गंगा , पद्मा और तिस्ता नदी से होने वाली तबाही के बारे में जानकारी दी गई है । पत्रिका के पहले अंक में बारिश और बाढ़ आदि पर पश्चिम बंगाल , तमिलनाडु ,उतराखंड और उत्तर प्रदेश की रपट दी गई है । जबकि अगला अंक हिमालय पर फोकस होगा जो कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक की जानकारी देगा ।

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Wednesday, December 22, 2010

दसवें के घाट पर वाजपेयी का जन्मदिन !


अंबरीश कुमार
लखनऊ दिसम्बर। अपने को हिंदुत्व का अलंबरदार मानने वाले भाजपाई पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी का ८७ वां जन्मदिन २५ दिसंबर को को लखनऊ के कुडिया घाट पर मना रहे है जो सनातन काल से दसवें का घाट है और चौक इलाके के गुलाला शमशान घाट का क्रिया घाट भी है । इस कार्यक्रम को अशुभ माना जा रहा है पर भाजपाई जो एक बार ठान लेते है तो जल्दी पीछे नही हटते है , यह तर्क पार्टी की तरफ से दिया गया । इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली होंगे । यह कार्यक्रम लखनऊ के सांसद लालजी टंडन के संरक्षण में हो रहा है । ये वही टंडन है जिनके जन्मदिन पर साड़ी बाँटने के दौरान भगदड़ मची तो दो दर्जन से ज्यादा के महिलाओं की मौत हो गई थी । दसवें के घाट पर वाजपेयी का जन्मदिन मनाने को चौक इलाके जिसे छोटी काशी भी कहा जाता है वहां के ब्राह्मणों को रास नही आया । पंडित द्वारका दास ने कहा -- जिस घाट पर दसवां होता है ,घंट बांधा जाता है , क्या वही जगह भाजपा वालों को मिली , ऐसे घाट पर तो तांत्रिक भोज होता है किसी के जन्मदिन का उत्सव नही । लगता है इस पार्टी ने तो परंपरा ,संस्कृति और संस्कार सभी को तिलांजलि दे दी है । दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -कुडिया घाट पर पहले भी वाजपेयी का जन्मदिन मनाया जा चुका है ।
इस कार्यक्रम को लेकर भाजपा में विरोध के स्वर मुखर नही हो पा रहे है क्योकि टंडन से कोई टकराव लेकर राजनैतिक भविष्य खराब नही करना चाहता । वैसे भी टंडन का यह कार्यक्रम राजनैतिक ज्यादा है । जबसे मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र का लखनऊ का दौरा बढ़ा है टंडन सतर्क हो गए है । ब्राह्मण के नाम पर इस लखनऊ की संसदीय सीट पर दूसरा दावेदार न आ जाए यह चिंता भी है । अरुण जेटली का दौरा उसी पेशबंदी का नतीजा है । पर लोग इस बात से हैरान है कि लालजी टंडन वाजपेयी का जन्मदिन दसवें के घाट पर क्यों मना रहे है ।जानकारी के मुताबिक कुडिया घाट पर वाजपेयी के जन्मदिन पर भजन आदि के बाद भोजन का भी कार्यक्रम है । समूचा कार्यक्रम दिन में दो बजे तक निपट जाएगा।
गोमतीनगर के कार्यकर्त्ता मनोज कुमार ने कहा - जबसे टंडन ने दसवें के घाट पर वाजपेयी का जन्मदिन मनाना शुरू किया है तभी से उनका स्वास्थ्य भी गड़बड़ा गया है । वैसे तो वैज्ञानिक दृष्टि से इन सब बातों का कोई महत्व नही पर जो पार्टी मर्यादा पुरषोत्तम राम के नाम पर सत्ता में आ चुकी हो और हिंदुत्व की बात करती हो उसे तो यह ध्यान रखना चाहिए कि जन्मदिन का उत्सव कहा मनाया जा सकता है और कहाँ नही । पार्टी को वाजपेयी की वह कविता ध्यान रखनी चाहिए जिसमे उन्होंने कहा था - हिंदू तन मन हिंदू जीवन ,रग रग मेरा हिंदू परिचय,सागर में समायु तो बदव नल बनकर उभरू । बेहतर हो पार्टी इस कार्यक्रम की जगह बदल कर अनावश्यक विवाद से बचे । और अरुण जेतली को भी ऐसी जगह नही जाना चाहिए जिससे पुरे हिंदू समाज में गलत संदेश जाए ।
ख़ास बात यह है कि वाजपेयी के जन्मदिन पर लखनऊ में कई और कार्यक्रम हो रहे है । भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हीरो बाजपेयी ने बताया -पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी का जन्मदिन (25 दिसम्बर) हम सबके लिए एक पर्व के समान है। श्रद्धेय अटल जी का व्यक्तित्व विराट है। वे 86 बरस के हो गये हैं। अटल जी के दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए उनके 87वें जन्मदिवस के एक दिन पूर्व 24 दिसम्बर को सुबह 10 बजे हनुमान मंदिर आम्रपाली चौराहा, ए-ब्लाक इन्दिरा नगर, लखनऊ पर सामूहिक हवन-पूजन का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, महापौर डॉ0 दिनेश शर्मा, सांसद कुसुम राय, पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेता भाजपा जयपाल सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। इसके पश्चात् लवकुश नगर बस्ती ए-ब्लाक इंदिरा नगर में मिष्ठान वितरण होगा।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश मंत्री एवं विधायक सुरेश श्रीवास्तव ने बताया कि विश्वपटल पर भारत का मान बढ़ाने वाले श्रद्धेय अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस की पूर्व संध्या पर दिनांक 24 दिसम्बर को शाम पांच बजे कोठारी बंधु पार्क राजाजीपुरम् में एक भजन संध्या का आयोजन किया गया है जिसमें भजन गायक किशोर चतुर्वेदी का गायन होगा। इस अवसर पर सांसद लालजी टंडन, महापौर डॉ दिनेश शर्मा, सांसद कुसुम राय, पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष जयपाल सिंह, नगर अध्यक्ष नीरज गुप्ता, पूर्व नगर अध्यक्ष प्रदीप भार्गव उपस्थित रहेंगे।

Monday, December 20, 2010

समाजवादी चेतना के प्रकाश पुंज


विजय प्रताप
लोकतांत्रिक - समाजवादी विचारों, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और सादगी की जिंदगी जीने के लिए प्रसिद्ध सुरेंद्र मोहन केवल भारतीय समाजवादी धारा के नेता नही थे, बल्कि सभी वामपंथी कार्यकर्ता, चाहे वे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों, उन्हें अपना नेता, सलाहकार और खैरख्वाह मानते थे।
सुरेंद्र मोहन ने युवा अवस्था में ही अंबाला से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में शरीक होकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। भारतीय समाजवादी आंदोलन के सभी स्वरुपों में उनकी अग्रणी भूमिका रही। इंदिरा गांधी की तानाशाही-आपातकाल - के खिलाफ चली मुहिम में भी उन्होने महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई। जय प्रकाश नारायण के विश्वासपात्र होने के साथ-साथ वे विभिन्न राजनीतिक धाराओें को एक जुट कर जनता पार्टी बनाने में सक्रिय प्रमुख व्यक्तियों में थे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव और उसके बाद बनी सरकार के दौरान वे जनता पार्टी के महामंत्री थे। 1978 से 1984 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे पीयूसीएल के संस्थापक सदस्य थे और लगातार उनके संरक्षक के रुप में सक्रिय रहे। अस्सी के दशक में हिंद मजदूर सभा के साथ उन्होनें ‘काम का अधिकार’ के लिए देश व्यापी अभियान खड़ा किया जिसमें विभिन्न श्रमिक संघों और राजनीतिक धाराओं ने एक जुट होकर इस मांग को बुलंद किया। 1990 में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए मंडल आयोग की सिफारिश पर अमल कराने में उनका भी अहम योगदान था।
काशी विद्यापीठ में दो साल समाजशास्त्र पढ़ाने के बाद सुरेंद्र मोहन ने नौकरी छोड़ कर पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनना तय किया था। पर पढ़ना-लिखना उनके जीवन का अभिन्न अंग बना रहा। हिंदी और अंग्रजी के अखबारों में उनके विश्लेषणात्मक लेख, अनेक पुस्तिकाएं और तीन पुस्तके प्रकाशित हुईं हैं। वे अंग्रजी में प्रकाशित पत्रिका ‘जनता’के सह-संपादक भी थे।
वे ‘सोशलिस्ट इंटरनेशनल’ और भारत-पाकिस्तान आवामी फोरम के सदस्य थे। दक्षिण एशिया में भारत और नेपाली समाजवादियों के बीच उनकी अहम भूमिका थी। नेपाली कांग्रेस के अनेक नेता उन्हें अपना मित्र, संरक्षक और सलाहकार मानते थे। सुरेंद्र मोहन के शब्द कोश में ‘सफलता’ और ‘विफलता’ दोनों शब्द नही थे। उनके जीवन का एक ही मकसद था, समाजवादी मूल्यों के लिए अनवरत कोशिश। इस मामले में वे संपूर्ण-संभव अर्थों में विदेह थे। सत्ता और संपत्ति के मोह से पूरी तरह ऊपर उठ चुके थे। जीवन संगिनी मंजू मोहन भी ऐसी मिलीं कि उनका घर देश भर के समाजवादी और जेपी आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए अपने घर जैसा था। कोई कभी भी उनके घर आता तो मंजू जी सबसे पहले पूछतीं - खाना खाया है। मुझे याद है 1977 के चुनाव पूर्व की स्थिति।
15 अप्रैल, 1977 को उनकी दूसरी संतान बिटिया अनघा मोहन को इस दुनिया में आना था। फिर भी सुरेंद्र मोहन सुबह से देर रात तक ऐतिहासिक चुनाव अभियान के लिए मुद्दे और प्रेस वक्तव्य तैयार करने, नौकरशाही में लोकतंत्र के लिए प्रसिद्ध वरिष्ठ अफसरों से संवाद रख कर संभावित साजिशों को भापनें और नाकाम करने की योजना बनाने में जुटे रहते थे और मंजू जी आने वाले हर कार्यकर्ता की देखभाल के लिए अपनें को झोंके रहती थीं।
इंदिरा गांधी ने 1976 में कुछ नेताओं को छोड़ा जरुर था, लेकिन सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए वे अंत तक साजिशें करती रही थीं। मगर हमारी नौकर शाही, बीएसएफ, सेना और चुनाव आयोग सभी में लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध लोगों के होने, उनके सुरेंद्र मोहन को आवश्यक सूचनाएं देने और सुरेंद्र मोहन द्वारा आवश्यक कदम उठाने के कारण लोकतंत्र की जीत हुई। इंदिरा जी को बार-बार ऐसी कोशिशों से बाज आने के लिए सार्वजनिक तौर पर ललकारने की भी जनता पार्टी की जीत में एक निर्णायक भूमिका थी। जनता की ‘नब्ज’ पहचानने वाले कई वरिष्ठ जननेता 1977 के चुनाव के बहिष्कार के पक्ष में थे। सुरेंद्र मोहन ऐसे लोगों में थे जो शुरु से मानते थे कि चुनावी मैदान में उतरने से ही दूसरी आजादी की जंग जीती जा सकती है।
1977 के अभियान और जनता पार्टी को चलाने की जिम्मेवारी अन्य तत्कालीन महामंत्रियों, लाल कृष्ण आडवाणी और रामकृष्ण हेगड़े की भी थी, लेकिन जनता पार्टी के थिंक टैंक- प्रो. जेडी सेठी, एलसी जैन, प्रो. राजकृष्ण- द्वारा तैयार सामग्री का धारदार इस्तेमाल जिस प्रकार सुरेंद्र मोहन करते थे, उनकी बानगी उन दिनों के समाचार पत्रों को पढ़ कर आज भी जानी जा सकती है।
सुरेंद्र मोहन आपातकाल में अगस्त में गिरफ्तारी से पहले भी बिहार आंदोलन के दौरान दो अक्तूबर, 1974 को गिरफ्तार हुए थे और 13 अक्टूबर, 1974 को छूटे। उसके बाद वे कई बार छोटी-छोटी अवधि के लिए सत्याग्रहों में शरीक रहे।
जेल में सुरेंद्र मोहन न केवल खुद स्वाध्याय में अपना समय बिताते थे, बल्कि अन्य साथियों को भी पढ़ने-गुनने की प्रेरणा देते थे। जेल में जिंदादिली से कैसे जिया जाता है, वह सुरेंद्र मोहन और और उनके अन्य साथियों बलवंत सिंह अटकान, सांवल दास गुप्ता, ललित मोहन गौतम और राजकुमार जैन आदि के साथ वालों के लिए आज भी एक मीठी याद जैसा है।
सुरेंद्र मोहन अपने विदेह भाव के कारण भविष्य में झांकने की अद्भुत क्षमता रखते थे। जो नकारात्मक पूर्वानुमान थे, वे भी सही निकले। जेल में वे समाजवादी पार्टी को किसी बड़ी पार्टी में विलीन कर देने के स्पष्ट रुप से विरोधी थे। उनका मानना था कि जनसंघ, संघठन कांग्रेस और लोकदल के समाजवाद विरोधी तत्व समाजवादियों और समाजवाद के कार्यक्रमों के खिलाफ एक हो जाएंगे। उनकी राय में समाजवादियों को एक फेडरल फ्रंट ही बनना चाहिए, जिससे हमारी समाजवादी पहचान कायम रहे। लेकिन इसे विडबंना ही कहा जाएगा कि जब जेपी ने सभी पार्टियों के विलय को अपने अभियान में शामिल होने की पूर्व शर्त के बतौर रख दिया तो सुरेंद्र मोहन ने ही निस्पृह भाव सभी नेताओं को एक करने और साझे झंडे, चुनाव चिह्न, घोषणा- पत्र और साझे- सामूहिक नेतृत्व को तैयार करने में महत्ती भूमिका निभाई।
कौन आदमी किस कद का है, यह नापने-जानने की भी सुरेंद्र मोहन में अद्भुत क्षमता थी। आज भी अगस्त 1977 की वह रात याद करके मेरे शरीर में झनझनाहट सी पैदा होती है। जनता पार्टी में विभिन्न घटक कैसे कैसे फिर से टूट सकते हैं, कौन नेता चाल चल सकता है और जनता पार्टी का प्रयोग कैसे अधबीच ही चरमरा सकता है, इस बात को उन्होनें शतरंज की बिसात की तरह चित्रित किया था। दुर्भाग्य से अधिकतर नेताओं ने अपनी चालें ऐसे चलीं तो सामने वाला क्या हारता और क्या जीतता, जनता पार्टी के प्रयोग की गाड़ी जुलाई 1979 में पटरी से उतर गई।
आज भी मेरे लिए यह सवाल अनसुलझी पहेली की तरह है कि जब वे भविष्य के नकारात्मक पहलुओं को इतना स्पष्ट देख लेते थे फिर भी शुभ के लिए, समाजवाद के लिए इतनी निष्ठा, एकाग्रता से कैसे जुटे रहते थे। जीवन के आखिरी क्षणों तक समाजवाद के सांगठनिक ढांचे को फिर से मरम्मत करके खड़ा कर देना है, इसके लिए वैचारिक चौखटे के पुनर्कथन, समाजवादी आंदोलन के विभिन्न संगठनों को चुस्त-दुरुस्त करने और एक साझी, बड़ी और प्रभावी समाजवादी पार्टी बनाने के मिशन में जुटे थे।
सुरेंद्र मोहन चौरासी वर्ष की उम्र में हमसे जुदा हुए। उनके परिवार में सहकर्मी पत्नी, बेटा और बेटी के परिवार ही नहीं, हजारों ऐसे सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, जिनको सुरेंद्र मोहन के जाने से व्यक्तिगत क्षति का आभास हुआ होगा। सामाजिक आंदोलन और उपेक्षित वर्गों के अधिकारों के लिए चल रहे तमाम अभियानों ने भी आज तक ऐसा आघात सहा है, जो कोई पूरा नही कर सकता।



Thursday, December 16, 2010

मुर्दों के नाम टैक्स वसूलते मंत्री

लखनऊ , दिसंबर । मायावती सरकार के होम्योपैथिक चिकित्सा और धर्मार्थ कार्य राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी जिन्हें मुर्दों पर टैक्स वसूलने के चक्कर में लोकायुक्त के यहाँ पेश होना पड़ा था वे आज अपनी बात से मुकर गए । राजेश त्रिपाठी ने आज गोरखपुर में कहा - मैंने लोकायुक्त से कोई माफ़ी नहीं मांगी । मै तो सिर्फ अपना पक्ष रखने गया था । इस मामले में मै इस्तीफा भी नहीं देने वाला हूँ । राजेश त्रिपाठी ने आगे कहा - बहन जी का निर्देश है की मुझे २०१२ का विधान सभा चुनाव लड़ना है । यही वजह है की विरोधी मुझे फंसा रहे है । दूसरी तरफ राजेश त्रिपाठी के खिलाफ लोकायुक्त को जो शिकायत की गई है उसमे आरोप लगाया गया कि वे मुर्दों के दाह संस्कार के लिए टैक्स वसूलते है । जो प्रति मुर्दे के हिसाब से सौ से डेढ़ सौ रुपए के बीच होती है । समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि मायावती सरकार में वसूली का दायरा शराब से लेकर शमशान तक फ़ैल चुका है ।
धर्मार्थ कार्य मंत्री राजेश त्रिपाठी के खिलाफ गोरखपुर के विजय कुमार शुक्ल ने करीब एक साल पहले लोकायुक्त के यहाँ शिकायत दर्ज कराई थी कि बड़हलगंज में नारकोटिक्स विभाग की जमीन पर कब्ज़ा करने वाले मंत्री राजेश त्रिपाठी शमशान घाट में मुर्दों के पंजीकरण का टैक्स वसूलते है । इसी शिकायत के आधार पर लोकायुक्त जस्टिस एनके मल्होत्रा ने मंत्री राजेश त्रिपाठी को बुधवार को तलब किया था । जानकारी के मुताबिक मल्होत्रा ने यह सवाल किया कि वे किस तरह मुर्दों के पंजीकरण का शुल्क लेते है । इस पर त्रिपाठी ने सफाई दी कि यह धनराशि लोग स्वेच्छा से देते है वसूला नही जाता है । मंत्री राजेश त्रिपाठी बड़हलगंज शमशान घाट मुक्ति पथ सेवा संस्थान के अध्यक्ष भी है । त्रिपाठी ने लोकायुक्त के सामने गलती स्वीकार की और इस संस्थान के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की बात कही । पर आज गोरखपुर पहुँचते ही वे पलट गए ।
राजेश त्रिपाठी ने गोरखपुर में कहा कि इस्तीफा देने का सवाल ही नही पैदा होता है । किसी भी पद से इस्तीफा नही देने वाला हूँ । त्रिपाठी ने यह भी कहा कि जब वे लोकायुक्त क सामने पेश हुए तो वहा कोई और नही था फिर इतनी बातें मीडिया में कैसे आ गई । मैंने न तो कोई गलती मानी और न ही माफ़ी मांगी है । यह संब मुझे बदनाम करने की साजिश है । राजेश त्रिपाठी ने कहा - इस मामले में मै अपनी जनता और नेता मायावती से बात कर ही कोई फैसला करूँगा । हालाँकि लोकायुक्त के सामने त्रिपाठी ने फ़ौरन इस्तीफे की पेशकश की थी । मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त को जो शिकायत की गई है उसमे अवैध कब्ज़ा कर शमशान घाट, दूकान और होटल बनवाने का आरोप है । इसक आलावा कछुवों की तस्करी म शामिल होने का भी आरोप है । समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - मायावती सरकार में वसूली का दायरा शराब से लेकर शमशान तक फ़ैल चुका है । इस घटना से साफ़ है कि इस सरकार के मंत्री कैसे कैसे पैसा वसूल रहे है । दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा - सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ शिकायते आ चुकी है । लोकायुक्त के यहाँ जब ऎसी शिकायतों का ढेर लग जाए तो बिगड़ते हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है ।
मायावती सरकार के दर्जन भर से ज्यादा मंत्री किसी न किसी मामले में फंसे हुए है । पर यह मामला अलग किस्म का है जिसमे मंत्री पर शमशान घाट में वसूली का आरोप लगा है । मंत्री भले ही यह दावा करे कि लोग स्वेच्छा से अंतिम संस्कार के लिए दान देते है पर यह किसी के गले आसानी से उतरने वाला नही है । सरकार के कई मंत्री पहले भी अलग अलग विवादों के चलते सरकार को सांसत में डाल चुके है अब यह नया विवाद भी टूल पकड़ सकता है ।

Monday, December 13, 2010

तीस साल बाद


अंबरीश कुमार
चार पांच दिन पहले की बात है दफ्तर में बैठा था तभी एक मोहतरमा की आवाज आई जो फाइनेंशियल एक्सप्रेस की पत्रकार दीपा से पूछ रही थी , अंबरीश जी कहा बैठते है । खबर बनाते हुए मेरा ध्यान उधर गया और फिर कोफ़्त हुई कि रिसेप्शन से बिना बात किए क्यों किसी को मेरे पास भेज दिया गया । खबर बनाने का समय अमूमन शाम छह बजे से सात बजे तक होता है और उस बीच न तो कोई फोन अटेंड करता हूँ और न ही किसी को मिलने के लिए भेजा जाता है क्योकि ध्यान टूटने पर खबर का तारतम्य बिगड़ जाता है ।इस बात को ज्यादातर परिचित लोग जानते है और वे इसका ध्यान भी रखते है । ऐसे में सिर्फ अनजान लोग ही कई बार आ जाते है । वे मोहतरमा आई और एक प्रेस रिलीज देते हुए बोली - मै अपर्णा गुप्ता हूँ । मैंने कहा , यह रिलीज नीचे ही दे देती । पर मैंने ध्यान दिया तो वह रिलीज किसी कवियित्री की याद में हुई सभा की थी जिसमे एक जगह मशहूर कवियित्री अपर्णा गुप्ता भी लिखा था । मैंने पूछा -क्या आप ही मशहूर कवयित्री अपर्णा गुप्ता है , इस पर वे कुछ झिझक कर बोली -मेरी कुछ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है । साहित्य से अपना कोई ख़ास रिश्ता नही रहा है और जनसत्ता में अब साहित्य का मामला काफी संवेदनशील भी माना जाता है। सुना है काफी खेमेबाजी है पर न तो इस क्षेत्र में कोई ज्ञान है और न दखल । साहित्यकार के रूप में मेरा परिचय सिर्फ मंगलेश डबराल से रहा और वे भी काफी नाराज रहते थे । मंगलेश डबराल जब तक थे तब तक अपने साथी अजित अंजुम सवाल उठाते थे - आपके यहाँ जोशी , डबराल ,उनियाल ,डंगवाल और बडथ्वाल जैसे लोग ही क्यों छापते है । पर अब कोई सवाल नही उठाता । खैर अचानक मेरा ध्यान रिलीज के अंत में गया जिसमे उस सभा में शामिल होने वालों का नाम था और उसमे अजय मेहरोत्रा से लेकर जौहर तक का नाम नजर आया । अजय पचपन के मित्र और सहपाठी रहे है । एक ज़माने में केन्द्रीय संचार मंत्री वीर बहादुर सिंह के ओएसडी थे और बाद में गृह राज्य मंत्री के ओएसडी बने तो सरकारी हवाई जहाज से देश के कई सुदूर हिस्सों का मंत्री महोदय के साथ दौरा भी कराया । घर आते थे तो फ़तेह बहादुर सिंह को भी लाते थे जो अब उत्तर प्रदेश सरकार में काबीना मंत्री है और अपन उनकी खबर जनसत्ता में लेते रहते है । खैर अजय फिलहाल एक बड़े ओद्योगिक घराने में आला अफसर है । अजय का नाम और प्रेस रिलीज पर दिया पता देख कर सब ध्यान आ गया । सन १९८० के दौर में अपर्णा गुप्ता लखनऊ विश्विद्यालय में मेरी क्लास में थी और जब मै छात्रसंघ का चुनाव लड़ा तो जिन छात्राओं ने प्रचार किया उनमे वे भी शामिल थी । उस दौर में विश्विद्यालय के दूसरे विभागों के छात्रों की भीड़ उन्हें देखने के लिए मनोविज्ञान विभाग में जमा रहती थी और मेरी यादाश्त में अभी भी आधा दर्जन से ज्यादा घटनाएं है जब अपर्णा गुप्ता को लेकर झगडा फसाद हुआ । वे विश्विद्यालय की सबसे खुबसूरत छात्राओं में एक थी । पर आज देखकर झटका लगा । तीस साल का समय ज्यादा होता है पर उम्र का असर कुछ लोगों पर ज्यादा पड़ता है तो कुछ पर कम । रामगढ में प्रोफ़ेसर रस्तोगी करीब ८५ साल के है और उनकी पत्नी अस्सी के आसपास होंगी । उनके घर में जो फोटो लगी है उसे देखकर लगता है १९५० की वैजंतीमाला की फोटो है । पर अस्सी साल की उम्र में भी उनके चेहरे को आप उस फोटो से मिला सकते है । पर अपर्णा गुप्ता में काफी बदलाव नजर आ रहा था । अपर्णा से विश्विद्यालय के दौर में कोई घनिष्ठता नही रही और ज्यादा जानकारी भी नही थी । बाद में उनके भाई द्विजेन्द्र से जान पहचान हुई तो उनके घर भी जाना हुआ । वर्ष १९८६ में जो लखनऊ छूटा तो ज्यादातर लोगों का साथ भी छुट गया । अपर्णा करीब घंटे भर बैठी तो विश्विद्यालय के समय की चर्चा हुई । उन्होंने बताया कि सिर्फ कुमकुम का पता है पर मै उन्हें नही जानता था । उस दौर के सहपाठियों में सिर्फ अखिलेश दास यहाँ है जो पहले केंद्र में मंत्री थे अब बसपा के सांसद है । कुछ समय पहले अखिलेश दास ने फोन कर बताया था कि वे मेरी क्लास में थे । खैर अपर्णा गुप्ता से मिलकर काफी अच्छा लगा पर झटका भी कम नही लगा । जो चेहरा दिमाग में था वह १९८० का था और वे उसके बाद २०१० की अंतिम बेला में मिली । वे दिल्ली दूरदर्शन में अफसर है । फिर बताया - लखनऊ विश्विद्यालय के सामने से गुजरी तो द्विजेन्द्र से कहा कि गाड़ी से ही एक चक्कर लगवा दो । अपर्णा चली गई । जो प्रेस रिलीज दे गई वे दिल्ली के अखबार के लिहाज से महत्वपूर्ण भी नही थी इसलिए कम्पोज हो जाने के बाद भी नहीं भेजा ।अटपटा जरुर लगा तीस साल बाद कोई आए और उसका छोटा सा अनुरोध भी पूरा न किया जा सके पर मजबूरी थी ।
अपर्णा के जाने के बाद लगा एक बार मै भी लखनऊ विश्विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग से लेकर सांख्यकी विभाग का चक्कर लगा लूँ । आखिर उसी शहर में सात साल से हूँ पर कभी अपने विभाग जाने का मौका नही मिला । उस मनोविज्ञान विभाग में तो कई शिक्षिकाए अभी भी है जिन्होंने मुझे पढाया था ।
फोटो -लखनऊ विश्विद्यालय

Wednesday, December 1, 2010

राजीव दीक्षित का जाना कोई खबर नही है


अंबरीश कुमार
तीस नवम्बर को मंसूरी से देहरादून आते समय सोचा कि क्यों न ऋषिकेश में राजीव दीक्षित से मिल लिया जाए जो बाबा रामदेव के साथ काम कर रहे है । पर वापसी का टिकट कन्फर्म न होने की चिंता ने सारा कार्यक्रम ध्वस्त कर दिया । एक दिसंबर जब खबर बना रहा था तभी इंडियन एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट का फोन आया , अरे आपके मित्र राजीव दीक्षित की डेथ हो गई है , आस्था चैनल पर खबर आ रही है । मै चौक गया ,यह कैसा संयोग है कल ही उनसे मिलने जा रहा था । उनके बारे में पहले पता चला कि कोई दुर्घटना हुई । बाद में पता चला कि दिल का दौरा पड़ा है । समझ नही आया कि जो व्यक्ति बाबा रामदेव के साथ हो और खुद लोगो को स्वास्थ्य के बारे में आगाह करता हो उसे दिल का दौरा पड़ जाए । पिछली मुलाकात चेन्नई में शोभाकांत जी घर हुई जहा राजीव के कहने पर सभी ने गर्म पानी पीना शुरू किया था । आज चेन्नई में प्रदीप जी से बात हुई तो बोले - कुछ गड़बड़ है । उनके बारे में कही कोई खबर तक नहीं आई । कई लोग किसी साजिश का अंदेशा भी जता रहे है ।
राजीव दीक्षित से अपना संबंध अस्सी के दशक से था जव छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और अन्य जन संगठनों में सक्रिय था । बाद में दिल्ली में जनसत्ता में आने के बाद आंदोलनों पर लिखना शुरू किया तो आजादी बचाओ आंदोलन पर काफी कुछ लिखा । १९८९ के बाद से राजीव दीक्षित इलाहाबाद से जब भी आते तो सीधे बहादुरशाह जफ़र स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के निचले तल पर जनसत्ता संपादकीय विभाग में मेरी सीट के सामने बैठ कर इंतजार करते । घर पर फोन करते और कहते - अंबरीश भाई , आराम से आए आप से चर्चा करनी है । उनसे बातचीत के बाद जब खबरे लिखनी शुरू की तो कुछ समय बाद ही कुछ कुंठित किस्म के लोगो ने एतराज किया और उनका नाम न देने की बात की । तब जनसत्ता हिंदी पत्रकारिता में शीर्ष पर था और हिन्दी पट्टी में काफी पढ़ा जाता था । कोई आगे बढे तो विघ्नसंतोषी तत्त्व खसरा खतौनी लेकर सात पुश्तों का हिसाब किताब ढूँढ़ लाते है । यह परम्परा पुरानी है और हिंदी मीडिया में कुछ ज्यादा ही है । इसलिए न तब परवाह की और न अब करता हूँ , यही वजह है राजीव दीक्षित से संबंध बना रहा । रायपुर में एक दिन कांग्रेस दफ्तर के सामने साइबर कैफे से इंडियन एक्सप्रेस को खबर भेज रहा था तभी राजीव दीक्षित का फोन आया और बोले -अंबरीश भाई मुलाकात कब हो सकती है तो मैंने घर आने को कहा । तभी जो लड़की खबर कम्पोज कर रही थी उसने बात सुनी और कहा क्या ये आजादी बचाओ आंदोलन वाले राजीव जी है ? मेरे हाँ कहने पर वह चौंकी और उनसे मिलने की इच्छा जताई । उसने ही बताया कि उनके कैसेट सुने जाते है । रात में राजीव घर आए तो उनके साथ करीब बीस गाड़ियों का काफिला भी था । मैंने छूटते कहा - राजीव जी आप तो अब ब्रांड बन गए है । जवाब में सिर्फ मुस्कुराए और बोले नागपुर से एक अखबार निकलना चाहता हूँ जो आंदोलन को आगे बढाए । आपकी मदद भी चाहिए । करीब घंटे भर साथ रहे । उसके बाद चेन्नई में वाहिनी के मित्र मिलन में उनसे मुलाकात हुई थी । करीब हफ्ता भर पहले ही बाबा रामदेव की खबर में उनका जिक्र किया था । आज सरे अखबार देख डाले कही कोई खबर नहीं । राखी सावंत से लेकर इंडियन आयडल अभिजीत सावंत की पिटाई तक की खबर है पर राजीव दीक्षित की खबर नही है ।
इसी समाज के लिए लड़ रहे थे राजीव दीक्षित ।

Wednesday, November 10, 2010

दीव के समुंद्र तट पर एक शाम










सविता वर्मा
यहाँ का मौसम रात करीब नौ बजे से स्थानीय लोगो की भाषा में ख़राब हो गया जो हमारे जैसे सैलानियों के लिए सुहाना था . खासकर गीर के जंगल से वनराज के दर्शन के बाद से ही तपती धूप से परेशान थे .गरमी की वजह से जंगल से जल्द लौटने के बाद दीव के सर्किट हाउस के कमरे में जो गए तो रात आठ बजे डिनर का बुलावा आने पर ही निकले .बाहर कड़कती बिजली के बीच अरब सागर की लहरें लगता था कि कमरे तक आ जाएंगी.दीव का यह सर्किट हाउस जालंधर बीच पर बना है और काफी भव्य है .पिछले साल राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल यही रुकी थी और उन्हें यह जगह काफी पसंद भी आई .जिस सूट में रुके वह दो बेडरूम का फ्लैट जैसा था किचन के साथ ,जिससे देर रात काफी खुद बना ली जाती .खिड़की के ठीक सामने अरब सागर है तो बाएं किले की चाहरदीवारी के अवशेष .सर्किट हाउस से लगा हुआ समुंद्र तट है जिस पर बच्चे से लेकर नौजवान तक लहरों से खेलते नजर आते ही .पर यहाँ के मशहूर बीच नागोवा और घोघला हैं .नागोवा में तो हर समय मेला लगा रहता है और गुजरात से बड़ी संख्या में लोग यहाँ आते है .पर हम जिस जगह रुके है वह पूरी तरह शांत है .आसपास कोई दुकान देखने निकले तो दो किलोमीटर चलने पर भी कोई ठेला ढाबा या पान की दूकान तक नही मिली .यह दीव है . कभी पुर्तगालियों का उपनिवेश था .बचपन से गोवा ,दमन और दीव का नाम सुनते रहे .गोवा तो कई बार पर दमन दो बार जाना हो चुका है पर दीव पहली बार आए और संयोग से जिस दिन पहुंचे वह दिन गुजरात के लोगों का नया साल था.आज चार दिन से यहाँ है जिसमे एक दिन गीर के जंगल में गुजरा .
गोवा और दमन की तरह यहाँ अब पुर्तगाली आबादी नही है .पुराने चर्च है ,तो खानपान पर उनका असर जरुर बचा है खासकर समुंद्री व्यंजन पर .खाने में झींगा हो या तली हुई पाम्फ्रेट मछली पुर्तगाली असर से मुक्त नही है .कई बाते जरुर चौकाती है मसलन सब्जी से लेकर मछली का बाजार सुबह आठ नौ बजे लगता है और दिन में बारह एक बजे बंद हो जाता है उसके बाद शाम को नही खुलता .सामान्य बाजार भी कई शहरों की तरह दिन में खाने के समय में बंद हो जाता है .पर दीव गोवा और दमन से काफी अलग है .गोवा शाम से ही जिस रंग में रंग जाता है वह यहाँ नही मिलेगा और दमन के मुकाबले यह जगह सैलानियों को ज्यादा पसंद आएगी.दीव के लिए मुंबई से किंगफिशर की रोज फ्लाईट है तो ट्रेन से सोमनाथ तक जाकर वहां से नब्बे किलोमीटर की सड़क की यात्रा कर दीव पंहुचा जा सकता है .अमदाबाद से भी रातभर का सफ़र है .दीव के आसपास द्वारका ,सोमनाथ और एशियाई शेरों के लिए मशहूर गीर का जंगल है जो जूनागढ़ के नवाब के समय से आकर्षण का केंद्र रहा है .तीन चार दिन की छुट्टियाँ बिताने के लिए दीव अच्छी जगह है .नारियल के पेड़ों से घिरे दीव का मौसम भी खुशगवार रहता है दिन में तेज धूप हो तो जरुर गरमी लगती है पर शाम ढलते ही सागर की ठंढी हवाओं में बैठना अच्छा लगता है .पर आज तो बरसात और हवा कहर ढा रही थी .रिशेप्सन के सामने का लैम्पोस्ट उखड कर गिर गया था तो पर्यटन विभाग का वह कप प्लेट भी भी तिरछा हो गया था जिसे सैलानी कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते है .रात होते होते तूफ़ान और तेज हो चुका था और समुंद्र पूरी ताकत से गरजता हुआ सड़क पर चढ़ आने का असफल प्रयास कर रहा था .दूर लाइट हाउस की रोशनी तूफ़ान के बीच भी टिमटिमा रही थी .पुराने ज़माने में यह लाइट हाउस ही जहाजो को जमीन का संकेत देते थे . और आज भी मछुवारों के छोटे जहाजों को दिशा बताते है .मछुवारे भी पूरे हफ्ते का राशन पानी और बर्फ के कैशरोल लेकर निकलते है .यह उनकी किस्मत पर है कि कितनी मछली मिलती है .ऐसे ही एक जहाज के मालिक अयूब भाई ने कहा - किस्मत अच्छी हो तो दो तीन लाख की मछली मिल जाएगी वर्ना डीजल और राशन पानी का भी खर्च नही निकल पाता. गोवा दमन की तरह दीव भी मछुवारों का गाँव रहा है और एक बड़ी आबादी आज भी इस पर निर्भर है .
अँधेरा छाते ही लाउंज के सामने की लाइट जल गई और समुंद्र तट के किनारे किनारे बनी सड़क जो बरसात से भीगी हुई थी चमकने लगी .आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और थोड़ी थोड़ी देर में बिजली कौंध जाती तो दूर तक समुंद्र की लहरें दिख जाती .एक युवक जो शाम से ही मछली पकड़ने की कटिया डाले हुए था वह एक बड़ी मछली पकड़ने के बाद वापस आता दिखा .बारिश की वजह से आज बहुत कम सैलानी समुंद्र तट पर नजर आ रहे थे लहरे भी इतनी आक्रामक थी कि पानी में उतरने पर डर लग रहा था . मोटरसाइकल पर कुछ जोड़े जरुर भीगते हुए गुजर रहे थे .बिन मौसम बरसात का मजा भी अलग होता है .शाम को बंदर चौक से पानी के छोटे जहाज से एक चक्कर लगाने का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम भी चौपट हो चूका था और बीच पर इस मौसम में जाने का सवाल ही नही उठता .लिहाजा बारिश के हल्के होते ही समुंद्र के किनारे सीमेंट की कुर्सी पर जम गए और लहरों को देखने लगे .एक लहर आती और किनारे पहुँचते ही बिखर जाती तभी दूसरी लहर और वेग से आ जाती ,यह सिलसिला जारी रहता .दूर समुंद्र में जहाज की रोशनी जरुर ध्यान बंटाती .दाईं तरफ एक टापू रोशनी से जगमगा रहा था . दीव एक द्वीप है जिसके आसपास कुछ और छोटे छोटे द्वीप जैसे टापू बन गए है .

Friday, October 8, 2010

तो सड़क का रास्ता पकड़िए


सुप्रिया रॉय
संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी या जो भाषा वे समझते हों, उसमें समझाना पड़ेगा कि वे भारत का पंच बनने की कोशिश न करे। उनके पंचायती राज में भारत शामिल नहीं है। अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर को विवादित और स्वतंत्र क्षेत्रों की सूची में शामिल कर के संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय डेरी फाउंडेशन ने अरुणाचल और कश्मीर को लगभग अलग देश बना दिया है। बैठा होगा कोई अनपढ़ अफसर जो चार पैग लगा कर रिपोर्ट लिख रहा होगा। भारत को ऐसी फालतू विवरणों से कोई फर्क नहीं मिलता और इसीलिए आज तो आप अरुणाचल प्रदेश के सफर का मजा लीजिए। सबसे पहला पड़ाव गुवाहाटी है। गुवाहाटी हवाई अड्डा बहुत मजेदार जगह है। कभी यहां से बांग्लादेश और भूटान को सीधी उड़ाने जाती है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा होने का जुगाड़ कर के यहां बार भी बनाया गया है और सिगरेट पीने का विशेष लाउंज भी। इसके अलावा उड़ाने आम तौर पर देरी से आती जाती है इसलिए श्रध्दालु कामाख्या देवी सिध्द तीर्थ के दर्शन कर के वापस लौट सकें, इसकी व्यवस्था भी प्राइवेट टेक्सी ऑपरेटरों के अलावा खुद हवाई अड्डे के प्रबंधकों ने की है। काफी धार्मिक आग्रह उनके भीतर जान पड़ता है। मगर आपकी मंजिल गुवाहाटी या दिसपुर या आसपास की नहीं हो तो इस हरे भरे, खूबसूरत, गोलियों की दहशत से भरे, खतरनाक सड़कों वाले रास्ते आपका इंतजार कर रहे हैं। आपकी आंखे जुड़ा जाएं, ऐसे दृश्य और आपका दिल बार बार बैठ जाने की धमकी दे, ऐसी खाइयां। मगर जिसने लेह, लद्दाख और कारगिल की खाइयां देखी हो जहां आपकी गाड़ी कई जगह सोलह हजार फीट की ऊंचाई पर अचानक बन गई खाई को लोहे के तख्तों पर से पार सकती है तो ज्यादा डर नहीं लगेगा। रही बात दूसरे साधनों की तो 25 सीटों वाला एक तीन इंजन एक साथ चलाने वाला हैलीकॉप्टर मौजूद है। यह हैलीकॉप्टर मध्य प्रदेश मूल की एक ऐसी विमान सेवा चलाती है जो तकनीकी रूप से कभी शुरू ही नहीं हो पाई। किराया भी ज्यादा नहीं हैं। तीन हजार रुपए में आप वह सफर आधे घंटे में कर लेते हैं जिसके लिए आपको सड़क पर आठ घंटे बिताने पड़ते हैं। फिर भी उत्तर पूर्व की खूबसूरती देखनी हो, वहां की ओंस को महसूस करना हो, बादलों के बीच से हो कर गुजरना हो तो सड़क का रास्ता ही बेहतर है। अरुणाचल की राजधानी ईटानगर में हैलीकॉप्टर शहर से काफी बाहर बने हैलीपैड पर उतरता है। पायलटों में से एक तुरंत बाहर उतर कर हैलीकॉप्टर के ठीक सामने खड़े हो कर सिगरेट सुलगा लेते हैं। जाहिर है कि उन्हें उस कानून की कोई परवाह नहीं हैं जिसमें हवाई पट्टी पर धूम्रपान करने की सजा कम से कम चार साल है और यह अपराध गैर जमानती है। खैर कानून को छोड़िए और नजारे देखिए। काफी विकट पहरे में मौजूद ईटानगर हैलीपैड और छोटे जहाज उतारने लायक हवाई पट्टी से बाहर निकल कर ईटानगर के मुख्य मार्ग पर आते ही सबसे पहले पंजाब पर गर्व होगा। पंजाब से तीन हजार किलोमीटर दूर ईटानगर में पंजाब पर गर्व इसलिए होता है कि सबसे ज्यादा दुकानें अपने सिख भाईयों की है और उन्होंने सारी स्थानीय भाषाएं बोलना भी सीख लिया है। कुछ ढाबे हैं और सबसे ज्यादा शराब की दुकाने है। एक से एक बड़े विदेशी ब्रांड। चीन में बनने वाली शराब भी। अरुणाचल आपको याद होगा कि चीन सीमा पर बसा है और चीन तो इसे अपना हिस्सा मानता है। इसीलिए अरुणाचलवासियों को चीन भारतीय नागरिक के तौर पर वीजा भी नहीं देता। अंग्रेजों ने कभी तिब्बत के हिस्से रहे अरुण्ााचल को भी एक अलग देश बनाने के चक्कर में 1914 में यहां एक निजी सीमा बना दी थी और बनाने वाले के नाम पर ही इसका नाम मैकमोहन लाइन रखा गया था। कहा गया था कि यह समझौता ब्रिटिश और तिब्बत सरकार के बीच का है। भारत में तो 1950 में इसे लागू कर भी दिया मगर चीन ने इसे कभी नहीं माना और 1962 का भारत-चीन युद्व सबसे भयंकर रूप में यहीं लड़ा गया था और अगर इलाके की खाइयां और उस जमाने की दुर्गम सड़कों की कल्पना करें तो हम सोच सकते हैं कि चीनियों से इसे बचाने के लिए भारतीय सेना को कितना गर्म लोहा निगलना पड़ा होगा। ईटानगर राजधानी है लेकिन पहाड़ियों और घाटियों में बसा हुआ एक नन्हा नादान सा शहर है। राजकीय अतिथि गृह से देखे तो शहर आपके सामने थाली में दीपकों की तरह बिखरा हुआ नजर आता है। शहर का सबसे बड़ा बाजार अपनी दिल्ली की ठीक ठाक कॉलोनियों की मोहल्ला मार्केट से ज्यादा बड़ा नहीं हैं और वहां धड़ल्ले से हिंदी फिल्मों की और गानों की सीडी और डीवीडी बिकती हैं। यहां के मूल निवासियों के बारे में माना जाता है कि वे तिब्बत में बौद्व धर्म के जन्म के भी दो तीन हजार साल पहले वहां से आ कर बसे हैं। महाभारत में यहां के राजा भीष्मका को बहुत महिमा मंडित किया गया हैं मगर इसके ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यह नाम अरुणाचल के किसी इलाके में किसी मंदिर या समाधि पर भी नहीं मिलता। जाहिर यह है कि तिब्बत और वर्मा यानी मंगोल मूल के लोग ही यहां के आदिवासी और मूलवासी है। अरुणाचल का असली इतिहास सोलहवीं शताब्दी में असम के आहोंम इतिहास के साथ ही लिखा गया था। इसमें मूनपा और शेरदुकपेन नाम के दो ताकतवर कवियों का जिक्र है और हाल ही खुदाई में चौदहवीं शताब्दी के वैष्णव हिंदू मंदिर सियांग इलाके की घाटियों से मिले हैं। वास्तु कला के हिसाब से सारे मंदिर दक्षिण की ओर खुलते हैं और असम की सीमा के पास है। यहां के तवांग बौद्व मठ को सीधे तिब्बती बौध्द इतिहास से जोड़ कर देखा जाता है और छठवें दलाई लामा भी यहीं पैदा हुए थे। वर्तमान और कायर दलाई लामा हाल में ही तवांग गए थे तो चीन ने ऐतराज जाहिर किया था। मगर चीन तो भारत के प्रधानमंत्री की अरुणाचल यात्रा पर भी ऐतराज करता है। चीन को बावली बीबियों की तरह अनसुना कर देना चाहिए मगर उनके बेलन से फिर भी बच कर रहना चाहिए। गए थे हैलीकॉप्टर से मगर लौटे अरुणाचल- असम सीमा पर बसे असम के शहर तेजपुर के पास बने हवाई अड्डे से। वहां एक डक्कन एयरवेज का एक चालीस सीटाें वाला लेकिन आरामदेह जहाज इंतजार कर रहा था जिसने 25 मिनट में गुवाहाटी पहुंचा दिया था। अब जहाज की यात्राएं तो जहाज की यात्राएं ही होती हैं, जहां खिड़कियाेंं से बादल और कभी कभी बहुत दूर की जमीन नजर आ जाती है इसलिए निवेदन है कि उत्तर पूर्व घूमना है तो सड़क का रास्ता पकड़िए। जीवन धन्य हो जाएगा।

पलामू बंगले के बरामदे में


वीना श्रीवास्तव
शनिवार की सुबह हम साढ़े पांच बजे जग गए। पूरब की दिशा में आकाश में बादल थे, लगा शायद सूर्योदय नहीं देख पाएंगे। फिर भी हम कैमरे के साथ वाच टावर पहुंच गए। वहां तीन लोग पहले से ही मौजूद थे।वातावरण में ठंडी हवा बह रही थी। पौने छह बजे मध्यम सा एक लाल गोला बादलों के बीच झलका लेकिन वह एक नजर में नहीं दिखाई दे रहा था। मैने कहा वह देखो सूरज उग रहा है। सब लोगों की निगाह आकाश पर लग गई। तब तक हल्का सा लाल गोला थोड़ा और ऊपर उठ चुका था, सामने की पहाड़ियों और सखुआ के पेड़ों के ऊपर। वाकई दिल को मोह लेने वाला दृश्य। हम 15 मिनट तक बाल सूरज को देखते रहे।
जीतन किसान ने नीचे से आवाज लगाई, बाबू चाय तैयार है, ऊपर ही लाएं क्या। हमने कहा नहीं, हम ही नीचे आते हैं। नीचे उतर कर हमने गेस्ट हाउस के बरामदे में गुनगुनी धूप के साथ चाय पी। इस दौरान हम घूमने की योजना पर भी चर्चा कर रहे थे। तय हुआ कि नाश्ते के बाद हम सनसेट प्वाइंट तक जाएंगे। वहां से लौटकर नेतरहाट स्कूल देखा जाएगा और फिर गेस्टहाउस लौटकर लंच लेंगे।
निर्धारित समय यानी ठीक साढ़े आठ बजे नाश्ता लगा। पराठें और आलू की भुजिया। यहां दही और दूध का रिवाज नहीं है। जीतन ने बताया था कि इसके अलावा टोस्ट बटर व आमलेट मिल सकता है। नाश्ते के बाद, हम सनसेट प्वाइंट की ओर रवाना हुए। पलामू बंगले से यह स्थान करीब 6 किमी है। रास्ता बेहद खूबसूरत। पतली सी सड़क सीधी सखुआ और चीड़ के बीच से। नेतरहाट स्कूल के बाद एक छोटी सी आदिवासी बस्ती पड़ी। सुंदर और शालीन घर। दूर से बटुली में पानी लाते बच्चे व महिलाएं। गाय व बकरियों के लिए चारे का इंतजाम करते लोग। जगह-जगह महिलाएं सड़क पर मक्का सुखा रहीं थीं। यहां कभी-कभार ही बाहरी लोग दिखाई देते हैं, सो लोग हमें कौतूहल से देख रहे थे।
रास्ते में चीड़ों के झुंड इतने शेप में दिख रहे थे जैसे किसी ने इनकी कटिंग कर ऐसा बनाया हो लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं होता है। हवा ही इन पेड़ों को संवारती है और शेप देती है। हमारी कार धीमे-धीमे चल रही थी और हम जंगल, हवा और मनोरम वातावरण का आनंद लेते हुए आगे बढ़ रहे थे। थोड़ी देर में हम सनसेट प्वाइंट पहुंच गए। वहां सनसेट देखने के लिए एक सीढ़ीदार प्लेटफार्म बना है। तीन साल पहले बने इस प्लेटफार्म की फर्श उखड़ चुकी है। उस पर लगे पत्थर गायब हैं, यहां तक कि उद्घाटन का पत्थर भी लोग उखाड़ ले गए।
सरकारी उपेक्षा से प्राकृतिक खूबसूरती तो उखड़ती नहीं है लिहाजा इस प्वाइंट से खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। इस प्वाइंट का नाम है मैग्नोलिया सनसेट प्वाइंट। इस प्वाइंट से नीचे एक गहरी खांईं है। बीच में घाटी है और फिर पहाड़ियों। सूरज इन्हीं पहाड़ियों के बीच डूबता है।
इस नाम के पीछे एक कहानी है- लोग बताते हैं यहां पहले एक अंग्रेज साहब रहता था जिसकी बेटी थी मैग्नोलिया। मैग्नोलिया बहुत खूबसूरत थी। हिंदुस्तान में ही पैदा हुई मैग्नोलिया यहां की भाषा भी अच्छे से आती थी। घुड़सवारी के दौरान उसकी मुलाकात एक आदिवासी नौजवान से हुई। यह नौजवान बहुत अच्छा बांसुरीवादक व गायक था। बांसुरी की तान जंगलों में और भी मारक हो जाती थी। तान सुनकर मैग्नोलिया बेचैन हो उठती थी। मुलाकात का दौर शुरू हुआ और धीरे-धीरे मैग्नोलिया के मन के कोमल से भाव ने मोहब्बत का रूप ले लिया। मैग्नोलिया उस आदिवासी के साथ रहना चाहती थी लेकिन उसके मां-बाप को यह मंज़ूर नहीं था। अंग्रेज साहब को जब कोई रास्ता न सूझा तो उसने आदिवासी युवक की हत्या करा दी। जब मैग्नोलिया को पता चलता है तो वह पागल हो उठती है। कहती है मुझे उस लड़के से मिलना है। अपने घोड़े पर सवार होती है और घोड़ा दौड़ाते हुए उस खांईं में छलांग लगा देती है। लोगों का कहना है कि कभी-कभी मधुर आवाज इस खांईं से आज भी सुनाई देती है और घोड़े पर सवार मैग्नोलिया भी दिखाई दे जाती है। इस तरह इस प्वाइंट का नाम मैग्नोलिया प्वाइंट पड़ गया।
शाम को लोहरदगा से आग्रह हुआ कि शनिवार की रात हम फारेस्ट रेस्टहाउस में स्थित लागहाउस में ठहरें। ठहरना तो नहीं हुआ लेकिन हम शाम को वहां चाय पीने जरूर गए। दरअसल हमने सोचा कि जब हम सनसेट देखने जाएंगे तो उधर से होते हुए जाएंगे। शाम को बादल छा गए लिहाजा सनसेट देखने का कार्यक्रम रद करना पड़ा और हम पहुंच गए फारेस्ट रेस्टहाउस।
साढ़े पांच बजे से बारिश शुरू हो गई। करीब आठ बजे तक जबरदस्त बारिश होती रही। घुप अंधेरा, तेज बारिश और केरोसिन लैंप के साथ हम बैठे पलामू बंगले के बरामदे में। प्रकृति ने जो माहौल बना रखा था कि उसका मजा ही अलग। बारिश की बूंदों के साथ सखुआ और चीड़ की जो जुगलबंदी शुरू हुई थी, वह तेज होती बारिश में डूब गई और फिर शुरू हुआ बादलों का मांदर। घड़ी की सुइंयां इतने धीमे चलती नजर आ रही थीं कि समय जैसे ठहर गया हो।
रविवार यानी 3 अक्टूबर को सुबह काफी चहलपहल थी। जब हम नाश्ता कर रहे थे तभी वहां विकास भारती संस्था के मुखिया अशोक भगत वहां आ गए। राजेंद्र को देखकर वह चौंक गए। नमस्कार हुआ। उन्होंने कहा कि गांधी जयंती पर विकास भारती आदिवासी युवक-युवतियों व बच्चों की एक दौड़ का आयोजन कर रहा है। यह दौड़ नेतरहाट स्कूल से शुरू होकर बनारी पर खत्म होगी। यानी करीब 25 किमी। अशोक भगत ने राजेंद्र से दौड़ को हरी झंडी दिखाने का आग्रह किया जिसे राजेंद्र ने सविनय मना कर दिया।
वापस होते हुए रास्ते में हमने देखा कि बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां (अधिकतर नंगे पांव) दौड़ते हुए नीचे जा रहे थे। विकास भारती ने जगह-जगह पानी का इंतजाम कर रखा था। कहीं से नहीं लग रहा था कि ये बच्चे नक्सली बनकर बंदूक उठाने का विकल्प अपनाएंगे यदि इन इलाकों को विकास मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाए।
अशोक भगत के आग्रह पर हम बिशुनपुर में विकास भारती के परिसर स्थित गेस्टहाउस में चाय पीने के लिए रुके। विकास भारती के कामों की जानकारी हमें दी गई। हमने उनका स्वावलंबन केंद्र देखा कि कैसे स्थानीय लोगों को स्वरोजगार के लिए न सिर्फ ट्रेन किया जा रहा है बल्कि उनके लिए प्लेटफार्म का काम भी विकासभारती कर रही है। यही नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी अयस्क से लोहा व एलुमुनियम बनाने की तकनीक को भी बचाए रखने का काम भी यहां चल रहा है।
लौटते में हम कुड़ू होकर नहीं बल्कि लोहरदगा से बेड़ो वाली सड़क से रांची आए। अच्छी सड़क, मनोहारी दृश्यों के बीच पता नहीं चला कि कब हम रांची पहुंच गए। कुल मिलाकर मुझे लगता है कि यदि आप दो-तीन दिन दुनिया-जहां से कटकर कुछ पल सुकून से बिताना चाहते हैं तो नेतरहाट सबसे मुफीद जगह है।
कैसे पहुंचे नेतरहाट
दिल्ली, कोलकाता, पटना व मुंबई से रांची वायुमार्ग से जुड़ा है। रेलमार्ग से रांची मुख्यरूप से दिल्ली व कोलकाता से जुड़ा है। रेल से धनबाद होकर भी रांची पहुंचा जा सकता है। धनबाद से रांची 160 किमी है। लखनऊ से आने के लिए कानपुर से ट्रेन पकड़े। रांची से टैक्सी लेकर नेतरहाट पहुंचा जा सकता है। सात में हल्के गर्म कपड़े ले जाना न भूलें।

Monday, October 4, 2010

सखुआ और चीड़ की जुगलबंदी



वीना श्रीवास्तव
नेतरहाट को यदि नेचर हाट कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। चीड़ और सखुआ के जंगल, नाशपाती के बागान, बादलों की सरपट दौड़ और शांत-मनोहारी माहौल व मौसम। रात को सखुआ के पत्तों पर एक बूंद भी गिरे तो आवाज सुनाई देती है। 3900 फुट की ऊंचाई पर बसा नेतरहाट किवदंतियों से भी भरा है। कोई भी आदमी आपको एक नया किस्सा सुना देगा।
30 सितंबर को हम लोग बात कर रहे थे कि झारखंड में रहते हुए एक साल हो गया और हम लोग अब तक झारखंड में कहीं नहीं गए। एक लंबा वीकेंड हमारे सामने था लिहाजा विचार शुरू हुआ कि कहां जाया जाए। बाबाधाम से शुरुआत हुई लेकिन दूरी 325 किमी थी लिहाजा दूसरे विकल्पों पर नजर डाली गई। मैथन डैम, तिलैया डैम, बेतला फारेस्ट पर बात करते-करते हम आए नेतरहाट पर। इस बीच राजेंद्र फोन करके रहने की व्यवस्था की जानकारी लेते रहे। नेतरहाट रांची से सिर्फ 140 किमी है और कार से जाने पर ज्यादा से ज्यादा चार घंटे का समय। लिहाजा तय हुआ कि नेतरहाट ही चलेंगे। राजेंद्र का पूरे झारखंड में अपना नेटवर्क है। उन्होंने लोहरदगा के एक पत्रकार साथी से नेतरहाट का फारेस्ट बंगला रिजर्व कराने को कहा लेकिन पता चला कि वहां जनरेटर नहीं है और पानी की भी दिक्कत है। अब दूसरा विकल्प था पलामू बंगला जो लातेहार जिला परिषद के नियंत्रण में है। लातेहार के एक वरिष्ठ पत्रकार साथी की मदद से यह बंगला दो दिन के लिए बुक कराया गया।
शुक्रवार को दोपहर एक बजे रांची से नेतरहाट के लिए निकलने की योजना बनी। हम तैयार थे कि राजेंद्र को याद आया कि अपनी दोनों कारों का इंश्योरेंस सितंबर में खत्म हो गया है। तो इंश्योरेंस रिन्यू कराने में थोड़ा समय लगा और हम ढाई बजे रांची से निकल पाए। रातू, मांडर और कुड़ू होते हुए हम करीब शाम 4 बजे लोहरदगा पहुंचे। रास्ता बहुत खराब था। कई जगह सड़क टूटी हुई थी लिहाजा समय ज्यादा लगा। हम लोगों ने सोचा था कि लंच कुडू के पास एक लाइन होटल में करेंगे लेकिन देर होने की वजह से हमने लंच ड्राप कर दिया। आपको बताते चलें कि इस इलाके में हाईवे पर स्थिति ढाबों को लाइन होटल कहते हैं। लोहरदगा में विभिन्न अखबारों के पत्रकार साथी मिले। वे राजेंद्र से जानना चाहते थे कि वह कौन सा अखबार ज्वाइन कर रहे हैं। दरअसल राजेंद्र हिंदुस्तान के झारखंड के संपादक थे। पिछले दिनों स्थानांतरण की वजह से उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। इन पत्रकार साथियों ने हमारे लिए एक स्थानीय होटल में लंच की तैयारी कर रखी थी। इस आग्रह को टाला न जा सका लिहाजा और देर हो गई। चलते समय एक पत्रकार साथी भी हमारे साथ हो लिए। रात को नेतरहाट जाना जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि आसपास का पूरा इलाका नक्सल प्रभावित है और थाना आदि उड़ाए जाने के किस्से यहां आपको डराने के लिए काफी हैं। लेकिन राजेंद्र ने कहा कि जब हम फरवरी 2002 में रात को एक बजे जम्मू-कश्मीर में उस समय के सबसे खतरनाक इलाके में स्थित गुलमर्ग जा सकते थे तो यहां क्या। फिर हम पत्रकार हैं, हमसे किसी की क्या दुश्मनी।
करीब 5.30 बजे हम लोहरदगा से नेतरहाट के लिए निकले। घाघरा पहंचते हुए अंधेरा छा गया और अभी हम करीब 60 किमी दूर थे। रास्ते में हमें सिर्फ बाक्साइट भरे ट्रक आते ही दिखाई दिए बाकी कोई आवागमन नहीं था। बिशुनपुर पार करते-करते पूरी तरह से अंधेरा हो गया। मुझे डर लग रहा था लेकिन मैं कुछ बोल नहीं रही थी। बनारी पार करने के बाद शुरू हुआ पहाड़ी रास्ता। भीगी सड़क देखकर लग रहा था कि यहां थोड़ी देर पहले बारिश हुई है। रास्ता बहुत अच्छा नहीं था। सड़क टूटी हुई थी और जगह-जगह पत्थर और कीचड़ था। हम ठीक सवा सात बजे नेतरहाट पहुंचे। राजेंद्र की ड्राइविंग की एक बार फिर दाद देनी होगी कि हम मानकर चल रहे थे कि आठ बजे नेतरहाट पहुंचेंगे लेकिन हम जल्दी पहुंच गए।
थोड़ा समय पलामू बंगला ढूंढ़ने में लगा। वहां महुआडांड़ के पत्रकार साथी लिली हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हम लोगों को देखकर राहत की सांस ली। वहां के सेवक जीतन किसान ने बेहतरीन गरमा-गरम चाय हमें पिलाई। जो थोड़ी-बहुत थकान थी वह काफूर हो गई। नेतरहाट का सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत खूबसूरत होता है और नेतरहाट इसके लिए जाना जाता है। जीतन ने बताया कि सूर्योदय पलामू बंगला प्रांगण में बने वाच टापर से ही देखा जा सकता है या फिर पास के प्रभात होटल से। हम लोगों ने तय किया सुबह वाच टावर पर सूर्योदय देखते हुए सुबह की चाय पिएंगे।
(जारी)

Saturday, October 2, 2010

प्रेम से मोक्ष का एक रास्ता खुलता


सुप्रिया रॉय  
प्रेम से मोक्ष का एक रास्ता खुलता है। रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी मांडू के जिन पत्थरों में लिखी है, वहां से लगभग कावेरी के किनारे किनारे धामनोद के रास्ते चलते चले जाए तो अंतत: पहुंचेगे वहां जहां कावेरी नर्मदा से मिलती हैं दोनों ही नदियां तेज धार वाली है, मगर मिलन के ठी पहले उनकी धार दोस्ती की यानी धीमी हो जाती हैं इसका श्रेय आप या यहां केपहाड़ी भूगोल को दे, या नदियों के मिलन के प्रेम रूपक को या यहां की धार्मिक किंवदंती बन गए धर्म स्थल ओंकारेश्वर को मगर सच यह है कि नदियां इतनी खामोशी से एक दूसरे में विलीन नहीं होती। खास तौर पर नर्मदा तो दुनिया की अकेली नदी है, जो पूर्व की तरफ नहीं पश्चिम की तरफ बहती है। एक बागी नदी को भी आत्मीय बनाने का यह चमत्कार ओंकारेश्वर में होता है।
दोनों नदियां सीधे नहीं मिलती। थोड़ा घूम कर लजाते शर्माते एक दूसरे के करीब आती है और उनके इसी प्रवाह में एक द्वीप बन गया हैं पड़ोस के पर्वतों या हेलीकॉप्टरों से देखें तो यह द्वीप सीधे ओम अक्षर की आकृति में बना है। इस द्वीप के नाम पर इस तीर्थ का नामकरण हुआ है- ओंकारेश्वर। इंदौर-महाराष्ट्र राजमार्ग पर बाड़वाह से 12 किलोमीटर जंगलों से घिरे एक रास्ते पर चलें तो आेंकारेश्वर की दुनिया प्रकट होती है।
रास्ते में ओंकारेश्वर बांध के कारण बस गया नर्मदा नगर का रास्ता भी है फिर हमेशा एक आस्तिक मेले की शकल में जागता रहने वाला ओंकारेश्वर तीर्थ है, जोहै तो नर्मदा के पार मगर वहां पहुंचने के लिए दो पुल मौजूद है। एक सीधा और दूसरा झूलता हुआ। पूल पार करते ही ऊपर एक बहुत प्राचीन लेकिन बसे हुए किले के नीचे रास्ता चला जाता है और वहां से एक तंग लेकिन उदार गली आप को आेंकारेश्वर महादेव के परम प्राचीन मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचा देती है। हाइटेक जमाना आ गया ह, इसलिए मंदिर के प्रेवश द्वार के सामने ही इस तीर्थ की महिमा बखानने वाली सीडी भी बिकती है और आम इसे देख सकें, इसकी व्यवस्था भी है।
आज तो आवागमन और संचार के सब साधन मौजूद है- जैसे ओंकारेश्वर के एटीएम से आप पैसे निकाल सकते हैं, दुनिया भर में बात कर सकते हैं, बीबीसी और सीएनएन देख सकते हैं, इंटरनेट पर संदेशें भेज सकते हैं और इसी कारण उस युग की कल्पना करना जरा कठिन प्रतीत होता है। जब भगवान राम के पूर्वज मांधाता ने यहां तपस्या करके सीधे भगवान शिव का दर्शन पया था और यही आदि शंकराचार्य ने अपने प्रारंभिग शिष्यों मेंसे एक को दीक्षा दी थी। मंदिर के तलघर में एक चट्टानी गुफा अब भी मौजूद हे, जहां मांधाता ने तपस्या की थी ओर इसके ठीक ऊपर एक कक्ष में एक आसन भी रखा है, जिसे राजा मांधाता का आसन कहा जाता हैं कहावत तो यह भी है कि इसी रघुवंश के राजा परीक्षित का जब नागदेव से झगड़ा हो गया था और नागदेवता राजा परीक्षित को दंडित और दंशित करने पर तुले हुए थे, मांधाता के तप ने ही मध्यस्थता की थी।
यही भगवान शिव की तपस्या करने नक्षत्र मंडल से उतर कर शनि देवता के आने की कथा भी कहीं जाती है और उसी पहाड़ी चट्टान पर शनि की एक सिध्द मंदिर भी है। ओंकारेश्वर मंदिर को श्री ओंका मांधाता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है और यह एक मल लंबे और आधा मील चौड़े चट्टानी द्वीप पर बना हुआ हैं।
चूंकि स्वयं भगवान शिव यहां प्रकट हुए थे, इसलिए वे अपने आगमन के स्मारक के रूप में एक ज्योर्तिलिंग की शक्ल में यहां स्थापित है और ओंकारेश्वर इसलिए संसार में 12 ज्योतिर्लिंग में से एक गिना जाता हैं एक उत्सुक साधारण यात्री के लिए ओेंकारेश्वर का महत्व इसलिए भी ज्यादा है कि यह बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे शिव को समर्पित तीर्थों की तुलना में सबसे कम दुरूह रास्ते के अंत पर बसा है। इंदौर से सवा घंटे में आप या कर के कारक युग में पहुंच जाते हैं और वहां से जप तप के कर्मकांड से गुजर कर वापस अपने इस इस नश्वर संसार में अपने दुनियादारी के कर्तव्य पूरे कर सकते है।
वैसे अगर समय हो तो ओंकारेश्वर में हर धर्म और हर विचार का अपना तीर्थ मौजूद है। मध्य कालीन ब्राम्हणी विचार धारा का अति प्राचीन सिध्दनाथ मंदिर है, जहां एक ही चट्टान पर हाथियों की पूरी बारात मौजूद है। चौबीस अवतार के नाम से हिंदू और जैन मंदिरों का एक पूरा सिलसिला मौजूद है जो धर्म के अलावा अपने स्थापात्य के लिए भी देखा जाना चाहिए। सिर्फ 6 किलोमीटर दूर दंसवी सदी के मंदिरों का एक समूह है हां फिर कलाकरों के भक्ति से जुड़ने की साक्षात कथा देखी जा सकती है। पिकनिक का मन हो तो नो किलोमीटर दूर पर काजल रानी गुफाए हैं, जो 21 वीं सदी में भी आपको जंगल बुक की दुनिया में होने का एहसार करवा सकती है।
वैसे आेंकारेश्वर महादेव मंदिर के एक दम पड़ोस में गायत्री शक्ति पीठ भी लगभग बन कर तैयार है और वह भी कम तीर्थ नहीं हैं ठहरने की चिंता छोड़ दीजिएं दस रुपए रोज की धर्मशालाओं से ले कर 700 रुपए तक के वातालुकूलित कमरे मौजूद हैं और जब तीर्थ में आए है तो मैन्यू देख कर खाने का क्या लाभ? शाकाहारी भोजनालयों की कतार लगी है, भरपेट खाइए, चाहें तो सो जाइए या फिर नर्मदा में चल रही नावों पर नौका विहार करके आइए। आप बहुत सारे ईश्वरों और देवताओं की छत्र छाया में हैं इसलिए चिंता की कोई बात नहीं।

Thursday, September 30, 2010

और खिल उठे भगवा ब्रिगेड के चेहरे


अंबरीश कुमार
लखनऊ, ।अयोध्या विवाद के साठ साल बाद आए फैसले से हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को नई ऊर्जा मिल सकती है। अयोध्या से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक भगवा ब्रिगेड के चेहरे खिल उठे हैं। फैसले की खबर मिलते ही अयोध्या के कारसेवक पुरम में महंत नृत्य गोपाल दास साधू-संतों से निपट गए। तो दूसरी तरफ उमा भारती से लेकर कल्याण सिंह तक ने तहे दिल से अदालत का आभार जताया। भारतीय जनता पार्टी ने फैसले पर ख़ुशी जताते हुए आम जनता से संयम से काम लेने की अपील की । कल तक जो यह कहते थे की अयोध्या में विवादित स्थल में राम लला का जन्म हुआ था आज अदालत ने उसपर मोहर लगा दी। हालांकि वाम दल इस फैसले को सबको संतुष्ट करने वाला राजनैतिक फैसला मान रहे हैं। पर हिंदुत्ववादी ताकतें अब अगले कदम की तैयारी में जुट गयीं हैं। इन ताकतों के मुताबिक यह तो साफ़ हो गया कि अयोध्या में मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई थी और उसी जगह पर रामलला का जन्म हुआ था। अब अगला कदम राम मंदिर का होगा। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कहा- 'अयोध्या में रामलला का मंदिर आस्था और विश्वास का मुद्दा रहा है। हिन्दुओं का ये मानना रहा है कि रामलला का जन्म यहाँ हुआ था। आज अदालत ने भी इसे स्वीकार कर लिया है । अब अयोध्या में रामलला का मंदिर बनाने का रास्ता साफ़ हो गया है।
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा-अयोध्या विवाद पर आज के फैसले से हिन्दुत्ववादी ताकतों के हौसले बुलंद हो सकते हैं। वैसे भी यह फैसला सभी को संतुष्ट करने वाला फैसला प्रतीत होता होता है। दूसरी तरफ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने कहा है कि अयोध्या विवाद का संतोषजनक हल देने में इलाहाबाद हाईकोर्ट असफल साबित हुआ है।
भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में कहा कि यह फैसला स्थापित कानूनी मान्यताओं के परे जाकर राजनैतिक नज़र आता है। उन्होंने कहा कि असंतुष्ट पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय में जाने का पूरा अधिकार है और देश को धैर्य और संयम के साथ अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने अयोध्या मामले में उच्च न्यायालय इलाहाबाद की विशेष पीठ के फैसले का स्वागत किया है। शाही ने कहा-हाईकोर्ट का फैसला आनन्द का विषय है साथ ही इस निर्णय से अयोध्या में रामलला के भब्य मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। शाही ने आग्रह करते हुये कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किये जाने को जय पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शाही ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्णय ने वर्षो से चली आ रही मान्यता की पुष्टि की है कि अयोध्या में जहां पर रामलला विराजमान हैं वही पर उनका जन्मस्थान है। उन्होंने कहा कि आज का निर्णय अयोध्या में भब्य राम मन्दिर बनाने की दिशा में निर्णायक कदम होगा मैं इसका स्वागत करता
हूँ। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने कहा कि आज का दिन एतिहासिक है क्योंकि अयोध्या मामले में बहुप्रतिक्षित मुकदमें का हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में विवादित भूमि को लेकर विवाद होते रहे हैं तरह-तरह की बातें कहीं जाती रही हैं लेकिन आज के निर्णय में तीनों ही माननीय न्यायाधीशों ने यह माना कि विवादित स्थल ही रामजन्म स्थल है। मिश्र ने कहा कि न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही विवादित स्थल को रामजन्म स्थल माना। उन्होंने कहा कि हम न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हैं एवं समाज के सभी धर्म-पंथ के लोगों से अपील करते हैं कि वे मन्दिर निर्माण के लिए आगे आएं।

अयोध्या में न्याय की षष्टिपूर्ति

आलोक तोमर
अयोध्या कांड में न्याय ने मामले की षष्ठिपूर्ति कर दी और इस अवसर पर काफी संशय दूर कर दी। यह जरूर है कि खुद उच्च न्यायालय को मालूम था कि अपील की जाएगी और इसके लिए तीन महीने का समय दे दिया गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा हालांकि समय सीमा पूरी हो जाने के कारण खारिज किया गया मगर वैसे भी कानूनन इसे पात्र नहीं माना जा रहा था। विस्तार मे फैसला आप अखबार और टीवी पर पढ़ चुके हैं और राम या अल्लाह में से जिसमें आपकी आस्था हो, उससे दुआ कीजिए कि न्याय का यह अवसर षष्टिपूर्ति के बाद शतायु होने के मौके तक नहीं पहुंचे।
पूरा देश दम साध कर इंतजार कर रहा था और फैसला कुल मिलाकर इस विवादित जमीन को राम जन्मभूमि मानने वालों के पक्ष में गया है। दो तिहाई जमीन निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि न्यास को दी गयी है और बाहर की एक तिहाई जमीन मस्जिद के पक्षधरों को। फैसला जाहिर है कि अभी आखिरी नहीं है लेकिन बहुत वर्षों बाद न्यायपालिका की निर्णायकता पर फिर से मुहर लग गयी है। जो लगभग अज्ञात लोग सुलह की बात कर रहे थे और जिन्हें अदालत ने फटकार कर बाहर कर दिया, वे भी इससे बेहतर फैसला शायद नहीं ला सकते थे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राम जन्म भूमि का वाकई राम जन्म भूमि होना भी कानूनी रूप से पहली बार प्रमाणित किया गया और भगवान राम को राम चबूतरे का मालिक बनाया गया। उम्मीद है कि सदभाव का जो माहौल दिखाई दे रहा है इसमें फैसला सामाजिक रूप से मंजूर किया जाएगा और देश अपनी उर्जा ढंग के काम में लगाएगा।
न्यायपालिका अयोध्या को लेकर हमेशा असमंजस और आपराधिक संशय में रही है। मामले शुरू हुए और पहली याचिका डालने वाले गोपाल चंद्र विशारद और दूसरे पक्ष के सारे पांच लोग अब दुनिया में नहीं हैं। फैजाबाद अदालत ने तो 1989 में ही कह दिया था कि इस मुद्दे पर सब कुछ कानून के दायरे में नहीं आ सकता, कुछ जनविश्वास औऱ आस्था पर भी छोड़ना पड़ेगा।
ऐसा भी कई बार हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय को इस विवाद का अधिकार क्षेत्र और कानूनी आधार निर्धारित करने के लिए खासतौर पर कहा औऱ एकबार तो आज से बीस साल पहले मामला अपने हाथ में ले लेने के संकेत भी दिए। कुछ तो वजह रही होगी कि उच्च न्यायालय ने अपवाद स्वरूप ही सही, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को मानने से इंकार कर दिया। मुद्दा ही ऐसा था कि बहस बढ़ी तो बवाल हुआ।
सवाल सबसे बड़ा ये था कि पहली याचिका करने वाले और उसका जवाब देने वाले सारे मर गये। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने राम मंदिर में हस्तक्षेप नहीं करने का आदेश देने की अपील की और मामला 1886 में वापस पहुंच गया। उस समय अंग्रेज जज कर्नल चेमियर ने कहा था कि यह सही है कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनी है लेकिन इतना वक्त बीत गया कि अब उसको आधार नहीं माना जा सकता। साठ साल तक कानून न हिंदुओं की मदद कर सका न इस्लाम मानने वालों की, और अब भी यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा, सात हजार से ज्यादा पन्नों की गवाहियां, डेढ़ हजार दस्तावेज औऱ वकीलों के तर्क पढ़े जाएंगे औऱ तब जाकर मामला शुरू होगा। जाहिर है कि न्यायपालिका अयोध्या के मामले में अपनी मति औऱ गति ठीक नहीं कर पायी है।
रही बात सुन्नी वक्फ बोर्ड की अपील की तो यह आजाद भारत का एक विचित्र किंतु सत्य तथ्य है । वक्फ बोर्ड भारत में इस्लामी संपत्तियों की रक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा गठित संस्था है। इसको आईएएस अधिकारी चलाते हैं। मुकदमे का मतलब यह है कि भारत सरकार खुद भारत सरकार के खिलाफ अदालत में खड़ी है। इतना ही नहीं जिस मीर बाकी ने मंदिर गिरा कर मस्जिद बनाई थी, वह शिया संप्रदाय का था और सिर्फ इसी आधार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज किया जा सकता था।
इसी कहानी में आगे यह सुनना भी जरुरी है कि मस्जिद के मामले में कोई भी कानूनी कार्रवाई मस्जिद के संरक्षक यानी मुतवल्ली ही कर सकते हैं। और बाबरी मस्जिद के मुतवल्ली मीर जावेद हसन मीर बाकी के वंशज हैं और अपने पूर्वज की मजार के पास अयोध्या से दस किलोमीटर दूर अंग्रेजों से मिली चालीस एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। मीर जावेद हसन ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका में शामिल होने से इंकार कर दिया था क्योंकि उन्होने कहा था कि वे शिया हैं। उन्होने तो यह भी कहा था कि मस्जिद को उनके गांव में स्थापित कर दिया जाय ताकि वे अपने पूर्वजों की बनाई मस्जिद में नमाज पढ़ सकें। मगर जहां मजहब से ज्यादा जरूरी सियासत हो, वहां तर्क कौन सुनता है।
यह सब इसके बावजूद है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड खुद औपचारिक औऱ सरकारी तौर पर जावेद हसन को बाबरी मस्जिद का मुतवल्ली करार दे चुका है। यह भी सही है कि वक्फ बोर्ड की याचिका तय समय सीमा से ग्यारह साल औऱ तीन सौ साठ दिन देरी से दायर की गई थी। इसलिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका को सुना ही क्यों गया यह आश्चर्य की बात है। आश्चर्य की बात तो यह भी है कि वक्फ बोर्ड की पंजीकृत संपत्तियों में बाबरी मस्जिद का कहीं नाम ही नहीं है। मगर जैसा कि पहले कहा कि जहां सिर्फ बात के लिए बात की जा रही हो, वहां तर्क कौन सुनता है।
1989 में पहली जुलाई को देवकी नंदन अग्रवाल ने राम मंदिर की मालकियत के लिए मंदिर की ओर से अपील की थी औऱ इस पर राजीव गांधी की सरकार की उदारता कहें या एक सोची समझी नासमझी, दो दिन के अंदर फैसला हो गया, मंदिर के ताले खुल गये, वहां पूजा भी होने लगी औऱ वहां रखी मूर्तियों को को भी वैध मान लिया गया। यह सब कुछ दिल्ली के इशारे पर हुआ था इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि कुछ ही घंटे में ताले खुलने का दृश्य दिखाने के लिए दूरदर्शन के कैमरे अखिल भारतीय प्रसारण की व्यवस्था के साथ अयोध्या में मौजूद थे।
जहां तक मंदिर के अस्तित्व का सवाल है तो 1767 में यहूदी पादरी जोसेफ टिफिन थेलर ने राम नवमी के दिऩ हिंदू और मुस्लिम दोनों को मस्जिद के अहाते में राम नाम गाते हुए देखने का दावा किया। उनके वर्णन में मंदिर औरंगजेब ने गिराया औऱ इसके पहले यहां जो महल बना था उसका नाम रामखोट यानी राम का महल था। राम चबूतरा पर पूजा होने की पूष्टि तो 1870 में ब्रिटिश पर्यटक औऱ इतिहासकार पी कारनेगी ने भी की है। और तो औऱ 1858 में बाबरी मस्जिद के मुख्य मौलवी ने भी माना है कि मस्जिद के प्रांगण में राम की पूजा भी होती है। वैसे भी अयोध्या की बजाय फैजाबाद में ज्यादा औऱ अधिक भव्य मस्जिदें हैं औऱ वहां बाबरी मस्जिद से ज्यादा नमाज पढ़ने वाले और हज़ पर जाने वाले जायरीन पहुंचते रहे हैं। राम जन्म भूमि बनी रहे और अजान के सुर गूंजते रहें, इसमें ही देश का वाकई भला है।

Thursday, September 23, 2010

अयोध्या विवाद पर पक्षकार राजी नही तो सुलह कैसी ?


अंबरीश कुमार
लखनऊ सितंबर । अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला टालकर इस मामले में सुलह की जो संभावनाएं तलाशी जा रही ही उनपर फिर पानी फिरता नज़र आ रहा है । सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले बाद फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से फिर यह यह साफ़ कर दिया गया कि इस मामले में वे देश की सबसे बड़ी अदालत में भी वही बात कहेंगे जो अब तक कहते आए है कि सुलह नही फैसला चाहिए । इस मामले के नब्बे वर्षीय मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी ने जनसत्ता से कहा - फैसला भले हफ्ते भर बाद आए पर फैसला होना चाहिए अब पंचायत या सुलह की कोई गुंजाइश नही है । यह सारा खेल कांग्रेस का है जिसने यह विवाद पैदा किया और अब फैसले को टालने की कोशिश में जुटी है । इस मामले को टलवाने में जहाँ कांग्रेस की भूमिका पर सवाल खड़ा हो रहा है वही भाजपा का भी सुर कांग्रेस के सुर में मिला हुआ है ।
राजनैतिक हलकों में माना जा रहा है कि फिलहाल यह मामला कुछ समय के लिए टल जाएगा । इस बीच कामनवेल्थ गेम्स और बिहार का चुनाव
निपट जाने से कांग्रेस को राहत मिल जाएगी । यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे पहले कांग्रेस ने स्वागत किया । पर जिस मामले में सुलह के ग्यारह प्रयास हो चुके हों और कोई हल नहीं निकला हो उसके फिर सुलझ जाने की संभावना के क्या आधार होंगे यह कोई नही जनता ।तीन -तीन प्रधानमंत्री और शंकराचार्य तक इस मामले में पहल कर चुके है । इलाहाबाद हाईकोर्ट की जिस बेंच में यह मामला चल रहा है उसने भी जुलाई के आखिरी हफ्ते में सभी पक्षकारों से सुलह के बारे बातचीत की पर कोई तैयार नही हुआ ।
इस मामले में चार मुख्य दावेदार हैं- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, रामजन्मभूमि न्यास और दिवंगत गोपाल सिंह विशारद। इनके वकीलों की भी यही राय है कि सुलह की कोई कोशिश नही की गई गई हैं। निर्मोही अखाड़ा ने जरुर फैसले की तारीख तीन दिन बढ़ा कर 27 सितंबर करने की बात की थी। पर जबतक मुस्लिम पक्षकार सुलह के लिए राजी नही होंगे सुलह होगी किससे ,यह कोई नही बता रहा । सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने पहले ही कहा था कि कांग्रेस इस मामले को टालने की साजिश में जुटी है । आज भी उन्होंने याचिका करने वाले रमेश चन्द्र त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल उठाया और कहा -इनके बारे में और भी जानकारी ली जा रही है । जिलानी ने साफ किया कि सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड का रुख वही है जो पहले था । इस मामले में सुलह की कोई गुंजाइश नही है सिर्फ मामले को लटकाया जा सकता है । दूसरी तरफ श्रीराम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने कहा -मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत हूं। इस पूरे मामले में त‍थाकथित राजनीतिक तत्वों ने वकीलों की मेहनत पर पानी फिरवा दिया है।
जनसत्ता

Monday, September 20, 2010

धान के खेतों में बत्तखों से मजदूरी




सुभाष चंद्र सिंह
आजमगढ़, सितम्बर । पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में इन दिनों किसान धान के खेतों में बत्तखों से मजदूरी करा रहे हैं । आपको इस बात पर भले ही विश्वास न हो लेकिन पिछले दस सालों से बत्तखें इस काम को बिना पैसे के बखूबी कर रही है ।
खरीफ की फसलों में धान की फसल बहुत ही मुख्य हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान की खेती बहुत ही अधिक मात्र में होती हैं । यह किसानों के लिए बहुत ही मेहनत का काम होती है । समय-समय पर पानी देना उसमें उगने वाले खर- पतवार , कीडॆ-मकोडो व काई की सफाई के लिए खेत मजदूरों एवं कीट नाशकों पर हजारों रुपये खर्च करने होते है । लेकिन जौनपुर के कई गाँव में अब बत्तखें धान के खेत में खेत मजदूरों की जगह इस काम को कर रही है ।
पानी भरे धान के खेत में तैर- तैर कर बहुत ही सफाई से खेत में उगने वाले खर - पतवार, काई के साथ ही साथ धान की फसल को नुकसान पहुचानें वाले कीडॆ-मकोडो को भी खा जाती है । इसके अलावा वह पुरे खेत की निराई - गुडाई भी कर देती है । बत्तखों से इस काम को कराने के लिए किसान बत्तख मालिक के यहाँ लाइन लगा रहे हैं ।
बत्तख पालक सुन्नीलाल राजभर ने बताया कि उसने गरीबी से तंग आकर सन् २००० में बत्तख पालन का काम शुरू किया और फिर उसके अण्डों से उसका खर्च चलने लगा । बत्तखों को चराने के लिए मज़बूरी के कारण धान के खेत में घुसा देता था. बत्तखों ने धान के खेत में उगे खर- पतवार,कीडॆ-मकोडो व काई की सफाई कर डाली. उसकी फसल आस- पास के खेतों की तुलना में सबसे अच्छी हो गई.बस बत्तखों से खेत मजदूरी कराने का सिलसिला यही से शुरू हो गया.उसके दो लड़के हैं वह दोनों भी दिन भर बत्तखे ही चरते हैं । कभी इस खेत में तो कभी उस खेत में ।
सुन्नीलाल ने बत्तखों से धान की खेती में यह नायब तरीका खोज डाला । धान की खेती के समय किसान उससे संपर्क करते है और वह अपने बत्तखों को पानी भरे उनके खेतों में घुसा देता है । बत्तखों को पानी में रोकने के लिए गेंहू बिखेर दिया जाता है । बत्तखे गेंहू खोजने के चक्कर में पुरे खेत की निराई - गुडाई कर देती हैं व खर- पतवार , कीडॆ-मकोडो को भी खा जाती हैं वह भी बिना धान की फसल को कोई नुकसान किये.सबसे बड़ी बात यह है कि इस काम को वह बिना पैसे के करती है.सुन्नीलाल कहता है कि किसान अपने खेत में बत्तख चराने देते हैं बस उसके लिए इतना खाफी हैं ।
सुन्नीलाल के पास २७०० बत्तखें है वह इन बत्तखों से प्रति माह २ से ३ हज़ार रुपये कमा लेता है और हर तीसरे साल वह पूरी बत्तखों को बेच कर १-१.५ लाख रुपये तक की कमाई करता है.सतहडा निवासी आशुतोष ने बताया कि एक एकड़ धान के खेत में सिर्फ निराई - गुडाई में कम से कम २ हज़ार रुपये लग जाते थे इसके अलावा कीडॆ-मकोडो को मारने के लिए कीट नाशको पर ५०० रुपये खर्च पड़ता है । कुल मिला कर एक एकड़ धान की खेती में २.५ से ३ हज़ार रुपये का कम से कम फायदा हो रहा हैं । वही अबबत्तखों की बीट खाद का काम कर जाती है. अब न तो हमेशा मजदूर खोजना है न ही मजदूरी का जुगाड़ करना हैं. यह काम बत्तखों के करने से काफी सहूलियत होने लगी हैं ।
सुन्नीलाल की इस खोज से जौनपुर के कई गाँव के किसानों को फायदा हो रहा हैं धीरे- धीरे उसकी पूछ भी बढ़ती जा रही हैं.लेकिन उसकी माली हालात में कोई बहुत सुधार नहीं हुआ हैं । वैसे देश के और भी भागों में इसका प्रयोग कर किसानों को फायदा पहुचाया जा सकता हैं । सुन्नीलाल कहता है कि कब किसके दिन बदल जाएँ कहा नहीं जा सकता । जनसत्ता

Sunday, September 19, 2010

मीर ,चकबस्त और बेगम अख्तर के फैजाबाद में फिर युद्ध जैसी तैयारी !




फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया
अंबरीश कुमार
अयोध्या , सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए । पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।
पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।
अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।
कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।
अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह में डाल रही थी ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।
यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि का व्यापार है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा ।
जनसत्ता

Wednesday, September 15, 2010

अयोध्या -अब सुलह नही फैसला चाहते है पक्षकार

अंबरीश कुमार / त्रियुग नारायण तिवारी
लखनऊ / अयोध्या सितंबर। उत्तर प्रदेश में अयोध्या के फैसले से पहले लखनऊ से लेकर फैजाबाद तक माहौल गरमा गया है । लखनऊ में सियासी पारा बढ़ रहा है तो अयोध्या में आशंका और तनाव । दूसरी तरफ अयोध्या मसले पर दोनों तरफ के पक्षकारों में सुलह की अंतिम कोशिश भी नाकाम होती नज़र आ रही है । इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मामले के पक्षकारों के बीच सुलह की एक और कोशिश के लिए १७ सितम्बर की तारीख़ तय की गई है ।पर कोई पक्षकार सुलह के मूड में नहीं है । दोनों पक्षकारो के वकीलों ने जनसत्ता से बातचीत में सुलह की संभावना से इनकार किया । दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल सुबह अयोध्या में राम लला के दर्शन कर साधू संतों के साथ बैठक करने जा रहे है । हालाँकि अयोध्या -फ़ैजाबाद में निषेधाज्ञा लागू कर सभी तरह के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । फैजाबाद के एसएसपी राजेश कुमार सिंह राठौर ने जनसत्ता से कहा - जिले में धारा १४४ लागू है और इसके तहत नियमो का पालन करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को अयोध्या में राम लला के दर्शन की इजाजत दी जा सकती है पर निषेधाज्ञा तोड़ने पर गिरफ्तार भी किया जा सकता है । कल्याण सिंह सुबह दस बजे अपने समर्थकों के साथ अयोध्या के लिए रवाना होंगे । उधर भाजपा के उपाध्यक्ष विनय कटियार ने इस मामले में केंद्र सरकार से दखल की मांग की । उन्होंने कहा कि आस्था और विश्वास के मामलें अदालते हल नही कर सकती। कटियार के मुताबिक अदालत ने निर्णय आने के पूर्व दोनो पक्षों को बातचीत का जो मौका दिया है वह सराहनीय है इसलिए अब केन्द्र सरकार को इस मामलें में आगे आना चाहिए।
सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारो के वकील जफरयाब जिलानी ने जनसत्ता से कहा - हमारा साफ मानना है कि इस मसले पर सुलह नहीं हो सकती अदालत अपना फैसला दे । इस तरह की कोशिशे पिछले १९ साल में कई बार हुई और कोई नतीजा नही निकला । इसलिए इस सिलसिले में जो अर्जी दी गई है उसपर विचार करने का कोई अर्थ नहीं है ।हम इस मामले में किसी भी तरह के सुलह के पक्ष में नही है।
दूसरी तरफ रामजन्म भूमि पुनरोद्धार समिति की तरफ से पेश होने वाली वकील रंजना अग्निहोत्री ने भी सुलह की संभावनाओ को ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ही सवाल खड़ा कर दिया । रंजना अग्निहोत्री ने कहा - यह तो न्यायपालिका की साख खराब करने की कोशिश है । जिस व्यक्ति ने अर्जी दी वह अब तक कहाँ सोया हुआ था । हम इस मामले में फैसला चाहते है ।
दरअसल अंतिम समय में जिस तरह का दबाव बढ़ा और यह अर्जी दी गई उससे लोग हैरान भी हुए है । लोगो का मानना है कि सभी फैसले का इन्तजार कर रहे ऐसे में इस तरह की कवायद से भ्रम हो सकता है । गौरतलब है की एक पक्षकार रमेश चन्द्र त्रिपाठी की अर्जी पर दोनों पक्षों से सुलह की कोशिश की जा रही है ।
दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल अयोध्या जा रहे है । कल्याण सिंह ने जनसत्ता से कहा - मै रामभक्त के रूप में रामलला के दर्शन करने अयोध्या जा रहा हूँ । वहा रामलला के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी जाऊंगा और उसके बाद साधू संतों के साथ सलाह मशविरा करूँगा ।
कल्याण सिंह सुबह दस बजे लखनऊ से रवाना होंगे । उनके साथ करीब डेढ़ सौ गाड़ियों का काफिला होगा । उधर अयोध्या में सुरक्षा और बढ़ा दी गई है ।कई और स्कूलों में सुरक्षा बल के जवान ठहरा दिए गए है । जिले के ५२ स्कूलों को नोटिस दी गई है कि कभी भी उनका परिसर लिया जा सकता है । अयोध्या फैजाबाद में दफा १४४ लगा दी गई है और प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । इसके आलावा खुशी या गम का कोई कार्यक्रम भी सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा सकता है । बढ़ते तनाव का असर अब दिखाई देने लगा है । अयोध्या में लोगों ने खाने व अन्य सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । जिसके चलते शाक सब्जी का दाम भी बढ़ गया है । फैजाबाद प्रशासन कल्याण सिंह के दौरे को लेकर सतर्क है और उन्हें अपने समर्थकों के साथ जाने से रोका जा सकता है । सूत्रों के मुताबिक उन्हें राम सनेही घाट या लखनऊ सीमा में ही रोका जा सकता है ।
जनसत्ता

Sunday, September 12, 2010

रामगढ का राइटर्स काटेज









आलोक तोमर
नैनीताल की भीड़ और झील के आसपास के बाजारों के शोर से बचना हो तो रास्ते तो कई हैं मगर असली मंजिल तक पहुंचाने वाला एक ही रास्ता है जो भुवाली और गागर होते हुए रामगढ़ पहुंचता है। रामगढ़ आज भी गांव है और कल्पना ही की जा सकती है कि एक छोटे से टीले पर हिंदी की महान कवियत्री महादेवी वर्मा ने जब यहां छोटा सा मकान बनाकर साहित्य रचने के प्रयोजन शुरु किए थे तो यहां कितना सन्नाटा रहा था। मुश्किल से पांच दुकानों के बाजार रामगढ़ में पांच सितारा होटलों को मात देने वाले होटल औऱ रिसार्ट हैं औऱ पत्रकारिता से लेकर राजनीति और अफसरशाही तक के सबसे बड़े नाम यहां आकर बस गये हैं। होने को नैनीताल भी हिल स्टेशन है मगर इससे भी लगभग सात हजार फीट उपर रामगढ़ में हवाएं जब ठंडी होती हैं तो बहुत ठंडी होती हैं। बारिश होती है तो आसपास हिमालय की प्रकृति द्वारा बनाई गयी पूरी चित्रकला भीग जाती है। कोहरा आपके घर में घुस आता है और आप भूल जाते है कि आप उसी लोक में हैं जिसे मर्त्यलोक कहा जाता है।
जब तक रामगढ़ का नाम नहीं सुना था और देश और दुनिया के बहुत सारे हिल स्टेशन देख डाले थे तब तक नहीं पता था कि पहाड़ियों की खामौश पवित्रता क्या होती है? रामगढ़ पहुंचने के ठीक पहले गागर में एक बड़ा मंदिर है और उसके ठीक उपर घुमावदार सड़क के आखिरी छोर तक जहां निगाह जाती है, हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती है। जून के महीने में पके हुए खुमानी ,आलूबुखारा ,स्ट्राबेरी और आड़ू से लदे पेड़ देखते बनते है तो जुलाई के बाद सुर्ख होते सेब । एकांत को तोड़ते हुए बीच बीच में से गुजर जाने वाले स्थानीय लोग जो अब बाहरी लोगों को कौतुक से नहीं अपनी स्वभाविक आत्मीयता से देखते हैं। आप हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के उस हिस्से में है जहां दुर्गम और सुगम के बीच का फासला मिट जाता है।
पुराने लोगों के जो घर हैं वे अब भी देहाती शैली में बने हुए हैं। सड़क पर हैं तो हवेली जैसा आकार भी देने की कोशिश की गई है। अगर पीछे हैं तो गांव के मकान हैं। वैसे भी रामगढ़ अब तक नगरपालिका भी नहीं बनी , सिर्फ ग्राम पंचायत है। घाटियों और चोटियों के बीच शानदार आशियाने भी बने हैं और इस खामोशी को प्यार करने वाले ऐसे लोग भी हैं जो शेष जीवन के लिए रिटायरमेंट से बहुत पहले आकर बस गये हैं।
खास बात ये है कि इस इलाके का महानगर कहा जाने वाला नैनीताल जहां कोई सिनेमाघर तक नहीं है और जहां दर्जनों हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है, रामगढ़ से सिर्फ पौन घंटे की दूरी पर है। होने को रामगढ़ मे अब एक डाकघर भी है, डिस्पेंसरी भी है और लगभग सभी पार्टियों से जुड़े नेताओं के रईस आशियाने भी हैं। दिल्ली के सबसे भव्य इलाके सुजान सिंह पार्क में एक विराट बंगले में रहने वाले खूबसूरत पत्रकार हिरण्यमय कार्लेकर ने भी यहां घर बना लिया है। भारतीय विदेश सेवा के सर्वोच्च अधिकारी रह चुके शशांक शेखर यहां हैं हीं।
यह कल्पना करना ही सम्मोहित और चकित करता है कि अगर रामगढ़ में महादेवी वर्मा और ज्यादा वक्त बिता पाती तो " अतीत के पता नहीं कितने और चलचित्र " हमे पढ़ने को मिलते। पता नहीं सुमित्रानंदन पंत ने यहां की यात्राओं में क्या लिखा मगर उनके साहित्यिक इतिहास में रामगढ़ का वर्णन नहीं है। रवींद्र नाथ ठाकुर के संस्मरणों में रामगढ़ का वर्णन आता है ।
अगर आप नैनीताल गये और रामगढ़ नहीं गये तो कम से कम आपके जीवन का निजी इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। इस धरती पर ऐसी जगहें कम मिलती हैं जहां गर्मी नहीं, शोर नहीं, धुआं नहीं, भीड़ नहीं, पार्किंग के झमेले नहीं और जहां तक नजर जाए वहां तक घाटियां और झरने ही झरने दिखते हैं। कई बार बाघ के बच्चे रामगढ़ में आ जाते हैं और यहां के लोग उन्हे दुलारकर वापस जंगल में छोड़ देते हैं। रामगढ़ को मसूरी या दार्जलिंग की तरह होटलों का जंगल बनाने की कोशिश चल रही है और इसके पहले इस खूबसूरत दुनिया के साथ यह हादसा हो जाय, आप भी रामगढ़ हो आइए...
अंबरीश कुमार ने अपनी खबरों वाली शैली से निकलकर रामगढ़ की जो तस्वीर खींची है वह एक झरोखा है जिसे पार करके और वहां रहकर ही रामगढ़ को प्रतीत किया जा सकता है। जब आप शांति में अपनी सांस की आवाज भी सून पाते हैं तो आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि रामगढ़ में गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर शांति निकेतन का एक केंद्र खोलना चाहते थे। एक सड़क और दो मोड़ों वाले इस कस्बे में अभी शहर नहीं घुसा है और यही इसकी खासियत है। अम्बरीश कुमार सौभाग्यशाली हैं कि उनकी गिनती रामगढ़ के आधुनिक आदिवासियों में से की जा सकती है और मित्रों की एक पूरी कतार है जो उनके कृतज्ञ है कि उन्हे बसने के लिए एक बेहतर विकल्प बताया। बाकी बची कमी वे ईंट गारे से नहीं शब्दों से पूरी कर रहे हैं। उनके इस राइटर्स काटेज में मै कई बार रुका हूँ और अब आप भी एक बार यहाँ जरुर जाए । हिमालय की बर्फ से भरी चोटियाँ देखनी हो तो सितम्बर के आखिरी हफ्ते से लेकर नवम्बर तक का समय बेहतर होगा । बर्फ पर चहलकदमीकरने के लिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर फरवरी तक समय है । और फल फूल से घिरे रामगढ को देखने के लिए मई से अगस्त तक का समय ठीक रहेगा ।
राइटर्स काटेज और पास पड़ोस की कुछ फोटो अलग अलग मौसम की