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Wednesday, January 7, 2009

भाजपा में ठाकुरवाद हावी-साहू

संजीत त्रिपाठी
रायपुर, जनवरी । भारतीय जनता पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किए गए दुर्ग के सांसद ताराचंद साहू ने पार्टी को दिमागी रूप से दिवालिया करार देते हुए कहा है कि योजनापूर्वक षड़यंत्र कर उन्हें शिकार बनाया गया है क्योंकि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडे को विधानसभा चुनाव में हरवाने के लिए तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत संगठन महामंत्री सौदान सिंह की मौन सहमति थी। उन्होंने अपने भावी कदमों का खुलासा न करते हुए कहा कि वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के तहत आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाएंगे। दुर्ग सांसद ने कहा कि वे जगदलपुर सरगुजा को छोड़कर अन्य स्थानों पर भाजपा को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं।
स्थानीय प्रेस क्लब में खचा-खच भरी संवाददाताओं की भीड़ में उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को 'निरीह प्राणी' बताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ रविशंकर प्रसाद व सौदान सिंह ने षड़यंत्र कर उन्हें पार्टी से निकाला है। यह पहली ऐसी राजनैतिक पार्टी होगी जिसने चार साल पहले की घटनाओं पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। हालांकि एक घटना हाल में हुए विधानसभा चुनाव की है। 
उन्होंने कहा कि उन्होंने गैर छत्तीसगढ़ियों को डराने-भगाने या मारने की बात कभी नहीं कही बल्कि सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि वे शासन व शोषण की बातें सोचें भी नहीं दुर्ग सांसद ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ भाजपा में बाहरी लोग हाबी हैं जो इसे उपनिवेश मानकर शोषण कर रहे हैं। जो इनकी जी-हजूरी नहीं करते स्वाभिमान की बात करते हैं उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। जो छत्तीसगढ़ की माटी, स्वाभिमान व तरक्की की बातें करते हैं। उनके लिए कोई स्थान भाजपा में नहीं है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पार्टी छोड़ने वाले समर्थकों की कतार लग जाएगी। वहीं जान का खतरा होने के सवाल पर उनका कहना था कि वे जान हथेली पर लेकर निकले हैं। उन्होंने कहा कि 6 महीने बाद यह एहसास होगा कि रमन कर गद्दी खतरे में है या नहीं। उन्होंने कहा कि जो रविशंकर प्रसाद खुद एक सरपंच नहीं बन सकते वे अगर हमें अनुशासन का पाठ पढाएंगे तो कतई बर्दाश्त नहीं होगा। 
  भाजपा में 'सिंह' लॉबी हावी
निष्कासित सांसद ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में 'सिंह' लॉबी हावी है। उन्होंने कहा कि पार्टी के दुर्दिन आ रहे हैं। एक तरफ भावी प्रधानमंत्री के रूप में अडवाणी को प्रोजेक्ट किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ पूर्व उप राष्ट्रपति शेखावत कह रहे हैं कि वे अडवाणी को प्रधानमंत्री पद पर उम्मीदवार नहीं बनने देंगे व खुद चुनाव लडेग़े। इसी से साबित होता है कि पार्टी का अंदरूनी हाल क्या है। 
रमन छत्तीसगढ़िया नहीं बल्कि प्रतापगढ़िया
पार्टी से निष्कासित किए गए ताराचंद साहू ने कहा कि मुख्यमंत्री रमन सिंह खुद छत्तीसगढ़िया नहीं बल्कि प्रतापगढ़िया हैं। उनका मूल स्थान यूपी का प्रतापगढ़ है। इसी तरह उनकी सूची में किसी अन्य नेता का भी नाम शामिल होने के सवाल पर उन्होंने भाजपा नेत्री सरोज पांडेय का नाम लिए बगैर स्वीकार किया कि हां एक महिला नेत्री के खिलाफ भी वे मुहिम चलाएंगे।

Thursday, October 16, 2008

 जोगी की टक्कर का नेता नही

संजीत त्रिपाठी

रायपुर , अक्टूबर। राज्य में राजनैतिक दलों में विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी भले ही अभी तय न हुए हों पर कांग्रेस-भाजपा दोनों ही एक दूसरे के बडे नेताओं को घेरने की रणनीति बनाने में लगे हुए है। वही  इन पार्टियों के अन्दर के धडे अपने ही पार्टी के नेताओं के भी पर कतरने की कोशिश में लगे हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी चाहकर भी अब तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की काट या उनकी टक्कर का नेता नही ढूंढ पाई है जो जोगी को ताल ठोंककर  चुनौती दे सके। वहीं जोगी लगातार मुख्यमंत्री रमन सिंह को चुनौती देने में लगे हुए है। भाजपा के कुछ रणनीतिकार इसके चलते जोगी का ध्यान रमन से हटाकर रेणु जोगी की सीट पर केंद्रित करवाने की योजना पर काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि अगर यह योजना सफल हो गई तो एक तीर से कई शिकार होने वाली बात हो जाएगी। इसके तहत भाजपा की तेज -तर्रार प्रवक्ता व दुर्ग की महापौर सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारने का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि सरोज पाण्डेय की पसंद सिर्फ और सिर्फ शहरी क्षेत्र है उसमें भी सिर्फ दुर्ग ही उनकी पहली पसंद है। भाजपा सूत्रों की मानें तो दरअसल सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारकर पार्टी दुर्ग के वर्तमान विधायक व मंत्री हेमचंद यादव को वहां से लड़ने के लिए हरी झंडी देना चाहती है। क्योंकि यादव  समर्थक पार्टी की प्रत्याशी चयन समिति के सामने मुखर होकर सरोज पाण्डेय को टिकट दिए जाने की मुखालफत कर चुके है।
इसी तरह यह बात सर्वविदित है कि सरोज पाण्डेय को राजनीति मे आगे बढ़ाने वाले वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष प्रेप्रकाश पाण्डेय ही हैं। पर इस बार मामला इसलिए दिलचस्प होता नजर आ रहा है कि प्रेमप्रकाश पाण्डेय खुद ही सरोज पाण्डेय को  दुर्ग शहर से टिकट दिए जाने का विरोध करते हुए यहां तक धमकी दे रहे है कि अगर सरोज पाण्डेय को टिकट दी जा रही है तो मुझे न दी जाय। बताया जाता है इसके पीछे पी पी पी यह तर्क दे रहे हैं कि आसपास लगी हुई दो सीटों पर ब्राम्हण  उम्मदवारों के होने परिणाम गड़बड़ा सकते है . गौरतलब है कि प्रेमप्रकाश पाण्डेय भिलाई नगर विधानसभा सीट के दावेदार हैं जो दुर्ग शहर से लगी ही हुई है। इसी सबके चलते सरोज पाण्डेय को रेणु जोगी के खिलाफ उतारा जा सकता है और वहां बडे नेताओं की सभाएं भी करवाई जा सकती है ताकि अजीत जोगी प्रचार के लिए अपनी सीट के साथ साथ कोटा सीट से ही बंध कर रह जाएं।
गौरतलब है कि भाजपा ने करीबन इसी तर्ज पर अपनी राष्ट्रीय प्रवक्ता सुषमा स्वराज को भी सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक के बेल्लारी  लोकसभा चुनाव में उतार दिया था । नतीजे चाहे जो भी आए रहे हों पर इसके पार्टी के अंदर सुषमा स्वराज का प्रभाव तत्कालिक रूप से कम हो गया था। इसी तरह छत्तीसगढ़ में दोनो ही पार्टियां जिस रणनीति पर काम कर रही है उसके तहत 'साजा के राजा' माने जाने वाले कांग्रेसी विधायक व पूर्व मंत्री  रविन्द्र चौबे के खिलाफ भाजपा ऐसे किसी साहू उम्मीदवार की तलाश में है जिसे वहां से उतारा जा सके । इस बार तो परिसीमन के कारण हालात और भी बदले नजर आ रहे हैं क्योंकि परिसीमन के चलते साजा विधानसभा क्षेत्र में कई गांव अलग हो गए है व कई ऐसे नए गांव जुडे हैं जो साहू बहुल हैं।
इसी तरह पाटन क्षेत्र के तेज-तर्रार कांग्रेसी विधायक व पूर्व मंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ  सांसद ताराचंद साहू की ही पुत्री झमिता साहू को उतारा जा सकता हैं। ध्यान देने लायक बात यह है कि झमिता साहू पूर्व में पार्टी की टिकट न मिलने पर जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीत चुकी हैं। बहरहाल, पार्टियां जब तक अपने उम्मीदवार तय नही कर लेतीं तब तक  रणनीति बनाने का यह दौर जारी रहेगा।
 वह तो चांदनी चौक या सदर बाजार के नेता ही कहे जा सकते हैं। ऐसे में भाजपा का यह चयन सही ठहराया जा सकता है क्योंकि उसने उस रिक्तता को भरने की कोशिश की है जोकि मदन लाल खुराना के पार्टी छोड़ने के बाद से थी। हालांकि खुराना अब पार्टी में लौट चुके हैं लेकिन पार्टी ने उन्हें कोई भूमिका नहीं देकर साफ कर दिया है कि उसने अभी तक उनको पूरी तरह से माफ नहीं किया है। मल्होत्रा के चयन से एक और बात साफ हो गई है कि दिल्ली भाजपा में पंजाबी समुदाय का बोलबाला बरकरार है। पूर्व में खुराना और केदारनाथ साहनी होते थे और अब मल्होत्रा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और वह पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली विधानसभा में इस समय विपक्ष के नेता जगदीश मुखी भी पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली की महापौर आरती मेहरा भी पंजाबी समुदाय से हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के घोषणापत्र समिति के प्रमुख पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर भी पंजाबी समुदाय से हैं। 
दिल्ली चुनावों के लिए प्रभारी बनाये गये अरुण जेटली भी पंजाबी समुदाय से हैं। दरअसल पंजाबी समुदाय दिल्ली में भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता रहा है। ऐसा कम से कम खुराना के समय तक तो था ही, खुराना के जाने के बाद कहीं वह वोटर छिटके नहीं इसलिए भी मल्होत्रा के नाम को उचित माना गया। पार्टी ने विजय गोयल और हर्षवर्धन को लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाने का आश्वासन दिया है। विजय गोयल की तो सीट पहले से ही निर्धारित है। हर्षवर्धन को पार्टी पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बना सकती है। 

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव-आसान नहीं बीजापुर से कांग्रेस की राह

देश के पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ‘जनादेश’  इन राज्यों की राजनीति और उससे जुड़ी हलचलों पर विशेष फोकस करने जा रहा है। इसकी शुरुआत आज से ही की जा रही है। हम छत्तीसगढ़ की एक-एक विधानसभा सीट की वर्तमान राजनैतिक हालात की समीक्षा प्रस्तुत करेंगे।

आसान नहीं बीजापुर से कांग्रेस की राह
संदीप पुराणिक

रायपुर।  बीजापुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता वर्तमान विधायक राजेन्द्र पामभोई से नाराज बताए जाते हैं। नक्सलियों द्वारा दी गई धमकी के बाद उन्होंने क्षेत्र में जाना बंद कर दिया है। राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि यदि कांग्रेस उन्हें प्रत्याशी बनाती है तो वे अपना प्रचार कैसे करेंगे? यहां इस बार भाजपा के पक्ष में वर्तमान विधायक व विकास कार्यों तथा सरकारी योजनाओं के कारण अच्छा माहौल दिखाई दे रहा है। इस चुनाव में यहां से  भाजपा को फायदा मिल सकता है। 
बीजापुर विधानसभा ने अक्सर कांग्रेस पर अपना विश्वास व्यक्त किया है। सन् 52 से आज तक 10 बार क्षेत्र के मतदाताओं ने कांग्रेस प्रत्याशी को विजयश्री दिलाकर विधायक बनाया है। गहन नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में सन् 1993 में भाजपा के प्रत्याशी को भी सफलता मिली। वर्तमान में कांग्रेस के अजीत जोगी के कट्टर समर्थक माने जाने वाले राजेन्द्र पामभोई विधायक हैं। 1952 में कांग्रेस के हीराशाह ने नामांकन दाखिल किया लेकिन किसी अन्य ने उनके खिलाफ पर्चा नहीं भरा। हीराशाह 52 में निर्विरोध निर्वाचित होकर विधानसभा में पहुंचे थे। 1957 के चुनाव में देश की आजादी का प्रभाव था। कांग्रेस सबके दिलों पर राज कर रही थी। क्षेत्र में भी इसका पूरा प्रभाव था मतदाताओं ने कांग्रेस के बी.आर. पामभोई को विधायक चुनकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। अगले चुनाव 1962 में हुए कांग्रेस के हीराशाह ने पचा भरा उनके सामने मुकाबले में कोई नहीं आया वे निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। इस प्रकार वे दो बार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। लेकिन एक घटनाक्रम के बाद यहां 27 अप्रैल 62 को उपचुनाव कराने पड़े कांग्रेस के पूर्व विधायक बी.आर. पामभोई पुन: विधायक बनाए गए उनका मुकाबला दो निर्दलीय आयतूराम व कोसा ने किया। सन् 1967 में 5 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे पहली बार जनसंघ ने हंगा मेंडा को अपना प्रत्याशी बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कांग्रेस ने बकैया राज को प्रत्याशी बनाया लेकिन दोनों राजनैतिक दलों को निर्दलीय दृगपाल शाह केशरीशाह ने मात देकर विजय प्राप्त की। सन् 1972 चुनावी समर में फिर 5 प्रत्याशी उतरे कांग्रेस के किष्टैया पप्पैया विधायक बने। उन्होंने निर्दलीय पूर्व विधायक दृगपाल को हराया। जनसंघ प्रत्याशी कन्हैया राजैय्या तीसरे क्रम में खड़े दिखाई दिए। 1977 में जनता लहर गहन बीहड़ वन क्षेत्र में पहुंच गई। जनता पार्टी ने महादेव आयतूराम को प्रत्याशी बना दिया। इस चुनाव में क्षेत्र के मतदाताओं ने परिवर्तन करके यह संदेश दिया कि देश की राजनैतिक हलचलों से यह बीहड़ क्षेत्र बराबर का सरोकार रखता है, महादेव आयतूराम विधायक बने। 1980 में कांग्रेस के महादेव राणा विधायक बने, उनका मुकाबला निर्दलीय राजेन्द्र कुमार बकैया पामभोई से हुआ। जनसंघ तीसरे क्रम पर ही खड़ी दिखाई दी। सन् 85 में भी कांग्रेस की विजय पताका शिशुपाल शाह ने विधायक बनकर फहराई। इस चुनाव में  उनका मुकाबला भाकपा के चिंतुर सुखराम से हुआ। जनसंघ भाजपा बन चुकी थी, फिर भी वह तीसरे क्रम पर ही खड़ी रही। 1990 के चुनाव में भाजपा ने यकायक मुकाबले पर आकर अपना जनाधार साबित कर दिया। उनके प्रत्याशी राजाराम तोडेम कांग्रेस प्रत्याशी राजेन्द्र पामभोई से मात्र 96 मतों से हार गए। लेकिन अपनी बढ़ी हुई शक्ति का प्रदर्शन कर दिया। 1993 में भाजपा से सतर्क कांग्रेस ने राजेन्द्र पामभोई को चुनाव मैदान में उतारा। राजाराम तोडेम ने कड़ा मुकाबला किया और 877 मतों से जीत हासिल कर पहली बार भाजपा का केशरिया ध्वज फहराया। क्षेत्र के लिए राजेन्द्र व राजाराम परंपरागत प्रतिद्वंद्वी बन गए। मतदाताओं ने दोनों पर भरपूर प्यार लुटाया आंकड़ों की गणित कभी राजेन्द्र कभी राजाराम के पक्ष में गई। 1998 में पुन: राजेन्द्र पामभोई विधायक बने। उन्होंने तोडेम को 7141 मतों से मात दी। 2003 में जब बस्तर का मतदाता भाजपा को जीत के मत डाल रहा था बीजापुर के मतदाता कांग्रेस पर अपनी मुहर लगा रहे थे। राजेन्द्र पामभोई ने तोडेम को 2721 मतों से फिर परास्त कर दिया। क्षेत्र महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में चल रहे आदिवासियों के सलवा जुडूम से प्रभावित है। राजेन्द्र पामभोई भी उसके अगुवा बने महेन्द्र कर्मा का साथ दिया। मंचासीन हुए लेकिन गुटबाजी की राजनीति व जोगी का नेतृत्व स्वीकार कर अपने गुट के इशारे पर उन्होंने बड़ी खूबसूरती से सलवा जुडूम आंदोलन से कन्नी काट कर लिया कल तक जुडूम जिंदाबाद के नारे लगाने वाले पामभोई जुडूम व महेन्द्र कर्मा के खिलाफ आग उगलने लगे। कल के दोस्त महेन्द्र कर्मा से छत्तीस का आंकड़ा बन गया। दोनों नेताओं में क्षेत्र के लोग एक मूल फर्क यह बताते हैं कि महेन्द्र को नक्सलियों ने बीजापुर में चुनौती दी तो वे सीना तान कर बीजापुर में घुसे चुनौती को स्वीकार किया लेकिन भैरमगढ़ क्षेत्र में हुए एक बारूदी विस्फोट में बच जाने के बाद राजेन्द्र पामभोई ने आज तक क्षेत्र की तरफ पलट कर भी नहीं देखा। लोग कहते हैं वे क्षेत्र में विकास तो हो रहा है पर धीमी चाल में और उसका श्रेय विधायक को नहीं जिले के मंत्री डा. सुभाऊ कश्यप को लोग देते हैं। लोग श्री पामभोई से नाराज दिखाई दिए। आगामी चुनाव में भी राजेन्द्र पामभोई की दावेदारी इस क्षेत्र की टिकट पर है। श्री पामभोई की टिकट का विरोध महेन्द्र कर्मा कर रहे हैं और पूर्व में कम्युनिस्ट पार्टी में रहे शंकनी चन्दैया को टिकट दिलाना चाहते हैं। ज्ञात रहे कि ये वही शंकनी चन्दैया है जिन्होंने पिछला चुनाव भाकपा की टिकट पर राजेन्द्र पामभोई के खिलाफ लड़ा था। एक घटनाक्रम में सलवा जुडूम से प्रभावित होकर उन्होंने महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस प्रवेश कर लिया। श्री कर्मा ने हाईकमान से कहा है कि पामभोई के स्थान पर किसी अन्य को टिकट देने की मांग की है। भाजपा से टिकट के दावेदार राजाराम तोडेम व महेश जागड़ा है। बीजापुर विधानसभा क्षेत्र में भाकपा का कोई खास प्रभाव नहीं है। यहां कांग्रेस व भाजपा के बीच ही सीधा मुकाबला होगा। इस चुनाव में भाजपा को सीधा फायदा होने के आसार है। क्योंकि वर्तमान विधायक राजेन्द्र पामभोई जब से उन्हें नक्सलियों की धमकी मिली है तब से क्षेत्र में जाना बंद कर दिए हैं। क्षेत्र के मतदाताओं के मन में उनके प्रति काफी नाराजगी है। संसदीय सचिव सुभाऊ कश्यप ने क्षेत्र में शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाए हैं, तथा विकास कार्य काफी कराए हैं। इसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। यदि कांग्रेस पामभोई को प्रत्याशी बनाती है तो उन्हें मतदाताओं को अपने पक्ष में करने तथा उनका आक्रोश दूर करने में समय व्यतीत हो जाएगा। मान मनौव्वल में समय व्यतीत करने से उनका यह चुनाव जीत पाना कठिन है। जिस नक्सली धमकी के कारण वे क्षेत्र में जाना बंद कर दिए हैं उस क्षेत्र में वे अपना चुनाव प्रचार कैसे करेंगे यह भी सोचनीय प्रश्न है? बीजापुर क्षेत्र धूर नक्सल प्रभावित है। यहां भी कई गांव नक्सली आतंक के कारण खाली हो चुके हैं। काफी संख्या में ग्रामीण शिविर में रह रहे हैं। सरकार ने शिविर में रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा व्यवस्था, रहने की व्यवस्था, रोजगार के साधन, पेयजल व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा की व्यवस्था की है। जानकारों का कहना है कि वर्तमान विधायक ने शिविर में रहने वाले ग्रामीणों का हालचाल भी जानने का शिविर स्थल में जाकर प्रयास नहीं किया है। विधायक के क्षेत्र में नहीं रहने के कारण क्षेत्र में विकास कार्य भी प्रभावित हुआ है। राजेन्द्र पामभोई को कांग्रेस ने चार बार प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा वे तीन बार जीते हैं और एक बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा है।

Monday, October 6, 2008

मध्य प्रदेश-सौ बच्चों की मौत

 
-फिरदौस खान-
बेशक भारत आर्थिक और परमाणु शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में वह काफी पीछे है। मध्य प्रदेश में कुपोषण से हो रहीं मौतें इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं। गौरतलब है कि पिछले करीब एक पखवाड़े में मध्यप्रदेश के खंडवा, झाबुआ, सतना और शिवपुरी जिलों में करीब सौ बच्चों की मौत हो चुकी है और दो सौ से ज्यादा अस्पताल में भर्ती हैं। 
संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 46 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3), 2005-06 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तीन साल से कम उम्र के करीब 47 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं। इसके कारण उनका शारीरिक विकास भी रुक गया है। देश की राजधानी दिल्ली में 33.1 फीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 60.3 फीसदी, झारखंड में 59.2 फीसदी, बिहार में 58 फीसदी, छत्तीसगढ में 52.2 फीसदी, उडीसा में 44 फीसदी, राजस्थान में भी 44 फीसदी,  हरियाणा में 41.9 फीसदी, महाराष्ट्र में 39.7 फीसदी, उत्तरांचल में 38 फीसदी, जम्मू कश्मीर में 29.4 फीसदी और पंजाब में 27 फीसदी बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं। 

यूनिसेफ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है। भारत में पांच करोड 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। विश्व में कुल 14 करोड 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं। विकास की मौजूदा दर अगर ऐसी ही रही तो 2015 तक कुपोषण दर आधी कर देने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 'एमडीजी' 2025 तक भी पूरा नहीं हो सकेगा। रिपोर्ट में भारत की कुपोषण दर की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा गया है कि भारत में कुपोषण की दर इथोपिया, नेपाल और बांग्लादेश के बराबर है। इथोपिया में कुपोषण दर 47 फीसदी तथा नेपाल और बांग्लादेश में 48-48 फीसदी है, जो चीन की आठ फीसदी, थाइलैंड की 18 फीसदी और अफगानिस्तान की 39 फीसदी के मुकाबले बहुत ज्यादा है। यूनिसेफ के एक अधिकारी के मुताबिक भारत में हर साल बच्चों की 21 लाख मौतों में से 50 फीसदी का कारण कुपोषण होता है। भारत में खाद्य का नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और सरकारी लापरवाही ही कुपोषण का कारण बन रही है। उनका यह भी कहना है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के सही तरीके के साथ सेहत के प्रति कुछ सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है।
दरअसल, कुपोषण के कई कारण होते हैं, जिनमें महिला निरक्षरता से लेकर बाल विवाह, प्रसव के समय जननी का उम्र, पारिवारिक खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, टीकाकरण, स्वच्छ पेयजल आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। हालांकि इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन इसके बावजूद संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आए हैं। देश की लगातार बढती जनसंख्या भी इन सरकारी योजनाओं को धूल चटाने की अहम वजह बनती रही है, क्योंकि जिस तेजी से आबादी बढ रही है उसके मुकाबले में उस रफ्तार से सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा उदारीकरण के कारण बढी बेरोजगारी ने भी भुखमरी की समस्या पैदा की है। आज भी भारत में करोडाें परिवार ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती। ऐसी हालत में वे अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन भला कहां से मुहैया करा पाएंगे। एक कुपोषित शरीर को संपूर्ण और संतुलित भोजन की जरूरत होती है। इसलिए सबसे बडी चुनौती फिलहाल भूखों को भोजन कराना है। हमारे संविधान में कहा गया है कि 'राज्य पोषण स्तर में वृध्दि और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में समझेगा।' मगर आजादी के छह दशक बाद भी 46 फीसदी बच्चे कुपोषण की गिफ्त में हों तो जाहिर है कि राज्य अपने प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्यों में नकारा साबित हुए हैं।
1996 में रोम में हुए पहले विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएफएस) के दौरान तकरीबन सभी देशों के  प्रमुखों ने यह वादा दोहराया था कि पर्याप्त स्वच्छ और पोषक आहार पाना सभी का अधिकार होगा।उनका मानना था कि यह अविश्वसनीय है कि दुनिया के 84 करोड लोगों को पोषक जरूरतें पूरी करने के लिए अनाज उपलब्ध नहीं है। कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है। विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वजन का है। यह संख्या करीब एक करोड 46 लाख है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फसल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाजार में पडी ग़ली-सडी सब्जियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं। महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूडेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकडाें को उठाते हुए देखा जा सकता है। रोजगार की कमी और गरीबी की मार के चलते कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं। इस हालत में भी सबसे ज्यादा त्याग महिलाओं को ही करना पडता है, क्योंकि वे चाहती हैं कि पहले परिवार के पुरुषों और बच्चों को उनका हिस्सा मिल जाए।  
काबिले-गौर यह भी है कि हमारे देश में एक तरफ अमीरों के वे बच्चे हैं जिन्हें दूध में भी बोर्नविटा की जरूरत होती है तो दूसरी तरफ वे बच्चे हैं जिन्हें पेटभर चावल का पानी भी नसीब नहीं हो पाता और वे भूख से तडपते हुए दम तोड देते हैं। यह एक कडवी सच्चाई है कि हमारे देश में आजादी के बाद से अब तक गरीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाईर् गईं, लेकिन लालफीताशाही के चलते वे महज कागजों तक ही सीमित होकर रह गईं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो इसे स्वीकार करते हुए यहां तक कहा था कि सरकार की ओर से चला एक रुपया गरीबों तक पहुंचे-पहुंचते पांच पैसे ही रह जाता है। एक तरफ गोदामों में लाखों टन अनाज सडता है तो दूसरी तरफ भूख और कुपोषण से लोग मर रहे होते हैं। ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? 

परिवार एवं कल्याण राज्य मंत्री रेणुका चौधरी भी कुपोषण की इस हालत पर चिंता जताते हुए इसे भयावह और शर्मनाक करार देती हैं। उनका मानना है कि नेताओं समेत शिक्षित वर्ग का एक बडा हिस्सा कुपोषण की समस्या को समझने में नाकाम रहा है। कुपोषण के लिए कृषि में आए बदलाव को काफी हद तक जिम्मेदार ठहराते हुए वे कहती हैं कि नगदी फसलों के प्रति बढे रुझान के कारण किसानों ने अपनी खाद्यान्न सुरक्षा खो दी है।

आज के बच्चे कल का भविष्य हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि उन्हें भरपेट संतुलित आहार मिले। इसके लिए सरकार को पंचायती स्तर पर प्रयास करने होंगे। हमारे देश में अनाज के भंडार भरे हुए हैं, ऐसी हालत में भी अगर बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं तो इसकी जवाबदेही प्रशासन की है।