Wednesday, March 18, 2009

ममता बनर्जी भी फ़िल्मी सितारों के सहारे

रीता तिवारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को सिर्फ कांग्रेस के साथ तालमेल से ही संतोष नहीं है। इस लोकसभा चुनाव में अपने सितारे चमकाने के लिए वे फिल्मी सितारों के सहारे मैदान में उतरी हैं। वैसे, सितारों की सहारा लेना उनकी फितरत रही है। बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने जाने-माने बांग्ला अभिनेता तापस पाल को चुनाव लड़ाया और जिताया था। पाल के अलावा ममता ने माधवी मुखर्जी और नयना दास जैसी अभिनेत्रियों को भी टिकट दिया था। इस बार उन्होंने तापस पाल को तो मैदान में उतारा ही है, जानी-मानी बांग्ला अभिनेत्री शताब्दी राय और गायक कबीर सुमन को भी चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया है। ममता ने अपर्णा सेन और पेंटर शुभप्रसन्न को भी टिकट देने की पेशकश की थी। लेकिन बात नहीं बनी।
दरअसल, दो साल पहले नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग के खिलाफ ममता के साथ सड़क पर उतरने वालों में बुद्धिजीवियों, कलाकारों और गायकों का एक बड़ा तबका शामिल था। उसके बाद ममता से इन सबकी नजदीकियां बढ़ीं। उन्होंने शताब्दी राय को बीरभूम संसदीय सीट से मैदान में उतारा है। राय ने तारापीठ में दर्शन-पूजन के बाद अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया है। शताब्दी का कहना है कि वे एक व्यक्ति व नेता के तौर पर ममता की इज्जत करती हैं। ममता राज्य के लोगों के जीवन में बदलाव का प्रयास कर रही हैं। इसलिए उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुरोध किया तो वेइंकार नहीं कर सकीं। शताब्दी कहती हैं कि वे लोकप्रियता हासिल करने के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं। एक अभिनेत्री के तौर पर यह तो मुझे पहले से ही हासिल है। अब अपनी इस लोकप्रियता को मैं आम लोगों के हित में इस्तेमाल करना चाहती हूं।
गायक कबीर सुमन ने भी ममता के अनुरोध पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। वे कहते हैं कि चुनाव जीत कर अब राज्य में बदलाव का प्रयास करेंगे। विधायक तापस पाल भी कृष्णनगर सीट से किस्मत आजमा रहे हैं। फिल्म निर्माता अपर्णा सेन को भी तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली इस निर्देशिका ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अपर्णा ने साफ कह दिया कि सक्रिय राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है।
सिंगुर में किसानों की जमीन लौटाने की मांग में दिसंबर 2006 में ममता ने जब 26 दिनों तक अनशन किया था तब शतब्दी, कबीर समुन और तापस पाल वहां लगातार मौजूद रहे थे। अभिनेता तापस पाल तो तृणमूल के टिकट पर अलीपुर से विधानसभा चुनाव भी जीत चुके हैं। पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री माधवी मुखर्जी ने वर्ष 2001 में कोलकाता की यादवपुर विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लेकिन हार गई थीं। एक और अभिनेत्री नयना 2001 में चुनाव जीती थी। लेकिन लोकसभा चुनावों में कलाकारों और फिल्मी हस्तियों को पहली बार मैदान में उतारा है ममता ने।
शताब्दी ने तपन सिन्हा की फिल्म आतंक के जरिए 1986 में अपना फिल्मी सफर शुरू किया था। उनकी फिल्में खासकर बंगाल के ग्रामीण इलाकों में काफी हिट रही हैं।
ममता को पिछले लोकसभा चुनावों में महज एक सीटें मिली थीं। लेकिन अबकी वे इसकी तादाद बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इसलिए कांग्रेस के साथ तालमेल हो या फिर सितारों को मैदान में उतारना, वे कोई भी मौका नहीं चूक रही हैं। 
ममता की इस रणीनिति की सत्तारूढ़ वाममोर्चा ने कड़ी आलोचना की है। माकपा के वरिष्ठ नेता श्यामल चक्रवर्ती ने कहा है कि इस फैसले से साफ हो गया है कि तृणमूल कांग्रेस राजनीतिक दिवालिएपन की शिकार हो गई है। उसके पास ढंग के उम्मीदवारों का टोटा है। इसलिए अपनी किस्मत चमकाने के लिए वे फिल्मी सितारों का सहारा ले रही हैं। 
वैसे, यह सितारें जीते या नहीं, लेकिन उनके चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ जुट रही है। अपने चहेते कलाकारों को देखने के लिए। ममता के विरोधी चाहे कुछ भी कहें, कई सितारों को मैदान में उतार कर ममता ने अबकी लोकसभा चुनावों में ग्लैमर के रंग तो घोल ही दिए हैं।




इंदिरा,संजय और वरुण

आलोक तोमर 
नई दिल्ली, मार्च- वरुण गांधी को राजनीति तो खैर नहीं ही आती, भाषा और संस्कार भी उनके पर्याप्त उलझे हुए हैं। जब तक बेडरूम में थे तब तक छिपे हुए थे वरना जैसे ही सड़क पर आए, उनका नंगापन नजर आ गया। 
उन्होंने पीलीभीत में अपनी पहली चुनाव सभा में जो भाषण किया उसमें तो वे प्रवीण तोगड़िया और साध्वी रितंभरा के भी उस्ताद नजर आए। मुसलमानों का गला काटने की अपनी पुण्य अभिलाषा का ऐलान उन्होंने मंच से किया। हिंदुओं की एकता का ऐलान किया। भारत के सारे मुसलमानों को ओसामा बिन लादेन बताया। ये भी कहा कि अगर हिंदू एक हो जाए तो सारे मुसलमान पाकिस्तान भाग जाएंगे। 
वरुण गांधी इतने पर ही रूक जाते तो भारतीय जनता पार्टी का होने के कारण उन पर सिर्फ सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगता। लेकिन अपनी अम्मा की जीती जिताई सीट पीलीभीत पर जीत की उम्मीद पक्की माने बैठे वरुणगांधी ने मंच से महात्मा गांधी को बेवकूफ कह दिया। अपने देश में गांधीवाद भले ही कायम नहीं हुआ हो, नोटों पर गांधी जी की तस्वीर छपती हैं और देश के हर शहर में महात्मा गांधी मार्ग है। कुल मिला कर गांधी जी देश के समाज में पूज्य हैं। 
यहां आ कर वरुणगांधी फंस गए। देश ने सवाल पूछना शुरू कर दिया। भाजपा को वरुणने करुण हालत में ला कर खड़ा कर दिया। भाजपा ज्यादा परेशान वरुणके मुस्लिम विरोधी बयान से थी इसलिए अपनी दो मुस्लिम उत्सव मूर्तियों- मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन को बयान देने के लिए खड़ा किया कि वरुण गांधी ने जो कहा वह उनका निजी मामला है और पार्टी की आम राय ये नहीं हैं। इस बयान पर कौन भरोसा करता? इसके बाद वरुण गांधी का बयान आया। इस बयान के मुताबिक सारे टीवी चैनलों ने उनके भाषण की सीडी में किसी और की आवाज डाल दी है। इस बयान पर तो खुद उनकी अम्मा मेनका गांधी भरोसा नहीं करेंगी। दर्जनों टीवी चैनल एक साथ मिल कर एक जैसी गलती नहीं कर सकते। वरुण गांधी अभी इतने बड़े नेता नहीं हुए है कि उनको निपटाने के लिए स्टार न्यूज और एनडीटीवी से ले कर मेरा नवजात सीएनईबी भी पीछे पड़ जाए। 
वरुण गांधी के लिए सबसे आसान था कि वे माफी मांग लेते और उन्हें बच्चा मान कर लोग माफ भी कर देते। मगर जो सुधर जाए वो आदमी वरुण गांधी नहीं हैं। उन्हें इतना भी याद नहीं रहा कि वे फिरोज गांधी के पोते हैं जो महात्मा गांधी के भक्त थे। उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि जवाहर लाल नेहरू उनके परनाना थे और उन्हे गांधी जी ने ही देश का पहला प्रधानमंत्री बनवाया था। यह एक ऐसा तथ्य है जिसके लिए भाजपा और संघ परिवार जिसके दुर्भाग्य से वरुण नेता कहे जा सकते हैं, गांधी को कभी क्षमा नहीं किया। वरुण जिस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं उसका मानना हैं कि नेहरू जी की जगह सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए था। भाजपा के जनसंघ अवतार पर उस समय गांधी जी की हत्या की साजिश करने का आरोप भी लगा था। ऐसे में भाजपा का कोई लोकसभा उम्मीदवार अगर गांधी जी को मंच से बेवकूफ कहेगा तो वह कम से कम यह प्रमाणित तो जरूर कर देगा कि वह संजय और मेनका गांधी का बेटा है। 
संजय गांधी कभी अपनी विनम्रता के लिए नहीं जाने गए। वे तो अपने शानदार दिनों में बड़ों बड़ों की छुट्टी कर दिया करते थे और मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक को अपने सामने बैठने तक नहीं देते थे। उनके द्वारा दी गई गालियों का इतिहास अब भी चल रहा है। लेकिन बहुत सारे ऐसे हमारे नेता हैं जो आम तौर पर सिर्फ इसलिए राजनीति में हैं क्योंकि उन्हें संजय गांधी से गालियां खाने में आपत्ति नहीं हुई थी। ये लोग बड़े बड़े पदों पर पहुंचे और राजनीति में स्थापित बने रहे। आज भी उनमें से कई स्थापित हैं। 
वरुण गांधी अपने नाम में जुड़े गांधी शब्द को भी भूल गए। उनकी अम्मा मेनका गांधी जो कुत्तों से ले कर गिध्दों तक का पर्याप्त ध्यान रखती हैं उन्हें अपने बेटे के मुंह से मुसलमानों की गर्दन काटने वाला बयान सुन कर कैसा लगा होगा? वैसे भी उन्होंने वरुण के बयान पर कुछ भी कहने से मना कर दिया है और कहा कि अगर कोई कुत्ता कहीं मारा जाए या किसी चूहे पर अत्याचार हो रहा हो तो मैं उस पर बोलूंगी। उन्हें शायद अपनी जवानी याद आई होगी जब वे बीसीएम की तौलियां पहन कर मॉडलिंग किया करती थी और सूर्या नामक पत्रिका निकाला करती थी जिसमें जनता सरकार के दौरान जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उनकी प्रेमिका सुषमा की अश्लील तस्वीरें उस पत्रिका की आमुख कथा के तौर पर उन्होंने प्रकाशित की थी। जगजीवन राम का प्रधानमंत्री बनना हमेशा के लिए स्थगित हो गया था। 
वरुण गांधी और राहुल गांधी के बीच अगर तुलना की जाए तो वह एक अक्षम्य अपराध होगा। सच तो यह है कि राहुल गांधी राजनीति के बाबा लोगों में गिने जाते हैं और यह भी सही है कि उन्होंने भी कई बार कुछ बचकाने बयान दिए हैं मगर सही यह भी है कि बचकाने होने के बावजूद राहुल गांधी ने कभी आपराधिक बयान नहीं दिए जो उनके चचेरे भाई वरुण ने दे डाला। वरुण और राहुल के बीच उतना ही अंतर है जितना राजीव गांधी और संजय गांधी में था। राहुल गांधी बड़े भाईयों की तरह विनम्र थे और संजय गांधी बिगड़े हुए छोटे भाईयों की तरह उदंड और हमलावर थे। 
यही सही है कि इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे संजय को ही अपना राजनैतिक उत्तराधिकार सौपना चाहती थी और अगर संजय गांधी की असमय एक दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई होती तो इतिहास कुछ और ही होता। राजीव गांधी बहुत बेमन से और श्रीमती सोनिया गांधी को लगभग नाराज कर के राजनीति में आने के लिए तैयार हुए थे और इंदिरा गांधी की निर्लज्ज हत्या नहीं होती तो राजीव गांधी इतनी जल्दी प्रधानमंत्री नहीं बनते। 
वरुण गांधी पिछला चुनाव इसलिए नहीं लड़ पाए थे क्योंकि वे 25 साल के नहीं थे। अब वे 29 साल के हैं। लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में पढ़ चुके हैं जहां एक जमाने में मनमोहन सिंह भी पढ़े थे। इसके अलावा लंदन के एक विश्वविद्यालय से वरुण ने अफ्रीका संबंधी विषयों पर विशेषज्ञता हासिल की है। वे कविताएं भी लिखते हैं और उनका एक कविता संकलन अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुका हैं जिसके नाम का मोटा मोटा अनुवाद करें तो यही होगा कि अपने होने का बेगानापन। वरुण ने जो किया है उसके बाद भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी जिसके वे सदस्य हैं, को तय करना पड़ेगा कि उन्हें इस बूढ़े होते जा रहे बच्चे के साथ क्या करना है? 

Wednesday, February 25, 2009

परिधि की यात्रा करते थे चंद्रदत्त तिवारी


अरूण कुमार त्रिपाठी
नई दिल्ली,  फरवरी-लखनऊ से अंबरीश कुमार ने तिवारी जी के जाने की खबर दी तो तमाम आदर्शवादी सपनों का पूरा जमाना याद आ गया।आज जब विचार से केन्द्र की यात्रा करने की होड़ लगी हो तब चंद्रदत्त तिवारी जसे राजनीतिक कार्यकर्ता अपने विचार केन्द्र से परिधि की ही यात्रा करते रहे। इस यात्रा में दो ही उपकरण उनके साथ रहे, एक साइकिल और दूसरी वैचारिक ईमानदारी। बाकी सब लोग और सामान आते-जते रहे और दुग्धधवल कुर्ता-पायजमा पहने तिवारी जी अपने जीवन को वैसे ही साफ सुथरा और कलफ की क्रीज लगा छोड़कर चले गए। आज समाजवाद के नाम पर गठित उत्तर प्रदेश की एक पार्टी का चुनाव चिन्ह भले साइकिल है, पर उसके नेताओं के दौरे के लिए हर समय चार्टर प्लेन खड़ा रहता है। वे परिधि से केन्द्र की यात्रा में दिन-रात लगे हैं। तिवारी जी इस प्रवृत्ति के ठीक उलटे थे। सन १९८0 में जब पुनीत टंडन और अतुल सिंघल ने रहस्यपूर्ण तरीके से लखनऊ विश्वविद्यालय के हास्टल के कमरे से उठाकर पेपर मिल कालोनी के उस पहली मंजिल के फ्लट में पहुंचाया तो विचारों की दुनिया ही बदल गई। आचार्य नरेन्द्र देव के चित्र लगे तिवारी जी के ड्राइंग रूप में तरह-तरह के विचारों और विभूतियों के दर्शन हुए और बड़े-बड़े लोगों से तर्क-वितर्क करने की समङा और हिम्मत आई। 
यही पर एसएन मुंशी जसे रेडिकल ह्यूमनिस्ट से मुलाकात हुई। यही दर्शन शास्त्र की प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा, समाजवादी नेता सर्वजीत लाल वर्मा, कम्युनिस्ट नेता जेड ए अहमद, रमेश चंद्र सिन्हा, समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन, संस्कृति समीक्षक कृष्ण नारायण कक्कड़, चित्रकार रणवीर सिंह विष्ट, केजी मेडिकल कालेज के पूर्व प्रिंसपल व जेपी के सहयोगी डाक्टर एमएल गुजराल, गिरि इंस्टीट्यूट के निदेशक डाक्टर पपोला, अर्थशास्त्री डाक्टर पीडी श्रीमाली, समाजवादी शिक्षक भुवनेश मिश्र, छात्र नेता और समाज शास्त्री आनंद कुमार, निर्मला श्रीनिवासन, समीक्षक वीरेन्द्र यादव और मुद्रा राक्षस जसी चर्चित विभूतियों से मिलने और उनके ज्ञान और विचार की चर्खी पर अपने को शान चढ़ाने का मौका मिला। 
यहीं राजीव, प्रमोद और आशुतोष मिश्र जसे अग्रज मिले और यहीं चंद्रपाल सिंह, हरजिंदर, अंबरीश कुमार, अनूप श्रीवास्तव, शायर अशोक हमराही और जनेन्द्र जन जसे मित्र भी मिले। हर इतवार को होने वाली इस गोष्ठी में इतना जोश भर दिया कि हम लोग पढ़ाई-लिखाई छोड़कर क्रांति के ही बारे में सोचने लगे। इसी केन्द्र के प्रभाव में मैंने अंतद्र्वद्व शीर्षक से एक कविता लिख डाली। उसमें एक युवा छात्र के मन की वही दुविधा थी कि पिता से सपनों पर खड़े होकर कैसे करूंगा क्रांति।
साहित्यिक प्रतिभा  के धनी अतुल सिंघल की सलाह पर उसे दिनमान में भेज तो दो-तिहाई पेज में छप गई। एक तरह मैं कवि के रूप में चर्चित हुआ तो दूसरी तरफ विचार केन्द्र में डाक्टर रूप रेखा वर्मा ने इस दुविधा के चलते मेरी क्रांतिकारिता पर संदेह किया। तिवारी जी की खिचड़ी खाते हुए विचारों के अदहन पर हम लोग इतना खदबदाने लगे कि एक दिन कृष्ण नारायण कक्कड़ ने बाहर चाय की दुकान पर पूछ ही लिया कि क्या यहां तुम लोग विद्वानों को धोबी की तरह पछीटने के लिए बुलाते हो। इसी केन्द्र के लोगों के साथ लखनऊ में पचासों बार धरने और प्रदर्शन में शामिल हुआ और विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति को प्रभावित किया और इसी केन्द्र की ईमानदारी का असर था कि चुनाव लड़ने से पीछे हट गया।
हममें से तमाम लोग लखनऊ के विचार छोड़कर केन्द्र की तरफ आए और तिवारी जी से संपर्क छूट गया। लगभग दस साल बाद तिवारी जी दिल्ली के आईटीओ स्थित नरेन्द्र निकेतन में मिले तो मुङो पहचान नहीं पाए। जब राजीव और प्रमोद कुमार ने याद दिलाया तो प्रेम से गले लगा लिया और फिर खिचड़ी खिलाकर ही विदा किया। तिवारी जी के जने की खबर अंबरीश ने दी तो तमाम आदर्शवादी सपनों का पूरा जमाना याद आ गया। मुंशी जी के निधन पर केजी मेडिकल कालेज में टहलते हुए तिवारी जी ने देह दान को एक आदर्श बताते हुए वैसा ही करने का संकल्प जताया था और किया भी। समाजवाद को हिन्दुत्व की ओर मोड़ने में लगे भुवनेश जी बहुत पहले चले गए थे। कक्कड़ साहब और विष्ट जी जसे लोग भी लखनऊ जने पर नहीं मिलेंगे। पुनीत टंडन के सहारे दिल्ली आया था पर वे पहले ही छोड़ गए। अनूप श्रीवास्तव की संवाद शली हंसाकर प्रसन्न कर देती थी पर उन्हें भी जने की जल्दी थी। इस बड़े खालीपन के बावजूद तिवारी जी के विचार केन्द्र में सादगी और विचारों की ईमानदारी की जो चाभी भरी है, उससे ये मन केन्द्र में रहते हुए भी बार-बार परिधि के लोगों की तरफ भागता रहता है। एक समर्पित समाजवादी का यह क्या कोई कम योगदान है?
लेखक- हिन्दुस्तान, दिल्ली के वरिष्ठ समाचार संपादक हैं।

Saturday, February 14, 2009

ऐसे सड़क पर गिराकर पीटी गई लड़किया



अंबरीश कुमार
लखनऊ,  फरवरी। उत्तर प्रदेश में मायावती की पुलिस का अभियान जरी है। गुरूवार को शिक्षकों की पिटाई हुई तो शुक्रवार को पत्रकार पिटे। आज शनिवार को छात्राओं का नंबर आया। पुलिस ने इस बेरहमी के साथ दो छात्राओं को पीटा कि उन्हें अस्पताल ले जना पड़ा। वेलेन्टाइन दिवस ़के दिन लफंगों और शोहदों के बाद पुलिस ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शहर के एक हिस्से में बजरंगी संस्कृति की रक्षा करने में जुटे थे तो विधानसभा के सामने महिला पुलिस ने दो छात्राओं के साथ जो सुलूक किया, वह शर्मनाक था। हालांकि लखनऊ के एसपी-कानून व्यवस्था रघुवीर लाल ने कहा, ‘मुख्यमंत्री का पुतला फूंकने पर आमादा छात्राएं महिला कांस्टेबिल से भिड़ गई थीं जिसकी वजह से उन्हें सख्ती से पेश आना पड़ा। बाद में शांति भंग की आशंका में तीन छात्राओं व चार छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।’
छात्राओं की पिटाई की फोटो से साफ है कि पुलिस ने किस तरह उनके कपड़ों पर हाथ डाल रखा है। दोनों छात्राओं प्रियंका लाल और अर्चना गोस्वामी को पुलिस ने इतनी बेरहमी से पीटा कि उन्हें अस्पताल ले जना पड़ा। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा-मायावती के राज में पुलिस पूरी तरह बेकाबू हो गई है। ला कालेज की छात्राओं ने आज विधि प्रथम सेमेस्टर परीक्षा की कापियों की पुन: जंच को लेकर जब प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उन पर लाठियां चलाई। जिसके चलते समाजवादी महिला सभा की प्रदेश सचिव प्रिंयका लाल और अर्चना गोस्वामी को गंभीर चोंटे आई। अर्चना गोस्वामी को सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है। प्रदर्शन में अन्य छात्रों के अलावा सौरभ शर्मा, अनामिका, सुपर्ण समदरिया आदि शामिल थे।
गौरतलब है कि डाक्टर भीमराव आंबेडकर ला कालेज के छात्र-छात्राएं विधि प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा को लेकर आंदोलनरत हैं। इस कालेज के ६0 छात्रों में से सिर्फ दो ही छात्र इस बार पास हुए हैं। छात्र इस बात से काफी नाराज थे और आंदोलन के चलते १२ फरवरी से भूख हड़ताल पर बैठे थे। आज इन्हीं छात्र-छात्राओं ने जब मुख्यमंत्री का पुतला फूंकने का प्रयास किया तो महिला पुलिस कांस्टेबिल के साथ उनकी ङाड़प हुई। छात्राएं अपने आंदोलन के चलते जब पुतला फूंकने पर अड़ गई तो उनकी बुरी तरह पिटाई की गई। पिटाई के साथ-साथ पुलिस ने उन्हें सड़क पर गिरा कर मारना शुरू किया। बाकी कहानी इसकी फोटो खुद बता दे रही है। इससे पहले गुरूवार को शिक्षकों के प्रदर्शन के दौरान जो फोटो ली गई थीं, उनमें एडीएम डाक्टर अनिल कुमार पाठक एक शिक्षक के सिर पर जूता मारते नजर आ रहे थे। इसके बाद कल एडीशनल एसपी परेश पांडेय ने पत्रकारों की धुनाई की। इस कड़ी में भय मुक्त समाज की पुलिस ने आज छात्राओं को सड़क पर गिराकर मारा।जनसत्ता 


Friday, February 13, 2009

पत्रकारों पर लाठिया,कई घायल


अंबरीश कुमार
लखनऊ , फरवरी। खबरों की कवरेज पर गए पत्रकारों की आज यहां सीबीआई कोर्ट में पुलिस ने बर्बरता से पिटाई की। कल ही शिक्षकों की पुलिस ने धुनाई की थी। इससे पहले वाराणसी बम धमाकों के आरोपी वलीउल्लाह को जब अदालत में पेश किया गया तो कुछ वकीलों ने उसकी पिटाई की और पत्रकार जब बीच में आए तो उनकी भी ठुकाई की गई। आज की घटना लखनऊ के सीबीआई कोर्ट परिसर में हुई जहां माफिया डान बबलू श्रीवास्तव पेशी पर आया था। पेशी के दौरान ही बबलू श्रीवास्तव के समर्थकों और पुलिस के बीच कुछ कहासुनी हुई जिसके बाद एडीशनल एसपी परेश पांडेय ने बबलू श्रीवास्तव के समर्थकों की पिटाई शुरू करवा दी। बीच में कुछ पत्रकारों को जनबूङाकर निशाना बनाया गया और उन्हें भी लाठियों से पीटा गया। इस घटना में जिन पत्रकारों को चोट आई, उनमें जी न्यूज के आलोक पांडे, आईबीएन ७ के परवेज, लाइव इंडिया के मंजुल, वाइस आफ इंडिया के तारिक और स्टार न्यूज के कैमरामैन प्रेम सिंह शामिल हैं। इस घटना से पत्रकार काफी उत्तेजित हुए और वित्त मंत्री लालजी वर्मा की बजट के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस का बायकाट कर दिया।
स्टार न्यूज के पत्रकार पंकज ङा के मुताबिक इस घटना में वाइस आफ इंडिया के पत्रकार तारिक के टूटे हाथ के प्लास्टर पर भी लाठी चलाई गई जिससे उसका प्लास्टर टूट गया। चश्मदीदों के मुताबिक सीबीआई कोर्ट में जसे ही माफियाडान बबलू श्रीवास्तव पेशी पर पहुंचा, टीवी पत्रकारों की टीम उसकी तरफ लपकी। यह देखते ही एडीशनल एसपी परेश पांडेय ने कहा-यही साले सब हीरो बना देते हैं। आज किसी को भी अंडरट्रायल से बातचीत नहीं करने दी जएगी। इस पर कुछ पत्रकारों से विरोध जताते हुए कहा कि वे हमेशा से बातचीत करते आए हैं। इस पर पांडेय उत्तेजित होकर चिल्लाने लगा और बोला-अभी तक जो करते आए हो, करते आए हो, अब नहीं करने दूंगा। इस पर जसे ही पत्रकार आगे बढ़े, परेश पांडेय लाठी लेकर दौड़े और उनके पीछे दूसरे पुलिस वालों ने भी पत्रकारों की पिटाई शुरू कर दी। इस मामले में परेश पांडेय को देर शाम ट्रांसफर कर दिया गया और बाजर खाला और कैसरबाग सीओ के साथ पांडेय के खिलाफ जंच के आदेश दे दिए गए।
इससे पहले इस घटना को लेकर पत्रकारों के बीच में आए कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह से भी टकराव हुआ। पत्रकार एडीशनल एसपी परेश पांडेय को हटाने की मांग कर रहे थे। बाद में सरकार ने पांडेय को हटाने का एलान किया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने के बाद से पत्रकारों का उत्पीड़न कम नहीं हो रहा है। गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष और आईबीएन सेवन के वरिष्ठ पत्रकार शलभमणि त्रिपाठी ने कहा-आए दिन पत्रकारों को निशाना बनाया ज रहा है। जहां भी मौका मिलता है, सरकार के अफसर पत्रकारों को फर्जी मामलों में फंसाने से लेकर जलील करने तक में पीछे नहीं रहते। पुलिस का रवैया तो और भी खराब है। आज जिस अधिकारी को लेकर टकराव हुआ, उसका व्यवहार पहले से ही बेकाबू था।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का सूचना विभाग के कुछ अफसर पत्रकारों को जलील करने में पीछे नहीं हैं। इनमें सबसे ऊपर नाम सूचना विभाग के एक बददिमाग अफसर एके उपाध्याय का है। इस अफसर के व्यवहार से कई पत्रकार बुरी तरह नाराज हैं। आज कबीना मंत्री अनंत कुमार मिश्र को भी इसकी अनौपचारिक जनकारी कुछ पत्रकारों ने दी। जिसके कुछ देर बाद ही सीबीआई कोर्ट में हुई घटना ने पत्रकारों को और उत्तेजित कर दिया।
समाजदी पार्टी ने पत्रकारों पर पुलिसिया कार्याई की घोर निन्दा की है। सपा ने कहा है कि प्रदेश की राजधानी में सीबीआई कोर्ट में पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि मायाती सरकार को न तो प्रेस की स्तंत्रता से मतलब है, न मानाधिकारों से और नहीं उसमें सम्यता का कोई अंश शेष है। यह पूर्णतया निरंकुश, फासिस्ट तथा तानाशाह सरकार है जो पुलिस-प्रशासन तंत्र का उपयोग लोगों को भयांक्रांत करने में करती है। उसका भयमुक्त और कानून का राज स्थापित करने का दाव  ङाूठा और मक्कारी भरा है। पुलिस ऊपरी शह के कारण प्रदेश में जंगलराज कायम किए हुए है। राजधानी में महिलाओं का सड़क पर निकलना निरापद नहीं है। सूदखोरों को खुली छूट है जिससे उत्पीड़ित लोग जन दे रहे है। अपराधी सत्तादल में संरक्षित है। 
सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा चूंकि प्रेस अपनी शक्ति भर सरकार की काली करतूतों को बेनकाब करता है इसलिए उसको अब कुचलने का पूरा इंतजम हो गया है। वैसे भी मुख्यमंत्री पत्रकारों के साथ अच्छा व्यहार नहीं करती है और अप्रिय सालों पर धमकी देने से भी बाज नहीं आती हैं। प्रेस के काम करने की आजदी उन्हें रास नहीं आती है। समाजवादी पार्टी ने अधिकारियों को भी चेतानी दी कि वे मायाती के कारिदों की तरह काम न करें। प्रेस की आजदी पर कोई भी चोट बर्दाश्त नहीं होगी। समाजदी पार्टी की घायल पत्रकारों के साथ सहानुभूति है और सरकार को इसके लिए सदन में तथा सदन के बाहर जबवही देनी होगी।जनसत्ता 




Thursday, February 12, 2009

‘द स्टेट्समैन’ के संपादक गिरफ्तार
जनादेश ब्यूरो
कोलकाता। कोलकाता में पुलिस ने अंग्रेज़ी अख़बार ‘द स्टेट्समैन’ के संपादक और प्रकाशक को गिरफ़्तार कर लिया है। इन दोनों पर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप लगाया गया है।मुस्लिम सुमदाय के कुछ लोगों ने अख़बार के संपादक रवींद्र कुमार और प्रकाशक आनंद सिन्हा के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी। इससे पहले अखबार में प्रकाशित एक आलेख को लेकर लोगों ने प्रदर्शन किया था। संयुक्त पुलिस आयुक्त प्रशासन प्रदीप चटर्जी ने कहा कि द स्टेट्समैन के संपादक रवीन्द्र कुमार और इसके मुद्रक व प्रकाशक आनंद सिन्हा को  एक शिकायत पर उनके आवास से 
गिरफ्तार किया गया।
मोहम्मद शाहिद ने यहां बऊबाजार थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। कुमार और शर्मा को पुलिस ने मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एस एस आनंद के समक्ष पेश किया और उन्हें पांच हजार रूपए के मुचलके पर अंतरिम जमानत दे दी गई।न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी।जोहान हैरी का व्हाई शुड आई रेस्पेक्ट दीज आप्रेसिव रीलिजन्स यानी मुझे इन दमनकारी धर्मों का आदर क्यों करना चाहिए शीर्षक से प्रकाशित आलेख पहले द इंडिपेंडेंट में छपा था और पांच फरवरी को यहां द स्टेट्समैन में उसे दोबारा प्रकाशित गया।
आलेख के खिलाफ मुसलिम संगठन छह फरवरी से ही द स्टेट्समैन दफ्तर के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। शिकायत में कहा गया कि पैगम्बर के बारे में उक्त लेख के कथन में कोई सच्चाई नहीं है और जानबूझ कर इसे दोबारा छापा गया है। दूसरी ओर, संपादक और प्रकाशक ने कहा है कि उन पर जानबूझकर बुरे इरादे से आलेख प्रकाशित करने का आरोप लगाया गया है जो सही नहीं है। जमाते-उलेमा-ए-हिंद से जुड़े कुछ लोगों ने शिकायत दर्ज की है कि 'द स्टेट्समैन’ में छपे लेख से उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं जो भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध है। इसबीच, संपादक रवींद्र कुमार ने पत्रकारों को बताया कि अख़बार में लेख को दोबारा छापने के लिए वे पहले ही माफ़ी मांग चुके हैं। उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि संपादकीय स्तर पर यह एक गलती थी, लेकिन ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया।जिस लेख यह बवाल मचा है उसे यहाँ पर पढ़ा जा सकता है।



ब्लॉग पर राजनीती

संजीत त्रिपाठी 
रायपुर। ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को चर्चाओं में बना रहना खूब आता है या यूं कहें कि उनकी करीबन हर हरकत चर्चा बन जाती है। इस बार अमित  ने अपने ब्लाग  के जरिए कांग्रेस नेताओं पर जमकर भड़ास निकाली है। वे विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के लिए अपने पिता को जिम्मेदार नहीं मानते। वहीं अपने पिता की उन्होंने खूब तारीफ की है पर उनके विरोधियों पर जमकर कटाक्ष किया है। 
अमित ने पार्टी की नीतियों का पोस्टमार्टम करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि अजीत जोगी को छोड़कर चलने की नीति से कांग्रेस को नुकसान हुआ है। पिछले पांच साल से अजीत जोगी और उनके किसी भी समर्थक को कोई पद नहीं मिला। 
अमित जोगी ने लिखा है कि पार्टी ने विधानसभा चुनाव में एनसीपी से गठबंधन कर भाजपा को तीन सीटें तोहफे में दे दी। मनेन्द्रगढ़ में कांग्रेस काबिज थी। सामरी में एनसीपी के प्रत्याशी को कुछ सौ वोट ही मिले और चंद्रपुर में एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक नोबेल वर्मा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने राजी किए जा सकते थे। 
वे कांग्रेस में अपने पिता के विरोधियों पर कटाक्ष करने से भी पीछे नहीं रहे। मोतीलाल वोरा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने लिखा है कि उन्हीं ने पांच साल पहले जोगी को छोड़कर चलने की नीति लागू की। इकलौते सांसद अजीत जोगी को केंद्र में स्थान नहीं दिया गया। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों से दूर रखा गया। गंगा पोटाई के बारे में कहा कि एक महिला 1990 से लगातार चुनाव हार रही है। अमित के मुताबिक अपनी हार के लिए अजीत जोगी को जिम्मेदार ठहराने वाले पीसीसी नेताओं ने अपनी प्रचार सामग्री में श्री जोगी की तस्वीरों का खुलकर उपयोग किया। वे लोग चुनाव में अपने क्षेत्र से बाहर तक नहीं निकले और हार भी गए। 
अमित ने अपने पिता की तारीफ करते हुए लिखा है कि उन्होंने मरवाही का एक बार भी दौरा नहीं किया फिर भी सबसे अधिक वोटों से जीते। अजीत जोगी के संसदीय क्षेत्र में पार्टी को सात सीटें मिली। इनमें राजिम, धमतरी की सीटें भी है जहां भाजपा काबिज थी।
नेता प्रतिपक्ष के बारे में उन्होंने लिखा है कि अजीत जोगी को विधायक दल का नेता बनाने अधिकांश विधायकों ने हस्ताक्षर किए थे, फिर भी उपेक्षा हुई। इतना काफी नहीं था। ऐसे व्यक्ति रविंद्र चौबे को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया जिसे बनाने अजीत जोगी पांच साल से प्रयासरत थे। उनकी नियुक्ति तब की गई जब उन्होंने अपने आप को मेरे पिता से दूर कर लिया। 
सलवा जुडूम वोट बैंक
उन्होंने सलवा जुडूम को वोट बैंक भुनाने का सुनियोजित तरीका करार दिया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष सलवा जुडूम का नेतृत्व कर रहे थे और पार्टी ने इस मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने से परहेज किया। इसका फायदा भाजपा ने उठाया।
गौरतलब है कि  अमित जोगी ने कुछ अरसा पहले राज्य के आदिवासियों और मछुआरों के साथ दिन बिताए था। बताया जाता है कि इसका उद्देश्य अमित जोगी को आम आदमी के जीवन में आने वाली मुश्किलों को समझने के लायक बनाना था। इस दौरान वे  राज्य के ताला गांव में रहे। हालांकि इस बारे में पूरी गोपनीयता बरती गई थी। अमित जोगी के आदिवासियों के बीच रहने के इस अभियान के पीछे उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत के रूप में देखा गया था। ताकि वे अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नक्शे कदम पर चल सकें। ताला गांव की आबादी करीब 700 है। यहां पर अधिकतर लोग गोंड आदिवासी जाति और केवट मछुआरा जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय की सतनामी जाति के लोग रहते हैं। 
राजधानी रायपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर बिलासपुर जिले में मनियारी नदी के किनारे यह गांव बसा है। सूत्रों के मुताबिक अमित पिछले चार वर्षों से विवादों में रहे हैं। इसलिए उन्होंने गरीब जनता के लिए काम करने का निर्णय लिया। इसके लिए उसने ग्रामीण इलाके के गरीब लोगों के साथ रहने की शुरुआत की। सूत्रों ने आगे कहा कि अमित ने गोंड जनजाति और केवट जाति के लोगों के साथ रात और दिन बिताया। इसका उद्देश्य अमित को आम आदमी की जिंदगी में आने वाली दिन प्रतिदिन की दिक्कतों के बारे में प्रशिक्षित करना है। अमित को कभी 'छत्तीसगढ़ का संजय गांधी' कहा जाता था, क्योंकि उनकी अधिकतर गतिविधियों से विवाद पैदा हो जाता था। कहा जाता है कि अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहते अमित की सरकारी कामकाज में भागीदारी बढ़ गयी थी।