Tuesday, August 10, 2010

रवींद्र कालिया ने माफी मांगी

नईदिल्ली। ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक और ज्ञानपीठ के निदेशक रवींद्र कालिया ने हिंदी समुदाय में बढ़ते रोष के मद्देनजर ‘छिनाल’ शब्‍द के प्रकाशन के लिए माफी मांगी है। कालिया ने ‘जनसत्ता’ को एक पत्र में कहा है कि ज्ञानपीठ पुरस्‍कार वितरण समारोह के आयोजन के सिलसिले में वे आठ दिन गोवा रहे, इसलिए ‘संपादकीय दायित्‍व का निर्वाह करने में असमर्थ रहे।’ उन्‍होंने आगे कहा है कि ‘उन्‍हें इसका गहरा अफसोस और शर्मिंदगी है कि विभूति नारायण राय का साक्षात्‍कार जैसा का तैसा चला गया।’ इसके लिए वे ‘हिंदी जगत के समस्‍त पाठकों और रचनाकारों से क्षमाप्रार्थी हैं।’
कालिया का यह स्‍पष्‍टीकरण हिंदी लेखकों के गले शायद ही उतरे, क्‍योंकि उनके गोवा जाने से पहले ‘नया ज्ञानोदय’ का अंक तैयार हो चुका था। इतना ही नहीं, उन्‍होंने खुद अंक के संपादकीय में राय के साक्षात्‍कार को ‘सबसे बेबाक’ करार दिया था। बहरहाल, क्षमायाचना के साथ कालिया ने यह जानकारी भी दी है कि अगस्‍त का वह अंक ‘जहां जहां से उपलब्‍ध हो सके, वापस मंगवा लिया गया है तथा वीएन राय के साक्षात्‍कार से विवादास्‍पद तथा आपत्तिजनक अंश हटा दिये गये हैं।’
ज्ञानपीठ के भीतर यह चर्चा है कि कालिया की यह सफाई ज्ञानपीठ के न्‍यासियों को स्‍वीकार होगी या नहीं। न्‍यास मंडल की बैठक 23 अगस्‍त को मुकर्रर है। फिलहाल केवल आलोक जैन कालिया के तरफदार हैं।

नामवर सिंह की चुप्पी शर्मनाक

विष्‍णु खरे
विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के कलुषित गठबंधन के विरुद्ध हिंदी में जो कार्रवाई हुई उसने हिंदी लेखक-लेखिकाओं की ताकतों, कमजोरियों और विरोधाभासों को भी उजागर करने में ‘मदद’ की। लेखिकाएं कपिल सिब्बल से मिलीं लेकिन कोई लिखित ज्ञापन नहीं ले गर्इं जिसमें विभूति नारायण के इस्तीफे या बर्खास्तगी की मांग की गई होती। वे राष्ट्रपति से नहीं मिलीं जिन्होंने कुलपति-पद के उम्मीदवारों की सूची से राय के नाम का अनुमोदन किया था। वे प्रधानमंत्री, उनकी पत्नी और उनकी बेटी से नहीं मिलीं। उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने का प्रयास नहीं किया। जो धरना ज्ञानपीठ के सामने दिया गया वह रेस कोर्स रोड, जनपथ और राष्ट्रपति-भवन के सिंहद्वार पर भी दिया जा सकता था।
हम ‘जसम’ की विडंबना की बात कर चुके हैं, लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ, जिसके राष्ट्राध्यक्ष नामवर सिंह वर्धा गांधी विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति के नामजद कुलाधिपति हैं, की चुप्पी शर्मनाक और निंदनीय है। यदि कुलपति लेखिकाओं को ‘‘छिनाल’’ कह सकता है तो ‘विजिटर्स नॉमिनी’ उसकी सार्वजनिक भर्त्सना अपना नैतिक कर्तव्य समझकर क्यों नहीं कर सकता? उधर हिंदी के कुछ लेखक-लेखिकाएं एक रहस्यमय विवशता में इस पूरे मसले पर या तो चुप हैं, या, जो और भी लज्जास्पद है, राय-कालिया का बचाव या समर्थन कर रहे हैं। इस लेखक ने विभूति राय और रवींद्र कालिया की बर्खास्तगी की मांग करने वाले एक सार्वजनिक पत्र पर दस्तखत किए हैं जिस पर करीब दो सौ हस्ताक्षर और हैं। इनमें शायद हिंदी की सभी विचारधाराओं के प्रतिनिधि होंगे। लेकिन यह कहना कठिन है कि उन सब ने सदिच्छा, ईमानदारी और क्षोभ के साथ इस अभियान में हिस्सा लिया होगा।
वर्तमान हिंदी परिदृश्य ने इतने व्यामोह और मनोविदलता को जन्म दिया है कि हर पार्टनर से उसकी पॉलिटिक्स पूछना अनिवार्य हो गया है। जब मैं इन हस्ताक्षरों को देखता हूं तो कुछ की कोई साहित्यिक पहचान नजर नहीं आती, कुछ कुप्रेरक या दोमुंहे प्रतीत होते हैं और कम-से-कम एक के बारे में मैं ही नहीं, सारा सुधी हिंदी संसार जानता होगा कि वह एक ऐसा ‘बहादुर’ है जो स्त्रियों को छिनाल से भी बदतर समझने में अपनी सिंह-विजय समझता है और मूलत: राय-कालिया बिरादरी का है।
किसी सोद्देश्य हस्ताक्षर-अभियान का अर्थ यह नहीं होता कि उसमें घुसपैठ कर कुछ धूर्त भी सुर्खरू हो लें- उसमें हमेशा एक जानकार, जागरूक ‘मॉडरेटर’ चाहिए। खुशी की बात है कि राय-कालिया टीम का भी एक हस्ताक्षर अभयान सामने आया है, और दुर्भाग्यवश उसमें कुछेक ऐसे समझदार दस्तखत भी हैं जो शायद पुरानी दोस्तियों को निबाह रहे हैं। लेकिन महज कुछेक। इन दोनों अभियानों की सूचियों ने हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार एक आधारभूत गुणात्मक और नैतिक विभाजन को रेखांकित किया है। कुछ विवेक से काम लेते हुए यदि इन दोनों सूचियों को थोड़ा-सा संशोधित किया जाए तो यह पांडवों-कौरवों या द्वितीय विश्व-युद्ध के ‘एलाइड’ और ‘एक्सिस’ वाले पक्ष बन जाते हैं और इन दोनों पर अगले वर्षों तक एक सख्त नजर रखी जानी चाहिए।
इस मामले के कुछ और पहलू भी जागरूकता की मांग करते हैं। क्या वजह है कि कपिल सिब्बल से मिलने वाली किन्हीं भी लेखिकाओं ने उस मुलाकात का अपना ब्योरा और आकलन नहीं दिया है? कुछ दूसरी लेखिकाओं ने क्यों राय-कालिया का पक्ष लिया है या चुप्पी अख्तियार कर रखी है- हालांकि स्त्री-पुरुष दोनों लेखकों को यह अधिकार भी है कि वे इस मसले को इतना घिनौना समझें कि हलधर बलराम की तरह युद्ध से विरक्त हो जाएं। कुछ लेखक तो इसलिए गूंगे हैं कि वे आगामी वर्षों में स्वयं को ज्ञानपीठ पुरस्कार की ‘शॉर्ट-लिस्ट’ में देख रहे हैं लिहाजा उसकी ‘ब्लैक-लिस्ट’ से बच रहे हैं। यह भी है कि लेखिकाओं का एक बहुत छोटा प्रतिशत अपने ‘कैरिअर’ को गतिशील बनाने के लिए संपादकों, आलोचकों, सहधर्माओं, प्रकाशकों, प्राध्यापकों और निजी तथा सार्वजनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों के बीच कुछ ज्यादा-ही सक्रिय है- यद्यपि यदि पुरुष लेखक वैसा करते हैं तो स्त्रियां क्यों न करें, लेकिन दक्षिण एशिया में औरत होने की ही ‘ऐसी ट्रेजिडी है नीच’- और मैं समझता हूं कि नारी-गरिमा के लिए कहीं भी अशोभनीय है और नैतिक रूप से संदिग्ध है। महिला- लेखक कम-से-कम पुरुष-लेखकों के पतन का अनुकरण तो न करें। इस प्रकरण में कुछ ब्लॉगों ने सक्रिय, जोशीली, पक्षधर भूमिका निबाही है लेकिन हिंदी का ब्लॉग-विश्व भी अत्यंत संदिग्ध प्रतिक्रियावादियों, कुंठित ‘लेखकों’, ‘पत्रकारों’, ‘पाठकों’, खुदाईखिद मतगारों, प्रगतिविरोधी तत्त्वों और देश के चतुर्दिक पतन से खलसुख प्राप्त करने वालों से बजबजा रहा है।
निस्संदेह कुछ अच्छे, सार्थक, विचारों के उत्तेजक टकराव वाले ब्लॉग भी हैं। लेकिन शेष अधिकांश हिंदी-समाज की गिरावट के प्रतिबिंब ही हैं। एक ही व्यक्ति अनेक नामों या अनामता से स्वयं अपने और दूसरों के ब्लॉगों पर आॅरवेलीय ‘डबलथिंक’ और ‘डबलस्पीक’ का लॅकैरीय ‘मोल’ या ‘डबल एजेंट’ बना हुआ है। कुछ महिलाओं के जाली नामों से लिख रहे हैं। कुल मिलाकर राय-कालिया जैसी उठाईगीर, बाजारू मानसिकता ने ब्लॉग जैसे सशक्त, कारगर माध्यम को कुछ ही समय में बर्बादी के कगार पर ला दिया है। वहां ‘छिनाल’ से भी ज्यादा अश्लीलता और चरित्र-हनन ‘माउस’ की एक ‘क्लिक’ पर कभी-भी, किसी के भी बारे में अवतरित हो सकते हैं। विडंबना यह भी है कि कंप्यूटरदु ि नया हिंदी में आज भी बहुत सीमित है। लेकिन ठीक राय-कालिया और उनकी बिरादरी की तरह कई ब्लॉग-टिटहरियां यह समझ रहीं कि हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का आकाश जैसा भी है उन्हीं की डेढ़ टांग पर टिका हुआ है। एक अजाचारी, समलैंगिक सुखभ्रांति चतुर्दिक व्याप्त है जिसमें आत्म-रति, अपना और अपने निरीह परिवार का विज्ञापन, गिरोहधर्मा अहोरूपम् अहोध्वनि, रूमानी भावनिकता, भेड़ियाधसान, पर्वतमूषकत्व आदि संचारी भाव हैं। कई ब्लॉग राय-कालिया मामले पर एक मौसेरे भाईचारे में चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि उनके संचालकों को वृहत्तर अकादमिक और ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ परिवार से अनेक आशाएं हैं।
हिंदी में और अखिल भारतीय तंत्र में एक भयावह तत्त्व और है। यदि आप किसी भी क्षेत्र में मनसा-वाचा-कर्मणा वास्तविक नैतिक और विचारधारागत मतभेद रखते हैं तो आप न सिर्फ उस हलके में अवांछित (पर्सोना नॉन-ग्राटा) हो जाते हैं बल्कि आपका एक मौन-अलिखित बहिष्कार कुष्ठ या एड्सग्रस्त या अछूत दलित की तरह शेष हर क्षेत्र में होता जाता है। इसका आतंक अधिकांश भारतीयों को कायर, मौकाशनास, धूर्त और दोमुंहा बना देता है। दुर्भाग्यवश, आज के कठिन-सरल जीवन संघर्ष को देखते हुए अधिकांश युवा उसी की पनाह ले रहे हैं। इसलिए भी कि उनके अधिकांश वरिष्ठों ने उनके सामने कोई बेहतर उदाहरण नहीं रखा।
हिंदी संसार, वह जैसा-जितना है, एक और त्रासद विडंबना से ग्रस्त है कि हिंदी पत्रिकाएं और पुस्तकें ही नहीं, मानीखेज हलचलें भी कोलकाता-मुंबई की हिंदी बिरादरी तक कम या देर से पहुंचती हैं और तब भी उसे विशेष उद्वेलित नहीं कर पातीं। यह भी है कि भोपाल, इंदौर, पटना, इलाहाबाद, बनारस, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, शिमला आदि नगरों-कस्बों के हिंदी लेखक, जिनमें खांटी वामपंथी भी शामिल हैं, राय-कालिया से भी कहीं गए- बीते सरकारी-गैरसरकारी सत्ताधारियों के साथ डेली बेसिस पर समझौते करते रहते हैं; महानगरों के शैतानों पर कभी-कभार प्रतीकात्मक पथराव कर देते हैं और छिनाल-जैसे मामलों पर या तो शिशुवत् भोलेपन का अभिनय करते हैं या कह देते हैं कि भैया ये तुम ‘दिल्लीवाले मठाधीशों’ का सत्ता-संघर्ष है, हमें इस कीचड़ में काहे को घसीटते हो, फिर माफी भी तो मांग ली गई है- और उसके बाद ‘ज्ञानोदय’ में रचना भेज कर ‘वर्धा’ का टिकट कटवा लेते हैं। जहां तक आम लुम्पेन हिंदीभाषी का प्रश्न है, राय- कालिया का मानसिक सहोदर होने के कारण वह सार्वजनिक क्षेत्रों में सक्रिय हर महिला को संदिग्ध ही समझता आया है।
यह कल्पना रोमांचक है कि यदि विभूति नारायण ने कार्पोरेट या राजनीतिक विश्व में निम्नोच्च स्तरों पर काम करने वाली महिलाओं को अपने प्रिय विशेषण ‘‘छिनाल’’ से नवाजा होता तो शास्त्री भवन, 7 रेसकोर्स रोड, 10 जनपथ, राष्ट्रपति भवन, तथा सरदार पटेल, बहादुर शाह जफर और कस्तूरबा गांधी के नामों पर रखे गए मार्गों पर क्या प्रतिक्रिया होती, फिक्की और एसोचैम उसके बारे में क्या कहते। यदि विभूति नारायण ने अंग्रेजी, मराठी, बांग्ला, उर्दू, मलयालम आदि भाषाओं की लेखिकाओं की शान में वह कसीदा पढ़ा होता तो नतीजों का तसव्वुर आसानी से किया जा सकता था। महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति उस मराठीभाषी क्षेत्र में बैठकर हिंदी लेखिकाओं को छिनाल कह रहा है जहां हिंदी साहित्य को लेकर अब भी बहुत स्नेह और सम्मान है, जहां चंद्रकांत पाटील सरीखा कवि- आलोचक-अनुवादक हाल ही में दस हिंदी कवयित्रियों को ‘संगिनी’ शीर्षक संग्रह के रूप में अनूदित कर चुका है। यदि विभूति नारायण को मालूम हो जाता तो मराठीभाषियों की चरित्र-रक्षा करने के लिए वे यह संग्रह ही रुकवा देते या उन्हें चेतावनी देने के लिए ‘संगिनी’ की जगह अपना पसंदीदा शब्द ‘बहुवचन’ में रखवा देते।
राय-कालिया जोड़ी ने ऐसा कारनामा अंजाम दिया है कि तीनों के लिए सिर्फ असंसदीय, अमुद्रणीय, घोर अपमानजनक शब्द ही जेहन और कलम की नोक पर आ-आकर लौट रहे हैं। दुर्भाग्यवश ‘ज्ञानोदय’ और ‘ज्ञानपीठ’ का प्रबंधन भी उन्हीं शब्दों को अर्जित करता लग रहा है-पाखंडी शालीनता में यकीन करना ऐसे मामलों को प्रोत्साहित करना ही होगा।
एक और अजीब कैफियत मुझ पर तारी हुई है। वेश्या-गमन से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि मैं उसे कानूनी वैधता प्रदान करने के पक्ष में हूं ताकि वेश्याओं का अपमान न हो। मुझे स्वयं कभी उन अभागी औरतों की दरकार नहीं हुई। बहरहाल, जो ‘‘बाजारीकरण’’ हमारे आसानीपरस्त, महदूद कहानीकार-कवियों का पिटा हुआ चहेता विषय हो चुका है उसी का विकराल स्वरूप इस शब्द के निर्लज्ज उपयोग और उसके बचाव के पीछे सक्रिय है। हमारे समाज और संस्कृति में बहुत कम गैरत और गुणवत्ता बची थी, बाजारीकरण उनका वेश्याकरण कर रहा है और ठीक इसी तरह साहित्यिक बाजारवाद बचे-खुचे सार्थक, श्रेष्ठ, प्रतिबद्ध लेखन के वेश्याकरण में जुटा हुआ है। जब ज्ञानपीठ का प्रबंधन यह कह रहा है कि रवींद्र कालिया ने ‘ज्ञानोदय’ और अन्य प्रकाशनों की बिक्री बढ़ा दी है, क्षमा मांग ली गई है, इसलिए उनके विरुद्ध और कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। चालीस वर्ष पहले ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ की निरामिष आत्मपावनता का यह आलम था कि किसी कहानी आदि में ‘शराब’, ‘अंडा’ और ‘गोश्त’ जैसे शब्द ‘जूस’, ‘आलू’ और ‘पराठा’ में बदल दिए जाते थे। आज पेंडुलम दूसरे आत्यंतिक छोर पर है जब ग्राहक बढ़ाने के लिए छिनाल चलाई जा रही है।
विभूति नारायण और रवींद्र कालिया से इस्तीफा लेना अब इसलिए बेमानी लगता है कि, जहां तक मेरा आकलन है, हिंदी साहित्य में उनकी प्रतिष्ठा यदि कभी थी भी तो आज फूटी कौड़ी की नहीं रह गई है। लेकिन अधिकांश ऐसे प्राणी, उनके सरपरस्त और समर्थक गंडक-चर्म में वाराहावतार होते हैं। उन्हें न व्यापै जगत-गति। फिर जिस समाज में हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, स्मग्लर, करोड़ों का गबन करने वाले संसद तक पहुंच रहे हों वहां हिंदी, जो खुद गरीब की जोरू की तरह सबकी भौजाई या साली है, भले ही उसका एक गांधी विश्वविद्यालय हो, उसकी लेखिकाओं को छिनाल कह देना तो एक होली की ठिठोली से ज्यादा कुछ नहीं। हिंदी साहित्य को अब ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ से कुलटा, रखैल, समलिंगी, हिजड़ा, ‘निम्फोमैनिएक’ सुपर-विशेषांकों और ग्रंथों की विकल प्रतीक्षा रहेगी। पोर्नोग्राफी के जिस दैत्याकार मार्केट के लिए विदेशी कंपनियां लालायित हैं, ज्ञानपीठ-ज्ञानोदय उसे भारतमाता को कलुषित नहीं करने देंगे। इस तरह वे विदेशी मुद्रा बचाएंगे और खुद कमाएंगे। किसे मालूम कि उससे कभी ज्ञानपीठ पुरस्कार एक करोड़ या उससे भी अधिक का किया जा सके!
क्या हिंदी लेखकों में वह नैतिक बल और संकल्प है कि वे विभूति नारायण और रवींद्र कालिया के रहते हिंदी विश्वविद्यालय और ज्ञानपीठ का बहिष्कार कर सकें? क्या हिंदी के अधिकांश सक्रिय लेखक-लेखिकाएं राय-कालिया जैसी हरकतों के विरुद्ध कोई दृढ़, दीर्घावधि स्टैंड ले सकते हैं? क्या हम हर संभव दरवाजा पीट सकते हैं?
राय और रवींद्र कालिया के सम्मिलित छिनाल कांड ने जिस तरह बेहतर हिंदी लेखकों को जागृत और एकजुट किया है वह एक विडंबनात्मक वरदान है। प्रश्न यही है कि हिंदी के ये सभी स्वाभिमानी और जिम्मेदार लेखक अपमानित मुचकुंद की तरह इस कालयवनद्वय को भस्म कर पाएंगे या वही बने रहेंगे जिसे ‘छिनाल’ की तरह परिभाषित किया जाता रहे- जबकि वेश्या भी रंडी कहे जाने पर एक तमाचा तो मार ही देती है?
जनसत्ता से साभार

Monday, August 9, 2010

हरियाली ,हिमालय और सुर्ख होते सेब








अंबरीश कुमार
दार्जलिंग से शिवानी ने सतबुंगा जाने का कार्यक्रम इस शर्त पर बनाया कि मै गाइड के रूप में मुक्तेश्वर तक कई जगहों को दिखाने ले जाऊंगा .इस वजह से अचानक नैनीताल जाने का कार्यक्रम बना और रामगढ पहुंचा .गागर से नीचे उतरते ही बरसात की वजह से हरियाली ऐसी नज़र आई कि देखते मन न भरे .घर के बगीचे में फूल कम हो गए थे पर सेब के पेड़ लदे थे .दरवाजे पर लगा किंग डेविड प्रजाति का सेब सुर्ख हो चुका था तो बगीचे में डेलिशियस प्रजाति के पेड़ों में लगे सेब सुर्ख तो नहीं थे पर मिठास भरपूर थी .शाम तक बारिश और बादल के बीच आस पास घूमते रहे .गर्मियों के मुकाबले ठंढ ज्यादा थी इसलिए शाल से राहत मिली .रात में खाना बनाने का जिम्मा साथ आए एक मित्र ने लिया जो एक राष्ट्रीय अखबार के दिल्ली से बाहर के संपादक भी है .खाना बनाने के लिए सारा सामान बाज़ार से लेना था क्योकि गर्मियों में जो भी बचता है सब बहादुर को दे दिया जाता है .दूसरे साथ आए एक साथी मछली मुर्गे के बिना खाना अधूरा मानते है.गनीमत थी कि रोहू और टेंगन जैसी मछली भी उपलब्ध थी .खाना बनना रात आठ बजे शुरू हुआ और देर रात तक बैठकी चली .बीच बीच में थोड़ी देर के लिए बाहर निकल कर बरसात और ठंढ का अंदाजा लगाते .रात में ही तय हुआ सुबह सात बजे गाड़ी आने से पहले सभी तैयार मिले. पर रात भर रिमझिम के बाद भी सुबह भीगी नज़र आई .निकलते निकलते आठ बज चुके थे और सिंधिया एस्टेट से आगे का रास्ता घने बादलों के चलते नही दिख रहा था .फ़ॉग लाइट की मदद से धीमी गति आगे बढे .बारिश तो नही ओस जैसी बूंदे थी पर बादल बार बार घेर ले रहे थे .
सतबुंगा आते ही लगा पहाड़ों पर से पर्दा हटा दिया गया .आसमान भी खुल चुका था और सामने था हिमालय का अनंत विस्तार .घाटी के बीच पहाड़ी के सीढ़ीदार खेत और सेब के बड़े बड़े बागान.सेब के सुर्ख रंग देखकर बाहर के मित्र हैरान थे .ऐसे लदे थे जैसे अपने यहाँ देसी आम के पेड़ लद जाते है.रास्ते भर सेब , नासपाती और बब्बूगोसा के पेड़ों से फल तोड़कर खाते रहे .मुक्तेश्वर पहुंचे तो सबसे पहले जोशी जी की दूकान पर चाय पीने बैठे .सामने ही डाकखाना है .देवदार के पेड़ों से घिरे मुक्तेश्वर से लोग रानीखेत और अल्मोड़ा के भी दर्शन करा देते है .समूचे कुमायूं में इतने खूबसूरत जंगल ,पहाड़ और वादियाँ नहीं मिलेंगी .महाभारत के समय का एक शिव मंदिर पहाड़ी पर है जो सात हजार फुट की ऊँचाई पर है .जहाँ से आसमान साफ़ होने पर हिमालय की तीन सौ किलोमीटर लम्बी श्रंखला साफ़ दिखाई पड़ती है और लगता है कुछ ही किलोमीटर दूर बर्फ के पहाड़ है .एक दिन पहले ही लखनऊ में गर्मी से जान निकल रही थी और यहाँ ठंड से हालत खराब हो रही थी .
वापस सतबुंगा लौटे तो एक पतले रास्ते से पहाड़ पर चढ़ना था .ड्राइवर से छाता निकालने को कहा तो साथ चल रहे सतबुंगा के निवासी सत्यप्रकाश ने कहा - साहब अब घंटे दो घंटे बारिश नहीं होगी .फिर मैने छाता ले लिया .पहाड़ी पगडंडी पर का रास्ता कुछ देर बाद ही सीढ़ीदार खेतों और बगीचों के बीच चला गया .सतबुंगा की एक छोटी पर मंदिर है और उसके आगे घने जंगल .यह पूरा इलाका बाघ , गुलदार जैसे जानवरों का है .जंगल से पहले ही रास्ते में तेज बूंदे पड़ने लगी .पथरीले रास्ते पर तेज चलने से फिसलने का खतरा भी था .कुछ दुरी पर बच्चों का स्कूल नजर आया तो टिन की छत के नीचे शरण ली गई .पत्थरों से बने चार पांच घर थे पर कोई नज़र नही आ रहा था .पता चला यही पर विवादस्पद पचौरी का भी घर है जो गंगा ,ग्लेशियर पर अपने विचारों से विवाद में घिर गए थे .और नीचे भाजपा के सांसद पत्रकार चन्दन मित्र का घर भी लगभग तैयार हो गया है .
सतबुंगा की हरियाली ,हिमालय और बागान आपको आसानी से वापस नहीं लौटने देंगे .यही वजह है कि रामगढ पहुँचते पंहुचते रात हो गई .दूसरे दिन जब दिल्ली में आलोक तोमर और सुप्रिया को सेब की फोटो दिखाई तो सुप्रिया इस बात से नाराज थी कि सेब लेकर क्यों नहीं आया क्योकि उनके बगीचे पेड़ों में भी सेब लदे थे .मैंने बताया कि बगीचे के फल तो जून में ही बिक जाते है जिसके बाद सिर्फ एक दो पेड़ के फल चौकीदार के बच्चों के लिए छोड़ देते है .पर यह शिकायत वाजिब थी कि जब सत्तर रुपए बोरी वहा सेब मिल रहा हो तो लाना तो चाहिए था .


साहित्यिक पत्रकारिता का पतन

विष्‍णु खरे
हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता है कि हम कुछ विचारों, वस्तुओं और व्यक्तियों को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये पूर्वग्रह कभी सकारण होते हैं और कभी नितांत निरंकुश, जिनके लिए उर्दू में ‘बुग्ज-ए-लिल्लाही’ जैसा खूबसूरत पद है। हमें कुछ लोगों का जिक्र करने, उन्हें देखने, उनके साथ उठने-बैठने-फोटो खिंचाने, उन्हें अपने घर की दहलीज पर फटकने देने की कल्पना मात्र से घिन आने लगती है। यह खयाल भी हमारा इलाज नहीं कर पाता कि कुछ दूसरे हमजिंस हमारे बारे में भी ऐसा ही सोचते होंगे। बुग्ज की रौनक इसी में है।
‘छिनाल’-ख्याति के विभूति नारायण राय को ही लें। मेरे जानते उन्होंने मेरा कभी कुछ बिगाड़ा नहीं है। उलटे एक बार जब वे किसी वामपंथी सम्मेलन में जा रहे थे, जिसमें मैं भी आमंत्रित था पर अपनी जेब से यात्रा-व्यय नहीं देना चाहता था, तो आयोजक ने मुझसे कहा था कि राय प्रथम श्रेणी में आ रहे हैं और मुझे अपने साथ निष्कंटक मुफ्त में ला सकते हैं। फिर जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए तो वर्धा के एक विराट लेखक-सम्मेलन में उन्होंने मुझे निमंत्रणीय समझा। अपने पूर्वग्रहों के कारण दोनों बार मैं उनके सान्निध्य से बचा।
उन्हें मैं कतई उल्लेखनीय लेखक नहीं मानता था और हाल ही में जब उनकी एक प्रेत-प्रेम कथा में यह पढ़ा कि अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास 1909 में आना शुरू हो चुके थे तो मेरी यह बदगुमानी पुख्ता हो गयी कि वे मात्र अपाठ्य नहीं, अपढ़ भी हैं। उनके आजीवन संस्थापन-संपादन में निकल रही एक पत्रिका उनके मामूली औसत मंझोलेपन का उन्नतोदर आईना है और उनके संरक्षण में उनके विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की जा रही तीनों पत्रिकाएं अधिकांशत: नामाकूल संपादकों के जरिये हिंदी पर नाजिल हैं, हालांकि उनमें से एक में मेरी कुछ शंकास्पद कविताओं के अन्यत्र प्रकाशित शोचनीय अंग्रेजी अनुवाद दोबारा छपे हैं।
यह सोचना भ्रामक और गलत होगा कि जो ख्याति विभूति नारायण ने ‘छिनाल’ के इस्तेमाल से हासिल की है, वह नयी है। उनके वर्धा कुलपतित्व (‘पतित’ के साथ अगर श्लेष लगे तो वह अनभिप्रेत समझा जाए) के पहले भी उन्हें लेकर अनेक अनर्गल किंवदंतियां थीं जिनका संकेत भी देना भारतीय दंड संहिता की मानहानि-संबंधित धाराओं को आकृष्ट कर लेगा; हालांकि उन्हें लेकर मुद्रणेतर माध्यमों में जो कुछ कहा जा रहा है, उस पर अगर वे अदालत गये तो उन्हें अपना शेष जीवन वकीलों के चैंबरों के पास पोर्टा कैबिन सरीखे किसी ढांचे में रह कर बिताना होगा।
गनीमत यह है कि हिंदी लेखिकाओं के लिए उन्होंने ‘छिनाल’ शब्द कहा ही नहीं है, उसे छपवाया भी है, उस पर बावेला मचने पर लोकभाषाओं और असहाय प्रेमचंद के हवालों से उसके इस्तेमाल का बचाव किया है – यानी उसे कबूल किया है – और अंत में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय स्तर पर एक खेले-खाये नौकरशाह की तरह सरकारी यदिवादी मुआफी भी मांग ली है। अपने कायर मगर चालाक त्वचारक्षण में कपिल सिब्बल और विभूति नारायण की मिलीभगत कामयाब रही – लाठी भी नहीं टूटी और शास्त्री भवन की इमारत खतरनाक, कुपित सर्पिणियों से खाली करवा ली गयी।
इसे क्या कहा जाए – ‘एंटी क्लाइमैक्स’, ‘इंटर्वल’, ‘हैपी एंडिंग’, ‘ट्रेजडी’, ‘फार्स’ या ‘बेकेट-ग्रोतोव्स्की-प्रसादांत’? क्या यह मसला सिर्फ एक बदजुबान, बददिमाग कुलपति-निर्मित-आईपीएस की सार्वजनिक मौखिक-लिखित अशिष्टता का था, जिसे खुद को लेखक-बुद्धिजीवी समझने की खुशफहमी भी है, जिसकी नाबदानी फासिस्ट फूहड़ता को रफा-दफा और दाखिल-दफ्तर कर दिया गया है?
इस मामले को ‘विभूति नारायण बनाम हिंदी लेखिकाएं’ मानना सिर्फ आंशिक रूप से सही होगा। हम इस अस्तित्ववादी बहस में यहां नहीं पड़ना चाहते कि तमाम महानतम विचारों, आस्थाओं और व्यक्तित्वों के बावजूद मानवता लगातार एक आत्महंता पतन का वरण ही क्यों करने पर अभिशप्त दीखती है, लेकिन यह एक कटु, निर्मम सत्य है कि समूचे भारत के सुकूत के बीच हिंदीभाषी समाज, उसकी संस्कृति(यों), हिंदी भाषा और साहित्य की उत्तरोत्तर अवनति और सड़न अब शायद दुर्निवार और लाइलाज है – बल्कि यह तक कहा जा सकता है कि दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिंदीभाषी समाज, यानी तथाकथित हिंदी बुद्धिजीवी, जिम्मेदार और कुसूरवार हैं।
प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, मुद्रित समाचार जगत, अकादेमियां, प्रकाशक, पुस्तकखरीद संस्थाएं, संस्कृति संसार, केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के मंत्रालय और विभाग, विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका – जहां भी हिंदी में या हिंदी का काम हो या नहीं हो रहा है, वहां के सारे हिंदी-उत्तरदायी इसके अपराधी हैं। हिंदीभाषी निम्न-उच्च और मध्यवर्ग भी इसके लिए कम दोषी नहीं।
यह मैं मानता हूं कि सर्जनात्मक साहित्य में कभी-कभी कथित अश्लील भाषा और चित्रण के बगैर लेखक का काम चल नहीं सकता, हालांकि उनके बिना भी सार्थक साहित्य लिखा ही जा रहा है। लेकिन गैर-रचनात्मक लेखन में लेखक को उससे बचना चाहिए, विशेषत: जब वह किन्हीं व्यक्तियों और समूहों को लेकर अपनी कोई धारणा व्यक्त कर रहा हो।
यह सही है कि विभूति नारायण ने अपना अधिकांश कार्यकाल एक ऐसे महकमे में काटा है जिसमें अश्लीलतम गालियां देना और सुनना पेशे का अनिवार्य और स्पृहणीय अंग है। लेकिन अगर एक ओर आपको यह भ्रम हो कि आप एक वाम समर्थक-समर्थित लेखक हैं – देखिए कि जन संस्कृति मंच ने उन्हें लेकर कैसे दो परस्पर-विरोधी जैसे बयान जारी किये हैं, जिनमें से एक को जाली बताया गया था – और दूसरी ओर गांधीजी (जिनके दुर्भाग्य का पारावार नजर नहीं आता) के नाम पर खोले गये हिंदी भाषा और साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति, तो आपको हिंदी को लेकर ‘बा मुहम्मद होशियार’ जैसा लौह-नियम जागते-सोते याद रखना चाहिए।
लेकिन, ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैं’ वाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम (‘डिल्यूजंस ऑफ ग्रैंड्योर’) का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विश्वविद्यालय में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए सारे बहाने और बहकावे-बहलावे हैं।
आप ‘एक्सपर्ट’ बन कर किस-किस को कहां-कहां कैसे-कैसे सेलेक्ट और रिजेक्ट नहीं कर सकते। प्रकाशक-मुद्रक-संपादक-कागज व्यापारी आपके बूट चूमने लगते हैं। हिंदी की सारी दुनिया आपके लोलुप लोचनों में छिनाल से कम नहीं रह जाती। हिंदी का प्राय: हर व्याख्याता, रीडर या प्रोफेसर इन्हीं फंतासियों में जीता है और उन्हें चरितार्थ करने में सक्रिय रहता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब जो कल्पनातीत और अधिकांशत: अपात्र वेतनमान लागू हैं, उनके कारण प्राध्यापक वर्ग में हिंदी के शुद्ध मसिजीवी लेखकों के प्रति हिकारत और बढ़ गयी है। सभी जानते हैं कि हिंदी विभागों में कई दशकों से यौन-शोषण चल रहा है, जो अक्सर दबा-छिपा दिया जाता है।
हम यह न भूलें कि ऐसे लोगों ने वे भी पाल रखे हैं, जिन्हें लीलाधर जगूड़ी के एक पुराने मुहावरे में ‘पुरुष-वेश्या’ ही कहा जा सकता है। अनेक हिंदी विभाग दरअसल ऐसी ही ‘अक्षतयोना’ पुरुष-वेश्याओं के उत्पादक चकले बन गये हैं, जहां कायदे से ‘कामायनी’ न पढ़ा कर ‘कुट्टनीमतं काव्यं’ पढ़ाया जाना चाहिए। एक छोटा-मोटा दस्ता रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी युगों से ही उठ खड़ा हुआ था, फिर नंददुलारे वाजपेयी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, नगेंद्र आदि के उप-युगों से होता हुआ अब नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे, पुरुषोत्तम अग्रवाल से गुजरता हुआ सुधीश पचौरी और अजय तिवारी जैसे अकादेमिक बौने छुटभैयों तक एक अक्षौहिणी में बदल रहा है।
देश के अन्य विश्वविद्यालय केंद्रों की कैसी दुर्दशा होगी यह सहज ही समझा जा सकता है – वहां यही लोग तो ‘एक्सपर्ट’ बन कर अपने तृतीय से लेकर अंतिम श्रेणी के भक्तों को तैनात करते हैं। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि सूडो-नामवर सिंह होने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाला एक हिंदी प्रोफेसर केंद्रीय सेवाओं के कूड़ेदान के लिए किस कचरे का योगदान कर रहा होगा। हिंदी की साहित्यिक संस्कृति का एक अनूठा आयाम यह भी है कि प्राय: सभी लेखक और प्रकाशक आपस में मित्र या शत्रु हैं, इन दोस्तियों और दुश्मनियों में भले ही बराबरियां न हों, ये संबंध अकादमिक दुनिया तक भी पहुंचते हैं और लगातार बदलते रहते हैं। इनमें एक वर्णाश्रम धर्म और वर्ग विभाजन भी है, नवधा-भक्तियां हैं, संरक्षकत्व, अभिभावकत्व, मुसाहिबी, चापलूसी, दासता आदि जटिल तत्त्व शामिल हैं। इसमें छोटी-बड़ी पत्रिकाओं के संपादकों की भूमिकाएं भी हैं, मगर बड़ी पत्रिकाओं के प्रकाशकों संपादकों के पास अधिक सत्ता है।
यह इसलिए है कि यों तो अपना नाम और फोटो छपा देखने की आकांक्षा पिछले साठ वर्षों से ही देखी जा रही है, पर लेखकों में फिर भी कुछ हया, आत्मसम्मान और स्व-मूल्यांकन के जज्बात बाकी थे। दुर्भाग्यवश अब पिछले शायद दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महत्त्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुड़ुकलुल्लू-मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी नमूदार हुई है, जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है। ‘अकविता आंदोलन’ के बाद साहित्यिक मूल्यों का ऐसा पतन सिर्फ इधर की कहानी और कविता दोनों में देखा जा रहा है। पत्रिका-जगत में ऐसे सरगनाओं जैसे संपादकों का वर्चस्व है, जो अपने-अपने लेखक-गिरोह तैयार करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के इक्कीसवीं सदी के संस्करणों का निर्लज्ज इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रतिभाशाली, संयमी, विवेकवान और साहसी युवा, प्रौढ़ और वरिष्ठ लेखक-लेखिकाएं बचे ही नहीं, मगर ग्रेशम के नियम के साहित्यिक संस्करण में खोटे सिक्कों ने वास्तविकों को बचाव-मुद्रा में ला दिया है जो अंतत: श्रेयस्कर ही है।
विभूति नारायण का छिनाल-प्रकरण अकादमिक-लेखकीय-संपादकीय मिलीभगत (‘नैक्सस’) के बिना संभव न होता। ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रवींद्र कालिया विभूति नारायण से कम मीडिऑकर लेखक हैं या अधिक, यह बहस का मसला नहीं है, लेकिन दोनों मिल कर एक अनैतिक साहित्यिक-सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते थे। ‘ज्ञानोदय’ दरअसल कितना छपता है इसका कुछ अंदाज हमें है; लेकिन बेशक कालिया ने उसमें और ज्ञानपीठ प्रकाशन में अपनी ‘वल्गर’ प्रतिभा से कुछ अस्थायी प्राण जरूर फूंके हैं। हम यह भी जानते हैं कि ज्ञानपीठ का प्रबंधन मूलत: राजनीतिक हवामुर्ग रहा है। कालिया अपने कांग्रेसी रिश्तों की वजह से ज्ञानपीठ में हैं, यह न तो ठीक-ठीक जाना जा सकता है और न उसकी जरूरत है।
मुझे शांतिप्रसाद-रमा जैन और लक्ष्मीचंद्र जैन के युग का ज्ञानोदय और ज्ञानपीठ याद हैं – वर्तमान निजाम को उसकी शर्मनाक अवनति ही कहा जा सकता है। लेकिन हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का उत्थान और पतन मुंबई के ‘धर्मयुग’ और ‘सारिका’ से होता हुआ नया ज्ञानोदय तक देखा जा सकता है। कुछ संपादकों ने मुख्यत: कहानी को स्त्रियों का शिकार करने की विधा में बदल दिया और रवींद्र कालिया उसी परंपरा की सड़ांध-भरी तलछट हैं। उन्हें दो बड़ी सुविधाएं हैं; उनके पास एक पत्रिका है, एक प्रकाशन-गृह है जिनके प्रबंधक साहित्य को सिर्फ बिक्री के तराजू में तौलना जानते हैं और उन्हें एक ऐसा लेखक-समाज मिला है जो अधिकांशत: किसी भी नैतिक कीमत पर सिर्फ छपना चाहता है।
साहित्यिक पत्रकारिता में बाजारवाद ‘धर्मयुग-सारिका’ से शुरू हुआ था जो अब अन्य पत्रिकाओं के अलावा ‘ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ’ में पूर्ण-कुसुमित महारोग का विकराल रूप ले चुका है। अपनी सत्ता और सफलता से राय-कालिया गठबंधन इतना प्रमादग्रस्त हो गया था कि उसने सोचा कि वह हिंदी समाज में ‘छिनाल’ को भी निगलवा लेगा, पर वह उसके गले की हड्डी बन गया।
जनसत्ता से साभार

Thursday, August 5, 2010

क्या यह डाइन है जो जीभ काटी


अंबरीश कुमार/विजय विनीत
लखनऊ/करहिया (सोनभद्र ) , अगस्त। आदिवासी महिला जागेश्वरी की जीभ काटने के मामले में उन सभी दो सौ लोगों लोगों पर मुकदमा चलाया जाए जो घटना के समय मूक दर्शक बने देख रहे थे ।यह मांग आदिवासियों के बीच काम कर रहे संगठनों ने आज की है । राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच ,मानवाधिकार कानून सलाह केंद्र और कैमूर क्षेत्र महिला मजदूर किसान संघर्ष समिति की तरफ एक प्रतिनिधिमंडल आज मौके पर पहुंचा । इस प्रतिनिधिमंडल में शांता भट्टाचार्य ,गणपति देवी ,शोभा सोकालो देवी और विनोद पाठक शामिल थे ।इस टीम युवा आदिवासी महिला जागेश्वरी से मुलाकात की जिसकी तीन दिन पहले भरी पँचायत में जीभ काट दी गई थी । बुधवार को एजंसी भाषा की खबर आने के बाद शासन प्रशासन के साथ मीडिया की भी नींद खुली । यह इलाका छत्तीसगढ़ से लगा है और बस्तर से लेकर सरगुजा तक टोनही और डायन के नाम पर दलित आदिवासी महिलाओं के शोषण का पुराना इतिहास है । छत्तीसगढ़ में जो काम बैगा करते है वही काम इस तरफ ओझा कर रहे है । इसी के चलते जागेश्वरी को डायन बता उसकी जीभ काट दी गई । पर जागेश्वरी की मुसीबते यही नही ख़त्म हुई । अस्पताल के डाक्टर ने इलाज तो दूर उसे कमरे से बाहर धकेल दिया । इस हादसे के बाद आदिवासी संगठन ने सवाल पूछा - क्या जागेश्वरी डायन है , जो भरी पंचायत में उसकी जीभ काट दी गई । छत्तीसगढ़ में डायन बताकर महिलाओं के उत्पीडन की पुरानी परंपरा रही है । उस परंपरा को और आगे बढ़ाते हुए इस गाँव के लोगों ने बर्बरता की सारी हदे पार कर एक युवा आदिवासी महिला की जीभ काट दी । और यह काम एक ओझा के कहने पर पंचायत में किया गया । पुलिस ने इस मामले में ओझा समेत दो लोगो को गिरफ्तार कर चालान कर दिया है ।
हैरान करने वाली बात यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ( म्योरपुर) के प्रभारी ने भी उसे शक की निगाह से देखते हुए इस महिला को कमरे से बाहर कर दिया । गुरूवार को कई घंटे वह अस्पताल परिसर में पेड़ के नीचे पड़ी रही । सामाजिक संगठनों के लोगों के सक्रिय होने पर उसे जिलाचिकित्सालय भेजा गया आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र के दक्षिणांचल में झाड़ - फूक व ओझाई के चलते हर माह मारपीट होती रहती है । गुरूवार को जन संगठनों के लोगों ने मौके पर पहुचंकर मामले की जांच की ।
छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा आदिवासी बाहुल्य करहीयां गांव सन् 2002 में तब चर्चा में आया था जब चार युवकों को माओवादी बताकर पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था । उसी करहीयां गांव में तीन दिन पहले जगेशरी की जीभ भरी पंचायत में उसी के दरवाजे पर डायन बताकर काट दी गई । रमाशंकर गोड़ की पत्नी जगेशरी की जीभ उसके चाचा के दामाद की पुत्री की मौत को लेकर काटी गयी । जिस समय उसकी जीभ काटी जा रही थी ,उस समय उसके चार बच्चे अंधा पिता व उसका पति लोगों के हाथ पैर जोड़कर ऐसा न करने की फरियाद कर रहे थे । लेकिन ग्रामीणों ने उसकी एक नही सुनी और ओझा के इशारे पर ऐसी अमानवीय हरकत कर डाली । घटना के एक दिन पूर्व जगेशरी के चाचा की पुत्री की चार वर्षीय बालिका की मौत हो गयी थी । इस पर बालिका का पिता सहदेव ने जगेशरी पर टोना टोटका करने का आरोप लगाया। इसकी पुष्टि के लिए उसने दो ओझाओं को बुलाया । ओझाओं ने जगेशरी के घर के सामने कटहल के पेड़ के नीचे पंचायत बुलाई । पंचायत में ओझाओं ने ऐलान किया की यह एक टोनही है जादू टोना करती रहती है । ऐसे में इसकी जीभ काट दी जाय । न जीभ रहेगी न यह जादू टोना कर पायेगी । इसके बाद कई लोगो ने उसका हाथ पैर पकड़ा और जीभ बाहर खीचकर गड़ासे से काट दी । जीभ कटते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी इससे वहां मौजूद लोग भाग खड़े हुये । उसका पति किसी तरह उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र म्योरपु र लाया । अस्पताल में भी उसके साथ डाक्टर का व्यवहार ओझा से कम नहीं था । उसे अन्य मरीजो से अलग थलग सिगंल बेड रूम मे डाल दिया । उपचार के नाम पर रस्म अदायगी की जाती रही । वह बोल नहीं पा रही थी उसके पास आठ माह का बच्चा राजनरायन भी था । गुरूवार दोपहर चिकित्सक ने उसे कमरे से बाहर करते हुए ताला लगा दिया और रेफर कर दिया । चिकित्सालय परिसर में वह काफी देर तक एक पेड़ के नीचे पड़ी रही । इसी बीच वहां महिला संगठन जागोरी कैमूर क्षेत्र मजदूर किसान सघर्ष समिति के लोगो ने जब महिला को पेड़ के नीचे पाया तो कलेक्टर को सूचना दी ।
घटना के तीन दिन बाद हरकत में आई पुलिस ने एक ओझा वह सहदेव को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया । एक आरोपी फरार है ,सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में तमाम लोग बिमारियों को भूत - प्रेत व जादू टोना मानते है । इसे लेकर इस जिले में आये दिन मारपीट होती रहती है , चार माह पूर्व कोन थाना क्षेत्र के पड़रच ग्राम पंचायत की एक महिला को ग्रामीणों ने डायन बता गांव से बाहर निकाल दिया । चोपन थाना क्षेत्र सलखन गांव में एक मांह पूर्व भूत प्रेत के चक्कर में एक महिला की जमकर पिटाई की गई । राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के चन्दुली गांव में भूत प्रेत को लेकर हुई मारपीट में 18 लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे । जबकि बभनी ,बीजपुर व दुद्धी थाना क्षेत्रों भूत- प्रेत को लेकर हुई मारपीट में एक साल के भीतर आधा दर्जनों लोगो की मौत हो चुकी है ।
जनसत्ता

Thursday, July 8, 2010

आलोक तोमर संकट में

आलोक तोमर संकट में है .डाक्टरी जाँच में कैंसर का पता चला है .सुप्रिया से बात हुई तो ज्यादा कुछ नही बोली और हिम्मत भी नही कि उनसे ज्यादा बात करूँ .करीब डेढ़ महीने पहले ही रामगढ में पर नाश्ते पर मिले थे .बार बार यही कहना था कि दिल्ली से उब गया हूँ यहाँ आकर लिखना पढना चाहता हूँ .गुप्ता जी ने बताया कि फेसबुक पर वे यह जानकारी पहले ही दे चुके है .पिछले दो दशक से ज्यादा समय से आलोक तोमर का साथ है और उन्हें लगातार लड़ते भिड़ते देखा है .आलोक तोमर के लिखे से असहमत हो सकते है पर हिंदी पत्रकारिता में भाषा का जो प्रयोग आलोक तोमर ने किया उसका कोई मुकाबला नही कर सकता . जनसत्ता के उदय के साथ हिन्दी पट्टी में रिपोर्टर के रूप में जो नाम सबसे ज्यादा मशहूर हुआ वह नाम आलोक तोमर का था . प्रभाष जोशी की जिस टीम हम सब हिस्सा रहे है उसके वे लीडर रहे है .अब इस लड़ाई में हम सब उनके साथ है .
अंबरीश कुमार

Monday, April 19, 2010

गर्मी से चटक रहा गोमुख ग्लेशियर


राजकुमार शर्मा
गोमुख .बढते तापमान ने मैदान के साथ ही हिमालय को भी बेचैन कर दिया है.अप्रैल माह में मई-जून जैसा तापमान हो जाने से गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री का बुरा हाल हो रहा है जिससे गोमुख ग्लेशियर पर भारी खतरा मण्डराने का संकेत धूप से चटक रहे ग्लेश्यिरों के भागीरथी में बहने से मिल रहा हैं . पर्यावरण वैज्ञानिक इसे मानवीय चहल कदमी से जोड़ कर देखने के साथ ग्लोबल वार्मिंग से इसे जोड़ रहे हैं.
गोमुख ग्लेशियर समुद्रतट से लगभग 13 हजार फीट की उंचाई पर स्थित हैं.पर्यटकों की लगातार बढ़ रही संख्या एंव पर्यटकों की पहली पंसद ग्लेशियरो के बनने के कारण हर वर्ष इन ग्लेशियरों तक मानव की आमद एंव चहलकदमी में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही हैं . ग्लेशियरों पर शोध कर रहे युवा वैज्ञानिकों के एक दल का मानना है कि गंगोत्री नेशनल पार्क के इस क्षेत्र में गत वर्ष रेकार्ड से अधिक पर्यटकों को जाने की छूट राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा दी गयी . इस मानवीय चहलकदमी के बढ़ोत्तरी का बुरा असर इन ग्लेशियरों पर पड़ा हैं.इसी के साथ इस सप्ताह में तापमान में हुए रिकार्ड बृद्धि से ग्लेशियर चटख रहे हैं.गंगोत्री,चतुरांगणी, शिंवलिंग,भागीरथी, केदारडोम,सतोपंथ ,कालिंदीखाल सहित दर्जन भर स्थलों सहित गोमुख के ग्लेशियर सभी आपस में एक दुसरे से जुड़े हुए हैं.गत वर्ष से घाटी में हुयी कम बर्फबारी के चलते इन ग्लेशियरों के अस्तित्व पर संकट मड़रा रहा हैं.इससे यह देखने को मिल रहा है कि हर वर्ष ग्लेशियरों की शक्ल बदलने के साथ ही ये तेजी से पीछे की ओर खिसक रहे हैं.जिसका सीधा प्रभाव गंगा पर भी पड़ रहा हैं.जिसका असर गंगोत्री में ही गंगा के प्रवाह में ही साफ दिखने लगा हैं.गोमुख से नाले के आकार में निकलने वाली गंगा का बेग गंगोत्री पहुचते ही भयंकर दिखता था जिसके बेग में भी लगातार कम होना दर्ज किया जा रहा हैं.कुछ वर्षो स ेअब तो महज मई जून के कुछ दिनों में ही इस बेग का दर्शन हो पाता हैं.पर्यावरण वैज्ञानिक पानी के इस बेग में आयी कमी को भी गंगा के अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं.इस बार अभी घाटी का तापमान 25 से 30डिग्री पहुंचने के कारण ही तेज धूप के कारण ग्लेशियर चटख रहे हैं.इस तरह से बढ़ते तापमान का बुरा असर इस घाटी में रहने वाले दुर्लभ वन्यजीवों पर भी पड़ रहा हैं.पर्यावरण वैज्ञानिक इस पुरे गोमुख क्षेत्र में मानवीय दखल रोकने की तत्काल आवश्यकता बताते हुए
कहा कि गंगा एंव गोमुख को बचाने के लिए छोटे बड़े बाधों पर तत्काल रोक लगाने एंव हिमालय को निषिद्ध क्षेत्र घोषित करनी की बात कही हैं.इनका मानना है कि इन्ही खतरों के चलते गंगा का धवला स्वरूप भी कही -कही मटीमैला हो रहा हैं.देवभूमि हिमालय की महिमा गंगा के कारण ही वेद विदीत हैं.गंगा को बचाने के लिए इन ग्लेशियरों के अस्तित्व का बचना आवश्यक है