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Friday, September 23, 2011

मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में घमासान


अंबरीश कुमार
लखनऊ , सितंबर । उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव को लेकर सत्ता की दौड़ से बाहर जाती दोनों राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की होड़ बढ़ती जा रही है । भारतीय जनता पार्टी में जहां इसे लेकर टकराहट अब कड़वाहट में बदल रही है वही कांग्रेस में भी गोलबंदी तेज हो गई है । भाजपा में तो इस दौड़ में कई राष्ट्रीय नेता शामिल है तो कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री तक । भाजपा के राष्ट्रीय नेता इस अभियान को और हवा दे रहे है ।मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में राजनाथ सिंह ,कलराज मिश्र ,विनय कटियार ,लालजी टंडन जैसे नेता भाजपा के है तो कांग्रेस में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा , श्रीप्रकाश जायसवाल ,आरपीएन सिंह जैसे पिछड़ी जातियों के नेता से लेकर अगड़ी जातियों में रीता बहुगुणा जोशी ,प्रमोद तिवारी ,जगदंबिका पाल ,जितिन प्रसाद, ,संजय सिंह और दलित नेताओं मी पीएल पुनिया का नाम शुमार किया जा रहा है । यह बात अलग है कि अपने बूते पर यह पार्टिया तीसरे और चौथे नंबर की लड़ाई लडती नजर आ रही है ।
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इस अभियान को यह कर कर गर्म किया कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का नाम तय है तो पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल बरेली में कहा -उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए नाम तय हो चुका है पर यह समय आने पर ही बताया जाएगा । पार्टी के एक कार्यकर्त्ता प्रकाश सिंह ने कहा - मुख्यमंत्री का नाम छुपा कर क्यों रखना चाहते है राजनाथ सिंह । पार्टी के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र पहले ही यह चुके है कि मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर चुनाव लड़ना चाहिए । सपा और बसपा के मुख्यमंत्री पद के नाम पहले से तय होते है । ऐसे में इनसे मुकाबला करने
जा रही भाजपा को भी अपने मुख्यमंत्री का ना नाम प्रोजेक्ट करना चाहिए । गौरतलब है कि भाजपा एक बार फिर कल्याण सिंह को लेकर विवाद में घिरी हुई है जो पार्टी के तीन में से एक पूर्व मुख्यमंत्री है । पिछली बार उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया पर उनके समर्थको का आरोप है कि टिकट बंटवारे में उनकी नहीं चली और पार्टी सत्ता की दौड़ में पिछड़ गई । उनके अलावा राजनाथ सिंह दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री है जिन्हें एक तबका मुख्यमंत्री पद का अघोषित दावेदार माना जा रहा है । यही वजह ही कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की टकराहट बढ़ रही है ।
कोंग्रेस का हाल भी ठीक नहीं है । प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन करते हुए पार्टी के एक नेता ने कहा - कांग्रेस में यह परंपरा रही है कि चुनाव अभियान जिस अध्यक्ष के नेतृत्व में चलता है उसे ही सफलता मिलने पर कमान सौपी जाती है । अशोक गहलौत से लेकर दिग्विजय सिंह उदहारण है । कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी का इस पद के लिए दावा करने का कोई औचित्य ही नहीं है । वे तो सालों से से कांग्रेस में इस पद पर है पार्टी का क्या हाल है सबके सामने है । फिर दावेदारों की कमी कहाँ है । पिछड़े तबके में बेनी प्रसाद वर्मा ,श्रीप्रकाश जायसवाल और आरपीएन सिंह है तो राजपूत नेताओं में संजय सिंह ,जगदंबिका पाल और राजकुमारी रत्ना सिंह है । दलित बिरादरी से पीएल पुनिया है । इसलिए उनलोगों को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखना चाहिए जो पार्टी को पीछे ले जा चुके है । jansatta

Tuesday, March 8, 2011

विदर्भ में किसानो का चूल्हा बंदी आंदोलन



अंबरीश कुमार
अमरावती, मार्च। विदर्भ के किसानों ने अब चूल बंद आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है। यह फैसला रविवार को यहां से 75 किलोमीटर दूर कारंजा तहसील के तरोड़ा गांव में किसानों की एक बैठक में किया गया। इस बैठक में करीब दर्जन भर गांव के किसान शामिल हुए थे। बैठक में इसके साथ ही खुदकुशी करने वाले किसानों की विधवा औरतों को एकजुट करने का भी फैसला किया गया। यह बैठक पूर्वांचल ग्रामीण विकास संस्थान (पीजीवीएस) और किसान मंच के साझा तौर पर बुलाी गई थी। गौरतलब है कि इन दोनों संगठनों ने विदर्भ के आधा दर्जन गांव में किसानों के हालात का सर्वे करने के बाद एक अध्ययन दल इन गांवों का मुआयना करने के लिए भेज रखा है। इस सर्वे के दायरे में विदर्भ के करीब आधा दर्जन जिले शामिल किए गए हैं। इन जिलों में अमरावती, अकोला, वासिम, वुलढ़ाना, वर्धा और यवतमाल शामिल है। किसानों की बैठक में बोलते हुए किसान मंच की महिला शाखा की संयोजक अरुना चापले ने कहा, ‘खुदकुशी से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। एक किसान खुदकुशी करता है तो पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ जाता है। जिसकी आमदनी का अंतिम जरिया भी खत्म हो जाता है। ऐसे में परिवार दर-दर की ठोकरें खाता है। विदर्भ के ग्यारह जिलों में हर साल करीब तीन हजार किसान खुदकुशी कर रहे हैं। जनवरी 2011 से अब तक करीब सात सौ किसान खुदकुशी कर चुके हैं। खुदकुशी करने वाले किसानों का सवाल उठ भी जाए पर उन विधवा औरतों का सवाल कोई नहीं उठाता जो बदहाली का शिकार हो अभिशप्त जीवन जी रही हैं। हम लोगों ने इन विधवा महिलाओं को संगठित कर विदर्भ के गांव में चूल बंद यानी चूल्हा बंदी आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है। जिसके तहत गांव में हफ्ते में एक बार चूल्हा नहीं जलेगा। इस चूल बंद आंदोलन की शुरुआत कारंजा तहसील के ग्यारह गांव से हो रही है।’
बैठक में कई किसानों ने अपनी बात रखी। वहीं तरोड़ा गांव के किसान विनायक विश्वनाथ मोहाड ने अपनी समस्या को लेकर चार दिन के भीतर खुदकुशी करने एलान कर सभी को हिला दिया। विनायक विश्वनाथ ने बताया कि उसके खेत के बीच से कच्ची नहर निकाल दी गई है जिसके चलते उसकी संतरे की खेती पूरी तरह चौपट हो गई है। इसको लेकर वह सरकारी दफ्तरों का चक्कर काटता रहा ताकि नहर पक्की बन जाए तो खेत बच जाए। लेकिन उसकी नहीं सुनी गई और अब उसके सामने खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। इसके बाद बैठक में आए किसानों ने उसे समझाने की कोशिश की। इस बैठक में वे महिलाएं भी आई थीं जिनके पति या बेटे ने खुदकुशी कर ली थी। ऐसी ही एक पचास साल की महिला मुक्ता प्रभाकर ने आचल से आंसू पोछते हुए कहा, ‘मेरे बेटे विलास प्रभाकर ने दो साल पहले ही अपनी शादी के ठीक चार दिन पहले खुदकुशी कर ली थी। वह कर्ज में डूबा हुआ था। जिसके चलते उसने अपनी जान दे दी पर हमारी परेशानियों का कोई अंत नहीं हो रहा, कहां जाएं यह समझ नहीं आता।’ इस मौके पर किसान मंच के महासचिव प्रताप गोस्वामी ने कहा, ‘विदर्भ में किसानों की समस्याओं को सुलझो के लिए हमें संगठित होकर प्रयास करना होगा। आज त्रासदी यह है कि किसानों की बात न तो सरकार सुनती है और न कोई राजनैतिक दल इनकी सुध लेने आता है। विदर्भ में सिर्फ कपास किसान ही खुदकुशी नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब सोयाबीन से लेकर संतरे के बागान लगाने वाले किसान भी खुदकुशी करने लगे हैं। यहां के किसान कर्ज में डूबे हैं और उन्हें केंद्र या राज्य सरकार की किसी भी कर्ज माफी योजना का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्रधानमंत्री का राहत पैकेज भी विदर्भ में नाकाम साबित हुआ है। उसकी मुख्य वजह यह है कि राहत का ज्यादातर पैसा नेताओ और सूदखोर महाजनों की जेब में जा रहा है। शर्मनाक घटना तो यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख को एक विधायक दिलीप सानंदा को बचाने का दोषी माना। ये वही सानंदा हैं जो किसानों को भारी ब्याज पर कर्ज देते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में देशमुख पर दस लाख रुपए का जुर्माना लगाया जिसे महाराष्ट्र सरकार ने भरा भी। इस मामले से विदर्भ के हालात साफ हो जाते हैं। जिसमें नेता, सूदखोर महाजन और अफसरशाही का खेल सामने आ जाता है।’
उन्होंने आगे कहा कि पीजीवीएस की तरफ से जो सर्वेक्षण कराया गया है। उसका विश्लेषण किया जा रहा है। पर इसके फौरी नतीजे चौंकाने वाले हैं। जिससे पता चल रहा है कि दस हजार से लेकर पचास हजार रुपए तक के कर्ज में डूबा किसान भी खुदकुशी कर ले रहा है। अब इस सवाल को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए इस क्षेत्र के ग्यारह गांवों में हम आंदोलन छेड़ने जा रहे हैं। यह चूल बंद आंदोलन आगामी चौदह अप्रैल से जिन गांव में शुरू किया जाएगा उनके नाम हैं- बोरी, कन्नमवार, सारथखांडा, हेटीकुंडी, मूसी, जामिनी, सावड़ी खुर्द, तरोड़ा, थाणेगांव, सेल गांव और कारंजा शामिल है। इस मौके पर पीजीवीएस के निदेशक डाक्टर भानु ने बताया, ‘हमारे सर्वे से पता चला है कि विदर्भ के हालात काफी गंभीर हैं। सर्वे के साथ-साथ हमने दर्जन भर गांव का दौरा भी किया। हम कन्नमवार गांव भी गए जिसमें हफ्ते भर पहले एक किसान ने खुदकुशी कर ली थी। यह गांव महाराष्ट्र के दूसरे मुख्यमंत्री दादा साहब मारोत राव कन्नमवार के नाम पर बसाया गय था। तब यह हालत है कि सरकार ऐसे गांव के किसानों की भी सुध नहीं ली रही है। मरने वाले किसान रमेश राव सोनकुटार पर पचास हजार रुपए का कुल कर्ज था जिसमें बीस हजार रुपए को-आपरेटिव बैंक और तीस हजरा रुपए निजी महाजन का। आज हालत यह है कि खुदकुशी के बावजूद उस किसान को कोई मुआवजा इसलिए नहीं दिया जा रहा है क्योंकि उसके नाम कोई खेत नहीं था जो खेती-बारी वह करता वह उसके पिता के नाम पर है। ऐसे में प्रशासन उसे किसान मानने को भी तैयार नहीं है। यह एक उदाहरण है। जिससे विदर्भ के हालात का अंदाज लगाया जा सकता है। इस बारे में ब्योरेवार एक रिपोर्ट जल्द जारी की जाएगी।’
विदर्भ में किसानों की खुदकुशी का सिलसिला जारी है। कल यवतमाल जिले में खुदकुशी का प्रयास करने वाले एक किसान से जब इस संवाददाता ने यवतमाल जिले के संजीवन मल्टी स्पेशलिटी हास्पिटल में मिलने की कोशिश की तो उसके प्रबंध निदेशक सुनील अग्रवाल ने इजाजत देने से मना कर दिया। बाद में पता चला कि खुदकुशी की कोशिश करने के बावजूद प्रशासन ने इस मेडिको लीगल केस को एक निजी अस्पताल को रेफर कर दिया गया था ताकि यह मामला तूल न पकड़ पाए। शनिवार को राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी यवतमाल जिले में ही थे। जिसके चलते प्रशासन ने मामला दबाने के लिए यह काम किया।

Thursday, February 3, 2011

बुंदेलखंड में बने विदर्भ जैसे हालात

अंबरीश कुमार
लखनऊ , । सूखे और भूखे बुंदेलखंड में विदर्भ जैसे हालत पैदा हो रहे है । पिछले तीस दिन तीन किसान खुदकुशी कर चुके है। वर्ष २००९ २०१० का का आंकड़ा भी कोई कम नही था और इस साल की शुरुआत तीन किसानो की खुदकुशी से हो चुकी है । कड़ाके की ठंढ के बाद दिन में बढती गरमी ने किसानो की चिंता बढ़ा दी है । गेंहूँ , अरहर , मसूर और मटर की फसल सूख रही है । दूसरी तरफ अर्जुन सहायक परियोजना के चलते किसानो में आक्रोश बढ़ रहा है । इस परियोजना के दायरें में 6700 किसानों की 30-56 हजार हैक्टेयर जमीन और कुल व 112 गांव आ रहें है। जिन किसानो की जमीन इस परियोजनाक दायरें में आ गई है वे काफी निराश है । जमीन तो जा ही रही मुआवजा भी नेताओं ,अफसरों और दलालों की मेहरबानी पर है । किसान राम विशाल ने अफसरों के सामने आत्मदाह किया तो जिले में सियासी हलचल हो गई है। कबरई बांध व झिर सहेबा गांव में पीएसी तैनात कर दी गई थी ।
बुंदलखंड के एनी जिलों के भी हालात खराब हो रहे है । उरई में पानी का संकट बढ़ रहा है जिसके चलते किसान फसल खराब होने की आशंका से परेशान है । पिछले साल पानी का इतना संकट नही था पर इस बार गेंहू , मटर, अरहर और मसूर बोने वाले किसान पानी की कमी से जूझ रहे है ।जिसके चलते फिर खुदकुशी का सिलसिला तेज हो सकता है । साल की शुरुआत में ही उरई के शांति नगर निवासी मंटोले अहिरवार (उम्र ६५) वर्ष की मौत आर्थिक तंगी के चलते हुई। जिस दिन इनकी मौत हुई उस दिन घर में खाने के लिए एक किलो आटा भी नही था। परिवार में दो पुत्र व उनकी पत्नियों के साथ कुल 11 लोगों का परिवार था। कमाई का कोई ठोस जरिया नही था। इसके बाद एक फरवरी 2011 को ग्राम हुसेपुरा जागीर निवासी किसान करन सिंह (उम्र ३५ वर्ष) की कम खेती होने के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षो से भी पैदावार भी ठीक नही हो रही थी। जिसके चलते वह मजदूरी के लिए आगरा चला गया था। वहां भी स्थाई मजदूरी नही मिली। लौटकर वह अपने गांव आ गया। उसके परिवार में पिता, पत्नी के साथ तीन बेटियां भी उसकी कमाई पर निर्भर थी। आमदनी कम खर्च ज्यादा होने की वजह से उसने यमुना नदी में डूबकर खुदकुशी कर ली।
ललितपुर जिले में सरकारी रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 2010 में 163 लोगों ने आत्महत्या की। जिसमें फांसी, जहरीला पदार्थ व ट्रेन से कूद कटकर खुदकुशी की। इसमें 100 लोग तो ऐसे हैं जिन्होनें परेशान होकर मौत को गले लगा लिया। 41 व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी मौत जहरीला पदार्थ खाकर हुई, 13 व्यक्तियों ने ट्रेन से कटकर अपनी जान दी, 4 व्यक्तियों ने आग लगाकर आत्महत्या कर ली। बुंदेलखंड में सर्वाधिक मौतें ऐसी ही हैं। यह जनपद में आता है इसके शहरी क्षेत्र को हम छोड़ दें तो बाकी क्षेत्र में बेहद गरीबी हैं खेती की सिचाई के लिए कुएं व तालाबों के सहारे खेती होती है।
उरई से सुनील शर्मा के मुताबिक जिले में नहरों के दायरें में जनपद की दस फीसदी भूमि है। जिसकी सिंचाई हो पाती है । जनपद के अधिकांश तालाब अप्रैल में सूखने लगते हैं। बारिश के पानी से यह जल स्रोत भरे जाते हैं। बुंदेलखंड के डार्क जोन में यह जिला आता है आज भी वहां का आलम ज्यों का त्यों है। इस बार फरवरी में ही पानी का संकट शुरू हो गया है जिससे हालात बिगड़ने लगे है । पानी को लेकर किसान धरना प्रदर्शन भी कर चुके है और तंग आकर जान देने लगे है । बुंदेलखंड में अभी यह हाल है तो आगे का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।
भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा - बुंदेलखंड के हालत खराब हो रहे है । एक महीने में तीन किसान खुदकुशी कर चुके है और गर्मी के चलते फसल चौपट होने की आशंका है जिससे किसान बर्बाद हो जाएगा । इस मुद्दे को लेकर पार्टी बुंदेलखंड में किसानो को लामबंद करने जा रही है ।
जबकि भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा - केंद्र और प्रदेश सरकार की नीतियों के चलते ही बुंदेलखंड का किसान खुदकुशी पर आमादा है । कही गरीबी के चलते तो कही खेती की जमीन छीने जाने की वजह से किसान जान दे रहा है । जब अधिग्रहण की एक नीति बन गई तो पूरे प्रदेश में उस लागू किया जाना चाहिए । राजनैतिक दलों के इन आरोपों में दम है । सरकार अगसर भेदभाव नही करती तो करछना में किसान की जान नही जाती जो आंदोलन कर रहे थे । यही आरोप महोबा में भी लगाया जा रहा है जहाँ किसानो की खुदकुशी का सिलसिला शुरू हो चूका है ।
महोबा से जनसत्ता संवादाता हरिश्चंद्र के मुताबिक धसान और कें नदी को जोड़ने वाली अर्जुन सहायक परियोजना को लेकर किसान डरे हुए है । जिन किसानो की जमीन इस परियोजना में गई है उन्हें खेती की जमीन का मुआवजा भी ढंग से नही मिल रहा है । जिसका जैसा जुगाड़ वैसा मुआवजा मिल रहा है । किसी को लाख रुपए बीघा तो किसी को चार लाख रुपए । किसान अकाल और सूखे से पहले सी ही बेहाल है अब जमीन जा रही है तो जान दे दे रहा है । इस परियोजना से महोबा, हमीरपुर, बांदा जिलों के 112 गांव प्रभावित हो रहें है। कबरई बांध की उंचाई बढ़ा कर उसे परियोजना से जोड़ा जा रहा है। केन नदी का पानी रोक कर लहचूरा बांध महोबा से हरपालपुर , शिवबहार और चंद्रावल होकर बांदा पहुंचेगा । इस परियोजना को लेकर किसान नाराज है । झिर सहेबा गांव के राम विशाल उर्फ बब्बू के आत्मदाह के बाद ग्राम निवासी पुष्पेंद्र कुमार, मुकेश, गोपाल, राजाराम, प्रभू, रतनलाल ने यहां कहा कि किसानों की मागों को स्वीकार किए बिना राज्य सराकर के नुमाइंदे आगे कोई कार्य न करें। हमारी मागें न माने जाने पर हजारों किसान आत्मदाह कर लेगें।
jansatta

Sunday, January 2, 2011

जेपी के सिपाही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नई मुहिम छेड़ेंगे


अंबरीश कुमार
लखनऊ , जनवरी । जयप्रकाश आंदोलन के सिपाही अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हिंदी भाषी राज्यों में नई मुहिम छेड़ेंगे । यह फैसला आज यहाँ जयप्रकाश नारायण की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के पुराने कार्यकर्ताओं के सम्मलेन में हुआ । इसके साथ ही सम्मलेन में नए राजनैतिक मंच राष्ट्रीय संघर्ष वाहिनी मंच के गठन का एलान भी किया गया जो तीन महीने में उत्तर भारत के सौ जिलों में संगठनात्मक ढांचा तैयार करेगा और नई राजनैतिक पहल करेगा । राजनैतिक मंच की वैचारिक नीव पिछले वर्ष मई में वाहिनी मित्र मिलन के नैनीताल शिविर में रखी गई थी । ३१ दिसंबर से शुरू हुआ यह सम्मलेन आज समाप्त हो गया जिसमे पांच राज्यों के जयप्रकाश आंदोलन के कार्यकर्त्ता जुटे थे । इनमे ओड़िसा के नियमगिरि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले से लेकर बिहार के बोधगया आंदोलन के कार्यकर्त्ता तक शामिल थे । सम्मलेन का अंतिम सत्र जयप्रकाश नारायण के सहयोगी शोभाकांत दास के संदेश के साथ समाप्त हुआ जो उन्होंने चेन्नई से फोन के जरिए कार्यकर्ताओं को दिया । स्वास्थ्य वजहों से इस सम्मलेन में शोभाकांत दास नही आ पाए । सम्मलेन में उत्तर प्रदेश , दिल्ली , बिहार , ओड़िसा , महाराष्ट्र ,झारखंड और ओड़िसा जैसे राज्यों से कार्यकर्त्ता पहुंचे थे ।
सम्मलेन में नए मंच राष्ट्रीय संघर्ष वाहिनी के विधिवत गठन के लिए तैयारी समिति बनाई गई है जिसके संयोजक राजीव बनाए गए तो सह संयोजक बिहार के पंकज और झारखंड के घनश्याम बनाए गए । जबकि राष्ट्रीय समिति में बिहार के कारू ,प्रकाश नारायण ,रमन कुमार , महाराष्ट्र से ज्ञानेंद्र ,शेखर सुनालकर ,दिल्ली से तारा ,पुतुल ,ओड़िसा से किशोर ,सिद्धार्थ और उत्तर प्रदेश से राकेश रफीक , ओम प्रकाश अरुण शामिल किये गए है । नया मंच का आधार पचास से सौ जिलो तक तैयार कर तीन महीने में सौ कार्यकर्ताओं की टीम तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है । बिहार के मुज्जफरपुर में अगली बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा होगी । गौरतलब है कि वाहिनी के पुराने कार्यकर्त्ता काफी समय से राजनैतिक मंच के गठन पर चर्चा कर रहे थे । चेन्नई में दो साल पहले हुए वाहिनी के सम्मलेन के बाद यह अभियान आगे बढ़ा और नैनीताल शिविर में सैधांतिक रूप से इसपर आम सहमती बन गई थी । लखनऊ के सम्मलेन में इसे मूर्त रूप देते हुए नए मंच का एलान कर दिया गया ।
बोधगया आंदोलन के कार्यकर्त्ता महात्मा भाई ने कहा - नया मंच राजनैतिक मंच होगा पर यह राजनैतिक दल नही है । इस मंच से कोई चुनाव भी नही लडेगा पर राजनैतिक दल के लोग इसमे शामिल हो सकते है । इस सम्मलेन में बिहार में जनता दल (यु) के विधायक सुरेश अंचल भी शामिल हुए क्योकि वे वाहिनी से ही निकले है । दूसरी तरफ कालाहांडी के सांसद भक्तचरण दास भी शामिल होने वाले थे पर अंतिम दौर में उनका कार्यक्रम रद्द हो गया । भक्त चरण दास नैनीताल के शिविर में शामिल हो चुके है ।
सम्मलेन में झारखंड ,बिहार ,ओड़िसा और उत्तर प्रदेश से काफी संख्या में कार्यकर्त्ता जुटे थे । झारखंड से विश्वनाथ बागी , मधुकर कुमुद ,राजेंद्र कुमार ,सतीश कुंदन थे तो ओड़िसा से निरंजन विद्रोही और सिद्धार्थ के नेतृत्व में कार्यकर्त्ता आए । दिल्ली से पत्रकार मणिमाला भी समेलन में शरीक हुई । मणिमाला बोधगया आंदोलन की जुझारू कार्यकर्त्ता रही है । दूसरी तरफ ओड़िसा में नियमगिरि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सिद्धार्थ भी थे जिन्होंने वेदांता के खिलाफ कारगर मोर्चा खोला था । वाहिनी के इस सम्मलेन में बड़ी संख्या में नौजवान शामिल हुए जो नए मंच की रीढ़ बन सकते है । जनसत्ता से

Monday, December 13, 2010

तीस साल बाद


अंबरीश कुमार
चार पांच दिन पहले की बात है दफ्तर में बैठा था तभी एक मोहतरमा की आवाज आई जो फाइनेंशियल एक्सप्रेस की पत्रकार दीपा से पूछ रही थी , अंबरीश जी कहा बैठते है । खबर बनाते हुए मेरा ध्यान उधर गया और फिर कोफ़्त हुई कि रिसेप्शन से बिना बात किए क्यों किसी को मेरे पास भेज दिया गया । खबर बनाने का समय अमूमन शाम छह बजे से सात बजे तक होता है और उस बीच न तो कोई फोन अटेंड करता हूँ और न ही किसी को मिलने के लिए भेजा जाता है क्योकि ध्यान टूटने पर खबर का तारतम्य बिगड़ जाता है ।इस बात को ज्यादातर परिचित लोग जानते है और वे इसका ध्यान भी रखते है । ऐसे में सिर्फ अनजान लोग ही कई बार आ जाते है । वे मोहतरमा आई और एक प्रेस रिलीज देते हुए बोली - मै अपर्णा गुप्ता हूँ । मैंने कहा , यह रिलीज नीचे ही दे देती । पर मैंने ध्यान दिया तो वह रिलीज किसी कवियित्री की याद में हुई सभा की थी जिसमे एक जगह मशहूर कवियित्री अपर्णा गुप्ता भी लिखा था । मैंने पूछा -क्या आप ही मशहूर कवयित्री अपर्णा गुप्ता है , इस पर वे कुछ झिझक कर बोली -मेरी कुछ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है । साहित्य से अपना कोई ख़ास रिश्ता नही रहा है और जनसत्ता में अब साहित्य का मामला काफी संवेदनशील भी माना जाता है। सुना है काफी खेमेबाजी है पर न तो इस क्षेत्र में कोई ज्ञान है और न दखल । साहित्यकार के रूप में मेरा परिचय सिर्फ मंगलेश डबराल से रहा और वे भी काफी नाराज रहते थे । मंगलेश डबराल जब तक थे तब तक अपने साथी अजित अंजुम सवाल उठाते थे - आपके यहाँ जोशी , डबराल ,उनियाल ,डंगवाल और बडथ्वाल जैसे लोग ही क्यों छापते है । पर अब कोई सवाल नही उठाता । खैर अचानक मेरा ध्यान रिलीज के अंत में गया जिसमे उस सभा में शामिल होने वालों का नाम था और उसमे अजय मेहरोत्रा से लेकर जौहर तक का नाम नजर आया । अजय पचपन के मित्र और सहपाठी रहे है । एक ज़माने में केन्द्रीय संचार मंत्री वीर बहादुर सिंह के ओएसडी थे और बाद में गृह राज्य मंत्री के ओएसडी बने तो सरकारी हवाई जहाज से देश के कई सुदूर हिस्सों का मंत्री महोदय के साथ दौरा भी कराया । घर आते थे तो फ़तेह बहादुर सिंह को भी लाते थे जो अब उत्तर प्रदेश सरकार में काबीना मंत्री है और अपन उनकी खबर जनसत्ता में लेते रहते है । खैर अजय फिलहाल एक बड़े ओद्योगिक घराने में आला अफसर है । अजय का नाम और प्रेस रिलीज पर दिया पता देख कर सब ध्यान आ गया । सन १९८० के दौर में अपर्णा गुप्ता लखनऊ विश्विद्यालय में मेरी क्लास में थी और जब मै छात्रसंघ का चुनाव लड़ा तो जिन छात्राओं ने प्रचार किया उनमे वे भी शामिल थी । उस दौर में विश्विद्यालय के दूसरे विभागों के छात्रों की भीड़ उन्हें देखने के लिए मनोविज्ञान विभाग में जमा रहती थी और मेरी यादाश्त में अभी भी आधा दर्जन से ज्यादा घटनाएं है जब अपर्णा गुप्ता को लेकर झगडा फसाद हुआ । वे विश्विद्यालय की सबसे खुबसूरत छात्राओं में एक थी । पर आज देखकर झटका लगा । तीस साल का समय ज्यादा होता है पर उम्र का असर कुछ लोगों पर ज्यादा पड़ता है तो कुछ पर कम । रामगढ में प्रोफ़ेसर रस्तोगी करीब ८५ साल के है और उनकी पत्नी अस्सी के आसपास होंगी । उनके घर में जो फोटो लगी है उसे देखकर लगता है १९५० की वैजंतीमाला की फोटो है । पर अस्सी साल की उम्र में भी उनके चेहरे को आप उस फोटो से मिला सकते है । पर अपर्णा गुप्ता में काफी बदलाव नजर आ रहा था । अपर्णा से विश्विद्यालय के दौर में कोई घनिष्ठता नही रही और ज्यादा जानकारी भी नही थी । बाद में उनके भाई द्विजेन्द्र से जान पहचान हुई तो उनके घर भी जाना हुआ । वर्ष १९८६ में जो लखनऊ छूटा तो ज्यादातर लोगों का साथ भी छुट गया । अपर्णा करीब घंटे भर बैठी तो विश्विद्यालय के समय की चर्चा हुई । उन्होंने बताया कि सिर्फ कुमकुम का पता है पर मै उन्हें नही जानता था । उस दौर के सहपाठियों में सिर्फ अखिलेश दास यहाँ है जो पहले केंद्र में मंत्री थे अब बसपा के सांसद है । कुछ समय पहले अखिलेश दास ने फोन कर बताया था कि वे मेरी क्लास में थे । खैर अपर्णा गुप्ता से मिलकर काफी अच्छा लगा पर झटका भी कम नही लगा । जो चेहरा दिमाग में था वह १९८० का था और वे उसके बाद २०१० की अंतिम बेला में मिली । वे दिल्ली दूरदर्शन में अफसर है । फिर बताया - लखनऊ विश्विद्यालय के सामने से गुजरी तो द्विजेन्द्र से कहा कि गाड़ी से ही एक चक्कर लगवा दो । अपर्णा चली गई । जो प्रेस रिलीज दे गई वे दिल्ली के अखबार के लिहाज से महत्वपूर्ण भी नही थी इसलिए कम्पोज हो जाने के बाद भी नहीं भेजा ।अटपटा जरुर लगा तीस साल बाद कोई आए और उसका छोटा सा अनुरोध भी पूरा न किया जा सके पर मजबूरी थी ।
अपर्णा के जाने के बाद लगा एक बार मै भी लखनऊ विश्विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग से लेकर सांख्यकी विभाग का चक्कर लगा लूँ । आखिर उसी शहर में सात साल से हूँ पर कभी अपने विभाग जाने का मौका नही मिला । उस मनोविज्ञान विभाग में तो कई शिक्षिकाए अभी भी है जिन्होंने मुझे पढाया था ।
फोटो -लखनऊ विश्विद्यालय

Wednesday, December 1, 2010

राजीव दीक्षित का जाना कोई खबर नही है


अंबरीश कुमार
तीस नवम्बर को मंसूरी से देहरादून आते समय सोचा कि क्यों न ऋषिकेश में राजीव दीक्षित से मिल लिया जाए जो बाबा रामदेव के साथ काम कर रहे है । पर वापसी का टिकट कन्फर्म न होने की चिंता ने सारा कार्यक्रम ध्वस्त कर दिया । एक दिसंबर जब खबर बना रहा था तभी इंडियन एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट का फोन आया , अरे आपके मित्र राजीव दीक्षित की डेथ हो गई है , आस्था चैनल पर खबर आ रही है । मै चौक गया ,यह कैसा संयोग है कल ही उनसे मिलने जा रहा था । उनके बारे में पहले पता चला कि कोई दुर्घटना हुई । बाद में पता चला कि दिल का दौरा पड़ा है । समझ नही आया कि जो व्यक्ति बाबा रामदेव के साथ हो और खुद लोगो को स्वास्थ्य के बारे में आगाह करता हो उसे दिल का दौरा पड़ जाए । पिछली मुलाकात चेन्नई में शोभाकांत जी घर हुई जहा राजीव के कहने पर सभी ने गर्म पानी पीना शुरू किया था । आज चेन्नई में प्रदीप जी से बात हुई तो बोले - कुछ गड़बड़ है । उनके बारे में कही कोई खबर तक नहीं आई । कई लोग किसी साजिश का अंदेशा भी जता रहे है ।
राजीव दीक्षित से अपना संबंध अस्सी के दशक से था जव छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और अन्य जन संगठनों में सक्रिय था । बाद में दिल्ली में जनसत्ता में आने के बाद आंदोलनों पर लिखना शुरू किया तो आजादी बचाओ आंदोलन पर काफी कुछ लिखा । १९८९ के बाद से राजीव दीक्षित इलाहाबाद से जब भी आते तो सीधे बहादुरशाह जफ़र स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के निचले तल पर जनसत्ता संपादकीय विभाग में मेरी सीट के सामने बैठ कर इंतजार करते । घर पर फोन करते और कहते - अंबरीश भाई , आराम से आए आप से चर्चा करनी है । उनसे बातचीत के बाद जब खबरे लिखनी शुरू की तो कुछ समय बाद ही कुछ कुंठित किस्म के लोगो ने एतराज किया और उनका नाम न देने की बात की । तब जनसत्ता हिंदी पत्रकारिता में शीर्ष पर था और हिन्दी पट्टी में काफी पढ़ा जाता था । कोई आगे बढे तो विघ्नसंतोषी तत्त्व खसरा खतौनी लेकर सात पुश्तों का हिसाब किताब ढूँढ़ लाते है । यह परम्परा पुरानी है और हिंदी मीडिया में कुछ ज्यादा ही है । इसलिए न तब परवाह की और न अब करता हूँ , यही वजह है राजीव दीक्षित से संबंध बना रहा । रायपुर में एक दिन कांग्रेस दफ्तर के सामने साइबर कैफे से इंडियन एक्सप्रेस को खबर भेज रहा था तभी राजीव दीक्षित का फोन आया और बोले -अंबरीश भाई मुलाकात कब हो सकती है तो मैंने घर आने को कहा । तभी जो लड़की खबर कम्पोज कर रही थी उसने बात सुनी और कहा क्या ये आजादी बचाओ आंदोलन वाले राजीव जी है ? मेरे हाँ कहने पर वह चौंकी और उनसे मिलने की इच्छा जताई । उसने ही बताया कि उनके कैसेट सुने जाते है । रात में राजीव घर आए तो उनके साथ करीब बीस गाड़ियों का काफिला भी था । मैंने छूटते कहा - राजीव जी आप तो अब ब्रांड बन गए है । जवाब में सिर्फ मुस्कुराए और बोले नागपुर से एक अखबार निकलना चाहता हूँ जो आंदोलन को आगे बढाए । आपकी मदद भी चाहिए । करीब घंटे भर साथ रहे । उसके बाद चेन्नई में वाहिनी के मित्र मिलन में उनसे मुलाकात हुई थी । करीब हफ्ता भर पहले ही बाबा रामदेव की खबर में उनका जिक्र किया था । आज सरे अखबार देख डाले कही कोई खबर नहीं । राखी सावंत से लेकर इंडियन आयडल अभिजीत सावंत की पिटाई तक की खबर है पर राजीव दीक्षित की खबर नही है ।
इसी समाज के लिए लड़ रहे थे राजीव दीक्षित ।

Thursday, September 23, 2010

अयोध्या विवाद पर पक्षकार राजी नही तो सुलह कैसी ?


अंबरीश कुमार
लखनऊ सितंबर । अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला टालकर इस मामले में सुलह की जो संभावनाएं तलाशी जा रही ही उनपर फिर पानी फिरता नज़र आ रहा है । सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले बाद फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से फिर यह यह साफ़ कर दिया गया कि इस मामले में वे देश की सबसे बड़ी अदालत में भी वही बात कहेंगे जो अब तक कहते आए है कि सुलह नही फैसला चाहिए । इस मामले के नब्बे वर्षीय मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी ने जनसत्ता से कहा - फैसला भले हफ्ते भर बाद आए पर फैसला होना चाहिए अब पंचायत या सुलह की कोई गुंजाइश नही है । यह सारा खेल कांग्रेस का है जिसने यह विवाद पैदा किया और अब फैसले को टालने की कोशिश में जुटी है । इस मामले को टलवाने में जहाँ कांग्रेस की भूमिका पर सवाल खड़ा हो रहा है वही भाजपा का भी सुर कांग्रेस के सुर में मिला हुआ है ।
राजनैतिक हलकों में माना जा रहा है कि फिलहाल यह मामला कुछ समय के लिए टल जाएगा । इस बीच कामनवेल्थ गेम्स और बिहार का चुनाव
निपट जाने से कांग्रेस को राहत मिल जाएगी । यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे पहले कांग्रेस ने स्वागत किया । पर जिस मामले में सुलह के ग्यारह प्रयास हो चुके हों और कोई हल नहीं निकला हो उसके फिर सुलझ जाने की संभावना के क्या आधार होंगे यह कोई नही जनता ।तीन -तीन प्रधानमंत्री और शंकराचार्य तक इस मामले में पहल कर चुके है । इलाहाबाद हाईकोर्ट की जिस बेंच में यह मामला चल रहा है उसने भी जुलाई के आखिरी हफ्ते में सभी पक्षकारों से सुलह के बारे बातचीत की पर कोई तैयार नही हुआ ।
इस मामले में चार मुख्य दावेदार हैं- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, रामजन्मभूमि न्यास और दिवंगत गोपाल सिंह विशारद। इनके वकीलों की भी यही राय है कि सुलह की कोई कोशिश नही की गई गई हैं। निर्मोही अखाड़ा ने जरुर फैसले की तारीख तीन दिन बढ़ा कर 27 सितंबर करने की बात की थी। पर जबतक मुस्लिम पक्षकार सुलह के लिए राजी नही होंगे सुलह होगी किससे ,यह कोई नही बता रहा । सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने पहले ही कहा था कि कांग्रेस इस मामले को टालने की साजिश में जुटी है । आज भी उन्होंने याचिका करने वाले रमेश चन्द्र त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल उठाया और कहा -इनके बारे में और भी जानकारी ली जा रही है । जिलानी ने साफ किया कि सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड का रुख वही है जो पहले था । इस मामले में सुलह की कोई गुंजाइश नही है सिर्फ मामले को लटकाया जा सकता है । दूसरी तरफ श्रीराम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने कहा -मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत हूं। इस पूरे मामले में त‍थाकथित राजनीतिक तत्वों ने वकीलों की मेहनत पर पानी फिरवा दिया है।
जनसत्ता

Sunday, September 19, 2010

मीर ,चकबस्त और बेगम अख्तर के फैजाबाद में फिर युद्ध जैसी तैयारी !




फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया
अंबरीश कुमार
अयोध्या , सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए । पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।
पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।
अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।
कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।
अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह में डाल रही थी ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।
यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि का व्यापार है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा ।
जनसत्ता

Wednesday, September 15, 2010

अयोध्या -अब सुलह नही फैसला चाहते है पक्षकार

अंबरीश कुमार / त्रियुग नारायण तिवारी
लखनऊ / अयोध्या सितंबर। उत्तर प्रदेश में अयोध्या के फैसले से पहले लखनऊ से लेकर फैजाबाद तक माहौल गरमा गया है । लखनऊ में सियासी पारा बढ़ रहा है तो अयोध्या में आशंका और तनाव । दूसरी तरफ अयोध्या मसले पर दोनों तरफ के पक्षकारों में सुलह की अंतिम कोशिश भी नाकाम होती नज़र आ रही है । इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मामले के पक्षकारों के बीच सुलह की एक और कोशिश के लिए १७ सितम्बर की तारीख़ तय की गई है ।पर कोई पक्षकार सुलह के मूड में नहीं है । दोनों पक्षकारो के वकीलों ने जनसत्ता से बातचीत में सुलह की संभावना से इनकार किया । दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल सुबह अयोध्या में राम लला के दर्शन कर साधू संतों के साथ बैठक करने जा रहे है । हालाँकि अयोध्या -फ़ैजाबाद में निषेधाज्ञा लागू कर सभी तरह के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । फैजाबाद के एसएसपी राजेश कुमार सिंह राठौर ने जनसत्ता से कहा - जिले में धारा १४४ लागू है और इसके तहत नियमो का पालन करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को अयोध्या में राम लला के दर्शन की इजाजत दी जा सकती है पर निषेधाज्ञा तोड़ने पर गिरफ्तार भी किया जा सकता है । कल्याण सिंह सुबह दस बजे अपने समर्थकों के साथ अयोध्या के लिए रवाना होंगे । उधर भाजपा के उपाध्यक्ष विनय कटियार ने इस मामले में केंद्र सरकार से दखल की मांग की । उन्होंने कहा कि आस्था और विश्वास के मामलें अदालते हल नही कर सकती। कटियार के मुताबिक अदालत ने निर्णय आने के पूर्व दोनो पक्षों को बातचीत का जो मौका दिया है वह सराहनीय है इसलिए अब केन्द्र सरकार को इस मामलें में आगे आना चाहिए।
सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारो के वकील जफरयाब जिलानी ने जनसत्ता से कहा - हमारा साफ मानना है कि इस मसले पर सुलह नहीं हो सकती अदालत अपना फैसला दे । इस तरह की कोशिशे पिछले १९ साल में कई बार हुई और कोई नतीजा नही निकला । इसलिए इस सिलसिले में जो अर्जी दी गई है उसपर विचार करने का कोई अर्थ नहीं है ।हम इस मामले में किसी भी तरह के सुलह के पक्ष में नही है।
दूसरी तरफ रामजन्म भूमि पुनरोद्धार समिति की तरफ से पेश होने वाली वकील रंजना अग्निहोत्री ने भी सुलह की संभावनाओ को ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ही सवाल खड़ा कर दिया । रंजना अग्निहोत्री ने कहा - यह तो न्यायपालिका की साख खराब करने की कोशिश है । जिस व्यक्ति ने अर्जी दी वह अब तक कहाँ सोया हुआ था । हम इस मामले में फैसला चाहते है ।
दरअसल अंतिम समय में जिस तरह का दबाव बढ़ा और यह अर्जी दी गई उससे लोग हैरान भी हुए है । लोगो का मानना है कि सभी फैसले का इन्तजार कर रहे ऐसे में इस तरह की कवायद से भ्रम हो सकता है । गौरतलब है की एक पक्षकार रमेश चन्द्र त्रिपाठी की अर्जी पर दोनों पक्षों से सुलह की कोशिश की जा रही है ।
दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल अयोध्या जा रहे है । कल्याण सिंह ने जनसत्ता से कहा - मै रामभक्त के रूप में रामलला के दर्शन करने अयोध्या जा रहा हूँ । वहा रामलला के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी जाऊंगा और उसके बाद साधू संतों के साथ सलाह मशविरा करूँगा ।
कल्याण सिंह सुबह दस बजे लखनऊ से रवाना होंगे । उनके साथ करीब डेढ़ सौ गाड़ियों का काफिला होगा । उधर अयोध्या में सुरक्षा और बढ़ा दी गई है ।कई और स्कूलों में सुरक्षा बल के जवान ठहरा दिए गए है । जिले के ५२ स्कूलों को नोटिस दी गई है कि कभी भी उनका परिसर लिया जा सकता है । अयोध्या फैजाबाद में दफा १४४ लगा दी गई है और प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । इसके आलावा खुशी या गम का कोई कार्यक्रम भी सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा सकता है । बढ़ते तनाव का असर अब दिखाई देने लगा है । अयोध्या में लोगों ने खाने व अन्य सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । जिसके चलते शाक सब्जी का दाम भी बढ़ गया है । फैजाबाद प्रशासन कल्याण सिंह के दौरे को लेकर सतर्क है और उन्हें अपने समर्थकों के साथ जाने से रोका जा सकता है । सूत्रों के मुताबिक उन्हें राम सनेही घाट या लखनऊ सीमा में ही रोका जा सकता है ।
जनसत्ता

Monday, September 6, 2010

झरना ,बादल और मुक्तेश्वर का डाक बंगला







अंबरीश कुमार
' ब्लू हेवन ' मुक्तेश्वर के डाक बंगले के उस सूट का नाम है जिसमे मै ठहरा हुआ हूँ .बगल के दूसरे सूट ' पर्पल मूड' में पत्रकार आशुतोष और ' पिंक मेमोरीस' में लेखक - पत्रकार सागर है .यह मुक्तेश्वर का अंग्रेजों के ज़माने का डाक बंगला है जिसमे कल अँधेरा घिरने के बाद हम सब पहुंचे तो ठंड बढ़ चुकी थी और धुंध के चलते के चलते ज्यादा दूर तक कुछ भी दिखाई नही दे रहा था .दिन भर पहाड़ी रास्तों पर फूट पड़े झरनों की फोटो खींचते रहे .झरने भी ऐसे की देखते रह जाए .पहाड़ के ऊपर जंगलों से लिपटती मानो कोई बरसाती नदी पूरे वेग से नीचे आ रही हो .हर मोड़ के बाद झरने का पानी नज़र आ रहा था .नैनीताल से मुक्तेश्वर की यह पहली यात्रा थी जिसमे जगह जगह बहते झरनों का दीदार हुआ .इससे पहले शिलांग से चेरापूंजी जाते समय जो झरने देखे थे उनकी याद ताजा हो गई . पूरा पहाड़ नहाया और भीगा हुआ .मौसम इस तेजी से बदल रहा था कि कभी धूप तो कभी धुंध .यह डाक बंगला जहाँ पर है वहां से बीस हजार फुट पर स्थित नंदा गुंती से लेकर त्रिशूल , नंदा देवी और नंदा कोट जैसी चोटियाँ दिखाई पड़ती है .यह जगह समुंद्र तट से साढ़े सात हजार फुट की उंचाई पर है यह भूल जाए तो डाक बंगले में एक शिला लेख याद दिला देता है .
सुबह कमरे के सामने की खिड़की का पर्दा खोला तो धुंध से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था .आशुतोष कमरे में आए तो खिड़की भी खोल दी .फिर बाहर से बादल भाप की तरह भीतर आने लगा .कमरे में बिजली की केतली में चाय का पानी खौल रहा था और भाप उड़ रही थी .बाहर और भीतर की भाप में कोई फर्क नहीं था .तभी लैपटाप में मेल चेक करने बैठा तो इंदु पुरी का कमेन्ट मिला जो मानसून की पोस्ट पर था .अंत में उन्होंने शाल की जगह साल लिखने की तरफ ध्यान खीचा . मै गूगल से मंगल में एक ऊँगली से कम्पोज करता हूँ जिससे कई बार गलती छूट जाती है इसे माफ़ कर देना चाहिए . मुक्तेश्वर के इस डाक बंगला के पीछे ही उतरांचल सरकार का पर्यटक आवास गृह है जिसमे रात में खाना खाने का मन था पर उनके यहाँ सैलानियों की भीड़ के चलते मैनेजर ने मन कर दिया .फिर डाक बंगले के चौकीदार से पूछा तो उसने कहा सामान लेने दूर जाना पड़ेगा और बरसात के साथ अँधेरा भी गहरा हो गया था .मुक्तेश्वर में आईवीआरआई परिसर में कोई बाजार नहीं है सिर्फ देवदार ,ओक और बलूत आदि के घने जंगल में ब्रिटिश कालीन पुराने बंगले जरुर नज़र आते है .अंत में ड्राइवर अरविन्द को साथ भेज कर रात के खाने का इंतजाम किया गया .इससे पहले रामगढ के अपने राइटर्स काटेज से शाम पांच बजे चले तो डर लग रहा था कही तेज बरसात से रास्ता न बंद हो जाए. एक दिन पहले ही रामगढ के घर का नाम राइटर्स काटेज रखने की दावत देर रात चली थी . कमरे के सामने का देवदार का दरख़्त जब बरसाती हवाओ से लहराने लगा तो मित्र लोग ग्लास के साथ बाहर ही सेब के पेड़ के नीचे बैठ गए .
बरसात ज्यादा तेज नही थी .कुछ देर बैठे तो रहा नहीं गया और छाता मंगवा लिया .इसी बीच केरल काडर के वरिष्ठ आईऐएस अधिकारी और साहित्यकार यूकेएस चौहान से फोन पर बात हुई तो उन्होंने भी राईटर्स काटेज में आकर लिखने की इच्छा जताई .चौहान साहब से विश्विद्यालय के ज़माने से सम्बन्ध है और जब वे उत्तर प्रदेश में सूचना निदेशक और पर्यटन विभाग के एमडी थे तो उतरांचल घुमाया था .उससे पहले कालीकट के कलेक्टर के रूप में बड़ा सांस्कृतिक आयोजन किया और केरल का खुबसूरत इलाका भी उनका आतिथ्य ग्रहण करने की वजह से देखने को मिला . अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्री ,नृत्यांगना सोनल मानसिंह और नौशाद भी साथ ठहरे थे और इन लोगों से काफी चर्चा भी हुई . ऐसे में उनसे बात कर अच्छा लगा .
रात के दस बज चुके थे और खुले में मधुशाला का माहौल ज्यादा देर तक नहीं चल पाया . बूंदे भारी होने लगी तो भीतर जाना पड़ा .इस बीच खाना बनाने का काम भी शरू हो गया .आशुतोष अच्छे खानसामा भी है यह उनके बनाए अफगानी चिकन टिक्का से पता चला . भवाली से चलते समय देसी मुर्गे दिखे तो सुझाव आया कि यही से ले लिया जाए पर तय हुआ की रामगढ से लिया जाएगा . पर रामगढ़ से डाक बंगला रोड के मोड़ पर मुर्गे के दडबे जब खली नज़र आये तो दूकान वाले से पूछा गया .जवाब मिला आज गाड़ी नहीं आई इसलिए कुछ नहीं मिल पाएगा .फिर भवाली से आ रहे एक सज्जन को कहा गया तो वे चिकन लेकर पहुंचे .जिसे मैरिनेट करने के बाद हम लोग कुछ लोगों से मिलने चले गए और साथ आए एक लेखक अपनी पुस्तक का एक अध्याय लिखने में व्यस्त हो गए .राइटर्स काटेज के शांत माहौल में लिखने पढने का अलग सुख है . जल्द ही लन्दन से एक मोहतरमा यहाँ लिखने पढने के लिए आने का कार्यक्रम बना रही है है . अब सुझाव दिया गया है कि राइटर्स काटेज का उपरी हिस्सा कायाकल्प कर उन लेखकों को भी मुहैया कराया जाए जो दौडभाग की आपा धापी में दस बीस दिन एकांत में लिखना पढ़ना चाहते हो .मकसद व्यावसायिक न होकर अपने व्यापक दायरे के लिखने पढने वालों को प्रोत्साहन देना ज्यादा है .रखरखाव के लिए प्रतीकात्मक सहयोग जरुर लिया जाएगा .इसी वजह से दो तीन मित्र साथ आए और तक्नीकी विशेषज्ञों से बात कर इसे नया रूप दिया जाए . यह काम बरसात के बाद ही हो पाएगा . बगीचा और पूरे परिसर की लैंडस्केपिंग भी नए ढंग से की जाएगी . साथ आए लोगों को आडू ,प्लम ,बादाम और खुमानी के पेड़ों पर कोई फल नहीं मिला . इनका सीजन पहले ही ख़त्म हो जाता है . सेब की देर वाली प्रजाति के खुछ फल जरुर बचे थे .
रामगढ से लेकर मुक्तेश्वर तक के रास्ते में कही कही सेब मिले तो बगीचे वालों ने उसकी पूरी कीमत भी वसूली .पेड़ से तोड़ कर सेब खाने की कीमत मात्र सौ रुपए किलो थी सो जाते मौसम के सेब का भी स्वाद लिया गया . एक जोड़ा जो दिन में सिड़ार लाज में खाना खाते मिला था वह भी पहुँच गया .साथ आए पत्रकारों ने उन मोहतरमा को भी काफी आग्रह के साथ सेब खिलाया. उन लोगों ने भी सेब के पेड़ के इधर उधर होकर फोटो भी खिंचवाई . पर पिछले महीने जिस तरह सुर्ख सेब दिखे थे वह नज़र नहीं आए . सतबूंगा की पहाड़ी पर एक शोध संस्थान बनने जा रहा है जिसकी लोकेशन भी देखनी थी .करीब पौन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद यहाँ पहुंचे तो नजारा देखने वाला था .जो जगह चुनी गई है उसके दोनों तरफ घाटियाँ है.बांज के पेड़ से घिरी इस पथरीली पहाड़ी के अंतिम छोर पर झरना है तो सामने हिमालय की तीन सौ फुट लंबी हिमालय की
सृंखला . सामने अगर हिमालय दिखेगा तो पीछे की तरफ जंगल से घिरी घाटी का विहंगम दृश्य .रास्ते में घोड़े दिखे जो संभवतः सड़क तक आने जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते होंगे .
अगल बगल खेतों में पत्ता गोभी आकर ले चुकी थी और राजमा की लतर चार पांच फुट तक चढ़ चुकी थी .कही कही मक्का भी तैयार होता नज़र आ रहा था .कई साल के संकट के बाद पहाड़ पर मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान है .हर पहाड़ भीगा हुआ , चट्टानों से रिसता पानी ,पेड़ों की पत्तियों से टपकता पानी और दुसरे या तीसरे मोड़ पर झरनों की अलग अलग ढंग की गूंजती आवाज .यह आवाज घने जंगलों में संगीत में भी बदल जाती है .झरने भी अलग अलग आकार और उंचाई के .किसी का एक छोर दिख जाता तो ज्यादातर जंगल से निकलते और सड़क पर करते हुए आगे चले जाते .झरनों की आवाज रात में दूर तक गूंजती है . पानी के जो श्रोत गर्मियों में सूख गए थे वे सभी रिचार्ज हो गए है .इससे लगता इस बार गर्मियों में पानी का वैसा संकट नहीं होगा जैसा पिछले कुछ सालों
में हुआ था . जा

Friday, August 20, 2010

गले की हड्डी बना किसान आंदोलन

अंबरीश कुमार
लखनऊ, अगस्त। अलीगढ में टप्पल के जिकरपुर गाँव में चल रहा किसान आंदोलन मुख्यमंत्री मायावती के गले की हड्डी बन गया है । इसका राजनैतिक असर पूरे प्रदेश में पड़ रहा है जो सरकार और बसपा दोनों के लिए खतरे की घंटी है। किसानो की पंचायत में आज साफ कहा गया कि खेत उजाड़ कर सड़क नहीं बनने दी जाएगी । जब तक राज्य सरकार किसानो की मांगे नहीं मानती धरना जारी रहेगा ।आज दिन में करीब पच्चीस हजार किसानो की सभा में महेंद्र सिंह टिकैत ,कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ,प्रमोद तिवारी और भाकपा के राज्य सचिव डाक्टर गिरीश आदि बोले और सभी ने किसान आंदोलन का समर्थन किया । कल अमर सिंह के आलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई किसान संगठन के प्रतिनिधि भी पहुच रहे है । आज यह भी कहा गया की यहाँ के किसान कही नहीं जाएंगे जिस नेता को समर्थन करना हो वह टप्पल आए। यह एलान नौ गांवों के किसानो की ६१ सदस्यों वाली किसान संघर्ष समिति ने किया जिसके संयोजक मनवीर सिंह तेवतिया है । इस बीच कन्नौज , उन्नाव ,महोबा ,फतेहपुर के साथ लखनऊ में लीडा के खिलाफ खड़े हुए किसान सक्रिय हो गए है । पूर्वांचल में गंगा वे के खिलाफ आंदोलन करने वाले भूमि बचाओ मोर्चा के नेताओं ने अलीगढ के किसानो के समर्थन में राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन बलिया ,गाजीपुर और मउ के कलेक्टर को सौंपा । इनका एक प्रतिनिधिमंडल आज टप्पल के लिए रवाना हो गया ।
उधर टप्पल में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने किसानो से कहा कि कांग्रेस पार्टी उनके आंदोलन के साथ है ।कांग्रेस ने हमेशा किसानो का साथ दिया है हरियाणा का उदाहरण सामने है । भूमि अधिग्रहण कानून बदला जाएगा और किसान की जमीन का जबरन अधिग्रहण नहीं होने दिया जाएगा । दिग्विजय ने जब यह कहा कि किसान दिल्ली आए राहुल गाँधी से उन्हें मिलवाया जाएगा । इस पर किसानो का एक खेमा बिगड़ गया और नारेबाजी होने लगी । धरना पर नारा गूंजा - राहुल चाहिए ,धरने पर । बाद में बताया गया कि सुरक्षा वजहों से जिस जगह संभव होगा राहुल गाँधी खुद किसानो से मिलेंगे । किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने कहा - शहर की दवा और गाँव की हवा बराबर होती है । अब गाँव में शहर बनने का क्या मतलब । खेत उजाड़कर किसान की जमीन नहीं लेने देंगे ।जमीन का जो मुआवजा एक जगह सरकार दे चुकी है उसे दूसरी जगह भी देना होगा ।
टिकैत ने राजनैतिक दलों को भी आगाह किया कि वे किसानो का साथ दे पर किसान के नाम पर राजनीति न करे । इशारा साफ़ था कि बिना किसान संगठनो को भरोसे में लिए राजनैतिक दल खुद कोई कार्यक्रम का एलान न करे । किसान संगठन के बीच यह भी विचार आया है कि इस सिलसिले में आंदोलन का नेतृत्व किसान संगठनो की संघर्ष समिति करे न की राजनैतिक दल ।
धरना पर बैठे किसानो को संबोधित करते हुए भाकपा नेता डाक्टर गिरीश ने कहा -कांग्रेस , भाजपा और सपा अपने शासनकाल में किसानो के हित के साथ खिलवाड़ करती रही है और अब घडियाली आंसू बहा रही है ।किसान इनसे सावधान रहे । उन्होंने यह भी कहा कि अब मुआवजा की मांग छोड़ कर उपजाऊ जमीन बचने की लड़ाई लड़नी चाहिए । गिरीश ने एलान किया कि भाकपा २८ अगस्त को अलीगढ और ३० अगस्त को प्रदेश भर में इस मुद्दे को लेकर धरना प्रदर्शन करेगी ।
इस बीच अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा ने किसानों को धोखा देकर उनकी जमीनें व्यवसायिक रेट से बेहद कम दाम पर जबरदस्ती छीनने के लिए मायावती सरकार की कड़ी निन्दा की है। ग्रेटर नाएडा में 880 रुपए वर्ग मीटर का रेट दिया गया, आगरा मे 580 रुपए का, अलीगढ़ व मथुरा में 570 रुपए का और करछना में केवल 120 रुपए वर्ग मीटर तथा लहोगरा बारा में केवल 60 से 120 रुपए वर्ग मीटर का। राज्य सरकार का करछना व बारा के इन इलाकों में स्टाम्प ड्यूटी का व्यवसायिक रेट है 2600 रुपए वर्ग मीटर। एआईकेएमएस ने केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा 1894 के अग्रेजों के भूमि अधिग्रहण कानून के अमल व इसके तहत किसानों के विस्थापन की आलोचना की है। बसपा पूरे उत्तर प्रदेश में कुल 23000 गांवों की जमीनें हाईवे, हाई टेक सिटी, शापिंग माल बनाने के लिए कब्जा करना चाहती हैं, जो प्रदेश के कुल करीब एक लाख गांवों के एक चौथाई हैं। इससे निश्चित रूप से प्रदेश व देश में खाद्य संकट बढ़ेगा। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया क्योकि बसपा सरकार भयादोहन और छलप्रपंच के जरिए किसानों में फूट डालकर उनके आंदोलन के बारे में भ्रम फैलाने में लगी है। किसान आंदोलित हैं और अपनी जमीन तथा रोजी रोटी की लड़ाई लड़ रहे है । यह सरकार उनकी जमीन छीनकर उनको बेरोजगार और बेघर करने पर तुली है। पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि सरकार को यह भी परवाह नहीं कि खेती की जमीन छिन जाने पर खाद्य समस्या का क्या होगा? इस सरकार की जन विरोधी नीतियों के चलते किसान लुट रहा है। समाजवादी पार्टी ने साफ़ कर दिया है कि गरीबों का खेत उजाड़कर सड़क और शहर का निर्माण नहीं होने दिया जाएगा। किसान अब पूरे प्रदेश में एकताबद्ध ढंग से आंदोलित है। किसानों ने अब तक सरकारी बहकावे में आकर समझौता नहीं किया है। मुख्यमंत्री ने चूंकि उद्योग समूह जेपी से अपना मोटा कमीशन पहले ही ले रखा है इसलिए वे किसानों में फूट डालकर राज करो की पुरानी अंग्रेजोवाली नीति अपना रही हैं। उनके अफसर पंचम तल का प्रशासनिक काम छोड़कर किसानों को आंतकित करने पटाने और भरमाने के काम में लग गए।

Thursday, August 19, 2010

गरीबों के खेत पर अमीरों की सड़क

अंबरीश कुमार
लखनऊ अगस्त । उत्तर प्रदेश में गंगा -यमुना के नाम पर मायावती सरकार गरीबों का खेत उजाड़कर जो पांच सितारा सड़क बनाई जाएगी उस पर अमीर ही चल पाएगा आम आदमी नहीं । यमुना एक्सप्रेस वे के नाम दोआबा की १६०००० ( एक लाख साठ हजार) हेक्टेयर उपजाऊ किसानो से ली जानी है जिससे ३१८ गाँव पूरी तरह ख़त्म हो जाएंगे । इसमे यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास अथारिटी की जमीन नहीं जोड़ी गई है जिसके दायरे में ८५० गाँव आ रहे है । और इसके बदले जो सड़क बनेगी उस पर अलीगढ से आगरा तक की करीब १६५ किलोमीटर की दूरी के लिए कर से जाने पर करीब हजार रुपए टोल टैक्स देना पड़ेगा । यह उस यमुना एक्सप्रेस वे का दूसरा पहलू है जिसकी बुनियाद भारतीय जनता पार्टी के राज में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के समय पड़ी थी । तब उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण एक्ट १९७६ के तहत इस सिलसिले में आठ गाँवो की जमीन लेने के अधिसूचना जारी की गई थी । जिसका विरोध किसान मंच के नेतृत्व में वीपी सिंह ने ग्रेटर नोयडा में किया था । अब किसान संगठन से लेकर राजनैतिक दलों ने निजी क्षेत्र की किसी भी परियोजना के लिए किसानो की जमीन लेने का भी विरोध शुरू कर दिया है । इन संगठनो ने एलान किया कि गरीबों का खेत उजाड़ कर सड़क नहीं बनने दी जाएगी ।
इस बीच अफसरों से राजनैतिक मुद्दों को सुलझाने में जुटी मायावती को फिर झटका लगा है । अलीगढ के बाद आगरा में भी किसानो ने सरकार की पेशकश ठुकरा दी । टप्पल में किसानो का आंदोलन समूचे प्रदेश के किसानो का केंद्र बन गया है । अब किसान आगे है और नेता पीछे । जो भी सरकार के झांसे में आया उसे किसान किनारे कर दे रहे है । राम बाबू कठेलिया उदाहरण है । टप्पल के किसान आंदोलन के समर्थन में भारतीय किसान यूनियन टिकैत ,किसान मंच ,दादरी किसान आंदोलन ,किसान यूनियन अम्बावता गुट ,किसान यूनियन चौधरी हरपाल गुट ,भूमि अधिग्रहण विरोधी प्रतिरोध समिति ,कृषि भूमि बचाओ मोर्चा उतर चुका है । जबकि किसान आंदोलन को समर्थन करने वाले राजनैतिक दलों में समाजवादी पार्टी ,लोकदल ,भाकपा ,माकपा ,जन संघर्ष मोर्चा ,भाकपा माले, राष्ट्रीय जनता दल ,फॉरवर्ड ब्लाक ,कांग्रेस और भाजपा भी शामिल है ।
यह बात अलग है कि एक तरफ जहाँ यमुना एक्सप्रेस वे की बुनियाद भाजपा के राज में पड़ी वही कांग्रेस सेज के नाम पर किसानो की जमीन लेने का रास्ता भी बना चुकी है । भूमि अधिग्रहण का कारगर ढंग से विरोध वीपी सिंह ने ही किया था और दादरी में अधिग्रहित जमीन पर ट्रैक्टर चलाकर आंदोलन छेड़ दिया था । उनके संगठन किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह ने कहा - यमुना वे हो या गंगा वे यह सब किसानो को बर्बाद करने की साजिश है जिसका किसान संगठन जमकर विरोध करेंगे । ऐसी सड़क पर कौन चलेगा जिसपर वाराणसी से दिल्ली तक करीब दो हजार रुपए टोल टैक्स पड़ेगा ।
गौरतलब है है कि अलीगढ से आगरा तक १६५ किलोमीटर की दूरी में १६ टोल टैक्स गेट होंगे और हर गेट पर कर के लिए ५५ रूपये टैक्स देना होगा । यह टैक्स जेपी समूह ३६ साल तक वसूलेगा । खास बात यह है की जिस किसान के खेत से यह सड़क गुजरेगी उसे भी सड़क पर कर अपने खेत में जाने के लिए टैक्स देना होगा क्योकि यह एक्सेस कंट्रोल हाई वे होगा । किसान की टोल गेट से टैक्स देकर ही अपने खेत में जाना होगा । राजद के प्रदेश अध्यक्ष अशोक सिंह ने कहा - सरकार किसानो पर जुल्म कर रही है जिसका सड़क पर उतर कर विरोध करेंगे । इस बीच जन संघर्ष मोर्चा ने २३ अगस्त के दिल्ली सम्मलेन में किसानो का सवाल पुजोर ढंग से उठाने का फैसला किया है ।
भारतीय जनता पार्टी ने मुआवजा मांग रहे किसानों के साथ लगातार हो रही पुलिस बर्बरता पर कड़ा रूख अपनाते हुए आज कहा कि बसपा सरकार एक औद्योगिक घराने को मुनाफा पहुंचाने वाली एजेंसी बन गई है। प्रदेश प्रवक्ता सदस्य विधान परिषद हृदयनारायण दीक्षित ने टप्पल अलीगढ़ के किसानों पर हुए लाठी, गोलीकाण्ड से सीख न लेकर आगरा में भी वही पुलिसिया तांडव दोहराने के लिये सरकार की कटु आलोचना की है।
किसानों पर पुलिस फायरिंग की जांच-पड़ताल के लिए अलीगढ़ गया भाकपा (माले) का दो सदस्यीय जांच दल घटनास्थल का दौरा कर आज लौट आया। इस दल में पार्टी की राज्य समिति के सदस्य अफरोज आलम और अखिल भारतीय किसाना महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलावत शामिल थे।
जांच दल की रिपोर्ट आज यहां जारी करते हुए भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने कहा कि अलीगढ़ में किसानों के आंदोलन पर दमन के खिलाफ 23 अगस्त को भाकपा (माले) पूरे प्रदेश में काला दिवस मनायेगी। इसी दिन माले और किसान महासभा के कार्यकर्ता अलीगढ़ डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन करेंगे।
जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए माले राज्य सचिव ने कहा कि अलीगढ़ के जिकरपुर में किसान हत्या की दोषी मायावती सरकार जे0 पी0 ग्रुप जैसे पूंजीपतियों के पक्ष में काम कर रही है। जिकरपुर में शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को दमन के बल पर खत्म कराने की मायावती सरकार ने जिस तरह से कोशिश की, वह शर्मनाक है। यदि किसान आंदोलन के प्रति यही रवैया रहा, तो अलीगढ़ से शुरू हुुआ आंदोलन मायावती सरकार के लिए ‘सिंगूर व नंदीग्राम’ साबित हो सकता है। माले राज्य सचिव ने कहा कि यमुना एक्सप्रेस वे, गंगा एक्सप्रेस वे, हाईटेक सिटी, माडल सिटी आदि के नाम पर किसानों की बिना सहमति लिये व बिना उचित मुआवजा दिये उनकी जमीन की हो रही लूट रोकने के लिए अंग्रेजी राज में बने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून व 2005 के ‘सेज कानून’ में आमूल परिवर्तन की जरूरत है। उन्होंने किसानों की मांगों के साथ एकजुटता प्रकट करते हुए फायरिंग के दोषी अधिकारियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की।
जांच रिपोर्ट का ब्यौरा देते हुए भाकपा (माले) राज्य सचिच ने बताया कि अलीगढ़ में टप्पल ब्लाक के जिकरपुर में यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे सर्वदल किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में 27 जुलाई से किसानों का धरना चल रहा था। किसान इस क्षेत्र में बनाये जा रहे मॉडल टाउन के लिए अपनी जमीन देने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि उन पर दबाव डालकर जमीन अधिग्रहण के समझौते कराये गये। उनकी सबसे बड़ी मांग थी कि इसी तरह की योजना में गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में दे वर्ष पहले ली गई जमीन का मुआवजा 870 रुपए प्रति वर्ग मीटर की रेट से दिया गया था, कम से कम वही रेट उन्हें भी दी जाये। सरकार व जेपी ग्रुप इसके लिए तैयार नहीं थे।
जांच रिपोर्ट के अनुसार 14 अगस्त की शाम पांच-छह बजे के बीच, टप्पल थानाध्यक्ष के नेतृत्व में सादी वर्दी में पुलिस बल व मुंह बांधे जेपी ग्रुप के गुण्डों ने किसानों के आंदोलन के नेता रामबाबू कटेलिया को धरना स्थल से उठा लिया। इसका विरोध कर रहे किसानों पर आंसू गैस के गोले व गोली चलायी गयी। जिसमें कई किसान घायल हुए। कटेलिया की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही हजारों की तादाद में किसान धरना स्थल पर चारों तरफ से जुटने लगे। पीएसी ने किसानों पर फायरिंग कर दी। इसमें तीन किसानों की मौत हो गई। पीएसी का एक अधिकारी भी मारा गया। रात 11 बजे तक पुलिस-किसान संघर्ष होता रहा। अगले दिन बड़ी संख्या में जुटे किसानों ने पलवल-अलीगढ़ मार्ग जाम कर दिया। टप्पल से लेकर जट्टारी कस्बे दो दिन बंद रहे। मथुरा में भी आंदोलन फैल गया। घटनायें की जा रही है और सरकार बढ़ावा दे रही है। प्रवक्ता ने कहा कि अगर सरकार ने जल्द ही अपने दल के नेताओं पर अंकुश नहीं लगाया तो जनता सड़को पर उतरेगी।

Wednesday, August 18, 2010

पूरब में भी किसान आंदोलन

अंबरीश कुमार
लखनऊ , अगस्त । यमुना एक्सप्रेस वे के खिलाफ अलीगढ़ के टप्पल के जिकरपुर गाँव से शुरू हुआ किसान आंदोलन अब गंगा एक्सप्रेस वे इलाके तक पहुँच गया है । टप्पल में किसानो का धरना जारी है और अब मुआवजा की बजाय जमीन बचाने पर जोर दिया जा रहा है । खेती बचाओ - गाँव बचाओ आंदोलन के नेता डाक्टर गिरीश ने कहा - टप्पल में धरना दे रहे किसानो और खासकर महिलाओ का साफ कहना है कि मुआवजा नहीं जमीन चाहिए । इस बीच दादरी के किसानो ने बझेडा में पंचायत कर जहाँ समर्थन का एलान किया । जबकि गंगा एक्सप्रेस वे के खिलाफ आंदोलनरत कृषि भूमि बचाओ मोर्चा की बलिया में हुई बैठक में अलीगढ के किसानो के समर्थन में गुरूवार को हर जिले में विरोध जताने और फिर तीन दिन बाद धरना देने का एलान किया गया । इस बीच समाजवादी पार्टी ने मायावती सरकार पर फिरोजाबाद और इलाहाबाद में नए सिरे से भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने की निंदा की । पार्टी ने बताया कि इलाहाबाद ,फिरोजाबाद ,आगरा ,मथुरा जैसे कई जिलों में किसानो ने प्रदर्शन कर भूमि अधिग्रहण का विरोध किया है ।
टप्पल में धरना दे रहे किसानो को चौतरफा समर्थन मिलने लगा है । आज कल्याण सिंह भी किसानो के बीच पहुंचे और समर्थन का एलान किया । किसान मंच का एक प्रतिनिधिमंडल २१ अगस्त को टप्पल पहुँच कर धरना पर बैठेगा । किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह ने बताया कि अलीगढ के किसानो का समर्थन विदर्भ के किसानो ने भी किया है और यवतमाल ,वर्धा और नागपुर से कुछ किसान यहाँ आने का कार्यक्रम बना रहे है ।
भाकपा के राज्य सचिव और खेती बचाओ -गाँव बचाओ आंदोलन के नेता डाक्टर गिरीश ने टप्पल से लौटकर बताया कि अब वहां के किसान मुआवजा नहीं जमीन चाहते है । गाँव की एक महिला ने तो यह भी कहा कि खेती की जमीन देख कर शादी हुई थी अब जमीन कैसे दे देंगे । जमीन नहीं रहेगी तो खाएंगे क्या ?भाकपा का एक प्रतिनिधिमंडल २० को टप्पल जा रहा है जो किसानो के साथ धरना पर बैठेगा ।
गौरतलब है कि भूमि अधिग्रहण को ले कर अब नई बहस भी शुरूं हो गई है । जिन किसानो ने लखनऊ में इंदिरा नगर और गोमती नगर के लिए अपनी जमीन बेचीं थी उनमे से कुछ के घर की महिलाए आज उसी जमीन पर बनी कोठियों में चौका बर्तन करती है। इसी तरह नोयडा की तरफ जमीन बेचने वाले किसानो का पैसा घर बनवाने से लेकर आलिशान वाहन लेने और फिर किसानी छोड़ दूसरे धंधे में लगा । ज्यादातर की हालत अब खराब हो चुकी है । इसलिए अब किसान मुआवजा की बजाय जमीन बचाने की कोशिश में है । खास बात यह है कि जहाँ भी मुआवजा का सवाल उठा वहा लाठी गोली चली । जहा जमीन न देने का संघर्ष हुआ वहा किसान भरी पड़े । उदहारण है गंगा एक्सप्रेस वे का । बलिया से लेकर वाराणसी ,भदोही ,मिर्जापुर और इलाहाबाद में किसानो ने पैमाइश तक नहीं होने दी । कृषि भूमि बचाओ मोर्चा के उपाध्यक्ष बलवंत यादव ने कहा - अभी पिछले महीने ही मिर्जापुर में पदयात्रा कर किसानो की जमीन अधिग्रहण का विरोध किया था । लैड पार्सल के लिए जेपी समूह के लोग ४०० हेक्टेयर जमीन चाहते है पर किसान देने को तैयार नहीं है । हम लोगो ने तो पैमाइश भी नहीं होने दी । हम किसानो की जमीन लेने के खिलाफ है । अब अलीगढ के किसानो के समर्थन में पूर्वांचल में भी आंदोलन छेड़ेंगे । शुरुवात कल से होगी ।
उधर समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने आज कहा -अलीगढ़, आगरा, मथुरा, मेरठ में किसान आंदोलन थमा नहीं था कि जनपद फिरोजाबाद में 1725 एकड़ किसानों की जमीन के अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू हो गई है। ग्राम पचोखरा, देवखड़ा, छिकाऊ, हिम्म्तपुर तथा गढ़ीहरिया सहित 29 गांवों के किसान इसके विरोध में कई दिनों से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। आज हजारों किसानों ने काली पटटी बांधकर विरोध जताया। इलाहाबाद में भी 75 लाख बीघा जमीन किसानो से छीनकर जेपी ग्रुप को दे दी गई है।
जनसत्ता

Tuesday, August 17, 2010

अब खेत जोतते किसानो पर गोली

अंबरीश कुमार
लखनऊ , अगस्त । पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के टप्पल के जिकरपुर गाँव से शुरू हुआ किसान आंदोलन आज आगरा तक फ़ैल गया । आगरा की कोतवाली एत्मादपुर इलाके के नौ गांवों कुआखेड़ा,मदरा, भमरौली आदि में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन कर रह किसानों जब अपना खेत जोतने की कोशिश कर रहे थे तो पुलिस ने उन्हें रोका । बाद में नाराज किसानो व पुलिस में टकराव हुआ और पर पुलिस ने गोली चला दी। इसमें दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए है। टकराव में दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए । इनमे पुलिस वाले भी शामिल है । उधर टप्पल में किसान संघर्ष समिति के साथ सरकार का समझौता सभी किसानो को रास नहीं आया और किसान नेता कल्लू सिंह बघेल खेमा ने आंदोलन तब तक जारी रखने को कहा जब तक नोयडा के बराबर मुआवजा नहीं मिल जाता । इस खेमे को दादरी के किसानो के साथ किसान मंच ,जन संघर्ष मोर्चा ,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ,माकपा आदि ने समर्थन देने का एलान किया है । लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने जनसत्ता से कहा - हम तो किसानो के साथ है । अगर पंचायत आंदोलन जारी रखने का फैसला करती है तो हम भी साथ रहेंगे । वैसे भी आंदोलन फ़ैल रहा है । आगरा में भी पुलिस ने गोली चला दी है । समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा - मायावती सरकार लगातार किसानो पर लाठी गोली चलवा रही है । इस बीच १८९४ का भूमि अधिग्रहण कानून रद्द करने की मांग और तेज हो गई है ।
टप्पल का किसान आंदोलन आगरा तक बढ़ गया । आगरा की कोतवाली एत्मादपुर की कुमेरपुर चौकी के नौ गांवों कुआखेड़ा,मदरा, भमरौली आदि में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन कर रह किसानों पर पुलिस ने गोली चला दी। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा -आगरा में ताजमहल के निकट हरित पट्टिका की जमीन जेपी ग्रुप को देने का बुढ़ाना, कुआखेड़ा, मदरा आदि के किसान विरोध कर रहे हैं। यहां नौ गांवों की जमीन का अधिग्रहण कर उसे जेपी समूह को देने की योजना बनी। सर्किल रेट में भी हेराफेरी कर इस समूह को फायदा पंहुचाया जा रहा हैं इसी वजह से किसान आंदोलित थे। आज उनका गुस्सा भी फूट पड़ा। बाद में पुलिस ने गोली चलाई जिसमे रामकृष्ण सिकरवार का पुत्र राजू और एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया है।
आगरा से मिली जानकारी के मुताबिक आंदोलन कर रहे एक युवक की पिटाई से नाराज गाँव वालों ने एक एसडीएम को बंधक बना कर पिटाई भी की । जिसके बाद पुलिस ने हवाई फायरिंग की । आगरा के आईजी विजय कुमार ने कहा - हिंसा पर आमादा गाँव वालो को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हवा में गोली चलानी पड़ी । गाँव वालों के हमले में दर्जन भर पुलिस वालों को चोट आई है। आगरा में किसानो पर गोली चलाए जाने की चौतरफा निंदा की जा रही है । जनसंघर्ष मोर्चा के संयोजक अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने कहा - अलीगढ और आगरा में किसानो पर गोली चलने वाले पुलिस वालों को दंडित किया जाए । यह सब इसीलिए हो रहा है क्योकि हम १८९४ के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द नहीं कर रहे है । कांग्रेस प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि आगरा में पुलिस की गोली से चार घायल हुए है और दर्जन भर से ज्यादा किसान जो अपना खेत जोतने जा रहे थे पुलिस से टकराव के बाद बुरी तरह घायल है । कांग्रेस ने गोली चलने वालों को बर्खास्त करने की मांग की । हिंद मजदूर किसान पंचायत के उपाध्यक्ष विजय नारायण ने कहा - केरल ( तब त्रावनकोर - कोचीन) में १९५३ निहत्थे लोगो पर गोली चलाए जाने पर राम मनोहर लोहिया ने अपनी सोशलिस्ट पार्टी की सरकार से ही इस्तीफा मांग लिया था । अब यह सरकार लगातार किसानो पर गोली चलवा रही है और बेशर्मी से सत्ता में टिकी हुई है । फॉरवर्ड ब्लाक के प्रदेश अध्यक्ष राम किशोर ने कहा कि अब मायावती को सत्ता में रहने का कोई हक नही है ।
बसपा सरकार ने टप्पल क्षेत्र में किसानों को आतंकित करने के लिए भारी संख्या में पुलिस पीएसी लगा रखी है। किसानों ने जिकरपुर में अभी भी अपना आंदोलन जारी रखा है। सरकार ने आधीरात समझौते की बात प्रचारित कर वस्तुतः धोखाधड़ी की है और किसानों की हमदर्द बनने का ड्रामा किया है। किसान नेता रामबाबू को बहूुत ज्यादा धमकाकर जमानत पर छोड़ा गया है। किसानों पर लाठी गोली चलाने वाले अफसरों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। मुकदमा भी दर्ज नहीं हुआ है। उनका ट्रांसफर किया गया, जो कोई सजा नहीं है।
इस सरकार ने जेपी ग्रुप को जमीन और टाउनषिप का ठेका देने के लिए किसानों के आंदोलन को जिस बुरी तरह से कुचलने का काम किया है उससे यह आषंका होती है कि मुख्यमंत्री की इस कंपनी के साथ विषेश साठगांठ है और उन्हें इससे वित्तीय लाभ मिलनेवाला है। आगरा काण्ड हो या अलीगढ़ का, इन सभी की न्यायिक जांच होनी चाहिए। बसपा सरकार के लोकतंत्र विरोधी चरित्र और आचरण का तभी पर्दाफाष होगा।
समाजवादी पार्टी आगरा के किसानों के प्रति सरकार के बर्बर और अमानवीय रवैये की तीव्र निन्दा करती है और केन्द्र सरकार से मांग करती है कि वह किसानों के खून से रंगी बसपा सरकार को तत्काल बर्खास्त करे। समाजवादी पार्टी किसानों के साथ कतई नाइंसाफी नहीं होने देगी। वह पूरी एकजुटता से उनकी मांगो की पूर्ति के लिए संघर्श में साथ देगी।
जनसत्ता

Saturday, August 14, 2010

पत्थरों पर रोशनी ,धरोहर पर अँधेरा

अंबरीश कुमार
लखनऊ , अगस्त। मूर्तियों ,पार्कों और और स्मारकों पर अरबों रुपये खर्च करने वाली सरकार ऐतहासिक धरोहरों को भगवान् भरोसे छोड़े हुए है। आज लखनऊ से लेकर जिलो जिलों में आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर रोशनी की जा रही है पर आजादी की लडाई की बहुत सी धरोहर अँधेरे में डूबी हुई है । पृथ्वीराज कपूर के मार्गनिदेशन आजमगढ़ में जो कला भवन बना उसको राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत से लाई अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस भवन को देकर और समृद्ध कर दिया था ,उस कला भवन का ताला आज आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर टूटा मिला । आस पास के भवनों पर आजादी की सालगिरह के मोके पर रोशनी की जा रही है और यह भवन अँधेरे में डूबा है । राहुल सांकृत्यायन तिब्बत से जो पत्थर लाए थे उनका एक बक्सा खाली हो चूका है और कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ भी नदारत है । पूरा प्रदेश इस समय पत्थरों की वजह से नई पहचान बना रहा और दूसरी ओर जिलों जिलों में मौजूद इतिहास के पन्ने बिखरते जा रहे है । उदाहरण है आजमगढ़ में साहित्य, संस्कृति और कला को संजोने वाले हरिऔध कला भवन । यह भवन 1857 के कंपनी बाग जो आज कुंवर सिंह उद्यान के नाम से जाना जाता है उसके परिसर स्थापित है ।
इस कला भवन के वे दरवाजे आजादी की पूर्व संध्या पर खुले मिले जिन पर प्रशासन ने ताले लगवाए थे। इस संग्राहालय में जहां राहुल सांकृत्यायन ने अपनी दुर्लभ पांडुलिपियों और पुरातत्व की महत्व की वस्तुओं को दान किया था उसकी सुरक्षा के लिए कोई इन्तजाम नहीं है। हरिऔध कला भवन के संरक्षण के लिए लंबे समय से लड़ रहे स्थानीय रंगकर्मी अभिषेक पंडित ने बताया कि कुछ महीने पहले यहां किताबों और पांडुलिपियों के चोरी हाने का मामला सामने आया था। जिस पर लंबे आदोलन के बाद प्रशासन ने सिर्फ ताला लगवाने का काम किया। प्रशासन ने इसके संरक्षण के लिए एक बैठक बुलाने का आश्वासन दिया था जो अब तक नहीं हुयी। यहां गौरतलब है कि इस कला भवन का निर्माण 1954 में जनता के पैसे से स्थानीय कलाकारों द्वारा करवाया गया था। जिसका पृथ्वीराज कपूर ने मार्गदशन किया था। दक्षिण एशिया का इतिहास और घुमक्कड़ शास्त्र के रचयिता राहुल सांकृत्यायन जो आजमगढ़ के ही रहने वाले थे ने तिब्बत से लायी गयी अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस कला भवन को देकर और समृद्ध कर दिया। आजादी की पूर्व संध्या पर इस खंडहर नुमा कला भवन पर बैठे रंगकर्मी राघवेंद्र मिश्रा, सुग्रिव विश्वकर्मा और बब्लू श्रीवास्तव ने कहा कि कला जो समाज में प्रतिरोध की भावना का विस्तार करती है उस चेतना को कुंद करने की यह कोशिश है। जिलाधिकारी कार्यालय से मात्र कुछ फर्लांग की दूरी पर स्थित होने के बावजूद जिलाधिकारी इसका हाल जानने के लिए कभी नहीं आते जबकि जिलाधिकारी इस हरिऔध कला भवन के अध्यक्ष हैं। कल स्वतंत्रता दिवस है पर यहां कोई सफाई नहीं की गयी है। आज हम लोग यहां की खुद सफाई कर रहे हैं।
पीयूसीएल के राजीव यादव और तारिक शफीक ने कहा कि जिले में कला, साहित्य और संस्कृति के लिए हरिऔध कला भवन की एक मात्र संस्थान हैं। पर इसको जिस तरह उपेक्षित किया जा रहा है वह हमारी सरकारों की मनोस्थिति को भी बताता है कि वे कला, साहित्य और संस्कृति से कितना डरती है। कई दशक से इस हरिऔध कला भवन संस्था का नवीनीकरण नहीं हुआ जिसका पदेन अध्यक्ष जिलाधिकारी है। यह तथ्य इस बात को दर्शाती है कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारों के पास कला, साहित्य और संस्कृति को लेकर जिले स्तर पर कोई नीति नहीं हैं। कभी इस कला भवन में कैफी आजमी, बादल सरकार और अशोक भौमिक जैसे नामी लोगों के बैठके यहां हुआ करती थीं। इस कला भवन का कुछ हिस्सा डह गया है। जहां एक तरफ रवींद्र नाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ मनायी जा रही है वहीं इस कला भवन के ओपेन थिएटर में रवींद्र नाथ टैगोर सहित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसी हस्तियों के आदम कद तैल चित्र के चीथड़े दीवारों पर टंगे हैं तो वहीं महात्मा गांधी और अशोक की लाट धूल फांक रही हैं। कला भवन के पुस्तकालय के आलमारियों के शीशे टूटे हुए हैं जिनमें अब भी बहुमूल्य किताबें हैं जो अपने चोरी होनी की बाट जोह रही हैं। अब यह कला भवन कुछ युवा रंगकर्मियों के भरोसे है जो इसे फिर से कला, साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रुप में स्थापित करने में लगे हैं।

Thursday, August 12, 2010

जेपी के सिपाही भी मैदान में


अंबरीश कुमार
लखनऊ अगस्त । लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जनता सरकार की परिकल्पना को अमलीजामा पहनाने की वजह से क्रांतिकारी कवि नागार्जुन के साथ १९ महीने जेल काटने वाले महात्मा भाई को बिहार के नवगठित समाजवादी मोर्चा सिवान में जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव में उतारने जा रहा है । उनके चुनाव में बिहार आंदोलन के साथ जयप्रकाश नारायण की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के पुराने कार्यकर्त्ता और बोधगया आंदोलन के लोग भी शामिल होंगे । साथ ही समाजवादी धारा के लोग महात्मा भाई के चुनाव में जुटने जा रहे है । महात्मा भाई ने आज लखनऊ में कई जन संगठनो के लोगो से मुलाकात कर जीरादेई आने की अपील की । उतर प्रदेश से कुछ विधायक और जन संगठन के नेताओं ने भी जीरादेई जाने का कार्यक्रम बनाया है ।
समर्थन जुटाने की मुहिम में उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए महात्मा भाई ने कई संगठनो के नेताओं से मुलाकात की । गौरतलब है कि महात्मा बिहार आंदोलन के लिए बनी संचालन समिति के सदस्य थे और बाद में वाहिनी के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थे।जब जयप्रकाश नारायण ने जनता सरकार की की कल्पना की तो उसकी शुरुवात सिवान में महत्मा ने ही की थी जिसमे नागार्जुन शामिल हुए । महात्मा भाई ने बताया - अभी प्रखंड स्तर तक ही जनता सरकार का गठन किया गया था कि हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया । बाबा नागार्जुन भी साथ गिरफ्तार हुए और फिर छपरा ,सीवान और बक्सर जेल में १९ महीने कटे । उस दौर में नितीश कुमार भी
साथ थे पर आज जेपी सम्मान पेंशन योजना के लिए बक्सर जेल का रिकार्ड तक नहीं मिल रहा जिसमे नागार्जुन से लेकर नितीश कुमार ,सुशील कुमार मोदी आदि थे
खुद नितीश अब मुख्यमंत्री है । महात्मा यहाँ अपने पुराने समाजवादी साथी व समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से मुलाकात कर पुराणी यादें ताजा की ।
इसी बीच उन्हें पटना से लोक मोर्चा के बिहार के प्रभारी विजय प्रताप ने बताया कि समाजवादी धारा के संगठनो और दलों की बैठक में संयुक्त लोकतान्त्रिक समाजवादी मोर्चा का गठन किया जा चुका है जो उन्हें जीरादेई से मैदान में उतारेगा ।
इस बैठक में रघु ठाकुर की लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी ,लोकतान्त्रिक समता दल ,सोशलिस्ट पार्टी ( लोहिया ) ,लोकमोर्चा ,समाजवादी जनता पार्टी समेत छोटे बड़े दस संगठन और दल शामिल हुए । महात्मा भाई के मुताबिक यह मोर्चा करीब पचास सीटों पर चुनाव लडेगा । चुनाव को लेकर मोर्चा कई दलों से बात करेगा ।
बिहार विधान सभा के चुनाव में समाजवादी धारा के लोग कुछ क्षेत्रों में जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े लोगों को ताकत देकर नई पहल करने के मूड में है । जीरादेई उसी प्रयोग की दृष्टि से देखा जा रहा है । युवा भारत के राजीव के मुताबिक देश के अलग अलग हिस्सों से आंदोलनों से जुड़े लोग महात्मा भाई की मदद में आने वाले है । राजनैतिक दलों को भी चाहिए कि जयप्रकाश आंदोलन के इस सिपाही को ताकत दे और उमके खिलाफ कोई उमीदवार नहीं खड़ा करें ।
जनसत्ता

Monday, August 9, 2010

हरियाली ,हिमालय और सुर्ख होते सेब








अंबरीश कुमार
दार्जलिंग से शिवानी ने सतबुंगा जाने का कार्यक्रम इस शर्त पर बनाया कि मै गाइड के रूप में मुक्तेश्वर तक कई जगहों को दिखाने ले जाऊंगा .इस वजह से अचानक नैनीताल जाने का कार्यक्रम बना और रामगढ पहुंचा .गागर से नीचे उतरते ही बरसात की वजह से हरियाली ऐसी नज़र आई कि देखते मन न भरे .घर के बगीचे में फूल कम हो गए थे पर सेब के पेड़ लदे थे .दरवाजे पर लगा किंग डेविड प्रजाति का सेब सुर्ख हो चुका था तो बगीचे में डेलिशियस प्रजाति के पेड़ों में लगे सेब सुर्ख तो नहीं थे पर मिठास भरपूर थी .शाम तक बारिश और बादल के बीच आस पास घूमते रहे .गर्मियों के मुकाबले ठंढ ज्यादा थी इसलिए शाल से राहत मिली .रात में खाना बनाने का जिम्मा साथ आए एक मित्र ने लिया जो एक राष्ट्रीय अखबार के दिल्ली से बाहर के संपादक भी है .खाना बनाने के लिए सारा सामान बाज़ार से लेना था क्योकि गर्मियों में जो भी बचता है सब बहादुर को दे दिया जाता है .दूसरे साथ आए एक साथी मछली मुर्गे के बिना खाना अधूरा मानते है.गनीमत थी कि रोहू और टेंगन जैसी मछली भी उपलब्ध थी .खाना बनना रात आठ बजे शुरू हुआ और देर रात तक बैठकी चली .बीच बीच में थोड़ी देर के लिए बाहर निकल कर बरसात और ठंढ का अंदाजा लगाते .रात में ही तय हुआ सुबह सात बजे गाड़ी आने से पहले सभी तैयार मिले. पर रात भर रिमझिम के बाद भी सुबह भीगी नज़र आई .निकलते निकलते आठ बज चुके थे और सिंधिया एस्टेट से आगे का रास्ता घने बादलों के चलते नही दिख रहा था .फ़ॉग लाइट की मदद से धीमी गति आगे बढे .बारिश तो नही ओस जैसी बूंदे थी पर बादल बार बार घेर ले रहे थे .
सतबुंगा आते ही लगा पहाड़ों पर से पर्दा हटा दिया गया .आसमान भी खुल चुका था और सामने था हिमालय का अनंत विस्तार .घाटी के बीच पहाड़ी के सीढ़ीदार खेत और सेब के बड़े बड़े बागान.सेब के सुर्ख रंग देखकर बाहर के मित्र हैरान थे .ऐसे लदे थे जैसे अपने यहाँ देसी आम के पेड़ लद जाते है.रास्ते भर सेब , नासपाती और बब्बूगोसा के पेड़ों से फल तोड़कर खाते रहे .मुक्तेश्वर पहुंचे तो सबसे पहले जोशी जी की दूकान पर चाय पीने बैठे .सामने ही डाकखाना है .देवदार के पेड़ों से घिरे मुक्तेश्वर से लोग रानीखेत और अल्मोड़ा के भी दर्शन करा देते है .समूचे कुमायूं में इतने खूबसूरत जंगल ,पहाड़ और वादियाँ नहीं मिलेंगी .महाभारत के समय का एक शिव मंदिर पहाड़ी पर है जो सात हजार फुट की ऊँचाई पर है .जहाँ से आसमान साफ़ होने पर हिमालय की तीन सौ किलोमीटर लम्बी श्रंखला साफ़ दिखाई पड़ती है और लगता है कुछ ही किलोमीटर दूर बर्फ के पहाड़ है .एक दिन पहले ही लखनऊ में गर्मी से जान निकल रही थी और यहाँ ठंड से हालत खराब हो रही थी .
वापस सतबुंगा लौटे तो एक पतले रास्ते से पहाड़ पर चढ़ना था .ड्राइवर से छाता निकालने को कहा तो साथ चल रहे सतबुंगा के निवासी सत्यप्रकाश ने कहा - साहब अब घंटे दो घंटे बारिश नहीं होगी .फिर मैने छाता ले लिया .पहाड़ी पगडंडी पर का रास्ता कुछ देर बाद ही सीढ़ीदार खेतों और बगीचों के बीच चला गया .सतबुंगा की एक छोटी पर मंदिर है और उसके आगे घने जंगल .यह पूरा इलाका बाघ , गुलदार जैसे जानवरों का है .जंगल से पहले ही रास्ते में तेज बूंदे पड़ने लगी .पथरीले रास्ते पर तेज चलने से फिसलने का खतरा भी था .कुछ दुरी पर बच्चों का स्कूल नजर आया तो टिन की छत के नीचे शरण ली गई .पत्थरों से बने चार पांच घर थे पर कोई नज़र नही आ रहा था .पता चला यही पर विवादस्पद पचौरी का भी घर है जो गंगा ,ग्लेशियर पर अपने विचारों से विवाद में घिर गए थे .और नीचे भाजपा के सांसद पत्रकार चन्दन मित्र का घर भी लगभग तैयार हो गया है .
सतबुंगा की हरियाली ,हिमालय और बागान आपको आसानी से वापस नहीं लौटने देंगे .यही वजह है कि रामगढ पहुँचते पंहुचते रात हो गई .दूसरे दिन जब दिल्ली में आलोक तोमर और सुप्रिया को सेब की फोटो दिखाई तो सुप्रिया इस बात से नाराज थी कि सेब लेकर क्यों नहीं आया क्योकि उनके बगीचे पेड़ों में भी सेब लदे थे .मैंने बताया कि बगीचे के फल तो जून में ही बिक जाते है जिसके बाद सिर्फ एक दो पेड़ के फल चौकीदार के बच्चों के लिए छोड़ देते है .पर यह शिकायत वाजिब थी कि जब सत्तर रुपए बोरी वहा सेब मिल रहा हो तो लाना तो चाहिए था .