Sunday, September 12, 2010

रामगढ का राइटर्स काटेज









आलोक तोमर
नैनीताल की भीड़ और झील के आसपास के बाजारों के शोर से बचना हो तो रास्ते तो कई हैं मगर असली मंजिल तक पहुंचाने वाला एक ही रास्ता है जो भुवाली और गागर होते हुए रामगढ़ पहुंचता है। रामगढ़ आज भी गांव है और कल्पना ही की जा सकती है कि एक छोटे से टीले पर हिंदी की महान कवियत्री महादेवी वर्मा ने जब यहां छोटा सा मकान बनाकर साहित्य रचने के प्रयोजन शुरु किए थे तो यहां कितना सन्नाटा रहा था। मुश्किल से पांच दुकानों के बाजार रामगढ़ में पांच सितारा होटलों को मात देने वाले होटल औऱ रिसार्ट हैं औऱ पत्रकारिता से लेकर राजनीति और अफसरशाही तक के सबसे बड़े नाम यहां आकर बस गये हैं। होने को नैनीताल भी हिल स्टेशन है मगर इससे भी लगभग सात हजार फीट उपर रामगढ़ में हवाएं जब ठंडी होती हैं तो बहुत ठंडी होती हैं। बारिश होती है तो आसपास हिमालय की प्रकृति द्वारा बनाई गयी पूरी चित्रकला भीग जाती है। कोहरा आपके घर में घुस आता है और आप भूल जाते है कि आप उसी लोक में हैं जिसे मर्त्यलोक कहा जाता है।
जब तक रामगढ़ का नाम नहीं सुना था और देश और दुनिया के बहुत सारे हिल स्टेशन देख डाले थे तब तक नहीं पता था कि पहाड़ियों की खामौश पवित्रता क्या होती है? रामगढ़ पहुंचने के ठीक पहले गागर में एक बड़ा मंदिर है और उसके ठीक उपर घुमावदार सड़क के आखिरी छोर तक जहां निगाह जाती है, हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती है। जून के महीने में पके हुए खुमानी ,आलूबुखारा ,स्ट्राबेरी और आड़ू से लदे पेड़ देखते बनते है तो जुलाई के बाद सुर्ख होते सेब । एकांत को तोड़ते हुए बीच बीच में से गुजर जाने वाले स्थानीय लोग जो अब बाहरी लोगों को कौतुक से नहीं अपनी स्वभाविक आत्मीयता से देखते हैं। आप हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के उस हिस्से में है जहां दुर्गम और सुगम के बीच का फासला मिट जाता है।
पुराने लोगों के जो घर हैं वे अब भी देहाती शैली में बने हुए हैं। सड़क पर हैं तो हवेली जैसा आकार भी देने की कोशिश की गई है। अगर पीछे हैं तो गांव के मकान हैं। वैसे भी रामगढ़ अब तक नगरपालिका भी नहीं बनी , सिर्फ ग्राम पंचायत है। घाटियों और चोटियों के बीच शानदार आशियाने भी बने हैं और इस खामोशी को प्यार करने वाले ऐसे लोग भी हैं जो शेष जीवन के लिए रिटायरमेंट से बहुत पहले आकर बस गये हैं।
खास बात ये है कि इस इलाके का महानगर कहा जाने वाला नैनीताल जहां कोई सिनेमाघर तक नहीं है और जहां दर्जनों हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है, रामगढ़ से सिर्फ पौन घंटे की दूरी पर है। होने को रामगढ़ मे अब एक डाकघर भी है, डिस्पेंसरी भी है और लगभग सभी पार्टियों से जुड़े नेताओं के रईस आशियाने भी हैं। दिल्ली के सबसे भव्य इलाके सुजान सिंह पार्क में एक विराट बंगले में रहने वाले खूबसूरत पत्रकार हिरण्यमय कार्लेकर ने भी यहां घर बना लिया है। भारतीय विदेश सेवा के सर्वोच्च अधिकारी रह चुके शशांक शेखर यहां हैं हीं।
यह कल्पना करना ही सम्मोहित और चकित करता है कि अगर रामगढ़ में महादेवी वर्मा और ज्यादा वक्त बिता पाती तो " अतीत के पता नहीं कितने और चलचित्र " हमे पढ़ने को मिलते। पता नहीं सुमित्रानंदन पंत ने यहां की यात्राओं में क्या लिखा मगर उनके साहित्यिक इतिहास में रामगढ़ का वर्णन नहीं है। रवींद्र नाथ ठाकुर के संस्मरणों में रामगढ़ का वर्णन आता है ।
अगर आप नैनीताल गये और रामगढ़ नहीं गये तो कम से कम आपके जीवन का निजी इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। इस धरती पर ऐसी जगहें कम मिलती हैं जहां गर्मी नहीं, शोर नहीं, धुआं नहीं, भीड़ नहीं, पार्किंग के झमेले नहीं और जहां तक नजर जाए वहां तक घाटियां और झरने ही झरने दिखते हैं। कई बार बाघ के बच्चे रामगढ़ में आ जाते हैं और यहां के लोग उन्हे दुलारकर वापस जंगल में छोड़ देते हैं। रामगढ़ को मसूरी या दार्जलिंग की तरह होटलों का जंगल बनाने की कोशिश चल रही है और इसके पहले इस खूबसूरत दुनिया के साथ यह हादसा हो जाय, आप भी रामगढ़ हो आइए...
अंबरीश कुमार ने अपनी खबरों वाली शैली से निकलकर रामगढ़ की जो तस्वीर खींची है वह एक झरोखा है जिसे पार करके और वहां रहकर ही रामगढ़ को प्रतीत किया जा सकता है। जब आप शांति में अपनी सांस की आवाज भी सून पाते हैं तो आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि रामगढ़ में गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर शांति निकेतन का एक केंद्र खोलना चाहते थे। एक सड़क और दो मोड़ों वाले इस कस्बे में अभी शहर नहीं घुसा है और यही इसकी खासियत है। अम्बरीश कुमार सौभाग्यशाली हैं कि उनकी गिनती रामगढ़ के आधुनिक आदिवासियों में से की जा सकती है और मित्रों की एक पूरी कतार है जो उनके कृतज्ञ है कि उन्हे बसने के लिए एक बेहतर विकल्प बताया। बाकी बची कमी वे ईंट गारे से नहीं शब्दों से पूरी कर रहे हैं। उनके इस राइटर्स काटेज में मै कई बार रुका हूँ और अब आप भी एक बार यहाँ जरुर जाए । हिमालय की बर्फ से भरी चोटियाँ देखनी हो तो सितम्बर के आखिरी हफ्ते से लेकर नवम्बर तक का समय बेहतर होगा । बर्फ पर चहलकदमीकरने के लिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर फरवरी तक समय है । और फल फूल से घिरे रामगढ को देखने के लिए मई से अगस्त तक का समय ठीक रहेगा ।
राइटर्स काटेज और पास पड़ोस की कुछ फोटो अलग अलग मौसम की

Saturday, September 11, 2010

जनसत्ता में राजसत्ता की चमक


अंजनी कुमार
एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी भी इन सारे मोर्चों पर न तो एक साथ लड़ सकती है और न ही लड़ते हुए गलतियों से बच सकती है। लेकिन गलतियों के खौफ से न तो सपने छोड़े जा सकते हैं और न ही उन्हें मारा जा सकता है। सपने देखना जरूरी है,लेकिन वह दिवास्वप्न न हो। सवाल उठाना जरूरी है,लेकिन वह खारिज करने वाला न हो। उनका जमीनी रिश्ता हो तो वह परिवेश से संवाद और खुद के भीतर एक सर्जक को जन्म देता है। अन्यथा सपने मारने की परम्परा तो चलती ही आ रही है। आप भी इसमें शामिल हैं तो यह कोई नई बात नहीं होगी। आज जरूरत सनसनीखेज खबर की नहीं,वस्तुगत सच्चाई से रू-ब-रू कराने वाली ख़बरों और इसे पेश करने वाले साहसी पत्रकारों की है।
उमा मांडी यानी सोमा मांडी के आत्मसमर्पण एवं सीपीआई (माओवादी)के नेताओं पर बलात्कार के आरोप की कहानी 24अगस्त को टाइम्स ऑफ इंडिया ने सनसनीखेज तरीके से पेश की। एक स्त्री की गरिमा और आम परम्परा तथा विशाखा निर्देशों (महिला हितों की रक्षा के लिए बना कानून)की धज्जी उड़ाते हुए इस अखबार ने उमा मांडी के फोटो और मूल नाम को भी छापा। इस घटना के लगभग दो हफ्ते बाद जनसत्ता में उसी कहानी को सच मानते हुए न केवल माओवादियों पर बल्कि लाल क्रांति पर कीचड़ उछालने वाला मृणाल वल्लरी का लेख छपा।
बीच के दो हफ़्तों में इस संदर्भ में तथ्य संबधी लेख,खबर और प्रेस रिपोर्ट भी छपकर सामने आये,लेकिन न तो लेखिका को पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों की चिंता थी और न ही 'जनसत्ता'को सच को प्रतिष्ठा प्रदान करने की। लगता है कि उनकी चिंता 'कालिमा'को सनसनीखेज तरीके से पेश करने की थी और इसके लिए माओवादी आसान पात्र थे। ठीक वैसे ही जैसे किसी भी जनपक्षधर नेतृत्व को माओवादी घोषित कर पूरे जनांदोलन को सनसनीखेज बनाकर कुचल देने के लिए पूर्व कहानी गढ़ लेना। आइए, दो हफ्ते में गुजरे कुछ तथ्यों पर नजर डालें।
द टेलीग्राफ में 29अगस्त को प्रणब मंडल के हवाले से सोमा यानी उमा मांडी के कथित आत्मसमर्पण की कहानी पर खबर छपी। इस रिपोर्ट के अनुसार उमा मांडी 20अप्रैल को कमल महतो के साथ मिदनापुर से 15किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-6पर पोरादीही में गिरफ्तार हुई थीं। कमल महतो को पुलिस ने 17अगस्त को कोर्ट में पेश कियालेकिन सोमा की गिरफ्तारी नहीं दिखाई गयी। इस रिपोर्टर के अनुसार इस बात की पुष्टि न केवल उनके रिश्तेदार, बल्कि पुलिस के एक हिस्से ने भी की।
इसी तारिख को 'यौन उत्पीड़न और राजकीय हिंसा के खिलाफ महिला मंच'ने एक प्रेस रिपोर्ट जारी कर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के खबर की तीखी आलोचना करते हुए कुछ सवाल उठाये। एक सवाल का तर्जुमा देखिये :-आत्मसमर्पण के समय उमा द्वारा दिये गये बयान को ही आधार बनाकर खबर दे दी गयी। इसे अन्य स्रोतों से परखा नहीं गया। इस खबर को बाद में भी अन्य स्रोतों के बरक्स नहीं रखा गया। ज्ञात हो कि उपरोक्त मंच में एपवा से लेकर स्त्री अधिकार संगठन और एनबीए जैसे 60संगठन और सौ से ऊपर व्यक्तिगत सदस्य हैं। 11सितम्बर के तहलका (अंग्रेजी) में बोधिसत्व मेइती की खबर के अनुसार ज्ञानेश्वरी रेल त्रासदी के आरोप में 26मई को हीरालाल महतो को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने हीरालाल को एक दूसरी पुलिस जीप में हथकड़ी के साथ बांधी गयी उमा मांडी के सामने पेश करते हुए कहा- यह तुम्हें जानती है कि तुम माओवादी सहयोगी हो। उमा मांडी को पुलिस की जीप में और साथ में पुलिस को वर्दी में देखने वाले ग्रामीणों के बयान को भी इस रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है।
31अगस्त को मानिक मंडल ने प्रेस क्लब, दिल्ली में बताया कि उमा मांडी की कहानी पुलिस द्वारा गढ़ी गयी है। उन्होंने अपने जेल अनुभव सुनाते हुए जेल में बंद पीसीपीए के कार्यकर्ताओं के उन पत्रों का हवाला दिया जिसमें उमा मांडी के पुलिस इन्फोर्मर होने की बात कही गयी है। इस पत्र के कुछ अंश तहलका ने जारी किये हैं। पूरा पत्र संहति ब्लॉग पर कुछ दिनों बाद अंग्रेजी में देखा जा सकेगा।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा यदि हम प.मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा के उमा मांडी के आत्मसमर्पण के समय के और बाद के बयानों को देखें तब भी इस मुद्दे के ढीले पेंच नजर आयेंगे। एक संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दे पर इन तथ्यों को नजरअंदाज कर लेख लिख मारने और छाप देने के पीछे न तो जल्दीबाजी का मामला दिख रहा है और न ही लापरवाही का। क्योंकि यहाँ हम इस तथ्य से भी वाकिफ हैं कि मृणाल वल्लरी लंबे समय से पत्रकारिता कर रही हैं, 'जनसत्ता' से जुड़ी हुई हैं और उन्हें युवा संभावनाशील पत्रकारों में शुमार किया जाता है। इसी तरह संपादक ओम थानवी के नेतृत्व वाली जनसत्ता की संपादकीय टीम भी ऊँचे दर्जे की पत्रकारिता के लिए स्थापित है।
राजेन्द्र यादव के शब्दों में ले-देकर यही एक अखबार है। यह अखबार भी सीपीआई माओवादी के बारे में अपनी ही पत्रकार के लेख को छापते समय पत्रकारिता की न्यूनतम नैतिकता को तक नजरअंदाज कर जाता है कि उमा मांडी उस पार्टी की सदस्य है भी या नहीं और इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध है भी है या नहीं। यह अखबार पीसीपीए और सीपीआई माओवादी के बीच के फर्क को भी नजरअंदाज कर जाता है। ठीक वैसे ही जैसे गॉधीवादी हिमांशु को माओवादी घोषित कर दिया जाता है। इसी अंदाज में मृणाल वल्लरी सीपीआई माओवादी पार्टी, माओवादी और मार्क्सवादी होने का फर्क मिटाकर मनमाना लिखने की खुली छूट हासिल कर लेती हैं। गोया पत्रकारिता न होकर सब धान बाइस पसेरी वाली दुकान हो।
ऐसा ही मनमानापन कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दिखा। पुलिस के बयान पर एक आदिवासी युवा लिंगाराम जोकि दिल्ली में पत्रकारिता कि पढाई कर रहा है, को सीपीआई माओवादी को प्रवक्ता घोषित करते हुए यह बताया गया कि वह दिल्ली में माओवादी समर्थक के यहाँ छिपा हुआ है। यदि यह अपढ़ होने तथा अधकचरेपन का परिणाम होता तो इसे दुरूस्त किया जा सकता है, लेकिन यह सचेत और सतर्कता का परिणाम है। इस मनमानेपन के पीछे पुलिस व शासन तंत्र की डोर कसकर बंधी हुई है। अन्यथा सिर्फ सरकारी बयान के संस्करण के आधार पर लाल क्रांति की चिंता का मनोजगत इस तरह खड़ा नहीं होता और न ही इस तरह की पत्रकारिता से हम रू-ब-रू होते।
मसलन,किसी आंदोलन का मूल्यांकन पार्टी संगठन,विचारधारा और कार्य अनुभव तथा हासिल के मद्देनजर करते हैं। सीपीआई माओवादी पार्टी के संगठन, विचारधारा,कार्य और हासिल के बारे में लेखों, रिपोर्टों आदि की लंबी फेहरिस्त है। ये आमतौर पर उपलब्ध हैं। ठीक इसी तरह अन्य पार्टियों,संगठनों तथा सरकारी तंत्र के कार्यों के बारे में भी तथ्य उपलब्ध हैं। मृणाल वल्लरी यह जरूर बताएं कि किस सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट में माओवादी बलात्कारी के रूप में चित्रित हैं। इसी तरह आप सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टों में सीपीएम व हरमाद वाहिनी,भाजपा,कांग्रेस तथा उनके सलवा जुडुम इत्यादि के चेहरे को भी देखें। ऑपरेशन ग्रीन हंट के कारनामों को देखें।
1967में नक्सलबाडी उभार के समय सिद्धार्थ शंकर रे ने एक तकनीक अपना रखी थी। इसमें पुलिस या आम छोटे दुकानदार को गोली मारने का काम खुफिया के आदमी किया करते थे,लेकिन परचे नक्सलियों के छोड़े जाते थे। आज छत्तीसगढ़ से लेकर मिदनापुर तक में यही कहानी चल रही है। इसमें नये तत्व शामिल हो गये हैं और नये खिलाड़ी भी शामिल हुए हैं। आपने 'लापता' महिलाओं का जिक्र करते हुए पीसीपीए के मिलिशिया पर बलात्कारी और अपहरणकर्ता होने का आरोप मढ़ा है। जिस दिन आपका लेख छपा है उसी दिन के 'जनसत्ता' में यह भी खबर है कि सीपीएम ने नंदीग्राम में 2500लोगों के बेघर होने की सूची सौपी है। आप बंगाल के प्रति चिंतित हैं और इससे निष्कर्ष निकालना चाहती हैं तो वहॉ के गैर माक्र्सवादियों से लेकर आईबी की सरकारी रिपोर्ट पर भी नजर डालें।
अब तक सीपीएम के नेतृत्व में पूरे जंगलमहल में हरमद वाहिनी ने 86 कैंप लगा रखे हैं, एकदम सलवा जुडुम की तर्ज पर। हत्या के बाद शव पर माओवादी साहित्य का जल चढ़ाने वाले हरमद वाहिनी के बलात्कार,हत्या और गायब करने के कारनामों के बारे में 'नारी इज्जत बचाओ कमेटी'के पत्र और प्रेस रिपोर्ट देखिये। पीसीपीए के डुप्लीकेट पर्चे और पोस्टर जिनका रंग मूल पीसीपीए से अलग है, के बारे में जानने के लिए एपीडीआर की रिपोर्ट को देखिए। किसी भी आन्दोलन में भटकाव हो सकता है। इन पर बात करते समय ठोस सच्चाइयों का जिक्र जरूरी है। स्रोत के बारे में न्यूनतम जॉच-पड़ताल जरूरी है।
हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका
इन संदर्भों को भूलकर आन्दोलन,नक्सलवाद व माओवाद पर पत्रकारिता करना भोलापन नहीं है। यह एक ऐसा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार है जिसके चलते आंदोलनों के प्रति संवेदनहीनता और उदासीनता का माहौल बनता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी तरह की पत्रकारिता ने हर विस्फोट को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाया जिसका फायदा फासिस्ट हिन्दूत्ववादी ताकतों ने उठाया। इसने बहुसंख्यक आबादी को मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रही और उनकी तकलीफों के प्रति संवेदनहीन बनाने में एक कारक की भूमिका अदा की।
मृणाल वल्लरी महिला आंदोलन की चुनौतियों को जिस संदर्भ में रखकर चिंता जाहिर कर रही हैं और निष्कर्ष निकाल रही हैं उसमें पुलिसिया संस्करण छोड़ कोई संदर्भ नहीं है। उनकी चिंता और तर्क महिला के प्रति उनके सरोकार के प्रकटीकरण हो सकते हैं,लेकिन महिला मुक्ति का सवाल पुलिसिया संस्करण से हल करने का उनका प्रयास उस संस्करण की व्याख्या होकर ही रह गया है।
मृणाल वल्लरी पूछती हैं कि ”मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?“जाहिरा तौर पर उनका जोर कॉमरेडों की बंदूक एवं खौफ पर है और उत्तर नकारात्मक है। वह मानकर चल रही हैं कि बंदूकें सिर्फ कॉमरेडों यानी पुरुषों के पास हैं। जो भी आन्दोलन के बारे कखग जानता होगा वह इस अज्ञानता पर हंस ही सकता है। खौफ से सपने टूटते भी हैं और खौफ पैदाकर सपने देखे भी जाते हैं। यह अपने देश में विभिन्न पार्टियॉ व उनकी सरकारें खूब करती आ रही हैं। आप जहाँ रह रही हैं वहॉ अनुभव से इसी तर्क तक ही पहुंचा जा सकता है और उसे ही आप आजमाने की कोशिश कर रही हैं।
खौफ के खिलाफ खड़े होने की भी एक तर्क प्रणाली है और उससे उपजा हुआ सपना एक तर्क और लोकरंजकता से लबरेज भी होता है। यह एक ऐसी आम सच्चाई है जिसे गीत में भी ढाला जा सकता है और विचार व सिद्धांत में बदला भी जा सकता है। इस पूरी प्रकिया में गलतियाँ भी हो सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग की लूट में कुछ अच्छाईंयां दिखती रह सकती हैं। लेकिन मूल मसला सपने का है। सामंती व्यवस्था वाले हमारे समाज में दलित, स्त्री,अल्पसंख्यक,आदिवासी और राष्ट्रियताएँ जिस उत्पीडन की शिकार हैं उससे मुक्ति का रास्ता बहुस्तरीय संघर्षों से होकर जाता है।
http://www.janjwar.com/

लाल क्रांति के सपने की कालिमा'

मृणाल वल्लरी
वे बलात्कारी हैं। यहां आते ही मैं समझ गई थी कि अब कभी वापस नहीं जा पाऊंगी।’ मुंह पर लाल गमछा लपेटे उमा एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार को बताती है। उमा कोई निरीह और बेचारी लड़की नहीं है। वह एक माओवादी है। कई मिशनों पर बुर्जुआ तंत्र के पोषक सिपाहियों और लाल क्रांति के वर्ग शत्रुओं को मौत के घाट उतारने के कारण सरकार ने उस पर इनाम भी घोषित किया। लेकिन अपने लाल दुर्ग के अंदर उमा की भी वही हालत है जो बुर्जुआ समाज में गरीब और दलित महिलाओं की।
बकौल उमा, माओवादी शिविरों में महिलाओं का दैहिक शोषण आम बात है। वह जब झारखंड के जंगलों में एक कैंप में ड्यूटी पर थी तो भाकपा (माओवादी) ‘स्टेट मिलिटरी कमीशन’ के प्रमुख ने उसके साथ बलात्कार किया। उसने उमा को धमकी दी कि वह इस बारे में किसी को न बताए। लेकिन उमा ने यह बात किशनजी के करीबी और एक बड़े माओवादी नेता को बताई। उमा के मुताबिक इस नेता की पत्नी किशनजी के साथ रहती है। लेकिन उमा की शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उसे इस मामले में चुप्पी बरतने की सलाह दी गई।
नक्सल शिविरों में यह रवैया कोई अजूबा नहीं है। कई महिला कॉमरेडों को उमा जैसे हालात से गुजरना पड़ा। अपने दैहिक शोषण के खिलाफ मुखर हुई महिला कॉमरेडों को शिविर में अलग-थलग कर दिया जाता है। यानी क्रांतिकारी पार्टी में उनका राजनीतिक कॅरिअर खत्म। कॉमरेडों की सेना में शामिल होने के लिए महिलाओं को अपना घर-परिवार छोड़ने के साथ निजता का भी मोह छोड़ना पड़ता है।
उमा बताती है कि नक्सल शिविरों में बड़े रैंक का नेता छोटे रैंक की महिला लड़ाकों का दैहिक शोषण करता है। अगर महिला गर्भवती हो जाती है तो उसके पास गर्भपात के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। क्योंकि गर्भवती कॉमरेड क्रांति के लिए एक मुसीबत होगी। यानी देह के साथ उसका अपने गर्भ पर भी अधिकार नहीं। वह चाह कर भी अपने गर्भ को फलने-फूलने नहीं दे सकती। महिला कॉमरेड का गर्भ जब नक्सल शिविरों की जिम्मेदारी नहीं तो फिर बच्चे की बात ही छोड़ दें। शायद शिविर के अंदर कोई कॉमरेड पैदा नहीं होगा! उसे शोषित बुर्जुआ समाज से ही खींच कर लाना होगा। जैसे उमा को लाया गया था। उसे अपने बीमार पिता के इलाज में मदद के एवज में माओवादी शिविर में जाना पड़ा था।
माओवादियों की विचारधारा का आधार भी कार्ल मार्क्स हैं। उमा को पार्टी की सदस्यता लेने से पहले ‘लाल किताब’ यानी कम्युनिज्म का सिद्धांत पढ़ाया गया होगा। एक क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य होने के नाते उम्मीद की जाती है कि नक्सल लड़ाकों को भी पार्टी कार्यक्रम की शिक्षा दी गई होगी। उन्हें कम्युनिस्ट शासन में परिवार और समाज की अवधारणा बताई गई होगी। यों भी, पार्टी शिक्षण क्रांतिकारी पार्टियों की कार्यशैली का अहम हिस्सा होता है और होना चाहिए।
मार्क्सवादी-माओवादी लड़ाकों के लिए ‘कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र’ बालपोथी की तरह होता है, जिसमें मार्क्स ने कहा है- ‘परिवार का उन्मूलन! कम्युनिस्टों के इस ‘कलंकपूर्ण’ प्रस्ताव से आमूल परिवर्तनवादी भी भड़क उठते हैं। मौजूदा परिवार, बुर्जुआ परिवार, किस बुनियाद पर आधारित है? पूंजी पर, अपने निजी लाभ पर। अपने पूर्णत: विकसित रूप में इस तरह का परिवार केवल बुर्जुआ वर्ग के बीच पाया जाता है। लेकिन यह स्थिति अपना संपूरक सर्वहाराओं में परिवार के वस्तुत: अभाव और खुली वेश्यावृत्ति में पाती है। अपने संपूरक के मिट जाने के साथ-साथ बुर्जुआ परिवार भी कुदरती तौर पर मिट जाएगा, और पूंजी के मिटने के साथ-साथ ये दोनों मिट जाएंगे।’
एक कम्युनिस्ट व्यवस्था का परिवार पर क्या प्रभाव पड़ेगा? एंगेल्स कहते हैं कि ‘वह स्त्री और पुरुष के बीच संबंधों को शुद्धत: निजी मामला बना देगी, जिसका केवल संबंधित व्यक्तियों से सरोकार होता है और जो समाज से किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अपेक्षा नहीं करता। वह ऐसा कर सकती है, क्योंकि वह निजी स्वामित्व का उन्मूलन कर देती है और बच्चों की शिक्षा को सामुदायिक बना देती है। और इस तरह से अब तक मौजूद विवाह की दोनों आधारशिला को निजी स्वामित्व द्वारा निर्धारित पत्नी की अपने पति पर और बच्चों की माता-पिता पर निर्भरता-को नष्ट कर देती है। पत्नियों के कम्युनिस्ट समाजीकरण के खिलाफ नैतिकता का उपदेश झाड़ने वाले कूपमंडूकों की चिल्ल-पों का यह उत्तर है। पत्नियों का समाजीकरण एक ऐसा व्यापार है जो पूरी तरह से बुर्जुआ समाज का लक्षण है और आज वेश्यावृत्ति की शक्ल में आदर्श रूप में विद्यमान है। हालांकि वेश्यावृत्ति की जड़ें तो निजी स्वामित्व में हैं, और वे उसके साथ ही ढह जाएंगी। इसलिए कम्युनिस्ट ढंग का संगठन पत्नियों के समाजीकरण की स्थापना के बजाय उसका अंत ही करेगा।’
बुर्जुआ समाज साम्यवादियों की अवधारणा पर व्यंग्य करता है और मार्क्स भी उसका जवाब व्यंग्य में देते हैं। मार्क्स के मुताबिक, बुर्जुआ समाज में औरतों का इस्तेमाल एक वस्तु की तरह होता है। निजी संपत्ति की रक्षा के लिए राज्य आया और इसी निजी संपत्ति का उत्तराधिकारी हासिल करने के लिए विवाह। विवाह जैसे बंधन के कारण स्त्री निजी संपत्ति हो गई। लेकिन उसी बुर्जुआ समाज में अपने फायदे के लिए औरतों का सार्वजनिक इस्तेमाल भी होता है। वह चाहे सामंतवादी राज्य हो या पूंजीवादी, सभी में औरत उपभोग की ही वस्तु रही। एक कॅमोडिटी।
आखिर कम्युनिस्ट शासन में परिवार कैसा होगा? इस शासन में निजी संपत्ति का नाश हो जाएगा, इसलिए संबंध भी निजी होंगे। कम्युनिस्ट शासन औरत और मर्द दोनों को निजता का अधिकार देता है। इन निजी संबंधों से पैदा बच्चों की परवरिश राज्य करेगा, इसलिए यह कोई समस्या नहीं होगी। उमा की बातों को सच मानें तो कम्युनिज्म की यह अवधारणा नक्सल शिविरों में क्यों नहीं है? क्या मुकम्मल राजनीतिक शिक्षण के बिना पार्टी में कॉमरेडों की भर्ती हो जाती है? सोच के स्तर पर वे इतने अपरिपक्व क्यों हैं कि महिला कॉमरेडों के साथ व्यवहार के मामले में बुर्जुआ समाज से अलग नहीं होते। कम से कम नक्सल शिविरों में तो आदर्श कम्युनिस्ट शासन का माहौल दिखना चाहिए! लेकिन यहां तो महिला कॉमरेड एक ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रूप में देखी जा रही है।
कहीं भी एक ही प्रकार का शोषण अपने अलग-अलग आयामों के साथ अपनी मौजूदगी सुनिश्चित कर लेता है। उमा के मुताबिक अगर किसी बड़े कॉमरेड ?े किसी महिला को ‘अपनी’ घोषित कर दिया है तो फिर वह ‘महफूज’ है। यानी उसकी निजता की सीमा उसके घोषित संबंध पर जाकर खत्म हो जाती है। अब उसके साथ एक पत्नी की तरह व्यवहार होगा। जो किसी की पत्नी नहीं, वह सभी कॉमरेडों की सामाजिक संपत्ति! जंगल के बाहर के जिस समाज को अपना वर्ग-शत्रु मान कर माओवादी आंदोलन चल रहा है, क्या वहां महिला या देह के संबंध उसी बुर्जुआ समाज की तर्ज पर संचालित हो रहे हैं, जिससे मुक्ति की कामना के साथ यह आंदोलन खड़ा हुआ है? जबकि एंगेल्स कम्युनिस्ट शासन में इस स्थिति के खात्मे की बात करते हैं। लेकिन कॉमरेडों ने शायद किसी रटंतू तरह एंगेल्स का भाषण याद किया और भूल गए।
वहीं आधुनिक बुर्जुआ समाज में महिलाओं की निजता के अधिकार की सुरक्षा के लिए कई उपाय किए गए हैं। यह दूसरी बात है कि व्यावहारिक स्तर पर ये अधिकार कुछ लड़ाकू महिलाएं ही हासिल कर पाती हैं। लेकिन इसी समाज में अब वैवाहिक संबंधों में भी बलात्कार का प्रश्न उठाया गया है। यानी विवाह जैसे सामाजिक बंधन में भी निजता का अधिकार दिया गया है। एक ब्याहता भी अपनी मर्जी के बिना बनाए गए शारीरिक संबंधों के खिलाफ अदालत में जा सकती है। कार्यस्थलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए यौन हिंसा की बाबत कई कानून बनाए गए हैं।
यहां बुर्जुआ समाज का व्यवहार जनवादी दिखता है। लेकिन गौर करने की बात यह है कि पूंजीवादी समाज में भी महिलाओं को अपने शरीर से संबंधित ये अधिकार खैरात में नहीं मिले हैं। पश्चिमी देशों में चले लंबे महिला आंदोलनों के बाद ही स्त्रियों के अधिकारों को तवज्जो दी गई। यह भी सही है कि महिला अधिकारों के कानून बनते ही सब कुछ जादुई तरीके से नहीं बदल गया। अभी इन अधिकारों के लिए समाज में ठीक से जागरूकता भी नहीं पैदा हो सकी है कि अतिरेक मान कर इन कानूनों का विरोध किया जाने लगा है। दहेज, घरेलू हिंसा या यौन शोषण के खिलाफ बने कानूनों को समाज के अस्तित्व के लिए खतरा बताया जाने लगा है। देश की अदालतों में माननीय जजों को भी इन अधिकारों के दुरुपयोग का खौफ सताने लगा है। इस चिंता में घुलने वाले चिंतक महिलाओं के शोषण का घिनौना इतिहास और वर्तमान भूल जाते हैं।
जनवादी महिला आंदोलनों ने ही भारत में स्त्री अधिकारों की लड़ाई की बुनियाद रखी और यहां जब स्त्री के हकों को कुचलने की कोशिश की जाती है तो जनवादी पार्टियां ही उनकी हिफाजत के आंदोलन की अगुआई करती हैं। लेकिन अति जनवाद का झंडा लहराते माओवादी शिविरों में महिला लड़ाकों की देह सामंतवादी रवैए का शिकार क्यों है? उमा ने यह भी बताया कि राज्य समिति का एक सचिव अक्सर गांवों में जिन घरों में शरण लेता था, वहां की महिलाओं के साथ बलात्कार करता था और इसके लिए उसे सजा भी दी गई थी। सवालों को टालने के लिए इसे एक कुदरती जरूरत मानने वालों की कमी नहीं होगी। लेकिन फिर कश्मीर, अफगानिस्तान या दुनिया के किसी भी हिस्से में सैन्य अभियानों के दौरान महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार सहित तमाम अत्याचारों के बारे में क्या राय होगी? यहां यह तर्क भी मान लेने की गुंजाइश नहीं है कि ऐसी अराजकता निचले स्तर के माओवादी कार्यकर्ताओं के बीच है जो कम प्रशिक्षित हैं। यहां तो सवाल शीर्ष स्तर के माओवादी नेताओं के व्यवहार पर है।
जंगलमहल की क्रांति का जीवन पहले भी पत्रकारों और दूसरे स्रोतों से बाहर आता रहा है। अभी तक लोग क्रांति के रूमानी पहलू से रूबरू हो रहे थे कि किस तरह कठिन हालात में बच्चे-बड़े, औरत-मर्द क्रांति की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन लाल क्रांति के अगुआ नेताओं का रवैया भी मर्दवादी-सामंती संस्कारों से मुक्त नहीं हो सका। इस बीच ताजा खबर यह है कि पश्चिम बंगाल में माओवादियों की सक्रियता वाले इलाकों में कई वैसी महिलाएं ‘लापता’ हैं जिन्होंने माओवादी दस्ते या उनके जुलूसों में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इनमें से एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता छवि महतो के मामले का खुलासा हो पाया है जिसे पीसीपीए के मिलीशिया उठा कर ले गए थे। उसके साथ पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर उसे जमीन में जिंदा गाड़ दिया गया।
क्रांति का समय तो तय नहीं किया जा सकता। लेकिन जो तस्वीरें दिख पा रही हैं, उनके मद्देनजर मार्क्सवादी-माओवादी कॉमरेडों से अभी ही यह सवाल क्यों न किया जाए कि भावी क्रांति के बाद कैसा होगा उनका आदर्श शासन? मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?


जनसत्ता

Monday, September 6, 2010

झरना ,बादल और मुक्तेश्वर का डाक बंगला







अंबरीश कुमार
' ब्लू हेवन ' मुक्तेश्वर के डाक बंगले के उस सूट का नाम है जिसमे मै ठहरा हुआ हूँ .बगल के दूसरे सूट ' पर्पल मूड' में पत्रकार आशुतोष और ' पिंक मेमोरीस' में लेखक - पत्रकार सागर है .यह मुक्तेश्वर का अंग्रेजों के ज़माने का डाक बंगला है जिसमे कल अँधेरा घिरने के बाद हम सब पहुंचे तो ठंड बढ़ चुकी थी और धुंध के चलते के चलते ज्यादा दूर तक कुछ भी दिखाई नही दे रहा था .दिन भर पहाड़ी रास्तों पर फूट पड़े झरनों की फोटो खींचते रहे .झरने भी ऐसे की देखते रह जाए .पहाड़ के ऊपर जंगलों से लिपटती मानो कोई बरसाती नदी पूरे वेग से नीचे आ रही हो .हर मोड़ के बाद झरने का पानी नज़र आ रहा था .नैनीताल से मुक्तेश्वर की यह पहली यात्रा थी जिसमे जगह जगह बहते झरनों का दीदार हुआ .इससे पहले शिलांग से चेरापूंजी जाते समय जो झरने देखे थे उनकी याद ताजा हो गई . पूरा पहाड़ नहाया और भीगा हुआ .मौसम इस तेजी से बदल रहा था कि कभी धूप तो कभी धुंध .यह डाक बंगला जहाँ पर है वहां से बीस हजार फुट पर स्थित नंदा गुंती से लेकर त्रिशूल , नंदा देवी और नंदा कोट जैसी चोटियाँ दिखाई पड़ती है .यह जगह समुंद्र तट से साढ़े सात हजार फुट की उंचाई पर है यह भूल जाए तो डाक बंगले में एक शिला लेख याद दिला देता है .
सुबह कमरे के सामने की खिड़की का पर्दा खोला तो धुंध से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था .आशुतोष कमरे में आए तो खिड़की भी खोल दी .फिर बाहर से बादल भाप की तरह भीतर आने लगा .कमरे में बिजली की केतली में चाय का पानी खौल रहा था और भाप उड़ रही थी .बाहर और भीतर की भाप में कोई फर्क नहीं था .तभी लैपटाप में मेल चेक करने बैठा तो इंदु पुरी का कमेन्ट मिला जो मानसून की पोस्ट पर था .अंत में उन्होंने शाल की जगह साल लिखने की तरफ ध्यान खीचा . मै गूगल से मंगल में एक ऊँगली से कम्पोज करता हूँ जिससे कई बार गलती छूट जाती है इसे माफ़ कर देना चाहिए . मुक्तेश्वर के इस डाक बंगला के पीछे ही उतरांचल सरकार का पर्यटक आवास गृह है जिसमे रात में खाना खाने का मन था पर उनके यहाँ सैलानियों की भीड़ के चलते मैनेजर ने मन कर दिया .फिर डाक बंगले के चौकीदार से पूछा तो उसने कहा सामान लेने दूर जाना पड़ेगा और बरसात के साथ अँधेरा भी गहरा हो गया था .मुक्तेश्वर में आईवीआरआई परिसर में कोई बाजार नहीं है सिर्फ देवदार ,ओक और बलूत आदि के घने जंगल में ब्रिटिश कालीन पुराने बंगले जरुर नज़र आते है .अंत में ड्राइवर अरविन्द को साथ भेज कर रात के खाने का इंतजाम किया गया .इससे पहले रामगढ के अपने राइटर्स काटेज से शाम पांच बजे चले तो डर लग रहा था कही तेज बरसात से रास्ता न बंद हो जाए. एक दिन पहले ही रामगढ के घर का नाम राइटर्स काटेज रखने की दावत देर रात चली थी . कमरे के सामने का देवदार का दरख़्त जब बरसाती हवाओ से लहराने लगा तो मित्र लोग ग्लास के साथ बाहर ही सेब के पेड़ के नीचे बैठ गए .
बरसात ज्यादा तेज नही थी .कुछ देर बैठे तो रहा नहीं गया और छाता मंगवा लिया .इसी बीच केरल काडर के वरिष्ठ आईऐएस अधिकारी और साहित्यकार यूकेएस चौहान से फोन पर बात हुई तो उन्होंने भी राईटर्स काटेज में आकर लिखने की इच्छा जताई .चौहान साहब से विश्विद्यालय के ज़माने से सम्बन्ध है और जब वे उत्तर प्रदेश में सूचना निदेशक और पर्यटन विभाग के एमडी थे तो उतरांचल घुमाया था .उससे पहले कालीकट के कलेक्टर के रूप में बड़ा सांस्कृतिक आयोजन किया और केरल का खुबसूरत इलाका भी उनका आतिथ्य ग्रहण करने की वजह से देखने को मिला . अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्री ,नृत्यांगना सोनल मानसिंह और नौशाद भी साथ ठहरे थे और इन लोगों से काफी चर्चा भी हुई . ऐसे में उनसे बात कर अच्छा लगा .
रात के दस बज चुके थे और खुले में मधुशाला का माहौल ज्यादा देर तक नहीं चल पाया . बूंदे भारी होने लगी तो भीतर जाना पड़ा .इस बीच खाना बनाने का काम भी शरू हो गया .आशुतोष अच्छे खानसामा भी है यह उनके बनाए अफगानी चिकन टिक्का से पता चला . भवाली से चलते समय देसी मुर्गे दिखे तो सुझाव आया कि यही से ले लिया जाए पर तय हुआ की रामगढ से लिया जाएगा . पर रामगढ़ से डाक बंगला रोड के मोड़ पर मुर्गे के दडबे जब खली नज़र आये तो दूकान वाले से पूछा गया .जवाब मिला आज गाड़ी नहीं आई इसलिए कुछ नहीं मिल पाएगा .फिर भवाली से आ रहे एक सज्जन को कहा गया तो वे चिकन लेकर पहुंचे .जिसे मैरिनेट करने के बाद हम लोग कुछ लोगों से मिलने चले गए और साथ आए एक लेखक अपनी पुस्तक का एक अध्याय लिखने में व्यस्त हो गए .राइटर्स काटेज के शांत माहौल में लिखने पढने का अलग सुख है . जल्द ही लन्दन से एक मोहतरमा यहाँ लिखने पढने के लिए आने का कार्यक्रम बना रही है है . अब सुझाव दिया गया है कि राइटर्स काटेज का उपरी हिस्सा कायाकल्प कर उन लेखकों को भी मुहैया कराया जाए जो दौडभाग की आपा धापी में दस बीस दिन एकांत में लिखना पढ़ना चाहते हो .मकसद व्यावसायिक न होकर अपने व्यापक दायरे के लिखने पढने वालों को प्रोत्साहन देना ज्यादा है .रखरखाव के लिए प्रतीकात्मक सहयोग जरुर लिया जाएगा .इसी वजह से दो तीन मित्र साथ आए और तक्नीकी विशेषज्ञों से बात कर इसे नया रूप दिया जाए . यह काम बरसात के बाद ही हो पाएगा . बगीचा और पूरे परिसर की लैंडस्केपिंग भी नए ढंग से की जाएगी . साथ आए लोगों को आडू ,प्लम ,बादाम और खुमानी के पेड़ों पर कोई फल नहीं मिला . इनका सीजन पहले ही ख़त्म हो जाता है . सेब की देर वाली प्रजाति के खुछ फल जरुर बचे थे .
रामगढ से लेकर मुक्तेश्वर तक के रास्ते में कही कही सेब मिले तो बगीचे वालों ने उसकी पूरी कीमत भी वसूली .पेड़ से तोड़ कर सेब खाने की कीमत मात्र सौ रुपए किलो थी सो जाते मौसम के सेब का भी स्वाद लिया गया . एक जोड़ा जो दिन में सिड़ार लाज में खाना खाते मिला था वह भी पहुँच गया .साथ आए पत्रकारों ने उन मोहतरमा को भी काफी आग्रह के साथ सेब खिलाया. उन लोगों ने भी सेब के पेड़ के इधर उधर होकर फोटो भी खिंचवाई . पर पिछले महीने जिस तरह सुर्ख सेब दिखे थे वह नज़र नहीं आए . सतबूंगा की पहाड़ी पर एक शोध संस्थान बनने जा रहा है जिसकी लोकेशन भी देखनी थी .करीब पौन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद यहाँ पहुंचे तो नजारा देखने वाला था .जो जगह चुनी गई है उसके दोनों तरफ घाटियाँ है.बांज के पेड़ से घिरी इस पथरीली पहाड़ी के अंतिम छोर पर झरना है तो सामने हिमालय की तीन सौ फुट लंबी हिमालय की
सृंखला . सामने अगर हिमालय दिखेगा तो पीछे की तरफ जंगल से घिरी घाटी का विहंगम दृश्य .रास्ते में घोड़े दिखे जो संभवतः सड़क तक आने जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते होंगे .
अगल बगल खेतों में पत्ता गोभी आकर ले चुकी थी और राजमा की लतर चार पांच फुट तक चढ़ चुकी थी .कही कही मक्का भी तैयार होता नज़र आ रहा था .कई साल के संकट के बाद पहाड़ पर मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान है .हर पहाड़ भीगा हुआ , चट्टानों से रिसता पानी ,पेड़ों की पत्तियों से टपकता पानी और दुसरे या तीसरे मोड़ पर झरनों की अलग अलग ढंग की गूंजती आवाज .यह आवाज घने जंगलों में संगीत में भी बदल जाती है .झरने भी अलग अलग आकार और उंचाई के .किसी का एक छोर दिख जाता तो ज्यादातर जंगल से निकलते और सड़क पर करते हुए आगे चले जाते .झरनों की आवाज रात में दूर तक गूंजती है . पानी के जो श्रोत गर्मियों में सूख गए थे वे सभी रिचार्ज हो गए है .इससे लगता इस बार गर्मियों में पानी का वैसा संकट नहीं होगा जैसा पिछले कुछ सालों
में हुआ था . जा

Tuesday, August 31, 2010

बादल फटा नहीं तो बच्चे मरे कैसे


शमशेर सिंह बिष्ट
बागेश्वर। उतराखंड के बागेश्वर जनपद के कपकोट तहसील में सौंग-समुगढ़, सरयू व रेवती नदियों के घाटियों में 18 अगस्त को जो तबाही मची जिसमें सुमगढ़ में स्थित सरस्वती शिशु मन्दिर के 18 बच्चे जिंदा दफन हो गये पूरे देश में मीडियाने यह प्रचारित किया की बादल फटने से यह हादसा हुआ आज बिल्कुल झूठा साबित हो गया है।
मारे गये बच्चों के अभिभावकों ने जिलाधिकारी बागेश्वर को ज्ञापन दिया है, कि इस हादसे की पूरी मजिस्ट्रेटी जॉच की जाए । हादसे में मारी गई खूशबु के दादा जगदीश चन्द्र जोशी ने कहा है कि 18 अगस्त की सुबह इस स्कूल के 140 बच्चों में से सिर्फ 39 बच्चे ही आये थे। बच्चों ने जब कक्षा में पानी आने की शिकायत अपने आचार्यों (अध्यापकों) से की तो आचार्यों ने बच्चों को डांट दिया तथा बाहर से कक्षायें बंद कर दी अन्दर से बच्चें कक्षाओं में ही थे ।लगभग 100 मीटर दूरी पर सरयू नदी जर्बदस्त उफान मे थी। अध्यापकों को यह डर भी हो रहा था कि नदी में बने पुल से ही बच्चों को आना जाना था। कोई बच्चा नदी में हादसे का शिकार न हो जाए । इसीलिये अध्यापकों ने बच्चों को कक्षा में बंद कर दिया। इसी समय समुगढ़ के ठीक सामने वाले पहाड़ में जिसमें सिलिंग उडियार सप्तकुंड बसे है जर्बदस्त धमाके की आवाज हुई। सारे अध्यापक दूसरी तरफ क्या हुआ यह देखने में लग गये, क्योंकि उस तरफ इतना जर्बदस्त नाला आ गया, जिसने खड़क सिंह के पूरे मकान व दुकानों को ही नष्ट नहीं कर दिया, वरन वहॉं खड़ी, कार, आदि वाहनों को अपनी चपेट में ले लिया। इस तरफ जान माल को कोई नुकसान इसलिये नहीं हुआ क्योंकि सभी लोग पहले से ही सर्तक हो गये थे। इसीलिये दयाल सिंह दियारकोटी जिसकी सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान सहित चार दुकाने पूरी नष्ट हो गई, इनका कहना है, की लगभग छह लाख की हानि हुई है, फिर भी कहीं चोट तक नहीं आई। जिस समय सरस्वती शिशु मन्दिर के अध्यापक सिलिंग उडियारी तप्तकुड की तबाही का नजारा देख रहे थे। उसी समय उनके स्कूल क ऊपर भूस्खलन होने से स्कूल की कमजोर दीवार को तोड़कर मलवा कक्षाओं में भर गया तथा 18 बच्चे दबकर मर गये, ये बच्चे सभी 7,8 वर्ष से कम उम्र के थे, इस सुमगढ़ गॉव में इस स्कूल के अलावा कोई हानी नहीं हुई। यह स्कूल अवश्य नदी के समीप है, जबकी गॉव की आबादी नदी से दूर है। अध्यापको के लिये नदी के पार, सिलिंग उडियार तप्तकुड समीप पढ़ता है। लेकिन सरयू नदी के तेज उफान के कारण पुल का एक हिस्सा टूट गया था जिस कारण मदद देर से मिली। यह बात सच है यह क्षेत्र भूकंप के सबसे खतरनाक पाचवें जोन में बसा है, इसी स्कूल के कुछ दूरी पर उत्तर भारत हाइड्रों पावर कारपोरेशन द्वारा पहाड़ को खोदकर सुरंग भी बनाई जा रही है। इसलिये यह कहना गलत नहीं होगा की पहाड़ को खोदकर जो सुरंग बनाई जा रही है, उसका प्रभाव भी स्कूल के उपर आए भूस्खलन का कारण हो सकता है। स्कूल की लापरवाही तो मुख्य कारण है ही। सरस्वती शीशु मन्दिर का यह स्कूल था, इसलिये इस स्कूल की दीवार सिर्फ सिंगल ईट पर खडी होना निर्माण कार्य को घटिया साबित करना तो है ही ।
इस सरयू घाटी के लगभग 10 किमी0 क्षेत्र के अन्तर्गत पहाड़ो को छेदकर तीन बड़ी-बड़ी सुरंगे बनाई जा रही हैं। देश के जाने माने वैज्ञानिक क डा. खड़क सिंह वल्दिया इस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित कर चुके है। लेकिन उत्तराखंड व भारत सरकार इस क्षेत्र के प्रति संवेदनशील नही है। जिसके कारण, उत्तराखंड के पहाड़ खतरनाक बनते जा रहे हैं। उत्तर भारत हाइड्रों पावर कारपोरेशन का कार्य इस क्षेत्र में तीन चरणें में होना है, द्वितीय व तृतीय चरण में तो कार्य चल रहा है, परन्तु प्रथम चरण का कार्य जनता के प्रतिरोध के कारण आरम्भ नहीं हो पाया है। सरयू हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व मे यह आन्दोलन नौ माह तक चला। कई प्रलोभनों, दमन के बाद भी यह आन्दोंलन टूट नहीं पाया। सरकार व कंपनी मिलकर भी विद्युत परियोजना का प्रथम चरण का कार्य आरम्भ नहीं कर पाये। पूर्व मुख्यमंत्री इसी क्षेत्र से विधानसभा सदस्य रहे हैं उन्होने इस आन्दोलन को तोड़ने का पूरा प्रयास किया। वे हमेशा कंपनी के पक्ष में खड़े रहे उनके लिए बिजली परियोजना का बनना ही विकास का मापदण्ड है, चाहे पहाड़ पूरे नष्ट हो जाए । इस क्षेत्र में हर वर्षा में जर्बदस्त तबाही होती है। इसी क्षेत्र सुडिंग में सन् 1957 में, मई 1991 में कमी में, सन् 1983-84 में रिखोड़ी-मोनांर तथा 2004 में पुनः सुड़िग में भारी जन धन की हानी हुई थी। लेकिन इन सबको भूलकर जनता के विरोध के बावजूद बॉध बनाने में सरकार अड़ी है। इसका पुरजोर समर्थन स्थानीय जन प्रतिनीधि भी करते है, क्योंकि चुनाव के लिये चन्दा इन्ही से मिलता है।
इस समय स्थानीय विधायक शेर सिंह गड़िया भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल अन्य नेता बिना पूछे ही यह कह रहे है कि इस हादसे में विद्युत परियोजना की कोई गलती नहीं हैं इनसे जब यह पूछा गया की सुमागढ़ में तो बादल फटा ही नहीं, 18 बच्चे कैसे मारे गये थें, तो बस इतना ही कहते हैं की कंपनी की गलती नहीं है।
सौंग बांध विरोधी नेता मोहन सिंह ताकुली कहते है की सुमगढ़ की घटना सुरंग बनाने से हुई। सौंग का क्षेत्र इसलिये बच गया, क्योंकि यहॉ हमने सुरंग बनने हीं नहीं दी आन्दोलन के ही एक नेता खड़क सिंद कुमल्टा कहते है की अब लोग समझ रहे हैं बॉध बनाना कितना खतरनाक है। 18 बच्चों के लिये देश की संसद ने श्रद्वान्जली अर्पित की लेकिन संसद को यह भी समझना होगा की कथित विकास व भ्रष्टाचार भी इन बच्चों की जान लेने में सहायक रहे है, प्राकृतिक नहीं, मानवी कृत्य इनके लिए अधिक घातक साबित हुआ है, लेकन दुखः यह है इनकी मौत का कउरण बादल फटना मान लिया गया। जबकि इनके स्कूल के ऊपर बादल फटा ही नही मंत्रियों के समझदारी का यह हाल है प्रभारी मंत्री व उत्तराखण्ड सरकार में राजस्व व आपूर्ति मंत्री दिवाकर भट्ट ने कहा है कि लोहारी नागपाल जल विद्युत परियोजना का जो विरोध कर रहे हैं वे सब सीआईए के एजेन्ट है। मंत्री जी को शायद यह मालूम नही कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री निशंक ने ही केन्द्र सरकार से लोहारी नागपाल परियोजना बंद करने की मांग की थी।
इस समय कपकोट के विधायक शेर सिंह गड़िया ने सरकार को प्रस्ताव भेजा है कि एक अरब की हानि हुई है, तत्काल राहत देकर निर्माण कार्य कराया जाए । पहाड़ में आई विपदा ने ठेकेदारों व अधिकारियों की मौज कर दी है। अधिकांश ठेकेदार दलों के ही नेता हैं इसलिये जनता के नाम से लूटने का मौका मिल गया। इस क्षेत्र में भ्रमण करने के बाद यह मालूम हुआ कि रिखाड़ी की गंगा देवी को 10 किलों आटा, 5 किलो चावल, 6 मुठ्ठी दाल व एक चाय की पुड़िया के अलावा कुछ नही मिला। खड़क सिंह व जसमल सिंह का पूरा कारोबार समाप्त हो गया है। सुरंग के ऊपर का गॉव कफलानी में लोग इतने डरे है कि लोग रात में स्कूल में जाकर सोते है। सूमागढ़ का सभापति हरिचन्द्र सत्तारूढ़ दल का नेता है, पिता कानूनगो है। सरकारी सहायता इनसे आगे बढ़ नही पा रही है। विचला, मल्ला दानपुर क्षेत्र में जर्बदस्त हानी हुई है। लेकिन नेता, मंत्री दौरा कर कच्ची सुविधायें की घोषणा कर रहे है लेकिन नीति में बदलाव की बात नहीं कर रहे है। इसलिये हादसे होते रहेगें, नेता आते रहेगें, लोग मरते रहेगे, लाशों के नाम से ठेके लेते रहेगें।

Friday, August 27, 2010

राष्ट्रपति की दरवाजे पर भी दस्तक

कृष्णमोहन सिंह
नईदिल्ली। अनीता भारती, विमल थोराट और अंजलि सिन्हा की अगुवाईवाली एक महिला प्रतिनिधि मंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल से मुलाकात करके ,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ,वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय को बर्खास्त करने की मांग की। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इस विश्वविद्यालय की विजिटर हैं और उनके पति देवी सिंह पाटिल को विभूति नारायण राय ने किसी तरह से पटा लिया है। राष्ट्रपति ने प्रतिनिधिमंडल की बातें बहुत ही ध्यानपूर्वक और धैर्य के साथ सुनी। महिलाओं ने उनको बताया कि कुलपति वी.एन राय ने लेखिकाओं को छिनाल कहा है। सबूत के तौर पर संबधित दस्तावेज और विभिन्न अखवारों, पत्रिकाओँ और ब्लाग में छपे लेख और प्रतिक्रियाए भी दिखाया । ऐसे बयान देने तथा विश्विद्यालय में अपनी जाति के नकलची अध्यापकों को नियुक्त व प्रमोट करने वाले, चहेतों की मनमानी नियुक्तियां करने, चाटुकारों-चहेतों को मनमानी प्रोजेक्ट बांटने,ठेका देने ,जगह-जगह सेमिनार कराने के नाम पर अपने चहेतो को घुमाने वाले , चहेतों को पहले से तय कर सेंटर खोलने का चक्कर चलाने वाले विभूति नारायण राय को कुलपति पद पर बने रहना शर्मनाक बताया। मंडल ने वर्धा विश्वविधालय में दलित छात्र- छत्राओं , व शिक्षकों के साथ लगातार की जा रही जातीय उत्पीडन की खबरों का खुलासा करते हुए राष्ट्रपति महोदया को प्रोफेसर कारूण्यकारा को 6 दिसम्बर (दलित डिग्निटी डे) को डा. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के कैडल मार्च में शामिल होने पर कारण बताओ नोटिस दिए जाने का ज्रिक करते हुए कहा कि आज तक किसी भी भारतीय नागरिक को 2 अक्टूबर, 30 जनवरी या फिर किसी भी ऐतिहासिक दिवस पर शमिल होने के लिए कारण बताओ नोटिस नहीं मिला तो किसी प्रोफेसर को मात्र 6 दिसम्बर को विद्यार्थियों द्वारा आयोजित सभा में शमिल होने के लिए कैसे एक कुलपति. कारण बताओ नोटिस दे सकता है। जबति कारूण्यकारा उसी विश्वविद्यालय के 'अम्बेडकर चेयर के अध्यक्ष भी हैं, कायदे से इस कार्यक्रम में शमिल होना उनका फर्ज बनता है। महिला प्रतिनिधिओं ने राहुल काबंले के केस की भी चर्चा करते हुए राहुल कांबले द्वारा राष्ट्रपति को भेजा गया 'इच्छामृत्यु की अनुमति' वाला पत्र भी दिखाया । राष्ट्रपति को पूर्व मंत्री व सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह द्वारा लोकसभा में कुलपति द्वारा की गई टिप्पणी के संदर्भ में उठाए गए सवाल का दस्तावेज भी दिखाया । वर्धा विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति के पुलिसिये हथकंडे और दमनकारी नितियों के बारे में भी बताया। लगभग 17 मिनट की बातचीत में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने ने पूरी बाते बडे मनोयोग से सुनी और संज्ञान लेने का आश्वासन दिया। प्रतिनिधि मंडल ने सभी अखबारों में वीएन राय की महिला संबंधी टिप्पणी के विरोध में लेख, प्रतिक्रियाएं विश्वविधालय में पदों से सम्बन्धित बरती जा रही नियमों की अनदेखी, घपले बाजी, और दलितों के जातीय उत्पीड़न सम्बन्धी दस्तावेज (लगभग 170-180 पेज) राष्ट्रपति महोदया को सौंपे। राष्ट्रपति ने उन सभी दस्तावेज को सम्बन्धित मंत्रालय में भेजवाने और उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया ।

Sunday, August 22, 2010

खामोश हो गई आंदोलनों की आवाज ,नही रहे गिरदा’


उत्तराखंड के क्रांतिकारी जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिरदा’ नही रहे। नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के इस जनकवि का पूरा जीवन संघर्ष भरा रहा। उतराखंड आंदोलनों को क्रांतिकारी आवाज देने वाली यह आवाज आज खामोश हो गई । ' आज हिमाल तुमुं कै धत्युं छः जागो जागो ओ मेरे लाल , गीत की यह पंक्तिया महाप्रयाण से पहले गिरदा ने अंतिम बार गुनगुनाई थी ।
रविवार की सुबह हल्द्वानी में गिरदा का निधन हो गया। वे 68 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और एक पुत्र है। गिरदा ने हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में रविवार की सुबह करीब सवा ग्यारह बजे अंतिम सांस ली। वे पेट का अल्सर फटने के बाद पिछले 20 अगस्त को अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनका 21 अगस्त को आपरेशन किया गया मगर आंत फटने के बाद हुए संक्रमण के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी अंत्येष्टि सोमवार की सुबह नैनीताल में होगी।
‘गिरदा’ के नाम से मशहूर गिरीश तिवाड़ी के गीतों ने चिपको आंदोलन से लेकर, नशा नहीं रोजगार दो, अगल राज्य के आंदोलन और नदी बचाओ आंदोलन सहित राज्य के चार बड़े जनांदोलनों में अलख जगाई। हुड़के की थाप पर ‘आज हिमालय तुमूकैं धत्यूं छौ, जागो-जागो ओ मेरा लाल’ और ‘ओ जैंता एक दिन तो आलो उदिन यौ दुनि में’ जैसे जनगीत गाते हुए गिरदा ने खुद भी जनांदोलनों में शिरकत की। उनके गीतों की तरह उनकी आवाज में भी गजब का जादू था। शेखर पाठक के साथ मिल कर लिखी गई उनकी एक पुस्तक ‘शिखरों के स्वर’ कुमाऊं विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल है। इसके अलावा ‘उत्तराखंड काव्य’ नाम की एक अन्य पुस्तक में उनके गीत संग्रहीत हैं।
उनके निधन पर शोक जताते हुए ‘पहाड़’ के संपादक प्रोफ़ेसर शेखर पाठक ने कहा कि वे सबके लिए बोलने वाले, पूरी मनुष्यता के लिए चिंता करने वाले और पूरी दुनिया के लिए सोचने वाले कलाकार थे, जो अब चले गए। प्रो. पाठक ने बताया कि इधर गिरदा के तीन संग्रहों के एक साथ प्रकाशन की तैयारी चल रही थी, जिनमें एक उनके कुमाऊंनी गीतों का, एक हिंदी गीतों का संकलन और एक अन्य पुस्तक उनके तीन नाटकों का संग्रह है। उन्होंने कहा कि इन तीनों पुस्तकों को हम शीघ्र प्रकाशित करेंगे। पत्रकार नवीन जोशी ने उन्हें पंद्रह दिन पहले ही लखनऊ के मेडिकल कालेज में दिखवा कर नैनीताल भेजा था । तब गिरदा ने कहा था वे ठीक है । आज नविन जोशी नैनीताल में उन्हें अंतिम विदाई दे रहे थे। लखनऊ में एक गिरदा के निधन पर एक शोक सभा कर उन्हें श्रधांजलि दी गई ।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन शाह ने कहा कि गिरदा सिर्फ कवि, गायक या रंगकर्मी नहीं थे, वे ऐसे बिरले बुद्धिजीवियों में से थे जो गोली खाने को भी तैयार रहता हो। गिरदा सचमुच लोगों के दिलों में राज करते थे। उत्तराखंड लोक वाहिनी के अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि उनके गीतों ने हर जनांदोलन में उत्प्रेरक का काम किया। वे आज हमेशा के लिए सो गए पर उनके गीत हमें इसी तरह आगे भी उठ खड़े होने की ताकत देते रहेंगे। दिल्ली में पर्वतीय कला केंद्र ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। पर्वतीय कला केंद्र के महासचिव चंद्रमोहन पपनै ने कहा कि गिरदा बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनके गीत हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो हमें हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे और जगाते रहेंगे।