Showing posts with label जनसत्ता. Show all posts
Showing posts with label जनसत्ता. Show all posts

Sunday, September 19, 2010

मीर ,चकबस्त और बेगम अख्तर के फैजाबाद में फिर युद्ध जैसी तैयारी !




फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया
अंबरीश कुमार
अयोध्या , सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए । पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।
पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।
अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।
कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।
अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह में डाल रही थी ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।
यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि का व्यापार है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा ।
जनसत्ता

Saturday, September 11, 2010

जनसत्ता में राजसत्ता की चमक


अंजनी कुमार
एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी भी इन सारे मोर्चों पर न तो एक साथ लड़ सकती है और न ही लड़ते हुए गलतियों से बच सकती है। लेकिन गलतियों के खौफ से न तो सपने छोड़े जा सकते हैं और न ही उन्हें मारा जा सकता है। सपने देखना जरूरी है,लेकिन वह दिवास्वप्न न हो। सवाल उठाना जरूरी है,लेकिन वह खारिज करने वाला न हो। उनका जमीनी रिश्ता हो तो वह परिवेश से संवाद और खुद के भीतर एक सर्जक को जन्म देता है। अन्यथा सपने मारने की परम्परा तो चलती ही आ रही है। आप भी इसमें शामिल हैं तो यह कोई नई बात नहीं होगी। आज जरूरत सनसनीखेज खबर की नहीं,वस्तुगत सच्चाई से रू-ब-रू कराने वाली ख़बरों और इसे पेश करने वाले साहसी पत्रकारों की है।
उमा मांडी यानी सोमा मांडी के आत्मसमर्पण एवं सीपीआई (माओवादी)के नेताओं पर बलात्कार के आरोप की कहानी 24अगस्त को टाइम्स ऑफ इंडिया ने सनसनीखेज तरीके से पेश की। एक स्त्री की गरिमा और आम परम्परा तथा विशाखा निर्देशों (महिला हितों की रक्षा के लिए बना कानून)की धज्जी उड़ाते हुए इस अखबार ने उमा मांडी के फोटो और मूल नाम को भी छापा। इस घटना के लगभग दो हफ्ते बाद जनसत्ता में उसी कहानी को सच मानते हुए न केवल माओवादियों पर बल्कि लाल क्रांति पर कीचड़ उछालने वाला मृणाल वल्लरी का लेख छपा।
बीच के दो हफ़्तों में इस संदर्भ में तथ्य संबधी लेख,खबर और प्रेस रिपोर्ट भी छपकर सामने आये,लेकिन न तो लेखिका को पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों की चिंता थी और न ही 'जनसत्ता'को सच को प्रतिष्ठा प्रदान करने की। लगता है कि उनकी चिंता 'कालिमा'को सनसनीखेज तरीके से पेश करने की थी और इसके लिए माओवादी आसान पात्र थे। ठीक वैसे ही जैसे किसी भी जनपक्षधर नेतृत्व को माओवादी घोषित कर पूरे जनांदोलन को सनसनीखेज बनाकर कुचल देने के लिए पूर्व कहानी गढ़ लेना। आइए, दो हफ्ते में गुजरे कुछ तथ्यों पर नजर डालें।
द टेलीग्राफ में 29अगस्त को प्रणब मंडल के हवाले से सोमा यानी उमा मांडी के कथित आत्मसमर्पण की कहानी पर खबर छपी। इस रिपोर्ट के अनुसार उमा मांडी 20अप्रैल को कमल महतो के साथ मिदनापुर से 15किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-6पर पोरादीही में गिरफ्तार हुई थीं। कमल महतो को पुलिस ने 17अगस्त को कोर्ट में पेश कियालेकिन सोमा की गिरफ्तारी नहीं दिखाई गयी। इस रिपोर्टर के अनुसार इस बात की पुष्टि न केवल उनके रिश्तेदार, बल्कि पुलिस के एक हिस्से ने भी की।
इसी तारिख को 'यौन उत्पीड़न और राजकीय हिंसा के खिलाफ महिला मंच'ने एक प्रेस रिपोर्ट जारी कर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के खबर की तीखी आलोचना करते हुए कुछ सवाल उठाये। एक सवाल का तर्जुमा देखिये :-आत्मसमर्पण के समय उमा द्वारा दिये गये बयान को ही आधार बनाकर खबर दे दी गयी। इसे अन्य स्रोतों से परखा नहीं गया। इस खबर को बाद में भी अन्य स्रोतों के बरक्स नहीं रखा गया। ज्ञात हो कि उपरोक्त मंच में एपवा से लेकर स्त्री अधिकार संगठन और एनबीए जैसे 60संगठन और सौ से ऊपर व्यक्तिगत सदस्य हैं। 11सितम्बर के तहलका (अंग्रेजी) में बोधिसत्व मेइती की खबर के अनुसार ज्ञानेश्वरी रेल त्रासदी के आरोप में 26मई को हीरालाल महतो को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने हीरालाल को एक दूसरी पुलिस जीप में हथकड़ी के साथ बांधी गयी उमा मांडी के सामने पेश करते हुए कहा- यह तुम्हें जानती है कि तुम माओवादी सहयोगी हो। उमा मांडी को पुलिस की जीप में और साथ में पुलिस को वर्दी में देखने वाले ग्रामीणों के बयान को भी इस रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है।
31अगस्त को मानिक मंडल ने प्रेस क्लब, दिल्ली में बताया कि उमा मांडी की कहानी पुलिस द्वारा गढ़ी गयी है। उन्होंने अपने जेल अनुभव सुनाते हुए जेल में बंद पीसीपीए के कार्यकर्ताओं के उन पत्रों का हवाला दिया जिसमें उमा मांडी के पुलिस इन्फोर्मर होने की बात कही गयी है। इस पत्र के कुछ अंश तहलका ने जारी किये हैं। पूरा पत्र संहति ब्लॉग पर कुछ दिनों बाद अंग्रेजी में देखा जा सकेगा।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा यदि हम प.मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा के उमा मांडी के आत्मसमर्पण के समय के और बाद के बयानों को देखें तब भी इस मुद्दे के ढीले पेंच नजर आयेंगे। एक संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दे पर इन तथ्यों को नजरअंदाज कर लेख लिख मारने और छाप देने के पीछे न तो जल्दीबाजी का मामला दिख रहा है और न ही लापरवाही का। क्योंकि यहाँ हम इस तथ्य से भी वाकिफ हैं कि मृणाल वल्लरी लंबे समय से पत्रकारिता कर रही हैं, 'जनसत्ता' से जुड़ी हुई हैं और उन्हें युवा संभावनाशील पत्रकारों में शुमार किया जाता है। इसी तरह संपादक ओम थानवी के नेतृत्व वाली जनसत्ता की संपादकीय टीम भी ऊँचे दर्जे की पत्रकारिता के लिए स्थापित है।
राजेन्द्र यादव के शब्दों में ले-देकर यही एक अखबार है। यह अखबार भी सीपीआई माओवादी के बारे में अपनी ही पत्रकार के लेख को छापते समय पत्रकारिता की न्यूनतम नैतिकता को तक नजरअंदाज कर जाता है कि उमा मांडी उस पार्टी की सदस्य है भी या नहीं और इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध है भी है या नहीं। यह अखबार पीसीपीए और सीपीआई माओवादी के बीच के फर्क को भी नजरअंदाज कर जाता है। ठीक वैसे ही जैसे गॉधीवादी हिमांशु को माओवादी घोषित कर दिया जाता है। इसी अंदाज में मृणाल वल्लरी सीपीआई माओवादी पार्टी, माओवादी और मार्क्सवादी होने का फर्क मिटाकर मनमाना लिखने की खुली छूट हासिल कर लेती हैं। गोया पत्रकारिता न होकर सब धान बाइस पसेरी वाली दुकान हो।
ऐसा ही मनमानापन कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दिखा। पुलिस के बयान पर एक आदिवासी युवा लिंगाराम जोकि दिल्ली में पत्रकारिता कि पढाई कर रहा है, को सीपीआई माओवादी को प्रवक्ता घोषित करते हुए यह बताया गया कि वह दिल्ली में माओवादी समर्थक के यहाँ छिपा हुआ है। यदि यह अपढ़ होने तथा अधकचरेपन का परिणाम होता तो इसे दुरूस्त किया जा सकता है, लेकिन यह सचेत और सतर्कता का परिणाम है। इस मनमानेपन के पीछे पुलिस व शासन तंत्र की डोर कसकर बंधी हुई है। अन्यथा सिर्फ सरकारी बयान के संस्करण के आधार पर लाल क्रांति की चिंता का मनोजगत इस तरह खड़ा नहीं होता और न ही इस तरह की पत्रकारिता से हम रू-ब-रू होते।
मसलन,किसी आंदोलन का मूल्यांकन पार्टी संगठन,विचारधारा और कार्य अनुभव तथा हासिल के मद्देनजर करते हैं। सीपीआई माओवादी पार्टी के संगठन, विचारधारा,कार्य और हासिल के बारे में लेखों, रिपोर्टों आदि की लंबी फेहरिस्त है। ये आमतौर पर उपलब्ध हैं। ठीक इसी तरह अन्य पार्टियों,संगठनों तथा सरकारी तंत्र के कार्यों के बारे में भी तथ्य उपलब्ध हैं। मृणाल वल्लरी यह जरूर बताएं कि किस सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट में माओवादी बलात्कारी के रूप में चित्रित हैं। इसी तरह आप सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टों में सीपीएम व हरमाद वाहिनी,भाजपा,कांग्रेस तथा उनके सलवा जुडुम इत्यादि के चेहरे को भी देखें। ऑपरेशन ग्रीन हंट के कारनामों को देखें।
1967में नक्सलबाडी उभार के समय सिद्धार्थ शंकर रे ने एक तकनीक अपना रखी थी। इसमें पुलिस या आम छोटे दुकानदार को गोली मारने का काम खुफिया के आदमी किया करते थे,लेकिन परचे नक्सलियों के छोड़े जाते थे। आज छत्तीसगढ़ से लेकर मिदनापुर तक में यही कहानी चल रही है। इसमें नये तत्व शामिल हो गये हैं और नये खिलाड़ी भी शामिल हुए हैं। आपने 'लापता' महिलाओं का जिक्र करते हुए पीसीपीए के मिलिशिया पर बलात्कारी और अपहरणकर्ता होने का आरोप मढ़ा है। जिस दिन आपका लेख छपा है उसी दिन के 'जनसत्ता' में यह भी खबर है कि सीपीएम ने नंदीग्राम में 2500लोगों के बेघर होने की सूची सौपी है। आप बंगाल के प्रति चिंतित हैं और इससे निष्कर्ष निकालना चाहती हैं तो वहॉ के गैर माक्र्सवादियों से लेकर आईबी की सरकारी रिपोर्ट पर भी नजर डालें।
अब तक सीपीएम के नेतृत्व में पूरे जंगलमहल में हरमद वाहिनी ने 86 कैंप लगा रखे हैं, एकदम सलवा जुडुम की तर्ज पर। हत्या के बाद शव पर माओवादी साहित्य का जल चढ़ाने वाले हरमद वाहिनी के बलात्कार,हत्या और गायब करने के कारनामों के बारे में 'नारी इज्जत बचाओ कमेटी'के पत्र और प्रेस रिपोर्ट देखिये। पीसीपीए के डुप्लीकेट पर्चे और पोस्टर जिनका रंग मूल पीसीपीए से अलग है, के बारे में जानने के लिए एपीडीआर की रिपोर्ट को देखिए। किसी भी आन्दोलन में भटकाव हो सकता है। इन पर बात करते समय ठोस सच्चाइयों का जिक्र जरूरी है। स्रोत के बारे में न्यूनतम जॉच-पड़ताल जरूरी है।
हिंदी अख़बारों की लघुपत्रिका
इन संदर्भों को भूलकर आन्दोलन,नक्सलवाद व माओवाद पर पत्रकारिता करना भोलापन नहीं है। यह एक ऐसा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार है जिसके चलते आंदोलनों के प्रति संवेदनहीनता और उदासीनता का माहौल बनता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी तरह की पत्रकारिता ने हर विस्फोट को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाया जिसका फायदा फासिस्ट हिन्दूत्ववादी ताकतों ने उठाया। इसने बहुसंख्यक आबादी को मुस्लिम समुदाय के प्रति पूर्वाग्रही और उनकी तकलीफों के प्रति संवेदनहीन बनाने में एक कारक की भूमिका अदा की।
मृणाल वल्लरी महिला आंदोलन की चुनौतियों को जिस संदर्भ में रखकर चिंता जाहिर कर रही हैं और निष्कर्ष निकाल रही हैं उसमें पुलिसिया संस्करण छोड़ कोई संदर्भ नहीं है। उनकी चिंता और तर्क महिला के प्रति उनके सरोकार के प्रकटीकरण हो सकते हैं,लेकिन महिला मुक्ति का सवाल पुलिसिया संस्करण से हल करने का उनका प्रयास उस संस्करण की व्याख्या होकर ही रह गया है।
मृणाल वल्लरी पूछती हैं कि ”मार्क्स और एंगेल्स के विचारों की बुनियाद पर खड़े कॉमरेडों के कंधों पर लटकती बंदूकों के खौफ से किस सपने का जन्म हो रहा है?“जाहिरा तौर पर उनका जोर कॉमरेडों की बंदूक एवं खौफ पर है और उत्तर नकारात्मक है। वह मानकर चल रही हैं कि बंदूकें सिर्फ कॉमरेडों यानी पुरुषों के पास हैं। जो भी आन्दोलन के बारे कखग जानता होगा वह इस अज्ञानता पर हंस ही सकता है। खौफ से सपने टूटते भी हैं और खौफ पैदाकर सपने देखे भी जाते हैं। यह अपने देश में विभिन्न पार्टियॉ व उनकी सरकारें खूब करती आ रही हैं। आप जहाँ रह रही हैं वहॉ अनुभव से इसी तर्क तक ही पहुंचा जा सकता है और उसे ही आप आजमाने की कोशिश कर रही हैं।
खौफ के खिलाफ खड़े होने की भी एक तर्क प्रणाली है और उससे उपजा हुआ सपना एक तर्क और लोकरंजकता से लबरेज भी होता है। यह एक ऐसी आम सच्चाई है जिसे गीत में भी ढाला जा सकता है और विचार व सिद्धांत में बदला भी जा सकता है। इस पूरी प्रकिया में गलतियाँ भी हो सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग की लूट में कुछ अच्छाईंयां दिखती रह सकती हैं। लेकिन मूल मसला सपने का है। सामंती व्यवस्था वाले हमारे समाज में दलित, स्त्री,अल्पसंख्यक,आदिवासी और राष्ट्रियताएँ जिस उत्पीडन की शिकार हैं उससे मुक्ति का रास्ता बहुस्तरीय संघर्षों से होकर जाता है।
http://www.janjwar.com/

Tuesday, August 17, 2010

गाँधी की खादी बाजार के हवाले

लखनऊ, अगस्त । गाँधी के नारे के सहारे सत्ता के गलियारों तक पहुँचने वाली कांग्रेस ने अब उसकी खादी को बाजार के ताकतों के हवाले कर दिया है । कांग्रेस ने खादी से 20 फीसदी की सब्सिडी खत्म कर दी है । जिससे अब खादी लेने पर कोई छूट नहीं मिलेंगी ।
कांग्रेस सरकार ने खादी वस्त्रों पर हर साल गाँधी जयंती के उपलक्ष्य में दी जाने वाली २० फीसदी की छुट इस साल से बंद करने का निर्णय लिया है, जब की हर साल यह छूट आज़ादी मिलने के बाद से अभी तक बिना किसी रुकावट के मिलती रही है। खादी वस्त्रों पर हर साल केंद्र के अलावां उत्तर प्रदेश सरकार भी अपनी तरफ से १० फीसदी का छुट देती है जो आज भी जारी है| बहुजन समाज पार्टी की सरकार से एक बार छूट बंद करने की उम्मीद की जा सकती थी लेकिन यह निर्णय गाँधी के आदर्शों को ढोने वाली कांग्रेस सरकार ने लिया ।
यह प्रस्ताव दरअसल पूर्व में भाजपा नेतृत्व वाली (राजग) सरकार ने तैयार किया था, जिसे भाजपा ने यह सोच कर नहीं लागू कराया की उसके अपने ही संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ऊपर गाँधी की हत्या कराने के आरोप लग चुके हैं । पूर्व राजग सरकार जिस प्रस्ताव को लागू कराने का साहस नहीं कर पाई, उसको कांग्रेस सरकार ने बहुत आसान तरीके से लागू करा ।
उत्तर प्रदेश में इसे लेकर आन्दोलन शुरू हो गया है । १६ अगस्त को पुरे प्रदेश के उत्पाद और बिक्री केंद्र बंद रखे गए । २२ अगस्त से वर्धा में गाँधी वादी फिर से आन्दोलन की रूप रेखा बना रहे है । खादी पर यहे छूट आजादी के पहले १९२० से दी जा रही है, हर साल गाँधी जयंती २ अक्टूबर पर १०८ दिनों तक यह छूट दी जाती है । गाँधी आश्रम के सचिव रामेश्वर नाथ मिश्रा बताते है कि यही वो वक्त होता है, जिसमे करीब पूरे साल कि ८५ फीसदी की बिक्री होती है, शेष १५ फीसदी वर्ष भर में की जाती ।
पूरे देश में खादी के करीब १९५० मान्यता प्राप्त संस्थान है, जिसमे ५५००० से उपर वेतन भोगी कर्मचारी है,जिसमे कतिन बुनकरों की संख्या २.५ से ३लाख है और करीब उत्तर प्रदेश में २२००० समितियां है।
इन समितियों में करीब ५५ लाख स्त्री बुनकर व कातिन हैं । भारत सरकार नें राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी के खादी के प्रचार प्रसार की नीतियों पर कुठारा घात करते हुए वर्षों से खादी पर दी जाने वाली इस छूट को समाप्त कर उसके स्थान पर ०१ अप्रैल २०१० से विपणअन विकास सहायता देना लागू कर दिया है ।
इस योजना के प्रावधानों के अनुसार वर्षों से भारी छूट का लाभ उठाने के आदि हो चुके ग्राहकों को अब खादी के वस्त्रों पर अब ४ या ५ फीसदी छूट ही उपलब्ध हो पायेगी जिससे खादी की बिक्री निश्चीत तौर पर प्रभावित होगी और खादी संस्थाओं तथा उनसे जुड़े बुनकरों और कामगारों को भारी वितीय क्षति उठानी पड़ेगी । निजी और कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा अपने ग्राहकों को दी जा रही आकर्षक छूट व अन्य प्रलोभनों के चलते धीरे धीरे खादी संस्थाओं में ताले पड़ते जायेंगे ।
१४ अक्टूबर २००९ को प्रधानमंत्री को प्रतिवेदन दे कर उनकी खादी विरोधी नीतियों का विरोध करते हुए नए निर्णयों को लागू करनें में असमथर्ता प्रकट की । कुछ संस्थाओं द्वारा सरकार द्वारा खादी विरोधी नीतियाँ न वापस लेने के विरोध में असहयोग आन्दोलन की चेतावनी दे डाली|
इस पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव अशोक मिश्रा का कहना है यह खादी के ऊपर एक प्रहार है, सरकारी संरक्षण के बिना इसको नहीं चलाया जा सकता है। कांग्रेस गाँधीवाद की हत्या कर रही है और ये विश्व व्यापर के समर्थक है तथा इस उद्योग को मरनें नहीं दिया जायेगा ।
जनसत्ता में आशुतोष सिंह की रपट

Thursday, August 5, 2010

क्या यह डाइन है जो जीभ काटी


अंबरीश कुमार/विजय विनीत
लखनऊ/करहिया (सोनभद्र ) , अगस्त। आदिवासी महिला जागेश्वरी की जीभ काटने के मामले में उन सभी दो सौ लोगों लोगों पर मुकदमा चलाया जाए जो घटना के समय मूक दर्शक बने देख रहे थे ।यह मांग आदिवासियों के बीच काम कर रहे संगठनों ने आज की है । राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच ,मानवाधिकार कानून सलाह केंद्र और कैमूर क्षेत्र महिला मजदूर किसान संघर्ष समिति की तरफ एक प्रतिनिधिमंडल आज मौके पर पहुंचा । इस प्रतिनिधिमंडल में शांता भट्टाचार्य ,गणपति देवी ,शोभा सोकालो देवी और विनोद पाठक शामिल थे ।इस टीम युवा आदिवासी महिला जागेश्वरी से मुलाकात की जिसकी तीन दिन पहले भरी पँचायत में जीभ काट दी गई थी । बुधवार को एजंसी भाषा की खबर आने के बाद शासन प्रशासन के साथ मीडिया की भी नींद खुली । यह इलाका छत्तीसगढ़ से लगा है और बस्तर से लेकर सरगुजा तक टोनही और डायन के नाम पर दलित आदिवासी महिलाओं के शोषण का पुराना इतिहास है । छत्तीसगढ़ में जो काम बैगा करते है वही काम इस तरफ ओझा कर रहे है । इसी के चलते जागेश्वरी को डायन बता उसकी जीभ काट दी गई । पर जागेश्वरी की मुसीबते यही नही ख़त्म हुई । अस्पताल के डाक्टर ने इलाज तो दूर उसे कमरे से बाहर धकेल दिया । इस हादसे के बाद आदिवासी संगठन ने सवाल पूछा - क्या जागेश्वरी डायन है , जो भरी पंचायत में उसकी जीभ काट दी गई । छत्तीसगढ़ में डायन बताकर महिलाओं के उत्पीडन की पुरानी परंपरा रही है । उस परंपरा को और आगे बढ़ाते हुए इस गाँव के लोगों ने बर्बरता की सारी हदे पार कर एक युवा आदिवासी महिला की जीभ काट दी । और यह काम एक ओझा के कहने पर पंचायत में किया गया । पुलिस ने इस मामले में ओझा समेत दो लोगो को गिरफ्तार कर चालान कर दिया है ।
हैरान करने वाली बात यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ( म्योरपुर) के प्रभारी ने भी उसे शक की निगाह से देखते हुए इस महिला को कमरे से बाहर कर दिया । गुरूवार को कई घंटे वह अस्पताल परिसर में पेड़ के नीचे पड़ी रही । सामाजिक संगठनों के लोगों के सक्रिय होने पर उसे जिलाचिकित्सालय भेजा गया आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र के दक्षिणांचल में झाड़ - फूक व ओझाई के चलते हर माह मारपीट होती रहती है । गुरूवार को जन संगठनों के लोगों ने मौके पर पहुचंकर मामले की जांच की ।
छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा आदिवासी बाहुल्य करहीयां गांव सन् 2002 में तब चर्चा में आया था जब चार युवकों को माओवादी बताकर पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था । उसी करहीयां गांव में तीन दिन पहले जगेशरी की जीभ भरी पंचायत में उसी के दरवाजे पर डायन बताकर काट दी गई । रमाशंकर गोड़ की पत्नी जगेशरी की जीभ उसके चाचा के दामाद की पुत्री की मौत को लेकर काटी गयी । जिस समय उसकी जीभ काटी जा रही थी ,उस समय उसके चार बच्चे अंधा पिता व उसका पति लोगों के हाथ पैर जोड़कर ऐसा न करने की फरियाद कर रहे थे । लेकिन ग्रामीणों ने उसकी एक नही सुनी और ओझा के इशारे पर ऐसी अमानवीय हरकत कर डाली । घटना के एक दिन पूर्व जगेशरी के चाचा की पुत्री की चार वर्षीय बालिका की मौत हो गयी थी । इस पर बालिका का पिता सहदेव ने जगेशरी पर टोना टोटका करने का आरोप लगाया। इसकी पुष्टि के लिए उसने दो ओझाओं को बुलाया । ओझाओं ने जगेशरी के घर के सामने कटहल के पेड़ के नीचे पंचायत बुलाई । पंचायत में ओझाओं ने ऐलान किया की यह एक टोनही है जादू टोना करती रहती है । ऐसे में इसकी जीभ काट दी जाय । न जीभ रहेगी न यह जादू टोना कर पायेगी । इसके बाद कई लोगो ने उसका हाथ पैर पकड़ा और जीभ बाहर खीचकर गड़ासे से काट दी । जीभ कटते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी इससे वहां मौजूद लोग भाग खड़े हुये । उसका पति किसी तरह उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र म्योरपु र लाया । अस्पताल में भी उसके साथ डाक्टर का व्यवहार ओझा से कम नहीं था । उसे अन्य मरीजो से अलग थलग सिगंल बेड रूम मे डाल दिया । उपचार के नाम पर रस्म अदायगी की जाती रही । वह बोल नहीं पा रही थी उसके पास आठ माह का बच्चा राजनरायन भी था । गुरूवार दोपहर चिकित्सक ने उसे कमरे से बाहर करते हुए ताला लगा दिया और रेफर कर दिया । चिकित्सालय परिसर में वह काफी देर तक एक पेड़ के नीचे पड़ी रही । इसी बीच वहां महिला संगठन जागोरी कैमूर क्षेत्र मजदूर किसान सघर्ष समिति के लोगो ने जब महिला को पेड़ के नीचे पाया तो कलेक्टर को सूचना दी ।
घटना के तीन दिन बाद हरकत में आई पुलिस ने एक ओझा वह सहदेव को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया । एक आरोपी फरार है ,सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में तमाम लोग बिमारियों को भूत - प्रेत व जादू टोना मानते है । इसे लेकर इस जिले में आये दिन मारपीट होती रहती है , चार माह पूर्व कोन थाना क्षेत्र के पड़रच ग्राम पंचायत की एक महिला को ग्रामीणों ने डायन बता गांव से बाहर निकाल दिया । चोपन थाना क्षेत्र सलखन गांव में एक मांह पूर्व भूत प्रेत के चक्कर में एक महिला की जमकर पिटाई की गई । राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के चन्दुली गांव में भूत प्रेत को लेकर हुई मारपीट में 18 लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे । जबकि बभनी ,बीजपुर व दुद्धी थाना क्षेत्रों भूत- प्रेत को लेकर हुई मारपीट में एक साल के भीतर आधा दर्जनों लोगो की मौत हो चुकी है ।
जनसत्ता