लखनऊ , दिसंबर । मायावती सरकार के होम्योपैथिक चिकित्सा और धर्मार्थ कार्य राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी जिन्हें मुर्दों पर टैक्स वसूलने के चक्कर में लोकायुक्त के यहाँ पेश होना पड़ा था वे आज अपनी बात से मुकर गए । राजेश त्रिपाठी ने आज गोरखपुर में कहा - मैंने लोकायुक्त से कोई माफ़ी नहीं मांगी । मै तो सिर्फ अपना पक्ष रखने गया था । इस मामले में मै इस्तीफा भी नहीं देने वाला हूँ । राजेश त्रिपाठी ने आगे कहा - बहन जी का निर्देश है की मुझे २०१२ का विधान सभा चुनाव लड़ना है । यही वजह है की विरोधी मुझे फंसा रहे है । दूसरी तरफ राजेश त्रिपाठी के खिलाफ लोकायुक्त को जो शिकायत की गई है उसमे आरोप लगाया गया कि वे मुर्दों के दाह संस्कार के लिए टैक्स वसूलते है । जो प्रति मुर्दे के हिसाब से सौ से डेढ़ सौ रुपए के बीच होती है । समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि मायावती सरकार में वसूली का दायरा शराब से लेकर शमशान तक फ़ैल चुका है ।
धर्मार्थ कार्य मंत्री राजेश त्रिपाठी के खिलाफ गोरखपुर के विजय कुमार शुक्ल ने करीब एक साल पहले लोकायुक्त के यहाँ शिकायत दर्ज कराई थी कि बड़हलगंज में नारकोटिक्स विभाग की जमीन पर कब्ज़ा करने वाले मंत्री राजेश त्रिपाठी शमशान घाट में मुर्दों के पंजीकरण का टैक्स वसूलते है । इसी शिकायत के आधार पर लोकायुक्त जस्टिस एनके मल्होत्रा ने मंत्री राजेश त्रिपाठी को बुधवार को तलब किया था । जानकारी के मुताबिक मल्होत्रा ने यह सवाल किया कि वे किस तरह मुर्दों के पंजीकरण का शुल्क लेते है । इस पर त्रिपाठी ने सफाई दी कि यह धनराशि लोग स्वेच्छा से देते है वसूला नही जाता है । मंत्री राजेश त्रिपाठी बड़हलगंज शमशान घाट मुक्ति पथ सेवा संस्थान के अध्यक्ष भी है । त्रिपाठी ने लोकायुक्त के सामने गलती स्वीकार की और इस संस्थान के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की बात कही । पर आज गोरखपुर पहुँचते ही वे पलट गए ।
राजेश त्रिपाठी ने गोरखपुर में कहा कि इस्तीफा देने का सवाल ही नही पैदा होता है । किसी भी पद से इस्तीफा नही देने वाला हूँ । त्रिपाठी ने यह भी कहा कि जब वे लोकायुक्त क सामने पेश हुए तो वहा कोई और नही था फिर इतनी बातें मीडिया में कैसे आ गई । मैंने न तो कोई गलती मानी और न ही माफ़ी मांगी है । यह संब मुझे बदनाम करने की साजिश है । राजेश त्रिपाठी ने कहा - इस मामले में मै अपनी जनता और नेता मायावती से बात कर ही कोई फैसला करूँगा । हालाँकि लोकायुक्त के सामने त्रिपाठी ने फ़ौरन इस्तीफे की पेशकश की थी । मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त को जो शिकायत की गई है उसमे अवैध कब्ज़ा कर शमशान घाट, दूकान और होटल बनवाने का आरोप है । इसक आलावा कछुवों की तस्करी म शामिल होने का भी आरोप है । समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - मायावती सरकार में वसूली का दायरा शराब से लेकर शमशान तक फ़ैल चुका है । इस घटना से साफ़ है कि इस सरकार के मंत्री कैसे कैसे पैसा वसूल रहे है । दूसरी तरफ भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा - सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ शिकायते आ चुकी है । लोकायुक्त के यहाँ जब ऎसी शिकायतों का ढेर लग जाए तो बिगड़ते हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है ।
मायावती सरकार के दर्जन भर से ज्यादा मंत्री किसी न किसी मामले में फंसे हुए है । पर यह मामला अलग किस्म का है जिसमे मंत्री पर शमशान घाट में वसूली का आरोप लगा है । मंत्री भले ही यह दावा करे कि लोग स्वेच्छा से अंतिम संस्कार के लिए दान देते है पर यह किसी के गले आसानी से उतरने वाला नही है । सरकार के कई मंत्री पहले भी अलग अलग विवादों के चलते सरकार को सांसत में डाल चुके है अब यह नया विवाद भी टूल पकड़ सकता है ।
Thursday, December 16, 2010
Monday, December 13, 2010
तीस साल बाद

अंबरीश कुमार
चार पांच दिन पहले की बात है दफ्तर में बैठा था तभी एक मोहतरमा की आवाज आई जो फाइनेंशियल एक्सप्रेस की पत्रकार दीपा से पूछ रही थी , अंबरीश जी कहा बैठते है । खबर बनाते हुए मेरा ध्यान उधर गया और फिर कोफ़्त हुई कि रिसेप्शन से बिना बात किए क्यों किसी को मेरे पास भेज दिया गया । खबर बनाने का समय अमूमन शाम छह बजे से सात बजे तक होता है और उस बीच न तो कोई फोन अटेंड करता हूँ और न ही किसी को मिलने के लिए भेजा जाता है क्योकि ध्यान टूटने पर खबर का तारतम्य बिगड़ जाता है ।इस बात को ज्यादातर परिचित लोग जानते है और वे इसका ध्यान भी रखते है । ऐसे में सिर्फ अनजान लोग ही कई बार आ जाते है । वे मोहतरमा आई और एक प्रेस रिलीज देते हुए बोली - मै अपर्णा गुप्ता हूँ । मैंने कहा , यह रिलीज नीचे ही दे देती । पर मैंने ध्यान दिया तो वह रिलीज किसी कवियित्री की याद में हुई सभा की थी जिसमे एक जगह मशहूर कवियित्री अपर्णा गुप्ता भी लिखा था । मैंने पूछा -क्या आप ही मशहूर कवयित्री अपर्णा गुप्ता है , इस पर वे कुछ झिझक कर बोली -मेरी कुछ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है । साहित्य से अपना कोई ख़ास रिश्ता नही रहा है और जनसत्ता में अब साहित्य का मामला काफी संवेदनशील भी माना जाता है। सुना है काफी खेमेबाजी है पर न तो इस क्षेत्र में कोई ज्ञान है और न दखल । साहित्यकार के रूप में मेरा परिचय सिर्फ मंगलेश डबराल से रहा और वे भी काफी नाराज रहते थे । मंगलेश डबराल जब तक थे तब तक अपने साथी अजित अंजुम सवाल उठाते थे - आपके यहाँ जोशी , डबराल ,उनियाल ,डंगवाल और बडथ्वाल जैसे लोग ही क्यों छापते है । पर अब कोई सवाल नही उठाता । खैर अचानक मेरा ध्यान रिलीज के अंत में गया जिसमे उस सभा में शामिल होने वालों का नाम था और उसमे अजय मेहरोत्रा से लेकर जौहर तक का नाम नजर आया । अजय पचपन के मित्र और सहपाठी रहे है । एक ज़माने में केन्द्रीय संचार मंत्री वीर बहादुर सिंह के ओएसडी थे और बाद में गृह राज्य मंत्री के ओएसडी बने तो सरकारी हवाई जहाज से देश के कई सुदूर हिस्सों का मंत्री महोदय के साथ दौरा भी कराया । घर आते थे तो फ़तेह बहादुर सिंह को भी लाते थे जो अब उत्तर प्रदेश सरकार में काबीना मंत्री है और अपन उनकी खबर जनसत्ता में लेते रहते है । खैर अजय फिलहाल एक बड़े ओद्योगिक घराने में आला अफसर है । अजय का नाम और प्रेस रिलीज पर दिया पता देख कर सब ध्यान आ गया । सन १९८० के दौर में अपर्णा गुप्ता लखनऊ विश्विद्यालय में मेरी क्लास में थी और जब मै छात्रसंघ का चुनाव लड़ा तो जिन छात्राओं ने प्रचार किया उनमे वे भी शामिल थी । उस दौर में विश्विद्यालय के दूसरे विभागों के छात्रों की भीड़ उन्हें देखने के लिए मनोविज्ञान विभाग में जमा रहती थी और मेरी यादाश्त में अभी भी आधा दर्जन से ज्यादा घटनाएं है जब अपर्णा गुप्ता को लेकर झगडा फसाद हुआ । वे विश्विद्यालय की सबसे खुबसूरत छात्राओं में एक थी । पर आज देखकर झटका लगा । तीस साल का समय ज्यादा होता है पर उम्र का असर कुछ लोगों पर ज्यादा पड़ता है तो कुछ पर कम । रामगढ में प्रोफ़ेसर रस्तोगी करीब ८५ साल के है और उनकी पत्नी अस्सी के आसपास होंगी । उनके घर में जो फोटो लगी है उसे देखकर लगता है १९५० की वैजंतीमाला की फोटो है । पर अस्सी साल की उम्र में भी उनके चेहरे को आप उस फोटो से मिला सकते है । पर अपर्णा गुप्ता में काफी बदलाव नजर आ रहा था । अपर्णा से विश्विद्यालय के दौर में कोई घनिष्ठता नही रही और ज्यादा जानकारी भी नही थी । बाद में उनके भाई द्विजेन्द्र से जान पहचान हुई तो उनके घर भी जाना हुआ । वर्ष १९८६ में जो लखनऊ छूटा तो ज्यादातर लोगों का साथ भी छुट गया । अपर्णा करीब घंटे भर बैठी तो विश्विद्यालय के समय की चर्चा हुई । उन्होंने बताया कि सिर्फ कुमकुम का पता है पर मै उन्हें नही जानता था । उस दौर के सहपाठियों में सिर्फ अखिलेश दास यहाँ है जो पहले केंद्र में मंत्री थे अब बसपा के सांसद है । कुछ समय पहले अखिलेश दास ने फोन कर बताया था कि वे मेरी क्लास में थे । खैर अपर्णा गुप्ता से मिलकर काफी अच्छा लगा पर झटका भी कम नही लगा । जो चेहरा दिमाग में था वह १९८० का था और वे उसके बाद २०१० की अंतिम बेला में मिली । वे दिल्ली दूरदर्शन में अफसर है । फिर बताया - लखनऊ विश्विद्यालय के सामने से गुजरी तो द्विजेन्द्र से कहा कि गाड़ी से ही एक चक्कर लगवा दो । अपर्णा चली गई । जो प्रेस रिलीज दे गई वे दिल्ली के अखबार के लिहाज से महत्वपूर्ण भी नही थी इसलिए कम्पोज हो जाने के बाद भी नहीं भेजा ।अटपटा जरुर लगा तीस साल बाद कोई आए और उसका छोटा सा अनुरोध भी पूरा न किया जा सके पर मजबूरी थी ।
अपर्णा के जाने के बाद लगा एक बार मै भी लखनऊ विश्विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग से लेकर सांख्यकी विभाग का चक्कर लगा लूँ । आखिर उसी शहर में सात साल से हूँ पर कभी अपने विभाग जाने का मौका नही मिला । उस मनोविज्ञान विभाग में तो कई शिक्षिकाए अभी भी है जिन्होंने मुझे पढाया था ।
फोटो -लखनऊ विश्विद्यालय
Wednesday, December 1, 2010
राजीव दीक्षित का जाना कोई खबर नही है
अंबरीश कुमार
तीस नवम्बर को मंसूरी से देहरादून आते समय सोचा कि क्यों न ऋषिकेश में राजीव दीक्षित से मिल लिया जाए जो बाबा रामदेव के साथ काम कर रहे है । पर वापसी का टिकट कन्फर्म न होने की चिंता ने सारा कार्यक्रम ध्वस्त कर दिया । एक दिसंबर जब खबर बना रहा था तभी इंडियन एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट का फोन आया , अरे आपके मित्र राजीव दीक्षित की डेथ हो गई है , आस्था चैनल पर खबर आ रही है । मै चौक गया ,यह कैसा संयोग है कल ही उनसे मिलने जा रहा था । उनके बारे में पहले पता चला कि कोई दुर्घटना हुई । बाद में पता चला कि दिल का दौरा पड़ा है । समझ नही आया कि जो व्यक्ति बाबा रामदेव के साथ हो और खुद लोगो को स्वास्थ्य के बारे में आगाह करता हो उसे दिल का दौरा पड़ जाए । पिछली मुलाकात चेन्नई में शोभाकांत जी घर हुई जहा राजीव के कहने पर सभी ने गर्म पानी पीना शुरू किया था । आज चेन्नई में प्रदीप जी से बात हुई तो बोले - कुछ गड़बड़ है । उनके बारे में कही कोई खबर तक नहीं आई । कई लोग किसी साजिश का अंदेशा भी जता रहे है ।
राजीव दीक्षित से अपना संबंध अस्सी के दशक से था जव छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और अन्य जन संगठनों में सक्रिय था । बाद में दिल्ली में जनसत्ता में आने के बाद आंदोलनों पर लिखना शुरू किया तो आजादी बचाओ आंदोलन पर काफी कुछ लिखा । १९८९ के बाद से राजीव दीक्षित इलाहाबाद से जब भी आते तो सीधे बहादुरशाह जफ़र स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के निचले तल पर जनसत्ता संपादकीय विभाग में मेरी सीट के सामने बैठ कर इंतजार करते । घर पर फोन करते और कहते - अंबरीश भाई , आराम से आए आप से चर्चा करनी है । उनसे बातचीत के बाद जब खबरे लिखनी शुरू की तो कुछ समय बाद ही कुछ कुंठित किस्म के लोगो ने एतराज किया और उनका नाम न देने की बात की । तब जनसत्ता हिंदी पत्रकारिता में शीर्ष पर था और हिन्दी पट्टी में काफी पढ़ा जाता था । कोई आगे बढे तो विघ्नसंतोषी तत्त्व खसरा खतौनी लेकर सात पुश्तों का हिसाब किताब ढूँढ़ लाते है । यह परम्परा पुरानी है और हिंदी मीडिया में कुछ ज्यादा ही है । इसलिए न तब परवाह की और न अब करता हूँ , यही वजह है राजीव दीक्षित से संबंध बना रहा । रायपुर में एक दिन कांग्रेस दफ्तर के सामने साइबर कैफे से इंडियन एक्सप्रेस को खबर भेज रहा था तभी राजीव दीक्षित का फोन आया और बोले -अंबरीश भाई मुलाकात कब हो सकती है तो मैंने घर आने को कहा । तभी जो लड़की खबर कम्पोज कर रही थी उसने बात सुनी और कहा क्या ये आजादी बचाओ आंदोलन वाले राजीव जी है ? मेरे हाँ कहने पर वह चौंकी और उनसे मिलने की इच्छा जताई । उसने ही बताया कि उनके कैसेट सुने जाते है । रात में राजीव घर आए तो उनके साथ करीब बीस गाड़ियों का काफिला भी था । मैंने छूटते कहा - राजीव जी आप तो अब ब्रांड बन गए है । जवाब में सिर्फ मुस्कुराए और बोले नागपुर से एक अखबार निकलना चाहता हूँ जो आंदोलन को आगे बढाए । आपकी मदद भी चाहिए । करीब घंटे भर साथ रहे । उसके बाद चेन्नई में वाहिनी के मित्र मिलन में उनसे मुलाकात हुई थी । करीब हफ्ता भर पहले ही बाबा रामदेव की खबर में उनका जिक्र किया था । आज सरे अखबार देख डाले कही कोई खबर नहीं । राखी सावंत से लेकर इंडियन आयडल अभिजीत सावंत की पिटाई तक की खबर है पर राजीव दीक्षित की खबर नही है ।
इसी समाज के लिए लड़ रहे थे राजीव दीक्षित ।
Wednesday, November 10, 2010
दीव के समुंद्र तट पर एक शाम









सविता वर्मा
यहाँ का मौसम रात करीब नौ बजे से स्थानीय लोगो की भाषा में ख़राब हो गया जो हमारे जैसे सैलानियों के लिए सुहाना था . खासकर गीर के जंगल से वनराज के दर्शन के बाद से ही तपती धूप से परेशान थे .गरमी की वजह से जंगल से जल्द लौटने के बाद दीव के सर्किट हाउस के कमरे में जो गए तो रात आठ बजे डिनर का बुलावा आने पर ही निकले .बाहर कड़कती बिजली के बीच अरब सागर की लहरें लगता था कि कमरे तक आ जाएंगी.दीव का यह सर्किट हाउस जालंधर बीच पर बना है और काफी भव्य है .पिछले साल राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल यही रुकी थी और उन्हें यह जगह काफी पसंद भी आई .जिस सूट में रुके वह दो बेडरूम का फ्लैट जैसा था किचन के साथ ,जिससे देर रात काफी खुद बना ली जाती .खिड़की के ठीक सामने अरब सागर है तो बाएं किले की चाहरदीवारी के अवशेष .सर्किट हाउस से लगा हुआ समुंद्र तट है जिस पर बच्चे से लेकर नौजवान तक लहरों से खेलते नजर आते ही .पर यहाँ के मशहूर बीच नागोवा और घोघला हैं .नागोवा में तो हर समय मेला लगा रहता है और गुजरात से बड़ी संख्या में लोग यहाँ आते है .पर हम जिस जगह रुके है वह पूरी तरह शांत है .आसपास कोई दुकान देखने निकले तो दो किलोमीटर चलने पर भी कोई ठेला ढाबा या पान की दूकान तक नही मिली .यह दीव है . कभी पुर्तगालियों का उपनिवेश था .बचपन से गोवा ,दमन और दीव का नाम सुनते रहे .गोवा तो कई बार पर दमन दो बार जाना हो चुका है पर दीव पहली बार आए और संयोग से जिस दिन पहुंचे वह दिन गुजरात के लोगों का नया साल था.आज चार दिन से यहाँ है जिसमे एक दिन गीर के जंगल में गुजरा .
गोवा और दमन की तरह यहाँ अब पुर्तगाली आबादी नही है .पुराने चर्च है ,तो खानपान पर उनका असर जरुर बचा है खासकर समुंद्री व्यंजन पर .खाने में झींगा हो या तली हुई पाम्फ्रेट मछली पुर्तगाली असर से मुक्त नही है .कई बाते जरुर चौकाती है मसलन सब्जी से लेकर मछली का बाजार सुबह आठ नौ बजे लगता है और दिन में बारह एक बजे बंद हो जाता है उसके बाद शाम को नही खुलता .सामान्य बाजार भी कई शहरों की तरह दिन में खाने के समय में बंद हो जाता है .पर दीव गोवा और दमन से काफी अलग है .गोवा शाम से ही जिस रंग में रंग जाता है वह यहाँ नही मिलेगा और दमन के मुकाबले यह जगह सैलानियों को ज्यादा पसंद आएगी.दीव के लिए मुंबई से किंगफिशर की रोज फ्लाईट है तो ट्रेन से सोमनाथ तक जाकर वहां से नब्बे किलोमीटर की सड़क की यात्रा कर दीव पंहुचा जा सकता है .अमदाबाद से भी रातभर का सफ़र है .दीव के आसपास द्वारका ,सोमनाथ और एशियाई शेरों के लिए मशहूर गीर का जंगल है जो जूनागढ़ के नवाब के समय से आकर्षण का केंद्र रहा है .तीन चार दिन की छुट्टियाँ बिताने के लिए दीव अच्छी जगह है .नारियल के पेड़ों से घिरे दीव का मौसम भी खुशगवार रहता है दिन में तेज धूप हो तो जरुर गरमी लगती है पर शाम ढलते ही सागर की ठंढी हवाओं में बैठना अच्छा लगता है .पर आज तो बरसात और हवा कहर ढा रही थी .रिशेप्सन के सामने का लैम्पोस्ट उखड कर गिर गया था तो पर्यटन विभाग का वह कप प्लेट भी भी तिरछा हो गया था जिसे सैलानी कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते है .रात होते होते तूफ़ान और तेज हो चुका था और समुंद्र पूरी ताकत से गरजता हुआ सड़क पर चढ़ आने का असफल प्रयास कर रहा था .दूर लाइट हाउस की रोशनी तूफ़ान के बीच भी टिमटिमा रही थी .पुराने ज़माने में यह लाइट हाउस ही जहाजो को जमीन का संकेत देते थे . और आज भी मछुवारों के छोटे जहाजों को दिशा बताते है .मछुवारे भी पूरे हफ्ते का राशन पानी और बर्फ के कैशरोल लेकर निकलते है .यह उनकी किस्मत पर है कि कितनी मछली मिलती है .ऐसे ही एक जहाज के मालिक अयूब भाई ने कहा - किस्मत अच्छी हो तो दो तीन लाख की मछली मिल जाएगी वर्ना डीजल और राशन पानी का भी खर्च नही निकल पाता. गोवा दमन की तरह दीव भी मछुवारों का गाँव रहा है और एक बड़ी आबादी आज भी इस पर निर्भर है .
अँधेरा छाते ही लाउंज के सामने की लाइट जल गई और समुंद्र तट के किनारे किनारे बनी सड़क जो बरसात से भीगी हुई थी चमकने लगी .आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और थोड़ी थोड़ी देर में बिजली कौंध जाती तो दूर तक समुंद्र की लहरें दिख जाती .एक युवक जो शाम से ही मछली पकड़ने की कटिया डाले हुए था वह एक बड़ी मछली पकड़ने के बाद वापस आता दिखा .बारिश की वजह से आज बहुत कम सैलानी समुंद्र तट पर नजर आ रहे थे लहरे भी इतनी आक्रामक थी कि पानी में उतरने पर डर लग रहा था . मोटरसाइकल पर कुछ जोड़े जरुर भीगते हुए गुजर रहे थे .बिन मौसम बरसात का मजा भी अलग होता है .शाम को बंदर चौक से पानी के छोटे जहाज से एक चक्कर लगाने का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम भी चौपट हो चूका था और बीच पर इस मौसम में जाने का सवाल ही नही उठता .लिहाजा बारिश के हल्के होते ही समुंद्र के किनारे सीमेंट की कुर्सी पर जम गए और लहरों को देखने लगे .एक लहर आती और किनारे पहुँचते ही बिखर जाती तभी दूसरी लहर और वेग से आ जाती ,यह सिलसिला जारी रहता .दूर समुंद्र में जहाज की रोशनी जरुर ध्यान बंटाती .दाईं तरफ एक टापू रोशनी से जगमगा रहा था . दीव एक द्वीप है जिसके आसपास कुछ और छोटे छोटे द्वीप जैसे टापू बन गए है .
Friday, October 8, 2010
तो सड़क का रास्ता पकड़िए

सुप्रिया रॉय
संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी या जो भाषा वे समझते हों, उसमें समझाना पड़ेगा कि वे भारत का पंच बनने की कोशिश न करे। उनके पंचायती राज में भारत शामिल नहीं है। अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर को विवादित और स्वतंत्र क्षेत्रों की सूची में शामिल कर के संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय डेरी फाउंडेशन ने अरुणाचल और कश्मीर को लगभग अलग देश बना दिया है। बैठा होगा कोई अनपढ़ अफसर जो चार पैग लगा कर रिपोर्ट लिख रहा होगा। भारत को ऐसी फालतू विवरणों से कोई फर्क नहीं मिलता और इसीलिए आज तो आप अरुणाचल प्रदेश के सफर का मजा लीजिए। सबसे पहला पड़ाव गुवाहाटी है। गुवाहाटी हवाई अड्डा बहुत मजेदार जगह है। कभी यहां से बांग्लादेश और भूटान को सीधी उड़ाने जाती है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा होने का जुगाड़ कर के यहां बार भी बनाया गया है और सिगरेट पीने का विशेष लाउंज भी। इसके अलावा उड़ाने आम तौर पर देरी से आती जाती है इसलिए श्रध्दालु कामाख्या देवी सिध्द तीर्थ के दर्शन कर के वापस लौट सकें, इसकी व्यवस्था भी प्राइवेट टेक्सी ऑपरेटरों के अलावा खुद हवाई अड्डे के प्रबंधकों ने की है। काफी धार्मिक आग्रह उनके भीतर जान पड़ता है। मगर आपकी मंजिल गुवाहाटी या दिसपुर या आसपास की नहीं हो तो इस हरे भरे, खूबसूरत, गोलियों की दहशत से भरे, खतरनाक सड़कों वाले रास्ते आपका इंतजार कर रहे हैं। आपकी आंखे जुड़ा जाएं, ऐसे दृश्य और आपका दिल बार बार बैठ जाने की धमकी दे, ऐसी खाइयां। मगर जिसने लेह, लद्दाख और कारगिल की खाइयां देखी हो जहां आपकी गाड़ी कई जगह सोलह हजार फीट की ऊंचाई पर अचानक बन गई खाई को लोहे के तख्तों पर से पार सकती है तो ज्यादा डर नहीं लगेगा। रही बात दूसरे साधनों की तो 25 सीटों वाला एक तीन इंजन एक साथ चलाने वाला हैलीकॉप्टर मौजूद है। यह हैलीकॉप्टर मध्य प्रदेश मूल की एक ऐसी विमान सेवा चलाती है जो तकनीकी रूप से कभी शुरू ही नहीं हो पाई। किराया भी ज्यादा नहीं हैं। तीन हजार रुपए में आप वह सफर आधे घंटे में कर लेते हैं जिसके लिए आपको सड़क पर आठ घंटे बिताने पड़ते हैं। फिर भी उत्तर पूर्व की खूबसूरती देखनी हो, वहां की ओंस को महसूस करना हो, बादलों के बीच से हो कर गुजरना हो तो सड़क का रास्ता ही बेहतर है। अरुणाचल की राजधानी ईटानगर में हैलीकॉप्टर शहर से काफी बाहर बने हैलीपैड पर उतरता है। पायलटों में से एक तुरंत बाहर उतर कर हैलीकॉप्टर के ठीक सामने खड़े हो कर सिगरेट सुलगा लेते हैं। जाहिर है कि उन्हें उस कानून की कोई परवाह नहीं हैं जिसमें हवाई पट्टी पर धूम्रपान करने की सजा कम से कम चार साल है और यह अपराध गैर जमानती है। खैर कानून को छोड़िए और नजारे देखिए। काफी विकट पहरे में मौजूद ईटानगर हैलीपैड और छोटे जहाज उतारने लायक हवाई पट्टी से बाहर निकल कर ईटानगर के मुख्य मार्ग पर आते ही सबसे पहले पंजाब पर गर्व होगा। पंजाब से तीन हजार किलोमीटर दूर ईटानगर में पंजाब पर गर्व इसलिए होता है कि सबसे ज्यादा दुकानें अपने सिख भाईयों की है और उन्होंने सारी स्थानीय भाषाएं बोलना भी सीख लिया है। कुछ ढाबे हैं और सबसे ज्यादा शराब की दुकाने है। एक से एक बड़े विदेशी ब्रांड। चीन में बनने वाली शराब भी। अरुणाचल आपको याद होगा कि चीन सीमा पर बसा है और चीन तो इसे अपना हिस्सा मानता है। इसीलिए अरुणाचलवासियों को चीन भारतीय नागरिक के तौर पर वीजा भी नहीं देता। अंग्रेजों ने कभी तिब्बत के हिस्से रहे अरुण्ााचल को भी एक अलग देश बनाने के चक्कर में 1914 में यहां एक निजी सीमा बना दी थी और बनाने वाले के नाम पर ही इसका नाम मैकमोहन लाइन रखा गया था। कहा गया था कि यह समझौता ब्रिटिश और तिब्बत सरकार के बीच का है। भारत में तो 1950 में इसे लागू कर भी दिया मगर चीन ने इसे कभी नहीं माना और 1962 का भारत-चीन युद्व सबसे भयंकर रूप में यहीं लड़ा गया था और अगर इलाके की खाइयां और उस जमाने की दुर्गम सड़कों की कल्पना करें तो हम सोच सकते हैं कि चीनियों से इसे बचाने के लिए भारतीय सेना को कितना गर्म लोहा निगलना पड़ा होगा। ईटानगर राजधानी है लेकिन पहाड़ियों और घाटियों में बसा हुआ एक नन्हा नादान सा शहर है। राजकीय अतिथि गृह से देखे तो शहर आपके सामने थाली में दीपकों की तरह बिखरा हुआ नजर आता है। शहर का सबसे बड़ा बाजार अपनी दिल्ली की ठीक ठाक कॉलोनियों की मोहल्ला मार्केट से ज्यादा बड़ा नहीं हैं और वहां धड़ल्ले से हिंदी फिल्मों की और गानों की सीडी और डीवीडी बिकती हैं। यहां के मूल निवासियों के बारे में माना जाता है कि वे तिब्बत में बौद्व धर्म के जन्म के भी दो तीन हजार साल पहले वहां से आ कर बसे हैं। महाभारत में यहां के राजा भीष्मका को बहुत महिमा मंडित किया गया हैं मगर इसके ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यह नाम अरुणाचल के किसी इलाके में किसी मंदिर या समाधि पर भी नहीं मिलता। जाहिर यह है कि तिब्बत और वर्मा यानी मंगोल मूल के लोग ही यहां के आदिवासी और मूलवासी है। अरुणाचल का असली इतिहास सोलहवीं शताब्दी में असम के आहोंम इतिहास के साथ ही लिखा गया था। इसमें मूनपा और शेरदुकपेन नाम के दो ताकतवर कवियों का जिक्र है और हाल ही खुदाई में चौदहवीं शताब्दी के वैष्णव हिंदू मंदिर सियांग इलाके की घाटियों से मिले हैं। वास्तु कला के हिसाब से सारे मंदिर दक्षिण की ओर खुलते हैं और असम की सीमा के पास है। यहां के तवांग बौद्व मठ को सीधे तिब्बती बौध्द इतिहास से जोड़ कर देखा जाता है और छठवें दलाई लामा भी यहीं पैदा हुए थे। वर्तमान और कायर दलाई लामा हाल में ही तवांग गए थे तो चीन ने ऐतराज जाहिर किया था। मगर चीन तो भारत के प्रधानमंत्री की अरुणाचल यात्रा पर भी ऐतराज करता है। चीन को बावली बीबियों की तरह अनसुना कर देना चाहिए मगर उनके बेलन से फिर भी बच कर रहना चाहिए। गए थे हैलीकॉप्टर से मगर लौटे अरुणाचल- असम सीमा पर बसे असम के शहर तेजपुर के पास बने हवाई अड्डे से। वहां एक डक्कन एयरवेज का एक चालीस सीटाें वाला लेकिन आरामदेह जहाज इंतजार कर रहा था जिसने 25 मिनट में गुवाहाटी पहुंचा दिया था। अब जहाज की यात्राएं तो जहाज की यात्राएं ही होती हैं, जहां खिड़कियाेंं से बादल और कभी कभी बहुत दूर की जमीन नजर आ जाती है इसलिए निवेदन है कि उत्तर पूर्व घूमना है तो सड़क का रास्ता पकड़िए। जीवन धन्य हो जाएगा।
पलामू बंगले के बरामदे में

वीना श्रीवास्तव
शनिवार की सुबह हम साढ़े पांच बजे जग गए। पूरब की दिशा में आकाश में बादल थे, लगा शायद सूर्योदय नहीं देख पाएंगे। फिर भी हम कैमरे के साथ वाच टावर पहुंच गए। वहां तीन लोग पहले से ही मौजूद थे।वातावरण में ठंडी हवा बह रही थी। पौने छह बजे मध्यम सा एक लाल गोला बादलों के बीच झलका लेकिन वह एक नजर में नहीं दिखाई दे रहा था। मैने कहा वह देखो सूरज उग रहा है। सब लोगों की निगाह आकाश पर लग गई। तब तक हल्का सा लाल गोला थोड़ा और ऊपर उठ चुका था, सामने की पहाड़ियों और सखुआ के पेड़ों के ऊपर। वाकई दिल को मोह लेने वाला दृश्य। हम 15 मिनट तक बाल सूरज को देखते रहे।
जीतन किसान ने नीचे से आवाज लगाई, बाबू चाय तैयार है, ऊपर ही लाएं क्या। हमने कहा नहीं, हम ही नीचे आते हैं। नीचे उतर कर हमने गेस्ट हाउस के बरामदे में गुनगुनी धूप के साथ चाय पी। इस दौरान हम घूमने की योजना पर भी चर्चा कर रहे थे। तय हुआ कि नाश्ते के बाद हम सनसेट प्वाइंट तक जाएंगे। वहां से लौटकर नेतरहाट स्कूल देखा जाएगा और फिर गेस्टहाउस लौटकर लंच लेंगे।
निर्धारित समय यानी ठीक साढ़े आठ बजे नाश्ता लगा। पराठें और आलू की भुजिया। यहां दही और दूध का रिवाज नहीं है। जीतन ने बताया था कि इसके अलावा टोस्ट बटर व आमलेट मिल सकता है। नाश्ते के बाद, हम सनसेट प्वाइंट की ओर रवाना हुए। पलामू बंगले से यह स्थान करीब 6 किमी है। रास्ता बेहद खूबसूरत। पतली सी सड़क सीधी सखुआ और चीड़ के बीच से। नेतरहाट स्कूल के बाद एक छोटी सी आदिवासी बस्ती पड़ी। सुंदर और शालीन घर। दूर से बटुली में पानी लाते बच्चे व महिलाएं। गाय व बकरियों के लिए चारे का इंतजाम करते लोग। जगह-जगह महिलाएं सड़क पर मक्का सुखा रहीं थीं। यहां कभी-कभार ही बाहरी लोग दिखाई देते हैं, सो लोग हमें कौतूहल से देख रहे थे।
रास्ते में चीड़ों के झुंड इतने शेप में दिख रहे थे जैसे किसी ने इनकी कटिंग कर ऐसा बनाया हो लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं होता है। हवा ही इन पेड़ों को संवारती है और शेप देती है। हमारी कार धीमे-धीमे चल रही थी और हम जंगल, हवा और मनोरम वातावरण का आनंद लेते हुए आगे बढ़ रहे थे। थोड़ी देर में हम सनसेट प्वाइंट पहुंच गए। वहां सनसेट देखने के लिए एक सीढ़ीदार प्लेटफार्म बना है। तीन साल पहले बने इस प्लेटफार्म की फर्श उखड़ चुकी है। उस पर लगे पत्थर गायब हैं, यहां तक कि उद्घाटन का पत्थर भी लोग उखाड़ ले गए।
सरकारी उपेक्षा से प्राकृतिक खूबसूरती तो उखड़ती नहीं है लिहाजा इस प्वाइंट से खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। इस प्वाइंट का नाम है मैग्नोलिया सनसेट प्वाइंट। इस प्वाइंट से नीचे एक गहरी खांईं है। बीच में घाटी है और फिर पहाड़ियों। सूरज इन्हीं पहाड़ियों के बीच डूबता है।
इस नाम के पीछे एक कहानी है- लोग बताते हैं यहां पहले एक अंग्रेज साहब रहता था जिसकी बेटी थी मैग्नोलिया। मैग्नोलिया बहुत खूबसूरत थी। हिंदुस्तान में ही पैदा हुई मैग्नोलिया यहां की भाषा भी अच्छे से आती थी। घुड़सवारी के दौरान उसकी मुलाकात एक आदिवासी नौजवान से हुई। यह नौजवान बहुत अच्छा बांसुरीवादक व गायक था। बांसुरी की तान जंगलों में और भी मारक हो जाती थी। तान सुनकर मैग्नोलिया बेचैन हो उठती थी। मुलाकात का दौर शुरू हुआ और धीरे-धीरे मैग्नोलिया के मन के कोमल से भाव ने मोहब्बत का रूप ले लिया। मैग्नोलिया उस आदिवासी के साथ रहना चाहती थी लेकिन उसके मां-बाप को यह मंज़ूर नहीं था। अंग्रेज साहब को जब कोई रास्ता न सूझा तो उसने आदिवासी युवक की हत्या करा दी। जब मैग्नोलिया को पता चलता है तो वह पागल हो उठती है। कहती है मुझे उस लड़के से मिलना है। अपने घोड़े पर सवार होती है और घोड़ा दौड़ाते हुए उस खांईं में छलांग लगा देती है। लोगों का कहना है कि कभी-कभी मधुर आवाज इस खांईं से आज भी सुनाई देती है और घोड़े पर सवार मैग्नोलिया भी दिखाई दे जाती है। इस तरह इस प्वाइंट का नाम मैग्नोलिया प्वाइंट पड़ गया।
शाम को लोहरदगा से आग्रह हुआ कि शनिवार की रात हम फारेस्ट रेस्टहाउस में स्थित लागहाउस में ठहरें। ठहरना तो नहीं हुआ लेकिन हम शाम को वहां चाय पीने जरूर गए। दरअसल हमने सोचा कि जब हम सनसेट देखने जाएंगे तो उधर से होते हुए जाएंगे। शाम को बादल छा गए लिहाजा सनसेट देखने का कार्यक्रम रद करना पड़ा और हम पहुंच गए फारेस्ट रेस्टहाउस।
साढ़े पांच बजे से बारिश शुरू हो गई। करीब आठ बजे तक जबरदस्त बारिश होती रही। घुप अंधेरा, तेज बारिश और केरोसिन लैंप के साथ हम बैठे पलामू बंगले के बरामदे में। प्रकृति ने जो माहौल बना रखा था कि उसका मजा ही अलग। बारिश की बूंदों के साथ सखुआ और चीड़ की जो जुगलबंदी शुरू हुई थी, वह तेज होती बारिश में डूब गई और फिर शुरू हुआ बादलों का मांदर। घड़ी की सुइंयां इतने धीमे चलती नजर आ रही थीं कि समय जैसे ठहर गया हो।
रविवार यानी 3 अक्टूबर को सुबह काफी चहलपहल थी। जब हम नाश्ता कर रहे थे तभी वहां विकास भारती संस्था के मुखिया अशोक भगत वहां आ गए। राजेंद्र को देखकर वह चौंक गए। नमस्कार हुआ। उन्होंने कहा कि गांधी जयंती पर विकास भारती आदिवासी युवक-युवतियों व बच्चों की एक दौड़ का आयोजन कर रहा है। यह दौड़ नेतरहाट स्कूल से शुरू होकर बनारी पर खत्म होगी। यानी करीब 25 किमी। अशोक भगत ने राजेंद्र से दौड़ को हरी झंडी दिखाने का आग्रह किया जिसे राजेंद्र ने सविनय मना कर दिया।
वापस होते हुए रास्ते में हमने देखा कि बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां (अधिकतर नंगे पांव) दौड़ते हुए नीचे जा रहे थे। विकास भारती ने जगह-जगह पानी का इंतजाम कर रखा था। कहीं से नहीं लग रहा था कि ये बच्चे नक्सली बनकर बंदूक उठाने का विकल्प अपनाएंगे यदि इन इलाकों को विकास मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाए।
अशोक भगत के आग्रह पर हम बिशुनपुर में विकास भारती के परिसर स्थित गेस्टहाउस में चाय पीने के लिए रुके। विकास भारती के कामों की जानकारी हमें दी गई। हमने उनका स्वावलंबन केंद्र देखा कि कैसे स्थानीय लोगों को स्वरोजगार के लिए न सिर्फ ट्रेन किया जा रहा है बल्कि उनके लिए प्लेटफार्म का काम भी विकासभारती कर रही है। यही नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी अयस्क से लोहा व एलुमुनियम बनाने की तकनीक को भी बचाए रखने का काम भी यहां चल रहा है।
लौटते में हम कुड़ू होकर नहीं बल्कि लोहरदगा से बेड़ो वाली सड़क से रांची आए। अच्छी सड़क, मनोहारी दृश्यों के बीच पता नहीं चला कि कब हम रांची पहुंच गए। कुल मिलाकर मुझे लगता है कि यदि आप दो-तीन दिन दुनिया-जहां से कटकर कुछ पल सुकून से बिताना चाहते हैं तो नेतरहाट सबसे मुफीद जगह है।
कैसे पहुंचे नेतरहाट
दिल्ली, कोलकाता, पटना व मुंबई से रांची वायुमार्ग से जुड़ा है। रेलमार्ग से रांची मुख्यरूप से दिल्ली व कोलकाता से जुड़ा है। रेल से धनबाद होकर भी रांची पहुंचा जा सकता है। धनबाद से रांची 160 किमी है। लखनऊ से आने के लिए कानपुर से ट्रेन पकड़े। रांची से टैक्सी लेकर नेतरहाट पहुंचा जा सकता है। सात में हल्के गर्म कपड़े ले जाना न भूलें।
Monday, October 4, 2010
सखुआ और चीड़ की जुगलबंदी
वीना श्रीवास्तव
नेतरहाट को यदि नेचर हाट कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। चीड़ और सखुआ के जंगल, नाशपाती के बागान, बादलों की सरपट दौड़ और शांत-मनोहारी माहौल व मौसम। रात को सखुआ के पत्तों पर एक बूंद भी गिरे तो आवाज सुनाई देती है। 3900 फुट की ऊंचाई पर बसा नेतरहाट किवदंतियों से भी भरा है। कोई भी आदमी आपको एक नया किस्सा सुना देगा।
30 सितंबर को हम लोग बात कर रहे थे कि झारखंड में रहते हुए एक साल हो गया और हम लोग अब तक झारखंड में कहीं नहीं गए। एक लंबा वीकेंड हमारे सामने था लिहाजा विचार शुरू हुआ कि कहां जाया जाए। बाबाधाम से शुरुआत हुई लेकिन दूरी 325 किमी थी लिहाजा दूसरे विकल्पों पर नजर डाली गई। मैथन डैम, तिलैया डैम, बेतला फारेस्ट पर बात करते-करते हम आए नेतरहाट पर। इस बीच राजेंद्र फोन करके रहने की व्यवस्था की जानकारी लेते रहे। नेतरहाट रांची से सिर्फ 140 किमी है और कार से जाने पर ज्यादा से ज्यादा चार घंटे का समय। लिहाजा तय हुआ कि नेतरहाट ही चलेंगे। राजेंद्र का पूरे झारखंड में अपना नेटवर्क है। उन्होंने लोहरदगा के एक पत्रकार साथी से नेतरहाट का फारेस्ट बंगला रिजर्व कराने को कहा लेकिन पता चला कि वहां जनरेटर नहीं है और पानी की भी दिक्कत है। अब दूसरा विकल्प था पलामू बंगला जो लातेहार जिला परिषद के नियंत्रण में है। लातेहार के एक वरिष्ठ पत्रकार साथी की मदद से यह बंगला दो दिन के लिए बुक कराया गया।
शुक्रवार को दोपहर एक बजे रांची से नेतरहाट के लिए निकलने की योजना बनी। हम तैयार थे कि राजेंद्र को याद आया कि अपनी दोनों कारों का इंश्योरेंस सितंबर में खत्म हो गया है। तो इंश्योरेंस रिन्यू कराने में थोड़ा समय लगा और हम ढाई बजे रांची से निकल पाए। रातू, मांडर और कुड़ू होते हुए हम करीब शाम 4 बजे लोहरदगा पहुंचे। रास्ता बहुत खराब था। कई जगह सड़क टूटी हुई थी लिहाजा समय ज्यादा लगा। हम लोगों ने सोचा था कि लंच कुडू के पास एक लाइन होटल में करेंगे लेकिन देर होने की वजह से हमने लंच ड्राप कर दिया। आपको बताते चलें कि इस इलाके में हाईवे पर स्थिति ढाबों को लाइन होटल कहते हैं। लोहरदगा में विभिन्न अखबारों के पत्रकार साथी मिले। वे राजेंद्र से जानना चाहते थे कि वह कौन सा अखबार ज्वाइन कर रहे हैं। दरअसल राजेंद्र हिंदुस्तान के झारखंड के संपादक थे। पिछले दिनों स्थानांतरण की वजह से उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। इन पत्रकार साथियों ने हमारे लिए एक स्थानीय होटल में लंच की तैयारी कर रखी थी। इस आग्रह को टाला न जा सका लिहाजा और देर हो गई। चलते समय एक पत्रकार साथी भी हमारे साथ हो लिए। रात को नेतरहाट जाना जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि आसपास का पूरा इलाका नक्सल प्रभावित है और थाना आदि उड़ाए जाने के किस्से यहां आपको डराने के लिए काफी हैं। लेकिन राजेंद्र ने कहा कि जब हम फरवरी 2002 में रात को एक बजे जम्मू-कश्मीर में उस समय के सबसे खतरनाक इलाके में स्थित गुलमर्ग जा सकते थे तो यहां क्या। फिर हम पत्रकार हैं, हमसे किसी की क्या दुश्मनी।
करीब 5.30 बजे हम लोहरदगा से नेतरहाट के लिए निकले। घाघरा पहंचते हुए अंधेरा छा गया और अभी हम करीब 60 किमी दूर थे। रास्ते में हमें सिर्फ बाक्साइट भरे ट्रक आते ही दिखाई दिए बाकी कोई आवागमन नहीं था। बिशुनपुर पार करते-करते पूरी तरह से अंधेरा हो गया। मुझे डर लग रहा था लेकिन मैं कुछ बोल नहीं रही थी। बनारी पार करने के बाद शुरू हुआ पहाड़ी रास्ता। भीगी सड़क देखकर लग रहा था कि यहां थोड़ी देर पहले बारिश हुई है। रास्ता बहुत अच्छा नहीं था। सड़क टूटी हुई थी और जगह-जगह पत्थर और कीचड़ था। हम ठीक सवा सात बजे नेतरहाट पहुंचे। राजेंद्र की ड्राइविंग की एक बार फिर दाद देनी होगी कि हम मानकर चल रहे थे कि आठ बजे नेतरहाट पहुंचेंगे लेकिन हम जल्दी पहुंच गए।
थोड़ा समय पलामू बंगला ढूंढ़ने में लगा। वहां महुआडांड़ के पत्रकार साथी लिली हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हम लोगों को देखकर राहत की सांस ली। वहां के सेवक जीतन किसान ने बेहतरीन गरमा-गरम चाय हमें पिलाई। जो थोड़ी-बहुत थकान थी वह काफूर हो गई। नेतरहाट का सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत खूबसूरत होता है और नेतरहाट इसके लिए जाना जाता है। जीतन ने बताया कि सूर्योदय पलामू बंगला प्रांगण में बने वाच टापर से ही देखा जा सकता है या फिर पास के प्रभात होटल से। हम लोगों ने तय किया सुबह वाच टावर पर सूर्योदय देखते हुए सुबह की चाय पिएंगे।
(जारी)
Subscribe to:
Posts (Atom)