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Thursday, February 12, 2009

ब्लॉग पर राजनीती

संजीत त्रिपाठी 
रायपुर। ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को चर्चाओं में बना रहना खूब आता है या यूं कहें कि उनकी करीबन हर हरकत चर्चा बन जाती है। इस बार अमित  ने अपने ब्लाग  के जरिए कांग्रेस नेताओं पर जमकर भड़ास निकाली है। वे विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के लिए अपने पिता को जिम्मेदार नहीं मानते। वहीं अपने पिता की उन्होंने खूब तारीफ की है पर उनके विरोधियों पर जमकर कटाक्ष किया है। 
अमित ने पार्टी की नीतियों का पोस्टमार्टम करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि अजीत जोगी को छोड़कर चलने की नीति से कांग्रेस को नुकसान हुआ है। पिछले पांच साल से अजीत जोगी और उनके किसी भी समर्थक को कोई पद नहीं मिला। 
अमित जोगी ने लिखा है कि पार्टी ने विधानसभा चुनाव में एनसीपी से गठबंधन कर भाजपा को तीन सीटें तोहफे में दे दी। मनेन्द्रगढ़ में कांग्रेस काबिज थी। सामरी में एनसीपी के प्रत्याशी को कुछ सौ वोट ही मिले और चंद्रपुर में एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक नोबेल वर्मा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने राजी किए जा सकते थे। 
वे कांग्रेस में अपने पिता के विरोधियों पर कटाक्ष करने से भी पीछे नहीं रहे। मोतीलाल वोरा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने लिखा है कि उन्हीं ने पांच साल पहले जोगी को छोड़कर चलने की नीति लागू की। इकलौते सांसद अजीत जोगी को केंद्र में स्थान नहीं दिया गया। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों से दूर रखा गया। गंगा पोटाई के बारे में कहा कि एक महिला 1990 से लगातार चुनाव हार रही है। अमित के मुताबिक अपनी हार के लिए अजीत जोगी को जिम्मेदार ठहराने वाले पीसीसी नेताओं ने अपनी प्रचार सामग्री में श्री जोगी की तस्वीरों का खुलकर उपयोग किया। वे लोग चुनाव में अपने क्षेत्र से बाहर तक नहीं निकले और हार भी गए। 
अमित ने अपने पिता की तारीफ करते हुए लिखा है कि उन्होंने मरवाही का एक बार भी दौरा नहीं किया फिर भी सबसे अधिक वोटों से जीते। अजीत जोगी के संसदीय क्षेत्र में पार्टी को सात सीटें मिली। इनमें राजिम, धमतरी की सीटें भी है जहां भाजपा काबिज थी।
नेता प्रतिपक्ष के बारे में उन्होंने लिखा है कि अजीत जोगी को विधायक दल का नेता बनाने अधिकांश विधायकों ने हस्ताक्षर किए थे, फिर भी उपेक्षा हुई। इतना काफी नहीं था। ऐसे व्यक्ति रविंद्र चौबे को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया जिसे बनाने अजीत जोगी पांच साल से प्रयासरत थे। उनकी नियुक्ति तब की गई जब उन्होंने अपने आप को मेरे पिता से दूर कर लिया। 
सलवा जुडूम वोट बैंक
उन्होंने सलवा जुडूम को वोट बैंक भुनाने का सुनियोजित तरीका करार दिया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष सलवा जुडूम का नेतृत्व कर रहे थे और पार्टी ने इस मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने से परहेज किया। इसका फायदा भाजपा ने उठाया।
गौरतलब है कि  अमित जोगी ने कुछ अरसा पहले राज्य के आदिवासियों और मछुआरों के साथ दिन बिताए था। बताया जाता है कि इसका उद्देश्य अमित जोगी को आम आदमी के जीवन में आने वाली मुश्किलों को समझने के लायक बनाना था। इस दौरान वे  राज्य के ताला गांव में रहे। हालांकि इस बारे में पूरी गोपनीयता बरती गई थी। अमित जोगी के आदिवासियों के बीच रहने के इस अभियान के पीछे उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत के रूप में देखा गया था। ताकि वे अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नक्शे कदम पर चल सकें। ताला गांव की आबादी करीब 700 है। यहां पर अधिकतर लोग गोंड आदिवासी जाति और केवट मछुआरा जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय की सतनामी जाति के लोग रहते हैं। 
राजधानी रायपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर बिलासपुर जिले में मनियारी नदी के किनारे यह गांव बसा है। सूत्रों के मुताबिक अमित पिछले चार वर्षों से विवादों में रहे हैं। इसलिए उन्होंने गरीब जनता के लिए काम करने का निर्णय लिया। इसके लिए उसने ग्रामीण इलाके के गरीब लोगों के साथ रहने की शुरुआत की। सूत्रों ने आगे कहा कि अमित ने गोंड जनजाति और केवट जाति के लोगों के साथ रात और दिन बिताया। इसका उद्देश्य अमित को आम आदमी की जिंदगी में आने वाली दिन प्रतिदिन की दिक्कतों के बारे में प्रशिक्षित करना है। अमित को कभी 'छत्तीसगढ़ का संजय गांधी' कहा जाता था, क्योंकि उनकी अधिकतर गतिविधियों से विवाद पैदा हो जाता था। कहा जाता है कि अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहते अमित की सरकारी कामकाज में भागीदारी बढ़ गयी थी।
 

Thursday, October 16, 2008

 जोगी की टक्कर का नेता नही

संजीत त्रिपाठी

रायपुर , अक्टूबर। राज्य में राजनैतिक दलों में विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी भले ही अभी तय न हुए हों पर कांग्रेस-भाजपा दोनों ही एक दूसरे के बडे नेताओं को घेरने की रणनीति बनाने में लगे हुए है। वही  इन पार्टियों के अन्दर के धडे अपने ही पार्टी के नेताओं के भी पर कतरने की कोशिश में लगे हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी चाहकर भी अब तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की काट या उनकी टक्कर का नेता नही ढूंढ पाई है जो जोगी को ताल ठोंककर  चुनौती दे सके। वहीं जोगी लगातार मुख्यमंत्री रमन सिंह को चुनौती देने में लगे हुए है। भाजपा के कुछ रणनीतिकार इसके चलते जोगी का ध्यान रमन से हटाकर रेणु जोगी की सीट पर केंद्रित करवाने की योजना पर काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि अगर यह योजना सफल हो गई तो एक तीर से कई शिकार होने वाली बात हो जाएगी। इसके तहत भाजपा की तेज -तर्रार प्रवक्ता व दुर्ग की महापौर सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारने का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि सरोज पाण्डेय की पसंद सिर्फ और सिर्फ शहरी क्षेत्र है उसमें भी सिर्फ दुर्ग ही उनकी पहली पसंद है। भाजपा सूत्रों की मानें तो दरअसल सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारकर पार्टी दुर्ग के वर्तमान विधायक व मंत्री हेमचंद यादव को वहां से लड़ने के लिए हरी झंडी देना चाहती है। क्योंकि यादव  समर्थक पार्टी की प्रत्याशी चयन समिति के सामने मुखर होकर सरोज पाण्डेय को टिकट दिए जाने की मुखालफत कर चुके है।
इसी तरह यह बात सर्वविदित है कि सरोज पाण्डेय को राजनीति मे आगे बढ़ाने वाले वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष प्रेप्रकाश पाण्डेय ही हैं। पर इस बार मामला इसलिए दिलचस्प होता नजर आ रहा है कि प्रेमप्रकाश पाण्डेय खुद ही सरोज पाण्डेय को  दुर्ग शहर से टिकट दिए जाने का विरोध करते हुए यहां तक धमकी दे रहे है कि अगर सरोज पाण्डेय को टिकट दी जा रही है तो मुझे न दी जाय। बताया जाता है इसके पीछे पी पी पी यह तर्क दे रहे हैं कि आसपास लगी हुई दो सीटों पर ब्राम्हण  उम्मदवारों के होने परिणाम गड़बड़ा सकते है . गौरतलब है कि प्रेमप्रकाश पाण्डेय भिलाई नगर विधानसभा सीट के दावेदार हैं जो दुर्ग शहर से लगी ही हुई है। इसी सबके चलते सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारा जा सकता है और वहां बडे नेताओं की सभाएं भी करवाई जा सकती है ताकि अजीत जोगी प्रचार के लिए अपनी सीट के साथ साथ कोटा सीट से ही बंध कर रह जाएं।
गौरतलब है कि भाजपा ने करीबन इसी तर्ज पर अपनी राष्ट्रीय प्रवक्ता सुषमा स्वराज को भी सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक के बेल्लारी  लोकसभा चुनाव में उतार दिया था । नतीजे चाहे जो भी आए रहे हों पर इसके पार्टी के अंदर सुषमा स्वराज का प्रभाव तत्कालिक रूप से कम हो गया था। इसी तरह छत्तीसगढ़ में दोनो ही पार्टियां जिस रणनीति पर काम कर रही है उसके तहत 'साजा के राजा' माने जाने वाले कांग्रेसी विधायक व पूर्व मंत्री  रविन्द्र चौबे के खिलाफ भाजपा ऐसे किसी साहू उम्मीदवार की तलाश में है जिसे वहां से उतारा जा सके । इस बार तो परिसीमन के कारण हालात और भी बदले नजर आ रहे हैं क्योंकि परिसीमन के चलते साजा विधानसभा क्षेत्र में कई गांव अलग हो गए है व कई ऐसे नए गांव जुडे हैं जो साहू बहुल हैं।
इसी तरह पाटन क्षेत्र के तेज-तर्रार कांग्रेसी विधायक व पूर्व मंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ  सांसद ताराचंद साहू की ही पुत्री झमिता साहू को उतारा जा सकता हैं। ध्यान देने लायक बात यह है कि झमिता साहू पूर्व में पार्टी की टिकट न मिलने पर जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीत चुकी हैं। बहरहाल, पार्टियां जब तक अपने उम्मीदवार तय नही कर लेतीं तब तक  रणनीति बनाने का यह दौर जारी रहेगा।
 वह तो चांदनी चौक या सदर बाजार के नेता ही कहे जा सकते हैं। ऐसे में भाजपा का यह चयन सही ठहराया जा सकता है क्योंकि उसने उस रिक्तता को भरने की कोशिश की है जोकि मदन लाल खुराना के पार्टी छोड़ने के बाद से थी। हालांकि खुराना अब पार्टी में लौट चुके हैं लेकिन पार्टी ने उन्हें कोई भूमिका नहीं देकर साफ कर दिया है कि उसने अभी तक उनको पूरी तरह से माफ नहीं किया है। मल्होत्रा के चयन से एक और बात साफ हो गई है कि दिल्ली भाजपा में पंजाबी समुदाय का बोलबाला बरकरार है। पूर्व में खुराना और केदारनाथ साहनी होते थे और अब मल्होत्रा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और वह पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली विधानसभा में इस समय विपक्ष के नेता जगदीश मुखी भी पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली की महापौर आरती मेहरा भी पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के घोषणापत्र समिति के प्रमुख पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर भी पंजाबी समुदाय से हैं। 
दिल्ली चुनावों के लिए प्रभारी बनाये गये अरुण जेटली भी पंजाबी समुदाय से हैं। दरअसल पंजाबी समुदाय दिल्ली में भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता रहा है। ऐसा कम से कम खुराना के समय तक तो था ही, खुराना के जाने के बाद कहीं वह वोटर छिटके नहीं इसलिए भी मल्होत्रा के नाम को उचित माना गया। पार्टी ने विजय गोयल और हर्षवर्धन को लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाने का आश्वासन दिया है। विजय गोयल की तो सीट पहले से ही निर्धारित है। हर्षवर्धन को पार्टी पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बना सकती है। 

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव-आसान नहीं बीजापुर से कांग्रेस की राह

देश के पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ‘जनादेश’  इन राज्यों की राजनीति और उससे जुड़ी हलचलों पर विशेष फोकस करने जा रहा है। इसकी शुरुआत आज से ही की जा रही है। हम छत्तीसगढ़ की एक-एक विधानसभा सीट की वर्तमान राजनैतिक हालात की समीक्षा प्रस्तुत करेंगे।

आसान नहीं बीजापुर से कांग्रेस की राह
संदीप पुराणिक

रायपुर।  बीजापुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता वर्तमान विधायक राजेन्द्र पामभोई से नाराज बताए जाते हैं। नक्सलियों द्वारा दी गई धमकी के बाद उन्होंने क्षेत्र में जाना बंद कर दिया है। राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि यदि कांग्रेस उन्हें प्रत्याशी बनाती है तो वे अपना प्रचार कैसे करेंगे? यहां इस बार भाजपा के पक्ष में वर्तमान विधायक व विकास कार्यों तथा सरकारी योजनाओं के कारण अच्छा माहौल दिखाई दे रहा है। इस चुनाव में यहां से  भाजपा को फायदा मिल सकता है। 
बीजापुर विधानसभा ने अक्सर कांग्रेस पर अपना विश्वास व्यक्त किया है। सन् 52 से आज तक 10 बार क्षेत्र के मतदाताओं ने कांग्रेस प्रत्याशी को विजयश्री दिलाकर विधायक बनाया है। गहन नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में सन् 1993 में भाजपा के प्रत्याशी को भी सफलता मिली। वर्तमान में कांग्रेस के अजीत जोगी के कट्टर समर्थक माने जाने वाले राजेन्द्र पामभोई विधायक हैं। 1952 में कांग्रेस के हीराशाह ने नामांकन दाखिल किया लेकिन किसी अन्य ने उनके खिलाफ पर्चा नहीं भरा। हीराशाह 52 में निर्विरोध निर्वाचित होकर विधानसभा में पहुंचे थे। 1957 के चुनाव में देश की आजादी का प्रभाव था। कांग्रेस सबके दिलों पर राज कर रही थी। क्षेत्र में भी इसका पूरा प्रभाव था मतदाताओं ने कांग्रेस के बी.आर. पामभोई को विधायक चुनकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। अगले चुनाव 1962 में हुए कांग्रेस के हीराशाह ने पचा भरा उनके सामने मुकाबले में कोई नहीं आया वे निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। इस प्रकार वे दो बार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। लेकिन एक घटनाक्रम के बाद यहां 27 अप्रैल 62 को उपचुनाव कराने पड़े कांग्रेस के पूर्व विधायक बी.आर. पामभोई पुन: विधायक बनाए गए उनका मुकाबला दो निर्दलीय आयतूराम व कोसा ने किया। सन् 1967 में 5 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे पहली बार जनसंघ ने हंगा मेंडा को अपना प्रत्याशी बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कांग्रेस ने बकैया राज को प्रत्याशी बनाया लेकिन दोनों राजनैतिक दलों को निर्दलीय दृगपाल शाह केशरीशाह ने मात देकर विजय प्राप्त की। सन् 1972 चुनावी समर में फिर 5 प्रत्याशी उतरे कांग्रेस के किष्टैया पप्पैया विधायक बने। उन्होंने निर्दलीय पूर्व विधायक दृगपाल को हराया। जनसंघ प्रत्याशी कन्हैया राजैय्या तीसरे क्रम में खड़े दिखाई दिए। 1977 में जनता लहर गहन बीहड़ वन क्षेत्र में पहुंच गई। जनता पार्टी ने महादेव आयतूराम को प्रत्याशी बना दिया। इस चुनाव में क्षेत्र के मतदाताओं ने परिवर्तन करके यह संदेश दिया कि देश की राजनैतिक हलचलों से यह बीहड़ क्षेत्र बराबर का सरोकार रखता है, महादेव आयतूराम विधायक बने। 1980 में कांग्रेस के महादेव राणा विधायक बने, उनका मुकाबला निर्दलीय राजेन्द्र कुमार बकैया पामभोई से हुआ। जनसंघ तीसरे क्रम पर ही खड़ी दिखाई दी। सन् 85 में भी कांग्रेस की विजय पताका शिशुपाल शाह ने विधायक बनकर फहराई। इस चुनाव में  उनका मुकाबला भाकपा के चिंतुर सुखराम से हुआ। जनसंघ भाजपा बन चुकी थी, फिर भी वह तीसरे क्रम पर ही खड़ी रही। 1990 के चुनाव में भाजपा ने यकायक मुकाबले पर आकर अपना जनाधार साबित कर दिया। उनके प्रत्याशी राजाराम तोडेम कांग्रेस प्रत्याशी राजेन्द्र पामभोई से मात्र 96 मतों से हार गए। लेकिन अपनी बढ़ी हुई शक्ति का प्रदर्शन कर दिया। 1993 में भाजपा से सतर्क कांग्रेस ने राजेन्द्र पामभोई को चुनाव मैदान में उतारा। राजाराम तोडेम ने कड़ा मुकाबला किया और 877 मतों से जीत हासिल कर पहली बार भाजपा का केशरिया ध्वज फहराया। क्षेत्र के लिए राजेन्द्र व राजाराम परंपरागत प्रतिद्वंद्वी बन गए। मतदाताओं ने दोनों पर भरपूर प्यार लुटाया आंकड़ों की गणित कभी राजेन्द्र कभी राजाराम के पक्ष में गई। 1998 में पुन: राजेन्द्र पामभोई विधायक बने। उन्होंने तोडेम को 7141 मतों से मात दी। 2003 में जब बस्तर का मतदाता भाजपा को जीत के मत डाल रहा था बीजापुर के मतदाता कांग्रेस पर अपनी मुहर लगा रहे थे। राजेन्द्र पामभोई ने तोडेम को 2721 मतों से फिर परास्त कर दिया। क्षेत्र महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में चल रहे आदिवासियों के सलवा जुडूम से प्रभावित है। राजेन्द्र पामभोई भी उसके अगुवा बने महेन्द्र कर्मा का साथ दिया। मंचासीन हुए लेकिन गुटबाजी की राजनीति व जोगी का नेतृत्व स्वीकार कर अपने गुट के इशारे पर उन्होंने बड़ी खूबसूरती से सलवा जुडूम आंदोलन से कन्नी काट कर लिया कल तक जुडूम जिंदाबाद के नारे लगाने वाले पामभोई जुडूम व महेन्द्र कर्मा के खिलाफ आग उगलने लगे। कल के दोस्त महेन्द्र कर्मा से छत्तीस का आंकड़ा बन गया। दोनों नेताओं में क्षेत्र के लोग एक मूल फर्क यह बताते हैं कि महेन्द्र को नक्सलियों ने बीजापुर में चुनौती दी तो वे सीना तान कर बीजापुर में घुसे चुनौती को स्वीकार किया लेकिन भैरमगढ़ क्षेत्र में हुए एक बारूदी विस्फोट में बच जाने के बाद राजेन्द्र पामभोई ने आज तक क्षेत्र की तरफ पलट कर भी नहीं देखा। लोग कहते हैं वे क्षेत्र में विकास तो हो रहा है पर धीमी चाल में और उसका श्रेय विधायक को नहीं जिले के मंत्री डा. सुभाऊ कश्यप को लोग देते हैं। लोग श्री पामभोई से नाराज दिखाई दिए। आगामी चुनाव में भी राजेन्द्र पामभोई की दावेदारी इस क्षेत्र की टिकट पर है। श्री पामभोई की टिकट का विरोध महेन्द्र कर्मा कर रहे हैं और पूर्व में कम्युनिस्ट पार्टी में रहे शंकनी चन्दैया को टिकट दिलाना चाहते हैं। ज्ञात रहे कि ये वही शंकनी चन्दैया है जिन्होंने पिछला चुनाव भाकपा की टिकट पर राजेन्द्र पामभोई के खिलाफ लड़ा था। एक घटनाक्रम में सलवा जुडूम से प्रभावित होकर उन्होंने महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस प्रवेश कर लिया। श्री कर्मा ने हाईकमान से कहा है कि पामभोई के स्थान पर किसी अन्य को टिकट देने की मांग की है। भाजपा से टिकट के दावेदार राजाराम तोडेम व महेश जागड़ा है। बीजापुर विधानसभा क्षेत्र में भाकपा का कोई खास प्रभाव नहीं है। यहां कांग्रेस व भाजपा के बीच ही सीधा मुकाबला होगा। इस चुनाव में भाजपा को सीधा फायदा होने के आसार है। क्योंकि वर्तमान विधायक राजेन्द्र पामभोई जब से उन्हें नक्सलियों की धमकी मिली है तब से क्षेत्र में जाना बंद कर दिए हैं। क्षेत्र के मतदाताओं के मन में उनके प्रति काफी नाराजगी है। संसदीय सचिव सुभाऊ कश्यप ने क्षेत्र में शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाए हैं, तथा विकास कार्य काफी कराए हैं। इसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। यदि कांग्रेस पामभोई को प्रत्याशी बनाती है तो उन्हें मतदाताओं को अपने पक्ष में करने तथा उनका आक्रोश दूर करने में समय व्यतीत हो जाएगा। मान मनौव्वल में समय व्यतीत करने से उनका यह चुनाव जीत पाना कठिन है। जिस नक्सली धमकी के कारण वे क्षेत्र में जाना बंद कर दिए हैं उस क्षेत्र में वे अपना चुनाव प्रचार कैसे करेंगे यह भी सोचनीय प्रश्न है? बीजापुर क्षेत्र धूर नक्सल प्रभावित है। यहां भी कई गांव नक्सली आतंक के कारण खाली हो चुके हैं। काफी संख्या में ग्रामीण शिविर में रह रहे हैं। सरकार ने शिविर में रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा व्यवस्था, रहने की व्यवस्था, रोजगार के साधन, पेयजल व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा की व्यवस्था की है। जानकारों का कहना है कि वर्तमान विधायक ने शिविर में रहने वाले ग्रामीणों का हालचाल भी जानने का शिविर स्थल में जाकर प्रयास नहीं किया है। विधायक के क्षेत्र में नहीं रहने के कारण क्षेत्र में विकास कार्य भी प्रभावित हुआ है। राजेन्द्र पामभोई को कांग्रेस ने चार बार प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा वे तीन बार जीते हैं और एक बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा है।

Friday, October 3, 2008

टाटा के जाने से टूट गए सपने

प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता, अक्तूबर। सिंगूर से टाटा मोटर्स के हाथ खींचने की वजह से पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीरण की प्रक्रिया को तो करारा ङाटका लगा ही है, कई सपने टूट गए हैं। इस बात का अंदेशा तो उसी समय पैदा हो गया था जब दो सितंबर को टाटा मोटर्स ने ¨सगुर संयंत्र का काम औपचारिक तौर पर बंद रखने का फैसला किया था। लेकिन बुधवार को रतन टाटा ने औपचारिक तौर पर सिंगूरसे वापसी का एलान कर उन तमाम सपनों पर पानी फिर गया, जो इस परियोजना के इर्द-गिर्द पनपने लगे थे। नैनो टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा के सपनों की कार तो थी ही, इस कार संयंत्र के आसपास बसे लोगों की आखों में भी इसने कई नए सपनों को जन्म दिया था। इलाके के नवधनाढच्यों के पैसों को भुनाने के लिए इलाके में कार व मोटरसाइकिलों के शोरूम तो खुले ही थे, बैंकों की कई शाखाएं भी खुल गई थीं। दिसंबर 2006 तक ¨सिंगूरमें महज दो बैंकों की ही शाखाएं थी, लेकिन अब यह तादाद सात तक पहुंच गई थी। इन बैंकों का टर्नओवर भी लगातार बढ़ रहा था।
वैसे, सिंगूर से टाटा की रवानगी की उल्टी गिनती तो उसी समय शुरू हो गई थी जब अगस्त के आखिर में तृणमूल के लोगों ने कर्मचारियों के साथ मारपीट की और उनको संयंत्र में काम पर जने से रोक दिया था। बीते २२ अगस्त को रतन टाटा ने जब यहां ¨सगुर से हाथ खींचने की चेतावनी दी थी, तब उन्होंने इसके लिए कोई समयसीमा नहीं तय की थी। शायद उनको उस समय भी हालात बदलने की उम्मीद रही होगी। टाटा ने आज माना भी कि उनको हालत सुधरने की उम्मीद थी। लेकिन डेढ़ महीने के इंतजर के बावजूद गतिरोध टूटते नहीं देख टाटा का धैर्य जवाब दे गया। टाटा ने कहा था कि भारी निवेश के बावजूद अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए वे इस परियोजना को कहीं और ले ज सकते हैं।। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा था कि अगर वे ¨सगुर से हाथ खींचते हैं तो राज्य में निवेश की टाटा समूह की भावी योजनाओं का प्रभावित होना तय है। सिंगुर में काम बंद होने से सिर्फ यहां से लखटकिया निकालने का टाटा समूह का सपना ही नहीं टूटा, बेशुमार लोगों के सपने टूट गए हैं। इनमें इस संयंत्र को जरिए राज्य में औद्योगिकीकरण अभियान को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाने का मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का सपना है तो इस संयंत्र में रोगजर पाने और इससे इलाके का कायाकल्प होने का लोगों का सपना भी टूटा है। टाटा के इस फैसले से राज्य में जरी औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को भारी ङाटका लगेगा। 
हुगली जिले के इस अनाम-से कस्बे में लखटकिया कार के लिए जमीन देने वाले ज्यादातर किसान भी चाहते थे कि नैनो इसी संयंत्र से बाहर निकले। इस परियोजना ने स्थानीय लोगों का जीवन और रहन-सहन का स्तर ही बदल दिया है। टाटा मोटर्स की इस परियोजना में सैकड़ों स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिला ही था, जमीन के बदले किसानों को जितने पैसे मिले, उसकी तो उन लोगों ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। लेकिन अब उन लोगों के सामने वजूद का सवाल खड़ा हो गया है। जमीन के एवज में मिले लाखों रुपए ने दो जून भरपेट भात के लिए तरसने वाले इन किसानों की ¨जदगी में पहिए लगा दिए थे। जिस जमीन की कीमत कल तक कौड़ियों में थी, वह रातोंरात आसमान चूमने लगी थी। परियोजना के जमीन देवे वाले कृष्णोंदु दास का कहना था कि इस परियोजना ने इलाके के लोगों में रोजगार और समृद्धि की उम्मीदें जगाई थी। इलाके के कई युवक तो इसमें काम भी कर रहे हैं। लेकिन अब तो हम न घर के रहे और न घाट के। 
इलाके के ज्यादातर लोगों का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद इलाके में विकास की प्रक्रिया और तेज हो जती। लेकिन अब बेहतर भविष्य के स्थानीय लोगों खासकर युवकों के सपने धुंधलाने लगे हैं।यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टाटा को अपने इस फैसले से सिर्फ आर्थिक नुकसान ही उठाना पड़ेगा। लेकिन उनके इस फैसले से ¨सगुर समेत पूरे राज्य और इसकी साख को जो नुकसान होगा उसकी भरपाई कर पाना काफी मुश्किल होगा। टाटा ने भले कहा हो कि राज्य में निवेश के माहौल से इस फैसले का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इसका असर भावी निवेशकों पर भी पड़ना तय है। इस फैसले के दूरगामी नतीजे तो बाद में सामने आएंगे, लेकिन इससे व्यावसायिक तबके में जो उथल-पुथल शुरू हो गई है, उसके ङाटके तो अभी से महसूस होने लगे हैं।जनसत्ता से