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Friday, February 13, 2009

पत्रकारों पर लाठिया,कई घायल


अंबरीश कुमार
लखनऊ , फरवरी। खबरों की कवरेज पर गए पत्रकारों की आज यहां सीबीआई कोर्ट में पुलिस ने बर्बरता से पिटाई की। कल ही शिक्षकों की पुलिस ने धुनाई की थी। इससे पहले वाराणसी बम धमाकों के आरोपी वलीउल्लाह को जब अदालत में पेश किया गया तो कुछ वकीलों ने उसकी पिटाई की और पत्रकार जब बीच में आए तो उनकी भी ठुकाई की गई। आज की घटना लखनऊ के सीबीआई कोर्ट परिसर में हुई जहां माफिया डान बबलू श्रीवास्तव पेशी पर आया था। पेशी के दौरान ही बबलू श्रीवास्तव के समर्थकों और पुलिस के बीच कुछ कहासुनी हुई जिसके बाद एडीशनल एसपी परेश पांडेय ने बबलू श्रीवास्तव के समर्थकों की पिटाई शुरू करवा दी। बीच में कुछ पत्रकारों को जनबूङाकर निशाना बनाया गया और उन्हें भी लाठियों से पीटा गया। इस घटना में जिन पत्रकारों को चोट आई, उनमें जी न्यूज के आलोक पांडे, आईबीएन ७ के परवेज, लाइव इंडिया के मंजुल, वाइस आफ इंडिया के तारिक और स्टार न्यूज के कैमरामैन प्रेम सिंह शामिल हैं। इस घटना से पत्रकार काफी उत्तेजित हुए और वित्त मंत्री लालजी वर्मा की बजट के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस का बायकाट कर दिया।
स्टार न्यूज के पत्रकार पंकज ङा के मुताबिक इस घटना में वाइस आफ इंडिया के पत्रकार तारिक के टूटे हाथ के प्लास्टर पर भी लाठी चलाई गई जिससे उसका प्लास्टर टूट गया। चश्मदीदों के मुताबिक सीबीआई कोर्ट में जसे ही माफियाडान बबलू श्रीवास्तव पेशी पर पहुंचा, टीवी पत्रकारों की टीम उसकी तरफ लपकी। यह देखते ही एडीशनल एसपी परेश पांडेय ने कहा-यही साले सब हीरो बना देते हैं। आज किसी को भी अंडरट्रायल से बातचीत नहीं करने दी जएगी। इस पर कुछ पत्रकारों से विरोध जताते हुए कहा कि वे हमेशा से बातचीत करते आए हैं। इस पर पांडेय उत्तेजित होकर चिल्लाने लगा और बोला-अभी तक जो करते आए हो, करते आए हो, अब नहीं करने दूंगा। इस पर जसे ही पत्रकार आगे बढ़े, परेश पांडेय लाठी लेकर दौड़े और उनके पीछे दूसरे पुलिस वालों ने भी पत्रकारों की पिटाई शुरू कर दी। इस मामले में परेश पांडेय को देर शाम ट्रांसफर कर दिया गया और बाजर खाला और कैसरबाग सीओ के साथ पांडेय के खिलाफ जंच के आदेश दे दिए गए।
इससे पहले इस घटना को लेकर पत्रकारों के बीच में आए कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह से भी टकराव हुआ। पत्रकार एडीशनल एसपी परेश पांडेय को हटाने की मांग कर रहे थे। बाद में सरकार ने पांडेय को हटाने का एलान किया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने के बाद से पत्रकारों का उत्पीड़न कम नहीं हो रहा है। गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष और आईबीएन सेवन के वरिष्ठ पत्रकार शलभमणि त्रिपाठी ने कहा-आए दिन पत्रकारों को निशाना बनाया ज रहा है। जहां भी मौका मिलता है, सरकार के अफसर पत्रकारों को फर्जी मामलों में फंसाने से लेकर जलील करने तक में पीछे नहीं रहते। पुलिस का रवैया तो और भी खराब है। आज जिस अधिकारी को लेकर टकराव हुआ, उसका व्यवहार पहले से ही बेकाबू था।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का सूचना विभाग के कुछ अफसर पत्रकारों को जलील करने में पीछे नहीं हैं। इनमें सबसे ऊपर नाम सूचना विभाग के एक बददिमाग अफसर एके उपाध्याय का है। इस अफसर के व्यवहार से कई पत्रकार बुरी तरह नाराज हैं। आज कबीना मंत्री अनंत कुमार मिश्र को भी इसकी अनौपचारिक जनकारी कुछ पत्रकारों ने दी। जिसके कुछ देर बाद ही सीबीआई कोर्ट में हुई घटना ने पत्रकारों को और उत्तेजित कर दिया।
समाजदी पार्टी ने पत्रकारों पर पुलिसिया कार्याई की घोर निन्दा की है। सपा ने कहा है कि प्रदेश की राजधानी में सीबीआई कोर्ट में पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि मायाती सरकार को न तो प्रेस की स्तंत्रता से मतलब है, न मानाधिकारों से और नहीं उसमें सम्यता का कोई अंश शेष है। यह पूर्णतया निरंकुश, फासिस्ट तथा तानाशाह सरकार है जो पुलिस-प्रशासन तंत्र का उपयोग लोगों को भयांक्रांत करने में करती है। उसका भयमुक्त और कानून का राज स्थापित करने का दाव  ङाूठा और मक्कारी भरा है। पुलिस ऊपरी शह के कारण प्रदेश में जंगलराज कायम किए हुए है। राजधानी में महिलाओं का सड़क पर निकलना निरापद नहीं है। सूदखोरों को खुली छूट है जिससे उत्पीड़ित लोग जन दे रहे है। अपराधी सत्तादल में संरक्षित है। 
सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा चूंकि प्रेस अपनी शक्ति भर सरकार की काली करतूतों को बेनकाब करता है इसलिए उसको अब कुचलने का पूरा इंतजम हो गया है। वैसे भी मुख्यमंत्री पत्रकारों के साथ अच्छा व्यहार नहीं करती है और अप्रिय सालों पर धमकी देने से भी बाज नहीं आती हैं। प्रेस के काम करने की आजदी उन्हें रास नहीं आती है। समाजवादी पार्टी ने अधिकारियों को भी चेतानी दी कि वे मायाती के कारिदों की तरह काम न करें। प्रेस की आजदी पर कोई भी चोट बर्दाश्त नहीं होगी। समाजदी पार्टी की घायल पत्रकारों के साथ सहानुभूति है और सरकार को इसके लिए सदन में तथा सदन के बाहर जबवही देनी होगी।जनसत्ता 




Thursday, February 5, 2009

सौम्या विश्वनाथन का नाम सुना है तो पढ़े



अरविन्द उप्रेती 
नई दिल्ली,  फरवरी- टुडे समूह की पत्रकार की सौम्या विश्वनाथन की हत्या के मामले में श्रम विभाग भी सक्रिय हुआ है। श्रम विभाग के मुख्य निरीक्षक केआर वर्मा की शिकायत पर विशेष मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जवेद असलम ने चैनल के मालिक अरुण पुरी को सम्मन जारी किया है। अपनी शिकायत में वर्मा ने अभियुक्त पुरी और उनके चैनल के खिलाफ दिल्ली दुकान व ठिकाना अधिनियम १९५४ की धारा ४0 के तहत कार्रवाई की सिफारिश की है। 
इस धारा के तहत कार्रवाई धारा १४ का उल्लंघन करने पर की जती है। धारा १४ में प्रावधान है कि किसी महिला से रात में डयुटी नहीं कराई जा सकती। अगर किसी संस्थान को इस प्रावधान से छूट लेनी हो तो उसके लिए श्रम सचिव के समक्ष आवेदन करना जरूरी है। सौम्या विश्वनाथन की आधी रात के बाद डयुटी से घर लौटते समय पिछले साल ३0 सितंबर को रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हुई थी। दिल्ली के मुख्य श्रम निरीक्षक का कहना है कि आज तक चैनल को धारा १४ के तहत कोई छूट प्रदान नहीं की गई थी। लिहाज उन्होंने सौम्या विश्वनाथन को रात की डयुटी पर रख कर इस कानून का उल्लंघन किया है। 
अदालत में दायर अपनी शिकायत में मुख्य निरीक्षक वर्मा ने दुकान व ठिकाना कानून १९५४ की धारा १४ को उदधृत भी किया है। जिसके तहत किसी नवयुवक या नवयुवती से गर्मियों में रात नौ बजे से सुबह सात बजे तक और सर्दियों में रात आठ बजे से सुबह आठ बजे तक काम नहीं लिया ज सकता। वर्मा ने इस बाबत चैनल को कारण बताओ नोटिस भी जरी किया था। पर अदालत में दायर अपनी शिकायत में वर्मा ने कहा है कि चैनल का जवाब धारा १४ के उल्लंघन के आरोप पर मौन रहा है। अलबत्ता श्रम सचिव को चार नवंबर को भेजे पत्र में चैनल की तरफ से तर्क दिया गया है कि सूचना प्रौद्योगिकी आधारित उद्योग को धारा १४ के तहत मुक्ति हासिल है। पर मुख्य निरीक्षक वर्मा इस सफाई से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि केवल कंप्यूटर का इस्तेमाल करने से कोई संस्थान सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्योग नहीं बन जता। 
अदालत में दाखिल शिकायत में वर्मा ने निष्कर्ष निकाला है कि सौम्या को प्रबंधन ने धारा १४ का उल्लंघन कर रात की डच्यूटी पर रखा था। वे तड़के तीन बजे तक डयुटी पर थीं। अपनी शिकायत में वर्मा ने आरोपियों के खिलाफ धारा १४ के उल्लंघन के लिए धारा ४0 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की फरियाद की है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस यूनियन के वाइस प्रेजिडेंट भी है .

Wednesday, January 28, 2009

बिहार में प्रेस पर अघोषित सेंसर

 फज़ल इमाम मल्लिक
पटना , जनवरी। बिहार में सब कुछ ठीक है। क़ानून व्यस्था पटरी पर लौट आई है। विकास चप्पे-चप्पे पर बिखरा है और ख़ुशहाली से लोग बमबम हैं। यह मैं नहीं कह रहा हूं। बिहार के अख़बार और समाचार चैनलों से जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है उससे तो बस यही लग रहा है कि बिहार में इन दिनों विकास की धारा बह रही है और निजाम बदलते ही बिहार की तक़दीर बदल गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जाहिर है कि इससे गदगद हैं और विकास को देखने अपने लाव-लशकर और गाजे-बाजे के साथ सलतनत को देखने निकले हैं। इस विकास यात्रा का ¨ढढोरा भी कम पीटा नहीं ज रहा है। नीतीश को टेंट में अकेले बैठा दिखाया ज रहा है, ग्रामीणों के साथ खाना खाते उनकी तस्वीरें हर अख़बार छाप रहा है और चैनल उसे सम्मोहित हो कर दिखा रहा है। कुछ चैनलों ने तो कई-कई घंटे तक किसी प्रायोजित कार्यक्रम की तरह नीतीश की शान में क़सीदे पढ़ते हुए उनके राजशाही ठाठ को दिखाया। उन चैनलों को देखते हुए यह लग रहा था कि हम किसी समाचार चैनल पर समाचार नहीं देख रहे हैं बल्कि राज्य सरकार का अपना कोई चैनल देख रहे हैं जो नीतीश कुमार के गुणगान में किसी तरह की कोई कंजूसी नहीं दिखाना चाहता है। उन चैनलों में या अख़बारों में यह कहीं नहीं दिखाया गया कि बिहार के उन गांवों में जहां-जहां नीतीश ने पांव धरे थे वहां इन तीन सालों में कितना और कैसा बदलाव आया। लोकशाही के इस दौर में राजशाही का नमूना इससे पहले दूसरी सरकारों के दौर में तो नहीं ही मिला था। लालू यादव के जंगल राज के दौरान भी नहीं। विकास यात्रा पर निकले नीतीश के ठाठ किसी राज की तरह थे। नर्तकों और कलाकारों का लावलशकर भी उनके साथ पटना से गया था जो रात भर उनका दिल बहलाता। किनकी फ़सलें उजड़ी गईं और किनके घरों को तोड़ा गया, इसकी ख़बर कहीं नहीं थी लेकिन विकास यात्रा की तस्वीरें थीं और नीतीश की घोषणाओं का जिक्र था। ठीक वैसी ही घोषणाएं जो इन तीन सालों में नीतीश करते रहे हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि नीतीश अपनी विकास यात्र के दौरान योजनाओं की ही घोषणा ही करते रहे, बिहार के उन गांवों में तीन सालों में क्या कुछ विकास हुआ इसकी जनकारी उन्होंने देने की जजाहमत तक नहीं उठाई। दरअसल नीतीश की फ़ितरत में यह है भी नहीं। सत्ता में रहते हुए उनमें ख़ुदाई इतनी आ जती है कि उन्हें अपने सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता है। बिहार में जाहिर है कि इन दिनों नीतीश की ख़ुदाई चल रही है और इसके लिए उन्होंने सबसे बड़े हथियार यानी मीडिया को हर तरह से ‘मैनज’ किया है। इस ‘हर तरह’ को अघोषित सेंसर के तौर पर पाठक पढ़ें तो बात ज्य़ादा साफ़ और समङा में आएगी।
सुशासन और विकास को ढोल पीटने वाले नीतीश कुमार के राज में क्या सचमुच सब कुछ ठीक है और विकास की बयार पह रही है। बिहार और खा़स कर दूर-दराा के गांवों में जने के बाद तो यह सब बातें महा छलावा और काग़ाी ही नार आती है। बिहार, शेखपुरा, सिकंदरा, जमुई, लखीसराय, खगड़िया जिलों का दौरा करें सड़कें बद से बदतर। बिजली कब आती है पता नहीं, पीने का साफ़ पानी भी मुयस्सर नहीं। पर पटना में अख़बारों में इन सब पर न तो लिखा गया और न छपा। सड़कों का टेंडर सत्ताधारी पार्टी के किन-किन सांसदों व विधायकों ने लिए और सड़कें नहीं बनीं तो इसकी वजह क्या थी। भ्रष्टाचार एेसा कि पार्टी के बड़े से लेकर छोटे नेता तक टेंडर पास कराने के लिए पैसे की मांग करते हैं। सड़कें अदालतों में ज्यादा बन रही हैं। ठेकेदारों के ङागड़े अदालतें ही निपटा रही हैं। नहीं मैं एेसा नहीं कह रहा कि पहले की सरकारों में एेसा नहीं होता था। ख़ूब होता था। लेकिन अख़बारों या चैनलों में स्याह-सफ़ेद के इस खेल को लेकर हंगामा किया जता रहा था। पर आज एेसा नहीं है। भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी नीतीश सरकार और उनकी नौकरशाही की ख़बरें अब अख़बारों में कहीं दिखाई नहीं देतीं। 
नीतीश के सखा और पार्टी के महžवपूर्ण नेता शंभू श्रीवास्तव ने बिहार सरकार के कामकाज को लेकर हाल में ही जो टिप्पणी की उससे नीतीश की लफ्फ़ाजी की पोल पट्टी खुल जती है। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए साफ़-साफ़ कहा- नीतीश के तीन साल के शासनकाल में प्रदेश में नौकरशाही हावी है। नौकरशाही में भ्रष्टाचार के कारण ही बिहार में निेश कम हो रहे हैं जिससे प्रेश का औद्यौगीकरण नहीं होने से रोजगार की तलाश में यहां से लोगों का दूसरे प्रेशों में पलायन जारी है और बिहार में उद्योग की स्थापना नहीं होने से रोजगार की तलाश में प्रेश से पिछले बीस सालों के ौरान करीब एक चौथाई आबाी का पलायन हुआ है और इसके लिए उन्होने र्तमान नीतीश सरकार सहित बिहार की सभी पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि राज के पिछले १५ सालों के शासन के ौरान प्रेश में किसी भी क्षेत्र में निेश हुआ ही नहीं लेकिन प्रेश की र्तमान नीतीश सरकार के तीन सालों के शासनकाल में ९२ हजार करोड़ रु पए के निेश किए जाने को लेकर समङाौते किए जा चुके हैं पर हकीकत यह है कि उसमें से मात्र ६00 करोड़ रु पए का ही अबतक निेश हुआ है जो बिहार जसे बड़े प्रदेश के लिए कुछ भी नहीं है। यहां तक कि कें्र सरकार ने र्तमान त्तिीय र्ष में बिहार में सात हजार कृषि पिणन कें्र खोले जाने के लिए १६७ करोड़ रु पए आबंटित किए थे लेकिन प्रेश के कृषि भिाग के सही समय पर अंकेक्षण और परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं किए जाने से राज्य सरकार इसमें से अबतक मात्र ११ करोड़ रु पए ही उठा पाई है। यह नीतीश सरकार के शासन का सच है। यह बातें किसी विपक्ष के नेता ने नहीं कहीं हैं। जनता दल (एकी) के एक क़द्दावर नेता ने यह बातें कहीं हैं। लेकिन मीडिया ने सत्ताधारी दल के इस बड़े नेता का यह बयान भी पटना के अख़बारों में उस तरह नहीं छपा, जिस तरह कभी सुशील कुमार मोदी के बयान को ामक-मिर्च लगा कर पटना के अख़बार छापा करते थे। सवाल पूछा ज सकता है कि सत्ता के बदलाव के साथ ही बिहार में अख़बारों में यह बदलाव आया है। तो जवाब है नहीं। अख़बारों में यह बदलाव आया नहीं है, लाया गया है। सत्ता संभालने के बाद बिहार में सरकार ने सबसे पहला काम मीडिया को ‘मैनेज’ किया और इसके लिए हर वह हथकंडे इस्तेमाल किए गए जो एक तानाशाह या बर्बर शासक करता है। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में बिहार में ‘जंगलराज’ पर लगभग हर रोज कुछ न कुछ विशेष ख़बरें छपती ही रहती थीं। लालू प्रसाद यादव के पिछड़े प्रेम और अगड़े विरोध ने बिहार में पत्रकारों को उनके ख़िलाफ़ कर दिया। यह मुख़ालफ़त घोषित नहीं अघोषित थी। लालू विरोध और नीतीश प्रेम के बीच सवाल यह है कि बिहार में इस पत्रकारिता ने किस का हित साधा है और इसका किसन ने उपयोग किया है। लालू प्रसाद यादव के पं्रह साल व नीतीश कुमार के तीन साल के शासनकाल के दौरान मीडिया के रवैये से इन सवालों के जवाब मिलते हैं। पिछले तीन साल के दौरान बिहार में मीडिया में विकास की धारा बह रही है और सुशासन का जदू सर चढ़ कर बोल रहा है। ख़बरों को बनाने वाले और उसका संपादन करने वाले छोटी सी छोटी ख़बरों में भी इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि कहीं इससे नीतीश की उजली छवि पर कोई दाग़ तो नहीं लग जएगा। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में एेसी बात नहीं थी। तब सुशील कुमार मोदी के बयान को भी आधार बना कर विशेष ख़बरें बना डाली जती थीं। लगभग एेसी ख़बरें रोज़ छापी और छपवाई जतीं थीं, जिससे राजनीतिक रूप से लालू यादव का नुक़सान हो। पर हैरत की बात यह है कि नीतीश कुमार के तीन साल के शासनकाल के दौरान बिहार के अख़बारों ने एक भी एेसी ‘विश्ेष ख़बर’ प्रकाशित नहीं की जिससे नीतीश का राजनीतिक क़द कम होता हो। हद तो यह है कि विपक्षी नेताओं तक के बयान सेसंर किए ज रहे हैं। कभी जनता दल (एकी) के प्रवक्ता रहे संजय वर्मा के अख़बारी मित्र उनसे कहते हैं नीतीश के ख़िलाफ़ कोई बयान मत छपने के लिए भेजिए, छाप देंगे तो नौकरी चली जएगी। नीतीश की मानसिकता और नीतियों की वजह से संजय वर्मा ने पार्टी छोड़ दी और पिछले क़रीब एक साल से वे शंकर आाद और विज्ञान स्वरूप के साथ मिल कर शोषित सर्वण संघर्ष समिति (एस फोर) बना कर नीतीश की कारगुारियों और बदनीयति की जनकारी बिहार के लोगों को दे रहे हैं। एस फोर लोगों के सामने नीतीश के उस चेहरे को सामने रखने में जुटा है जो दिखता नहीं है और जो चेहरा किसी क्रूर तानाशाह का है। पर दिक्क़त यह है कि सारे सबूत देने के बावजूद पटना के अख़बार उनके बयानों को उस तरह नहीं छापते, जिस तरह छापनी चाहिए। सच तो यह है कि राजद के शासनकाल के जिस तरह ख़बरें बनाई ज रहीं थीं, नीतीश के इन तीन सालों में बिहार में ख़बरें दबाई ज रही हैं। 
नीतीश कुमार के शासनकाल में अगस्त में कोसी में आई बाढ़ ने गांव के गांव तबाह कर डाले। लोगों का मानना है कि पिछले एक सदी में आई यह सबसे बड़ी आपदा है। ख़ुद नीतीश ने इसे प्रलय कहा। यह बात अलग है कि नीतीश सरकार के आपदा प्रबंधन के आंकड़े इस बाढ़ को बहुत कम कर आंकता है। आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक़ कुछ सौ लोग इस बाढ़ में मारे गए हैं। पर कोसी अंचल ज कर बाढ़ की विनाशलील का पता लगता है। शंकर आाद के साथ अभी-अभी सुपौल, मधेपुरा और अररिया के उन इलाकों में जने का मौक़ा मिला तो तबाही को देख कर दिल परेशान हो गया। लोगों का कहना है कि बाढ़ में कम से कम पचास हार लोग मारे गए हैं। नीतीश कुमार इन आंकड़ों को दबा रही है ताकि सहायता को मिले १५0 हार करोड़ की रक़म का घपला किया ज सके। कोसी क्षेत्र में सुपौल से लेकर निर्मली और फिर ललितग्राम, प्रतापपुर, पिपरा, नरपतगंज उधर अररिया के बतनाहा से लेकर फारबिसगंज, बनमखी व पूर्णिया, मधेपुरा के कुमारखंड प्रखंड का रामनगर, मुरलीगंज, बभनगांवा, सुखासन व बिहारीगंज इलाक़े में बाढ़ की विभिषिका पूरी सच्चई के साथ दिखाई देती है। खेत बालू से पटे हैं, घर तालाब बन गए हैं और इन इलाकों का संपर्क राज्य के दूसरे हिस्सों से लगभग ख़त्म है। सड़क व रेल मार्ग दोनों ही संपर्क टूट चुका है। पटरियां उखड़ी पड़ी हैं और हालत एेसी है कि फ़िलहाल उसे बनाया भी नहीं ज सकता। बाढ़ को लेकर नीतीश लाख सफ़ाई दें पर इतना तो साफ़ है कि राज्य सरकार की लापरवाही की वजह से कोसी का तटबंध टूटा था। पर मीडिया संवेदनहीन बना रहा। नीतीश की विकास यात्रा को प्रमुखता से प्रकाशित करने वाले अख़बार या इसका सीधा प्रसारण करने वाले समाचार चैनलों के लिए कोसी की बाढ़ कोई ख़बर नहीं है। वहां क्या हालात हैं और बाढ़ से तबाह हुए लोगों को क्या कुछ राहत मिला है या मिल रहा है उस पर एक भी खोजपरक रिपोर्ट बिहार के अख़बारों में देखने को नहीं मिली। जबकि उन गांवों को फिर से बसने में सालों लग जएंगे। सरकारी स्तर पर कोसी के बाढ़ प्रभावित इलाकों में एेसा कुछ नहीं किया गया है जिसे लेकर उसकी पीठ ठोंकी जए। पर बिहार के अख़बार एेसा कर रहे हैं। सरकारी दावों व आंकड़ों को पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा ज रहा है और बाढ़ की त्रासदी को कम से कम दिखाने की कोशिश की जती रही है। महीनों बीत जने के बाद भी किसी पत्रकार ने यह हिम्मत नहीं जुटाई कि कोसी के सच को सामने लाया ज सके। 
बिहार में सामाजिक न्याय और समाजवाद पर कभी बड़ी-बड़ी बातें कहने वाले और लालू यादव के ‘कुंबा प्रेम’ पर पन्ने के पन्ने स्याह करने वाले किसी पत्रकार ने नीतीश कुमार के जतीय और नालंदा प्रेम को उजगर करने की ाहमत नहीं उठाई। नालंदा जिला के नीतीश कुमार जति से कुर्मी हैं और उन्होंने पार्टी के महिला व युवा अध्यक्ष पद पर अपने ही जिला के कुर्मी नेताओं को बैठाया है। किसी ने कभी कहा था कि ‘नशेमन लुट ही जने का ग़म होता तो क्या ग़म था, यहां तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है’। नीतीश पर यह बात पूरी तरह लागू होती है। सिर्फ़ इन दो पदों पर ही वे अपनी बिरादरी और जिले के लोगों को बिठाते तो कोई बात नहीं थी। उन्होंने तो मानव संसाधन विकास मंत्री, मुख्य सचेतक विधानसभा व विधानपरिषद, लोकायुक्त, वरिष्ठ उपाध्यक्ष नागरिक परिषद, मुख्यमंत्री के प्रधान व निजी सचिव, अध्यक्ष संस्कृति परिषद व राष्ट्रभाषा परिषद, पटना के जिलाधिकारी, पटना के ग्रामीण एसपी व पटना मेडिकल कॉलेज के सुपरिटेंडेंट के पदों पर अपनी बिरादरी व गृह जिला के लोगों का ला बिठाया है। थोड़ी पड़ताल की जए तो यह सूची और भी लंबी हो सकती है पर नीतीश के इस जतीय प्रेम पर पटना के मीडिया में कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। बिहार में पत्रकारिता का यह नया चेहरा है जो नीतीश ने गढ़ा है और उनकी सरकार इसे आकार देने में लगी है। वर्ना क्या कारण है कि कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से उत्पन्न स्थिति पर अख़बारों में ख़बरें अंदर के पन्नों पर जगह पाती हैं जबकि इस हड़ताल से बिहार में पूरा तंत्र चरमरा गया है और कामकाज ठप है। लेकिन मीडिया चुप होकर सारा तमाशा देख रही है। हड़ताल पर सरकार अपना पक्ष रखते हुए अख़बारों में विज्ञापन देती है, अगले दिन उसी विज्ञापन के आधार पर अख़बार इसे लीड ख़बर बना कर कर्मचारियों को विलेन बताने की कोशिश में जुट जती है। कभी भारतीय जनता पार्टी चाल, चरित्र और चेहरा की बात करती थी। बिहार के मीडिया के संदर्भ में अब यह कहा ज सकता है कि उसका चाल, चरित्र और चेहरा इन तीन सालों में पूरी तरह बदल गया है।
बिहार में मीडिया इन दिनों भीतर व बाहरी दबावों से जूङा रहा है। बाहरी दबाव पत्रकारों का वह पुराना ‘लालू प्रेम’ है, जिसने सुशील कुमार मोदी के बयानों को आधार बना कर ‘स्पेशल स्टोरी’ बनाई। पर यह बाहरी दबाव बहुत ज़्यादा ख़तरनाक नहीं है। भीतरी दबाव नीतीश कुमार की तानाशाही है और यह यादा ख़तरनाक है। नीतीश और उनके सलाहकारों ने बहुत ही सलीक़े से पत्रकारों को अपना मुसाहिब बनाने के लिए हर वह हथकंडा अपनाया, जो सत्ता में बने रहने के लिए ारूरी है। नीतीश के कुछ नादीकी लोगों की बात मानें तो बिहार में पत्रकारों को पालतू व भ्रष्ट बनाने के लिए बाक़ायदा मुहिम छेड़ी गई और पत्रकार इसका शिकार बन कर सरकार के क़सीदे पढ़ने लगे। सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल कर प्रबंधकों को भी स्याहको सफ़ेद करने के लिए ललचाया गया। ाहिर है कि एेसे में खोजपरक ख़बरें तो छपने से रहीं। बिहार के कुछ पत्रकारों ने ही यह भी बताया है कि अख़बारों को भेजे गे विपक्षी दलों के बयान तक छपने से पहले मुख्यमंत्री की टेबल पर पहुंचाए जते हैं। समाचार एजंसियों तक में ख़ुफ़िया विभाग के अधिाकीर घूमते रहते हैं कि कहीं कोई ख़बर सरकार के खि़लाफ़ तो चलाई नहीं ज रही है। यहां तक कि दिल्ली से चलाई गई ख़बरों को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय से निर्देश आते हैं कि सरकार की नकारात्मक छवि वाली ख़बरें नहीं चलाईं जएं। एेसा ही निर्देश अख़बारों के दफ़्तरों तक भी पहुंचाए जते हैं। ाहिर है कि इसके बाद दिल्ली से जरी कोई ख़बर बिहार के अख़बारों में नहीं छपतीं और छपती भी हैं तो सरकार की नकारात्मक छवि को गौण करने के बाद। बिहार में यह अघोषित सेंसरशिप बहुत ही सुनयिोजित ढंग से लागू किया गया है और अख़बारों को अपने हित में इस्तेमाल कर उसे राज्य सरकार का भोंपू बना डाला गया है। फै़ा अहमद फैज ने कभी कहा था कि ‘मताए लौह-ओ-क़लम छिन गया तो क्या ग़म है, कि ख़ून-ए-दिल में डुबो दी हैं उंगलियां मैंने’, पर बिहार में मीडिया पर पहले बिटा दिए गए हैं और ख़ून-ए-दिल में उंगिलियां डुबोने वाला कोई नजार नहीं आ रहा है। बिहार में जगन्नाथ मिश्र के अख़बारों पर लगाए गए प्रतिबंध को काला क़ानून बताते हुए कभी देश भर के पत्रकारों ने इसका विरोध किया था, आज नीतीश कुमार के अघोषित काला क़ानून पर कहीं कोई सुनगुन तक नहीं। यह बड़ी चिंता की बात है।

Monday, January 12, 2009

मीडिया पर नया हमला, फ़िर आ रहा है काला कानून

मीडिया पर नया खतरा मंडराने लगा है .इस खतरे को लेकर देश के 15 संपादको ने प्रधामंत्री को पत्र लिखकर विरोध जताया है .इन संपादको में राजदीप सरदेसाई,बरखा दत्त,अजित अंजुम ,दीपक चौरसिया ,कमर वाहिद नकवी ,सुप्रिय प्रसाद ,आशुतोष,अर्नब गोस्वामी,विनय तिवारी आदि शामिल है.खतरा टीवी चैनल से सुरु होकर समूचे मीडिया की तरफ़ बढ़ने वाला है .खतरे की तरफ़ इशारा करती एक रपट. इस बारे में हर घटनाक्रम की जानकारी जनादेश पर दोनों भाषाओ में .
चौथे स्तंभ को दफनाने की तैयारी
शाज़ी जमां
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दफनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। आवाम के आंखों पर काली पट्टी बांधने की साजिश रची जा चुकी है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग मीडिया की धार भोथरी करने का फैसला कर चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कंटेट कोड को अंतिम रूप दिया जा चुका है। माना जा रहा है कि ये कोड इस जनवरी के अंत तक जारी कर दिया जाएगा। वैसे तो इस कोड के ज़रिये उन परिस्थियों में मीडिया कवरेज को रेगुलेट करने की बात कही गई है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा हो। लेकिन गौर से देखे तो ये साफ है कि इस काले कानून की आड़ बहुत आसानी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सेंसरशिप लागू किया जा सकता है।
सरकार की ओर से तैयार कंटेट कोड में ये साफ है कि आतंकवादी हमला, सांप्रादायिक दंगा, हाईजैकिंग या बंधक बनाये जाने जैसी किसी भी वारदात के दौरान मीडिया अपनी ओर से कोई कवरेज नहीं कर पाएगी। न्यूज़ चैनलों को सिर्फ वही फुटेज दिखाना पड़ेगा जो सरकारी अधिकारी उपलब्ध कराएंगे। यानी घटना को लेकर सरकारी अमला अपनी कहानी पकाएगा और मीडिया कनपटी पर बंदूक रखकर उसे बाध्य किया जाएगा कि वो उस कहानी जनता के सामने उसी तरह पेश करे। मामला यहीं खत्म नहीं होता। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा और आपत्तकालीन स्थिति को सरकारी अधिकारी अपने हिसाब से परिभाषित करेंगे और इस तरह वो ख़बर दबा दी जाएगी, जिससे सरकारी तंत्र कटघरे में खड़ा होता हो। क्या ये मीडिया का गला घोंटने की साजिश नहीं है? 
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सेंसरशिप से शुरु हुआ ये सिलसिला प्रिंट और दूसरे प्रसार माध्यमों तक जाएगा। मीडिया के हाथ से लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका छिन जाएगी और मुमकिन है, हमें उसी दौर में लौटना पड़े जो इमरजेंसी के वक्त था। लोकतंत्र की हत्या के इस काले कानून के विरोध के लिए हमने अभियान चलाने का फैसला किया है। आप भी जुड़िये इस अभियान से।
अपनी ज़रूरत और सुविधा के मुताबिक फतवा खरीदा जा सकता है! संसद में सवाल पूछने और काम करवाने के लिए सांसद दोनों हाथों नोट बटोर सकते हैं! किसी बेगुनाह को मारने के लिए पुलिस वाले सुपारी ले सकते हैं और उस बेरहम कत्ल को बड़ी सहजता से एनकाउंटर का नाम दे सकते हैं! मेटरनिटी होम के डॉक्टर बच्चों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं! अनाथालयों में पल रहे मासूमों को खरीदकर गुनाह के रास्ते पर धकेला जा सकता है! इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष कैमरे पर दिन-दहाड़े रिश्वत लेते हुए नज़र भी आ सकते हैं। 
आपको इन तस्वीरों की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। पिछले कई बरसों में टीवी चैनलों पर ये तस्वीरें आपने अनगिनत बार देखी होंगी। इन ख़बरों ने देश को हिलाया था और सच परदा हटाया था। टीवी पत्रकार होने के नाते हमें इन ख़बरों पर नाज हैं। लेकिन ये ख़बरे हमारे जेहन में अचानक इसलिए बार-बार कौंध रही हैं क्योंकि न्यूज़ चैनलों के ख़िलाफ सत्ता के गलियारे में एक ख़तरनाक खेल चल रहा है। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश के तहत बकायदा एक अभियान चलाया रहा है। सरकारी हलकों से कंटेंट कोड की खुसफुसाहट लगातार सुनाई दे रही है। वही कोड जिसका मकसद पत्रकारिता की धार को पूरी तरह कुंद करना है और न्यूज़ चैनलों पर नकेल डालकर उन्हे पालतू बनाना है। कंटेंट कोड एक बेहद ख़तरनाक साजिश है और आंख मूंदकर इसका समर्थन करने से पहले ये समझ लेना चाहिए कि मीडिया और पूरे देश पर इसका असर क्या होगा।
निरंकुश सत्ता हमेशा ख़तरनाक होती है। निरंकुशता चाहे सरकार की हो, न्यायपालिका या फिर मीडिया की, वो अच्छी नहीं है। इतना हम भी समझते हैं कि किसी भी सभ्य समाज में मीडिया के लिए भी कोई ना कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल है-- ये लक्ष्मण रेखा कौन खीचेगा। हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि लोकहित में सरकार के हर कदम पर नज़र रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की ये एक बुनियादी शर्त है। लेकिन कंटेट कोड के ज़रिये उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है। यानी मीडिया सरकार पर नहीं बल्कि सरकार मीडिया पर नज़र रखेगी। जब सरकार ये तय करने लगेगी कि पब्लिक इंट्रेस्ट क्या है, तो फिर तमाम चैनल दूरदर्शन जैसे बन जाएंगे। क्या पब्लिक कभी ये चाहेगी कि इस देश के सारे चैनल दूरदर्शन मार्का हो जायें।मैं दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रसारण तंत्र के ख़िलाफ इसलिए नहीं हूं कि वो नीरस और उबाउ है, बल्कि असल में दूरदर्शन जनता के प्रति बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं है, जैसा कि इसे बताया जाता है।
मैं टीवी पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों की सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का एक दिलचस्प वाकया पेश करना चाहूंगा। इस मुलाकात में कुछ अधिकारियों ने ये शंका जाहिर की कि अपने काम करने के अंदाज़ से न्यूज़ चैनल दंगा करवा सकते हैं। इस पर मेरे एक पत्रकार मित्र ने जवाब दिया है-- ये क्षमता सिर्फ एक ही चैनल में है और वो है- दूरदर्शन। अपनी इस क्षमता का नमूना दूरदर्शन ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के कवरेज़ में पेश कर दी थी, जब भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़के थे। ज़ाहिर है, जब सत्ता से जुड़े ऐसी समझ वाले लोग हमारी निगरानी करेंगे तो फिर उनपर नज़र कौन रखेगा। 
हमें अपनी कमजोरियों का पता है। इसलिए न्यूज़ चैनलों ने सेल्फ रेगुलेशन की व्यवस्था बनाई है। कंधार विमान अपहरण कांड जैसे ही खत्म हुआ सरकार ने मीडिया को संयम बरतने के लिए धन्यवाद दिया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उससे हमारे प्रति सरकार का नज़रिया बदल गया। क्या इसकी वजह ये थी कि न्यूज़ चैनल जनता के आक्रोश को सामने लाने का मंच बन गये? मुझे इसमें शक है। सच तो ये है कि पब्लिक के गुस्से की कहानी जब मीडिया के ज़रिये सामने आई और ये साफ हो गया कि पूरा तंत्र अपने नागरिकों की हिफाजत में नाकाम है, तो सरकार बुरी तरह हिल गई। जब हुक्मरान और सियासतदां हिले तो ऐसे-ऐसे बचकाने बयान सामने आये जो पहले कभी नहीं सुने गये। बतौर बानगी.. `ये लिपिस्टिक लाली लगाकर हमारी बहने प्रदर्शन करती हैं'-- 
इस तरह के बयान सत्ता और राजनीतिक तंत्र की नाकामी के अभूतपूर्व नमूने थे। 24 घंटे चलने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों ने इन बयानों पर नेताओं की बखिया उधेड़कर रख दी। 
26 नवंबर के आतंकवादी हमले के बाद सरकार ने चैनलों को सुझाव दिया कि वो इसके असर को दबा दें। क्या ये जनता के सच जानने, देखने और समझने के अधिकार का हनन था? हमने भी ये महसूस किया कि मुंबई वारदात की कवरेज़ से जुड़ी तस्वीरे दिखाने से पहले उन्हे आम आदमी की संवेदनशीलता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। लेकिन क्या ये सरकार तय करेगी कि आम आदमी की संवेदनशीलता कैसी और कितनी होनी चाहिए? क्या हम सुरक्षा में हुई ऐतिहासिक चूक की वो तस्वीर हमेशा के लिए मिटा दें जो एक अरब लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैद हो चुकी हैं। या फिर हम ये तय करे कि 26-11 को हम कभी नहीं भूलेंगे और ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देंगे।
अगर सरकार ने न्यूज़ चैनलों पर कंटेट कोड लागू कर दिया तो आप वो तस्वीरे और ख़बरें नहीं देख पाएंगे जिनका जिक्र मैंने अपने लेख की शुरुआत में किया था। समझा जा सकता है कि कंटेट कोड के क्या नतीजे होंगे और इससे क्या हासिल होगा। 
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प्रधामंत्री को पत्र 
letter to the prime minister from tv editors


12th January 2009


Mr. Manmohan Singh,
The Prime Minister of India.

Dear Manmohan Singhji,

We are sure you are aware that the proposed measures to gag the electronic media have caused immense disquiet in the journalistic fraternity and amongst all those who believe in the freedom of expression.

As editors, we believe that the media is the watchdog to keep democracy and democratic principles alive. If instruments of the state begin to regulate us, the damage to democracy and all stakeholders in democracy would be irreparable. It is all the more surprising that this is happening when you are directly holding charge of the ministry of Information and Broadcasting.

We are aware that our right to keep a vigil also brings with it a responsibility to function according to the highest standards of ethics and national interest. We firmly believe that in a democracy media needs self-regulation and not regulation. The electronic media fraternity has already made significant movement in this direction. In view of this, we urge you to immediately suspend the proposed measures.

We would like to personally meet and impress upon you the historical blunder that these measures would be. They would for all times taint this government as one that tried to impose draconian measures on media and forever remind us that the emergency is not yet a closed chapter in this country.

Hoping for an appointment at the earliest.


Best regards
1. Ajit Anjum, News 24
2. Arnab Goswani, Times Now
3. Ashutosh, IBN 7
4. Barkha Dutt, NDTV 24X7
5. Deepak Chaurasia, Star News
6. Milind Khandekar, Star News
7. N K Singh, ETV
8. Pankaj Pachauri, NDTV India
9. QW Naqwi, Aaj Tak
10. Rajdeep Sardesai, CNN IBN
11. Satish K Singh, Zee News
12. Shazi Zaman, Star News
13. Supriya Prasad, News 24
14. Vinay Tiwari, CNN IBN
15. Vinod Kapri, India TV

चौथे खंभे को धराशायी करने की साजिशः सुप्रिय प्रसाद
लोकतंत्र के सबसे चौथे खंभे को उखाड़ने की कोशिशें सिर उठा रही हैं। इस खंभे को कमजोर करने की कोशिश कोई दुश्मन नहीं कर रहा है। मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपकर केंद्र सरकार उसे नख दंतविहीन बना देना चाहती है। अपने हक की लड़ाई लड़ रही जनता पर अगर सरकारी दमन हुआ और उसके फुटेज आपके पास हैं तो उसे आप दिखा नहीं पाएंगे। मुंबई पर हुए हमलों की कवरेज का बहाना बनाकर सरकार अपना छिपा एजेंडा लागू करना चाहती है। वो न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाना चाहती है। अगर सरकार अपनी मंशा में कामयाब हो गई तो कोई दावा नहीं कर पाएगा कि सच दिखाते हैं हम। क्योंकि सच वही होगा, जो सरकार कहेगी। आपके फुटेज धरे के धरे रह जाएंगे। दंगा हो या आतंकवादी हमला। इमरजेंसी की हालत में सरकारी मशीनरी ज्यादातर मूक दर्शक बनी रहती है। सरकार चाहती है कि मीडिया भी उसी तरह मूक दर्शक बनी रहे। हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखती रहे। ये वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं है। मीडिया पर सेंसरशिप लगाने की इस साजिश को नाकाम करने का वक्त है। (सुप्रिय प्रसाद न्यूज 24 चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं। )


पाक मीडिया हमसे ज्यादा आजादः विनोद कापड़ी
-सबसे ब़ड़ा सवाल ये है कि सरकार पर नजर रखने के लिए मीडिया बनी है या मीडिया पर नजर रखने के लिए सरकार बनी है। मीडिया का काम ही यही है कि वो सरकार पर नजर रखे, जनता की बात जनता तक पहुंचाए, सरकार को बताए कि वो ये गलत कर रही है। लेकिन यहां तो स्थिति बिल्कुल उलटी हो चुकी है। सरकार मीडिया को बता रही है कि ये गलत है और ये सही है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। आप पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हालत देखिए। कितनी अराजकता है, लोकतंत्र नाम की चीज नहीं है, लेकिन वहां का मीडिया हमसे ज्यादा आजाद है। हमारी सरकार को क्या ये नहीं दिखाई देता। मीडिया पर सेंसरशिप का सरकारी ख्याल कतई लोकतांत्रिक नहीं है। ये प्रेस की आजादी पर हमला है।
(विनोद कापड़ी इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हैं)

सरकार को इतनी जल्दी क्यों हैं -आशुतोष
इस रेगुलेशन से सरकारी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं..। क्योंकि टीवी चैनल पर कुछ दिनों पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक इमरजेंसी गाइड लाइन बनाई गई थी। सारे चैनलों ने इसे लागू करने की बात भी कही थी, लेकिन सरकार ने इस इमरजेंसी गाइडलाइन को ही सिरे से नकार दिया, जबकि सरकार को इस गाइडलाइन के तहत चैनलों को काम करने देना चाहिए, जो उसने नहीं किया। सवाल ये है कि सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? वो सेल्फ रेग्यूलेशन के खिलाफ क्यों है? ये एक बड़ा सवाल है। (आशुतोष आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर हैं)

प्रेस की आजादी पर हमला-सतीश के सिंह
आजाद भारत के इतिहास में प्रेस की आजादी पर इससे बड़ा अंकुश लगाने की, इससे बड़ी कोशिश कभी नहीं हुई। सरकार न सिर्फ टीवी बल्कि प्रिंट और वेब मीडिया पर भी अपना अंकुश लगाना चाहती है। सरकार की ये कोशिश किसी मीडिया सेंसरशिप से कम नहीं है। प्रेस के लिए बाकायदा कानून हैं। अगर कोई विवाद की स्थिति होती है तो संस्था और पत्रकारों पर मुकदमे चलते ही हैं, लेकिन सरकार अब जो करने की कोशिश कर रही है वो प्रेस की आजादी पर हमला है, फंडामेंटल राइट्स के खिलाफ है। (सतीश के सिंह जी न्यूज के एडिटर हैं)






Wednesday, October 29, 2008

हमारी आवाज़ दबाने की कोशिश

सुशील कुमार सिंह
 
गासिपअड्डा.काम का मकसद नेपथ्य की उन खबरों को सामने लाना रहा है जिन्हें पारंपरिक मीडिया में जगह नहीं मिलती। वे खबरें चाहे राजनीति की हों या अफसरशाही की अथवा खुद मीडिया की। कितनी ही सूचनाएं हैं जो कभी रोशनी में नहीं आ पातीं, अगर इस साइट ने उन्हें प्रकाशित न किय़ा होता। यह ऐसा मंच है जहां पाठक भी अपना सहयोग देकर हमारे प्रयास में भागीदार बन सकते हैं।
 
इस प्रयोग का एक शर्मनाक नतीजा यह निकला कि राजनीतिकों की बजाय नेपथ्य की खबरों से मीडिया के कुछ मठाधीशों को ज्यादा परेशानी हुई। वे ऐसी हरकतों पर उतर आए कि इमरजेंसी की याद आ जाए। 23 अक्तूबर की शाम करीब साढ़े छह बजे लखनऊ से दर्जन भर पुलसियों की एक टीम गासिपअड्डा.काम के संस्थापक सुशील कुमार सिंह को गिरफ्तार करने उनके घर जा धमकी। कुछ ऐसी खबरों के एवज़ में जिनमें हिंदुस्तान टाइम्स संस्थान में घटी कुछ घटनाओं का जिक्र था।
 
सुशील घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी ने उन्हें फोन किया। उन्होंने पुलिसवालों से मोबाइल पर बात करवाई। लखनऊ के गोमती नगर थाने के एक सब-इंस्पेक्टर राजीव कुमार सिंह लाइन पर थे। वे चाहते थे कि सुशील तत्काल घर लौटें। सुशील ने कहा कि वे तो रात दस बजे लौटेंगे। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस तुरंत उनसे बात करना चाहती है तो वह प्रेस क्लब आ जाए या फिर पटियाला हाउस अदालत परिसर में एक वकील के चैंबर में। पुलिस टीम इन दोनों जगह आने को तैयार नहीं थी।
 
पुलिस उनके परिवार को एक घंटे तक धमकाती रही। फिर सुशील के एक मित्र और पड़ोसी शरद गुप्ता उनके घर पहुंचे। तब पहली बार पुलिस ने बताया कि मामला क्या है। शायद यह सोच कर कि शरद गुप्ता भी एक पत्रकार हैं।पुलिसियों ने बताया कि गासिपअड्डा.काम के खिलाफ हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप के बारे में कुछ लिखने पर उसके लखनऊ दफ्तर के एक अधिकारी बीएस अस्थाना ने एक एफआईआर दर्ज कराई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि गासिपअड्डा.काम से किसी ने फोन करके अस्थाना जी से पचास लाख रुपए की मांग की ताकि भविष्य में ऐसी खबरें इस साइट पर न आएं।
 
जाते-जाते भी पुलिस टीम ने धमकी दी कि वे सुशील कुमार सिंह को उठाने के लिए कभी भी दोबारा आ सकते हैं। एक वकील मित्र ने सुशील को सलाह दी कि किसी हालत में वे पुलिस से अकेले न मिलें। वकील मित्र ने कई बार फोन करके पुलिस टीम को इस बात के लिए राजी करने का प्रयास किया कि वह सुशील से बात करने किसी ऐसी जगह आ जाए जहां वकील मौजूद रहे या फिर मीडिया के कुछ मित्र। मगर पुलिसवाले लगातार जिद करते रहे कि वे तो अकेले सुशील से मिलेंगे।
 
दो-तीन घंटों में यह खबर मीडिया में फैल गई। अनेक पत्रकारों ने हिंदुस्तान टाइम्स संस्थान और उत्तर प्रदेश पुलिस के इमरजेंसी जैसे रवैये की एकजुट होकर निंदा की। प्रेस क्लब आप इंडिया ने एक प्रस्ताव पास कर सुशील कुमार सिंह पर पुलिस कार्रवाई का विरोध किया है। अब तक देश के पांच प्रेस क्लब ऐसा ही प्रस्ताव पास कर चुके हैं। आल इंडिया वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने भी एक प्रस्ताव के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया है। हम देश-विदेश के उन तमाम साथियों के प्रति आभार प्रकट करना चाहते हैं जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का विरोध करने में हमारा साथ दिया है।चार दिन तक दिल्ली में सुशील कुमार सिंह की तलाश करते रहने के बाद आखिरकार पुलिस टीम लखनऊ लौट गई।गासिप अड्डा.काम इन हथकंडों से घबराने वाला नहीं है। हैरानी की बात है कि ये हथकंडे मीडिया के ही कुछ प्रतिनिधि अपना रहे हैं। इसके बावजूद इस साइट की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।www.janadesh.in
 

Monday, October 27, 2008

वेब पत्रकारों की यूनियन!

अंबरीश कुमार
हिन्दी में वेब साइटों की बढ़ती संख्या, पत्रकारों की ब्लाग की दुनिया में बढ़ती दिलचस्पी एक नए युग की शुरूआत कर रही है। पर दिलचस्प बात यह है कि वेब पत्रकार की परिभाषा तक अभी गढ़ी नहीं ज सकी। वर्किग जनर्लिस्ट एक्ट में इस नई विधा के पत्रकारों के लिए कोई नियम-कानून नहीं है। देश में अभी तक साइबर कानून भी नहीं है। सारे मामले भारतीय दंड संहिता के तहत देखे ज रहे हैं। यही वजह है कि पत्रकार सुशील कुमार सिंह को लेकर वेब पत्रकारों के हितों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। यदि जल्द ही वेब पत्रकारों को परिभाषित करते हुए उनका संगठन नहीं बना तो आने वाले समय में इस तरह की चुनौतियां और बढ़ेंगी। पेशेवर पत्रकारों को अगर छोड़ दें तो बड़ी संख्या में ब्लागर आए हुए हैं जो अपने ब्लागों पर पूरी आजदी के साथ लिख रहे हैं। कई बार इनका लेखन प्रिंट मीडिया के नियम-कानूनों को तोड़ता हुआ आगे भी बढ़ जता है। चाहे सांप्रदायिकता की बहस हो या फिर जतिवाद का मामला। सुशील कुमार सिंह को जिस तरह के मामले में फंसाया गया है, उसके आधार पर चले तो कई राज्यों में पुलिस सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने, जतीय उत्पीड़न, मानवाधिकार के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा देने और ईलता के बहाने किसी भी ब्लागर या वेब पत्रकार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर सकती है। यदि ब्लागर छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश का है और असम की पुलिस ने कोई मामला दर्ज कर दिया तो संबंधित ब्लागर-पत्रकार के सामने दूसरे राज्य में जकर जमानत लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। 
ब्लाग पर आमतौर पर किस्सा, कविता और ज्ञान-विज्ञान की बातें हो रही हैं। पर अब अखबारों से पहले खबर देने का काम भी ब्लाग पर शुरू हो चुका है। यह ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि जो खबरें प्रिंट मीडिया के लोग रोकने का प्रयास करते हैं, उसे वेब पत्रकार अंतर्राष्ट्रीय वेब मंडी में डाल देते हैं। यह प्रिंट मीडिया के मठाधीशों के लिए नया खतरा बन रहा है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका-इराक युद्ध के दौरान बगदाद के ब्लागर की जनकारी और फोटो का इस्तेमाल अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी किया। दूसरी तरफ अमेरिका में सीनेटर ट्रेन्ट लोन्ट के खिलाफ ब्लागरों की मुहिम ऐसी चली कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। भारत में भी आधी दुनिया के मानवीय सवालों को उठाने वाले बेटियों काब्लाग को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिला। यह एक पहलू है। पर दूसरा पहलू यह है कि एक्सप्रेस समूह में एक दशक से ज्यादा समय गुजरने वाले सुशील कुमार सिंह, एनडीटीवी और सहारा न्यूज चैनल में महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेकिन उनके खिलाफ पुलिस उत्पीड़न की कार्रवाई पर कोई भी अखबार और चैनल नहीं बोला। इन अखबारों में वे अखबार भी शामिल हैं जो जनर्लिज्म ऑफ करेज का नारा देते हैं और वे भी जो अपने को विश्व का सबसे बड़ा अखबार घोषित करते रहे हैं। यह वेब पत्रकारिता के नए खतरों को चिंहित भी कर रहा है। चाहे ब्लागर हों या फिर वेब पत्रकार, न इनका कोई संगठन है और न यूनियन। कई तो इन्हें पत्रकार मानेंगे ही नहीं। कल को यदि ये संकट में फंसे या किसी ने फर्जी मुकदमा कर दिया तो इनके सवाल को लेकर कौन खड़ा होगा? वक्त आ गया है वेब पत्रकारिता करने वाले साथी इस पर गंभीरता से सोचें। वेब पत्रकारों का न सिर्फ एक संगठन बने बल्कि वर्किग जनर्लिस्ट एक्ट में संशोधन कर इनके हितों की रक्षा की जए। हर राज्य में वेब पत्रकारों के संगठन को मान्यता दिलाई जए। साथ ही वेब पत्रकार के हितों को सुरक्षित किया जए। वरना जिस तरह प्रिंट मीडिया के लोग अपने पत्रकार के फंसने पर उससे न सिर्फ नाता तोड़ते हैं बल्कि उसे नौकरी से बाहर कर उसकी खबर तक नहीं छपने देते हैं। और उनके संगठन उनके पक्ष में आवाज तक नहीं उठाते हैं। यही सुशील कुमार सिंह 1990 के दशक में राम नाथ गोयनका के अखबार द इंडियन एक्सप्रेस पर सत्तारूढ़ दल के हमलों के खिलाफ सड़क के संघर्ष में हमारे साथ थे। पर आज वह अखबार उनको पहचानता नहीं है। तब जनसत्ता के पत्रकारों ने न सिर्फ गुण्डों की लाठियां खाई बल्कि उन पर तेजब भी फेंका गया। यही वजह है कि अब वेब पत्रकारों को इन सब मुद्दों पर गंभीरता से सोचना है।

Friday, October 24, 2008

देशभर के पत्रकार एकजुट

जनादेश ब्यूरो
नई दिल्ली । दिल्ली में बनाई गई वेब पत्रकार संघर्ष समिति का देश भर के पत्रकार संगठनों ने स्वागत किया है। अखबारों में जनसत्ता, द इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक जगरण, दैनिक भास्कर, अमर उजला, नवभारत, नई दुनिया, फाइनेन्शियल एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान, दी पायनियर, मेल टूडे, प्रभात खबर, डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट व बिजनेस स्टेन्डर्ड जसे तमाम अखबारों के पत्रकारों ने वेब पत्रकार संघर्ष समिति के गठन का स्वागत किया। हिन्दुस्तान के दिल्ली और लखनऊ के आधा दजर्न से ज्यादा पत्रकारों ने इस मुहिम का स्वागत करते हुए अपना नाम न देने की मजबूरी भी बता दी। आईएफडब्ल्यूजे, इंडियन एक्सप्रेस इम्प्लाईज वर्कर्स यूनियन, जनर्लिस्ट फार डेमोक्रेसी, चंडीगढ़ प्रेस क्लब और रायपुर प्रेस क्लब ने इस पहल का समर्थन किया है और सुशील कुमार सिंह के खिलाफ फर्जी आपराधिक मामले में फंसाने की कड़ी आलोचना की है। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जनर्लिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव ने कहा-अभी तक प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मुद्दों को लेकर चर्चा होती रही है। पर पहली बार वेब पत्रकारों ने पहल करते हुए जो संगठन बनाया है, वह आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हम इस संगठन के गठन का स्वागत करते हैं। 
जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस इम्प्लाईज वर्कस यूनियन के उपाध्यक्ष अरविन्द उप्रेती ने कहा-हम सुशील कुमार सिंह के साथ हैं। वे हमारे एक्सप्रेस के संघर्ष के दिनों के पुराने साथी हैं। एक्सप्रेस यूनियन की तरफ से मैं उनके खिलाफ होने वाली पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करता हूं। इस बीच हिन्दुस्तान में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार और डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के संपादक प्रभात रंजन दीन ने कहा-सुशील कुमार सिंह के साथ जो हुआ, वह शर्मनाक है। इस मुद्दे पर साथियों की जो भी राय बनेगी, हम वह सब करने को तैयार हैं।
जनर्लिस्ट फार डेमोक्रेसी के संयोजक पंकज श्रीवास्तव ने कहा-वेब पत्रकारों की एकजुटता नई पहल है। आने वाला समय वेब पत्रकारिता का है। ऐसे में पत्रकारों के सामने नई चुनौतियां भी आएंगी जिनका मुकाबला इस प्रकार के संगठनों से किया ज सकेगा। 
इस बीच रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने सुशील सिंह के मामले में पुलिस उत्पीड़न की कार्रवाई की तीखी निंदा करते हुए उनके खिलाफ सारे मामले वापस लेने की मांग की है। इस बारे में रायपुर प्रेस क्लब में बैठक भी बुलाई ज रही है। पुसदकर ने दिल्ली में वेब पत्रकारों का संगठन बनाए जने का स्वागत करते हुए इसकी छत्तीसगढ़ इकाई शुरू करने का एलान किया। जनादेश वेबसाइट की संपादक सविता वर्मा ने सुशील कुमार सिंह के प्रकरण को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए वेब पत्रकारों की पहल का स्वागत किया है। इससे आने वाले समय में वेब पत्रकारों को फर्जी मामले में फंसाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया ज सकेगा। पश्चिम बंगाल की पत्रकार रीता तिवारी ने दिल्ली में वेब पत्रकारों की संघर्ष समिति बनाए जने का स्वागत करते हुए कहा कि इसकी इकाईयां अन्य राज्यों में भी बनाई जनी चाहिए ताकि राज्यों के वेब पत्रकारों का उत्पीड़न न हो सके। प्रेस क्लबऑफ़ इंडिया के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा-वेब पत्रकारों के सामने जो भी चुनौतियां भी आएंगी उनका मुकाबला किया जाएगा।
लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष सिद्धार्थ कलहंस ने कहा-वेब पत्रकारिता का नया दौर शुरू हुआ है। ऐसे में पत्रकारों की यह पहल महत्वपूर्ण है। चंडीगढ़ प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष चरनजीत आहूज ने वेब पत्रकारों की पहल का स्वागत करते हुए इसे हर संभव समर्थन देने का एलान किया है।दूसरी तरफ पीपुल्स यूनियन फॉर ह्यूमन राइट्स के शाहनवाज आलम ने सुशील सिंह के खिलाफ फर्जी मामला दर्ज करने की कड़ी निंदा करते हुए इस मामले को मानवाधिकार आयोग ले जने की बात कही है। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के राष्ट्रीय महासचिव चितरंजन सिंह ने कंधमाल से फोन पर कहा-हम दिल्ली लौटते ही इस मुद्दे पर पहल करेंगे।

इससे पहले एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।
इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।
दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।
बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा हमला करने का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे। एकजुटता और संघर्ष की इसका कारगर इलाज है।
विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''
लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।
बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।
बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।www.janadesh.in