Sunday, February 5, 2012

समर्थन की जरुरत तो राहुल को है -सपा


अनामिका शिमला
लखनऊ , फरवरी । समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को साफ़ चेतावनी दे दी है कि राहुल गाँधी सीमा में रहे नहीं तो संकट पैदा हो सकता है ।राहुल गाँधी ने किसी के समर्थन के मुद्देपर कहा था कि वे गुंडों बदमाशों का समर्थन नहीं लेंगे । इशारा साफ तौर पर समाजवादी पार्टी की ओर था । इस पर समाजवादी पार्टी ने राहुल गाँधी को आइना दिखाते हुए कहा -समर्थन तो उन्हें चाहिए वर्ना केंद्र की सरकार गिर जाएगी । रविवार को समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को चेतावनी दी है कि समर्थन की जरुरत कांग्रेस को केंद्र में है । अगर अन्य दलों का समर्थन वापस हुआ तो सरकार गिर जाएगी ।सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि कांग्रेस महासचिव व युवराज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति होने की आशंका से निराश और हताश होकर अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने लगे हैं। उन्हें यह भी पता नहीं कि वे किसके बारे में और किस संदर्भ में बड़बोलापन दिखा रहे हैं । चौधरी ने कहा कि उनका यह बयान कि कांग्रेस जीतें या हारें वह किसी पार्टी से उत्तर प्रदेश में गठबंधन नहीं करेगी ।यह एक तरह से बचकानापन से भरा बयान है क्योंकि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस हैसियत में है कहां कि उसके साथ गठबंधन की किसी को दरकार हो। गठबंधन तो सही में कांग्रेस की मजबूरी है जिसके बिना तो केंद्र में वह शासन में हीं नहीं रह सकेगी । चौधरी ने कहा कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को दूसरों पर आक्षेप करने से पहले अपने घर की सच्चाई जान लेना चाहिए। देश व प्रदेश पर सबसे ज्यादा समय तक कांग्रेस का राज रहा है । इसलिए देश व प्रदेश में जो समस्याएं है उनकी जिम्मेदारी भी उसी पर है। चौधरी ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी ने गरीबी हटाओं का नारा देकर जनता को भरमाया था। पर देश व प्रदेश को क्या मिला । गरीबी, भुखमरी व अपमान भरा जीवन। यह बात तो सरकारी रिपोर्टो से साबित है कि देश में अभी भी 80 फिसद लोग एक वक्त भूखे रहकर ही सोते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य की दुहरी व्यवस्था,धनपतियों के स्वार्थ की योजनाएं, उदारीकरण के नाम पर लघु, मध्यम उद्योगों की बर्बादी यह सब तो कांग्रेस की ही देन है। उन्होंने कहा कि सपा यह भी जानना चाहेगी कि आखिर उनकी नजरों में चोर और गुंडा कौन है । आतंकवाद के नाम पर निर्दोष मुस्लिम नौजवानों का एन्काउंटर करनेवाले या किसानों को जमीन से जबरिया बेदखल करनेवाले । कांग्रेस पर तीखी टिपण्णी करते हुए चौधरी ने राहुल से पूछा कि कामनवेल्थ खेल घोटाला, टूजी स्पेक्ट्रम घेाटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला करनेवाले और जनता की गाढ़ी कमाई विलासिता में लुटानेवालों को पता नहीं वे चोर मानेगें या नहीं। साथ ही साथ राहुल गांधी से उन्होंने यह भी सवाल किया कि वे यह भी बताएं कि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्टो में कहा गया है कि मुसलमानों की स्थिति दलितों से बदतर है। मुस्लिमो की इस दशा का जिम्मेदार कौन है । उन्होंने कहा कि अच्छा हो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी यह भी स्पष्ट कर दें कि प्रदेश को बर्बादी के गर्त में ढकेलने वाली बसपा सरकार और इसकी मुख्यमंत्री को पांच सालों से कौन अभयदान देता रहा है। अपराध, भ्रष्टाचार बलात्कार और लूट की तमाम शिकायतों के बावजूद कांग्रेस हाथी पर हाथ धरे क्यों बैठी रही । हाथी को केन्द्रीय मदद का चारा खिलाकर किसने मोटा किया है । चौधरी ने कहा कि राहुल गांधी खुद ही तय कर लें कि प्रदेश के विकास को अवरूद्ध करनेवाली पत्थर प्रेमी बसपा सरकार ने जो तबाही मचाई है उसमें उनकी पार्टी कांग्रेस की कितने हिस्सेदारी है । चौधरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस महासचिव को जगह जगह कम भीड़ और काले झण्डों से वास्ता पडा है ।तो वहीं अखिलेश यादव को जनता का हर जगह समर्थन मिला है। जनता के इस रूझान से सपा की बहुमत की सरकार प्रदेश में बनाना तयं है। उन्होंने कहा कि सपा प्रदेश में अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में है। उसको किसी के सहारे या गठबंधन की जरूरत नहीं है। कांग्रेस सोचे कि वह इन चुनावों के बाद कहां खड़ी होगी ।

Saturday, January 28, 2012

संकट में है कोवलम के समुंद्र तट


अंबरीश कुमार
देवताओं के अपने देश यानी केरल का समूचे विश्व में मशहूर कोवलम समुंद्र तट खतरे में है। गोवा समेत यह देश के सबसे खूबसूरत समुंद्र तटों में से एक है जहां पर साल भर सैलानियों का जमावड़ा लगा रहता है । जैसा सभी समुंद्र तटों का इतिहास है यह भी मछुवारों का गांव रहा जो अब आलिशान रिसार्ट ,होटलों और रेस्तराओं की भीड़ में में बदल चुका है। बाजार इस समुंद्र तट को लील रहा है । प्रकृत के इस अनोखे समुंद्र तट पर अब समुंद्र की हदबंदी कर दी गई ।बगल के राज्य तमिलनाडु में समुंद्र तट के नियम कायदे काफी कड़े है और कोई भी निर्माण पांच सौ मीटर के भीतर नहीं हो सकता जिसका उदाहरण चेन्नई के मैरिना समुंद्र तट से लेकर महाबलीपुरम तक में देखा जा सकता है। पर केरल की ताकतवर होटल लाबी ने अपने राज्य में इन नियम कायदों को ताक पर रखकर निर्माण कर डाला है । केरल का पर्यटन विभाग का नारा है देवताओं का अपना देश । पर देवताओं के इस देश में सबसे मशहूर समुंद्र तट का समुंद्री पर्यावरण संकट में है और इसके चलते कभी भी कोई बड़ा हादसा भी हो सकता है ।
केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में कई समुंद्री तट हैं जिनमें से एक कोवलम तट हैं। रेतीले तटों पर लहराते नारियल के पेड़ों को देखकर ऐसा लगता है मनो आप कोई पिक्चर पोस्ट कार्ड देख रहे हों । यहाँ लहराता समुंद्र है ,नारियल के घने जंगल है तो हरे भरे जंगलों के बीच बैक वाटर और ख़ूबसूरत लैगून भी हैं। कोवलम बीच के पास तीन और तट भी हैं जिनमें से दक्षिणतम छोर पर स्थित लाइट हाउस बीच सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस समुंद्र तट पर अब समुंद्र की जगह कम होती जा रही है और होटल ,रेस्तरां बढ़ते जा रहे है । विदेशी सैलानी इस तट पर सबसे ज्यादा नजर आएंगे क्योकि यही पर सूरज की किरणों के बदलते कोणों के साथ ही पानी रंग बदलता नजर आता है ।समुंद्र तट पर आते ही बाई तरफ नारियल से घिरी पहाड़ियों पर पुराना लाइट हाउस है जिसकी रौशनी शाम ढलते ही घुमने लगती है। रात में अरब सागर की स्याह लहरों पर जब इस लाइट हाउस की रौशनी पड़ती है तो लगता है कोई जहाज दिशा पहचान कर इधर ही आ रहा है । शाम को सूर्यास्त का अद्भुत नजारा इन सुंदरा तटों पर दिखता है। और शाम के बाद तट पर फैलता बाजार आबाद हो जाता है। अरब सागर की ओर खुले इन रिसार्ट ,होटल और रेस्तरां में सीजन के समय शाम से ही सीटे भर जाती है जिनमे विदेशियों की भी बड़ी संख्या होती है। दिन में लाइन से लगी छतरियों के नीचे ये विदेशी बिकनी में धूप सेकते नजर आते है तो सत्तर -अस्सी दशक का गोवा का कलंगूट याद आ जाता है जो हिप्पियों के चलते इस कदर बदनाम हुआ कि वहां अपसंस्कृति से बचने के लिए नग्न होने पर रोक लगा दी गई और आज भी वहा इस तरह के बोर्ड नजर आते है। कोवलम के समुंद्र तटों पर भी कुछ हद तक विदेशियों का यह असर महसूस किया जा सकता है जो विदेशों में तो आम है पर दक्षिण भारत के इस अंचल में लोगों को अटपटा लगता है । पर्यटन को केरल सरकार काफी बढ़ावा देती है तो उसे इस दिशा में भी सोचना चाहिए ताकि परिवार के साथ जाने वालों को किसी अप्रिय स्थिति का सामना न करना पड़े ।
बंगाल से आए उज्जवल चटर्जी ने कहा - पर्यटन विभाग को यह सोचना चाहिए कि यह जगह गोवा से कुछ अलग है ,यहां तीर्थ यात्रा वाले पर्यटक भी बड़ी संख्या में आते है जो कन्याकुमारी जाते है ,पद्मनाभम स्वामी के मंदिर में दर्शन करने आते है । जबकि गोवा का पर्यटक पूरी तरह मौज मस्ती के लिए जाता है इस वजह से इन समुन्द्र तटों पर लोग एक सीमा तक ही बेपर्दा हो यह जरुर ध्यान रखना चाहिए ।
दरअसल केरल के इन समुंद्री तटों पर देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले ज्यादातर पर्यटक धार्मिक रुझान वाले होते है क्योकि वे मदुरै ,रामेश्वरम,सबरीमाला ,कन्याकुमारी जैसी जगहों से यहाँ पहुँचते है जो तिरुअनंतपुरम से तीन चार सौ किलोमीटर के दायरेमें है । इन पर्यटकों में उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश ,बंगाल ,और गुजरात के ज्यादातर पर्यटक होते है। कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की वजह से बंगाली पर्यटक बड़ी संख्या में आते है और कन्याकुमारी के बाद उन्हें सबसे करीब लगभग अस्सी किलोमीटर पर तिरुअनंतपुरम आना ज्यादा सुविधाजनक लगता है।
इस शहर का इतिहास भी काफी रोचक है । अनंतवरम तिरुअनंतपुरम का प्राचीन पौराणिक नाम है जिसका उल्लेख ब्रह्मांडपुराण और महाभारत में मिलता है। 18वीं शताब्दी में त्रावनकोर के महाराजा ने जब इसे अपनी राजधानी बनाया तभी से तिरुअनंतपुरम का महत्त्व बढ़ा। यहाँ के लोगों के मुताबिक 1994-95 के दौरान भारी मात्रा में स्वर्ण आयात होने के कारण तिरुअनंतपुरम 'स्वर्णिम द्वार' कहा गया है। इस शहर का नाम शेषनाग अनंत के नाम पर पड़ा जिनके ऊपर पद्मनाभस्वामी (भगवान विष्णु) विश्राम करते हैं। तिरुवनंतपुरम, एक प्राचीन नगर है जिसका इतिहास 1000 ईसा पूर्व से शुरू होता है। पद्मनाभस्वामी मंदिर की वजह से यहाँ भारी संख्या में तीर्थ यात्री पहुँचते है । इसके बाद कुछ अन्य पर्यटन स्थलों को छोड़कर ज्यादातर सैलानी कोवलम समुंद्र तट का रुख करते है जो शहर से सोलह किलोमीटर की दूरी पर है । उससे पहले करीब आठ किलोमीटर पर शंखमुघम समुंद्र तट पड़ता है जहाँ सैलानी इकठ्ठा होते है पर यहां अरब सागर की सीधी लहरें काफी खतरनाक नजर आती है और यह समुंद्र तट नहाने के लिहाज से सुरक्षित नहीं है । इसलिए सैलानियों को कोवलम का समुंद्र तट ज्यादा भाता है ।
कोवलम के रास्ते में परशुराम का मंदिर पड़ता है जो काफी प्राचीन है । कहा जाता है कि परशुराम के फरसे की वजह से ह केरल बना जो उन्होंने एक बार क्रोधित होकर फेंका था और समुंद्र पीछे हट गया तभी केरल का आकर फरसे की तरह माना जाता है ।पर यह सब धार्मिक किवदंतियां है । बहर्हार इस मंदिर के कुछ ही आगे बढ़ने पर नारियल के पेड़ों से घिरे बैक वाटर का भी नजारा दिख जाता है । बैक वाटर में नाव से घुमाने वाले बहुत से निजी आपरेटर है जो सौ रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से घंटे भर सैर कराते है । इस सैर में प्राकृतिक दृश्य देखते बनता है । हरियाली ऎसी की आंखे बंद होने का नाम न ले । नारियल के घने जंगलों में सुपारी के लंबे दरख्त और बीच बीच में केलों के बगीचे का हरापन काफी लुभाता है । शाम से कुछ पहले कोवलम के लाइट हाउस बीच पर पहुंचे तो दहकता हुआ सूरज नीचे आने की तैयारी कर रहा था । लाइट हाउस के पास ही तक वहां जाता है कि उसके आगे वहां का रास्ता नहीं है और कुली सामान लेकर रिसार्ट तक पहुंचाता है । इसी से पता चल जाता है कि इस तट पर बने रिसार्ट और होटल बाद के निर्माण है । इस समुंद्र तट पर पहले जो भी रेस्तरां झोपड़ी के रूप में थे वे अब पक्के निर्माण में बदल चुके है । केरल सरकार के एक वरिष्ठ अफसर ने नाम न देने की शर्त पर कहा -कोवलम के लाइट हाउस समुन्द्र तट पर जो पैदल पक्का रास्ता बनवाया गया है उसके चलते अतिक्रमण रुक गया है क्योकि कोई भी इस रास्ते को पर कर समुंद्र तट पर नहीं जा सकता वर्ना कई निर्माण तो लहरों के किनारे हो जाता । उन्होंने भी माना कि इस समुन्द्र तट पर बहुत ज्यादा अतिक्रमण कुछ सालों में हुआ है जो तटीय नियम कायदों का सीधा उलंघन है ।तमिलनाडु के सामाजिक कर्यकर्ता प्रदीप कुमार ने कहा - तमिलनाडु के मुकाबले केरल में तटीय नियम कानून का जमकर उलंघन किया जा रहा है जिसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण कोवलम के समुंद्र तट है जहाँ पचास मीटर की दूरी पर निर्माण मिल जाएगा । दूसरी तरफ तमिलनाडु में चाहे मैरिना बीच हो या कोई अन्य बीच सभी जगह पांच सौ मीटर तक किसी भी तरह का निर्माण न करने का नियम कड़ाई से लागू है । केरल में जो हो रहा है वह खतरनाक भी है सौ मीटर पर बने होटल और रिसार्ट खतरनाक है । कभी भी कोई सुनामी आई तो बड़े पैमाने पर जान माल का नुकसान हो सकता है ।
कोवलम में रात होते ही तट पर माहौल रंगीन हो जाता है । तट सी लगी हुई सड़क रौशनी में डूब जाती है तो समुन्द्र की तरफ खुले हुए रेस्तरां आबाद हो जाते है ।हर रेस्तरां के सामने समुंद्री जीवों का छोटा सा बाजार खुल जाता है जिसमे तरह तरह की मछलियाँ ,झींगे ,केकड़े ,लोबस्टर आदि होते है जिन्हें देखकर सैलानी अपना आर्डर देते है । यह विदेशों में तो लोकप्रिय है ही अब देश में भी शुरू हो गया है । हर रेस्तरां में अंग्रेजी संगीत के साथ मदिरा का दौर शुरू हो जाता है जिसके चलते कई पर्यटक ग्लास लेकर समुंद्री लहरों के सामने ही बैठ जातें है । नौजवानों का समूह ऐसे में रेत पर ही अपनी महफ़िल सजा लेता है। कोवलम क इस तट पर काफी देर तक सैलानी जमे रहते है ।
२९ जनवरी २०१२ को जनसत्ता में प्रकाशित लेख
फोटो -अंबर कुमार

Tuesday, November 1, 2011

सच्चर ब्रह्मास्त्र के चुनावी खेल में फच्चर की आशंका

अंबरीश कुमार
लखनऊ , नवंबर । मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने के लिए कांग्रेस जिस सच्चर कमेटी की सिफारिशों को चुनावी ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है उसमे फच्चर लग सकता है । सारा खेल मुसलमानों के वोट को लेकर है जिसकी बड़ी दावेदार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी है । केंद्रीय कानून और अल्पसंख्यक मामलों के मानती सलमान खुर्शीद ने कल लखनऊ में सच्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को नौकरियों में छह फीसद आरक्षण की बात कह कर राजनीति में हलचल मचा दी थी । समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने आज साफ़ कहा -सच्चर कमेटी की सिफारिशें ज्यों की त्यों लागू की जाए।
कांग्रेस के इस खेल से धर्मनिरपेक्ष तकते सतर्क हो गई है। राजनैतिक दल इसे कांग्रेस का चुनावी हथकंडा मान रहे है । भाकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा -कांग्रेस अपनी फटी चादर में इस तरह के पैबंद लगा क़र चुनावी वैतरणी पर करना चाहती पर यह संभव नहीं है । सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने में जो देरी हो रही है उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है । जो हर काम चुनावी फायदे के लिहाज से करती है । सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशो को लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न राजनैतिक दल लगातार मांग करते रहे है पर कोई पहल होती नजर नहीं आई । समाजवादी पार्टी से लेकर बसपा ,वाम दल ,पीस पार्टी और जन संघर्ष मोर्चा आदि इसे जल्द से जल्द लागू करने की बात कहते रहे है ।पर अब तक इसे लागू करने के आसार नजर नही आ रहे थे । पर सोमवार को सलमान खुर्शीद ने दो महीने के भीतर पिछड़े मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण का एलान कर उन सभी दलों को झटका दिया जिनका मुस्लिम जनाधार है ।
वैसे भी राजनैतिक विश्लेषक मान रहे है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव में एक के बाद एक राजनैतिक हथियारों का इस्तेमाल कर माहौल अपने पक्ष में करने का प्रयास करेगी । जिसकी शुरुआत मुस्लिम आरक्षण से हो सकती है । बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी इसकी मांग कर चुकी है ।
उत्तर प्रदेश में विधान सभा की करीब बीस फीसद सीटें मुस्लिम बहुल है जिसकी वजह से वे एक बड़ी राजनैतिक ताकत भी है ।यह बात अलग है कि उनकी पहचान एक वोट बैंक के रूप में ज्यादा रही और उनके विकास के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुई ।
इसी मुद्दे को राजनैतिक दल कांग्रेस के खिलाफ एक औजार की तरह इस्तेमाल करते रहे है। कांग्रेस अब सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कर राजनैतिक लाभ लेना चाहती है पर विपक्षी दल इन सिफारिशों को ज्यों का त्यों लागू करने की मांग कर कांग्रेस की घेरेबंदी भी कर रहे है । समाजवादी पार्टी के मुस्लिम चेहरे के रूप में मशहूर आजम खान ने कहा -छह फीसद आरक्षण की बात कर कांग्रेस ने मुसलमानों को जलील किया है ,इसके लिए पार्टी को माफ़ी मांगनी चाहिए । आजम खान कके तेवर से साफ़ है कि मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा अब गरमा सकता है । कांग्रेस के लिए भी यह राजनैतिक चुनौती के रूपमे सामने आ सकता है क्योकि आरक्षण का सवाल काफी संवेदनशील मुद्दा माना जाता रहा है ।jansatta

Monday, October 31, 2011

गागा को तालियां,किसानो को गालियां



अंबरीश कुमार
लखनऊ । पिछले चौबीस घंटे में गोरखपुर में जापानी बुखार से तीन बच्चों की मौत के साथ ही इस वर्ष गोरखपुर में इस बीमारी से मरने वालों की संख्या पांच सौ तक पहुँच गई । पूर्वांचल में जापानी बुखार और जल जनित बीमारियों से हर साल की तरह इस बार भी मौत का सिलसिला जारी है । इसकी मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकार की बेरुखी और स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर पर्याप्त पैसा न दिया जाना है । दूसरी तरफ ग्रेटर नोयडा में फार्मूला -१ रेस के लिए अरबो रुपए फूंक दिए गए और दलितों की सबसे बड़ी नेता और देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री मायावती भी इसमे शामिल हुई । बाद में लेडी गागा का कार्यक्रम हुआ । शैम्पेन ,शराब और शबाब का दौर चला और लोग भूल गए कि यह वाही राज्य है जहाँ कुछ घंटे पहले ही करछना में किसानो पर लाठी गोली चली और गालियों से नवाजा गया । यह वही राज्य है जिसके एक छोर पर बच्चों की मौत का सिलसिला इसलिए नहीं थम पा रहा है क्योकि उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं है । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस विरोधाभास पर कहा -यह चिंतनहीन राजनीति की अय्यासी का अय्यासी का दौर है जो मध्यकाल के सुल्तानों को भी मात कर रहा है । समाजवादी पार्टी ने इसे दलितों के नाम पर क्रूर मजाक बताया और एलान किया कि सत्ता में आने पर इसकी जाँच करई जाएगी।
दरअसल इस खेल में जिस तरह सत्तारूढ़ दल ने दिलचस्पी दिखाई है उससे राजनैतिक हलकों में हैरानी जताई जा रही है । भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा -यह वोट की राजनीति और भ्रष्टाचार की काली कमाई का नतीजा है । इस सरकार को समाज का यथार्थ नहीं दिखता,गरीबी और भुखमरी नहीं दिखती । यह बात कभी हदतक सही भी नजर नजर आती है । पूर्वांचल में जिस तरह स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बच्चे मर रहे है उसे देखते हुए ग्रेटर नोयडा का कार्यक्रम किसी के गले के नीचे नहीं उतरपा रहा है । इस आभिजात्य वर्गीय खेल को लेकर प्रदेश का जेपी समूह भी फिर विपक्ष के निशाने पर आ गया है। विपक्ष का आरोप है कि एक तरफ यह समूह किसान की जमीन छीनकर सरकार के जरिए निहत्थे किसानो पर लाठी गोली चलवाता है तो दूसरी तरफ गरीबों का मजाक उड़ाते हुए पैसे का भौंडा प्रदर्शन इस तरह के खेल के नाम पर करता है ।फार्मूलावन रेस की तैयारी के साथ शनिवार को करछना (इलाहाबाद) में प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए जमीन लिए जाने का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस ने जमकर लाठियां चलाई और फायरिंग भी की। महिलाओं और बच्चों पर भी जुल्म ढाये गए। क्षेत्र के आठ गांव इस योजना से प्रभावित होने जा रहे है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - कल फार्मूला-1 सत्र की 17वीं और भारत की पहली रेस सिनेसितारों और पाप सिंगर लेडी गागा की उपस्थिति में सम्पन्न हुई और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी रेस की दर्शकों में रहीं। उनके द्वारा पुरस्कार भी बांटे गए। इस रेस के आयोजन पर 20 अरब रूपए से ज्यादा खर्च हुए हैं। रेस खत्म होने पर शराब और शबाब का खुलकर प्रदर्शन हुआ। भारत में, जहां 80 प्रतिशत आबादी आज भी 20 रूपए रोज पर गुजर-बसर करती है, दो जून पेट भरने लायक जिसकी कमाई नहीं, उस देश-प्रदेश मे राजसी खेल का आयोजन शमशान में शाही दावत के इंतजाम जैसा है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश की मुख्यमंत्री की दौलतमंदों के खेल में दिलचस्पी दलितों के साथ क्रूर मजाक है। झुग्गी-झोपड़ी में बीमारी, तंगहाली और कर्ज के शिकार दलितों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेंमाल करनेवाली मुख्यमंत्री ने बड़े पूंजीघरानों से दोस्ती के लिए ही इस खेल में सक्रिय दिलचस्पी ली है। इसमें उनकी ओर से भी लम्बी रकम का पूंजीनिवेश किया गया है। उनके इस खेल प्रेम की बलि चढ़े है ग्रेटर नोएडा के वे किसान जिनकी 875 एकड़ जमीन जबरन छीनकर फार्मूला वन रेस की सर्किट तैयार की गई है। इन गांवों के बुजुर्ग हतप्रभ थे कि ये क्या हो रहा है, यह कोई खेल है या अमीरो की चोंचलेबाजी। उनसे जबरन छीनी जमीन पर विदेशी कारों का फर्राटा और साथ में नशे में झूमती युवतियां। jansatta

सौ चिठ्ठियों के जवाब में एक ख़त

अंबरीश कुमार
लखनऊ । उतर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रधानमंत्री के नाम लिखे सौ से ज्यादा पत्रों के जवाब में कांग्रेस के एक पत्र ने सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाल दिया है । यह सौ सुनार की बनाम एक लुहार की वाली कहावत को चरितार्थ भी करता है । इस पत्र के साथ ही विधान सभा चुनाव की तैयारी में जोर शोर से जुटी कांग्रेस मायावती को बचाव की मुद्रा में लाती दिख रही है ।सत्ता में आने के बाद मायावती ने अबतक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को करीब सौ पत्र लिख चुकी है पर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के पत्र ने मायावती की राजनैतिक घेरेबंदी कर दी है। जयराम रमेश का यह पत्र राजनैतिक मकसद में कामयाब होता नजर आ रहा है। किसी भी प्रदेश में किसी घोटाले की सीबीआई जांच सत्तारूढ़ दल के लिए परेशानी का सबब बन जाती फिर जब मामला उत्तर प्रदेश का हो जहां सभी दल चुनावी तैयारी में जुटे हों तो उसके राजनीति मायने भी होते है।उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ,सांसदों और मंत्रियों से जुड़े कई मामले जांच के घेरे में है जिनमे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम का बड़ा घोटाला भी है जिसमे एक हिस्ट्रीशीटर सांसद,दो दागी मंत्री के साथ कई और नेता भी घेरे में है। पर मनरेगा का घोटाला विधान सभा चुनाव के मद्देनजर ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि इसका दायरा काफी बड़ा है और इसका राजनैतिक असर भी ज्यादा पड़ेगा ।
इस समय करीब दर्जन भर जिलों से मनरेगा को लेकर गंभीर शिकायते सामने आई है और चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी लूट का मुद्दा कांग्रेस जोर शोर से उठाएगी । यही सवाल सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाले हुए है जिसका जनाधार राजनीति के अपराधीकरण के साथ राजनैतिक लूट और वसूली के चलते खिसक रहा है । मायावती वर्ष २००७ में जब २०६ सीटों के साथ सत्ता में आई थी तो बसपा को ३०.४३ फिसद वोट मिला था पर उसके बाद कांग्रेस ने बढ़त ली और २००९ के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक तीन फीसद गिरकर २७.४२ फीसद पर पहुँच गया था। विधान सभा की सीटों में इसे तब्दील करने पर लोकसभा चुनाव में बसपा अपनी आधी क्षमता पर पहुँच चुकी थी । ऐसे में बसपा का संकट बढ़ सकता है। अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जो कांग्रेस पहले पशोपेश में थी अब आगे बढ़ कर सत्तारूढ़ दल पर हमला कर रही है। यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा भी है । कांग्रेस की मीडिया कमेटी के प्रभारी राजबब्बर ने कहा -पहले की तुलना में कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव आया है ,अब कांग्रेस चुनावी संघर्ष में आ चुकी है । लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जिस तरह लोगों को चौकाया था वैसे ही नतीजे विधान सभा चुनाव के होंगे। सरकारी लूट खसोट और राजनैतिक गुंडागर्दी के खिलाफ कांग्रेस गांव गांव तक लोगों को लामबंद करेगी । यह सवाल उठाएगी कि गैर कांग्रेसी दलों ने इस प्रदेश को किस जगह पहुंचा दिया है ।
फिलहाल मुद्दा मायावती और केंद्र के बीच चिठ्ठी पटरी को लेकर शुरू हुए विवाद का है। मायावती अबतक अपने राजनैतिक एजंडा को लेकर पत्र भेजती रही है। चाहे उत्तर प्रदेश के बंटवारे का मामला हो या फिर बुंदेलखंड पॅकेज का मामला या फिर विभिन्न समुदायों के आरक्षण का मुद्दा हो इनका मकसद कांग्रेस की राजनैतिक घेरेबंदी ज्यादा रहा है। आज मायावती मीडिया को लेकर जो आरोप जयराम रमेश पर लगा रही है वे खुद यह करती रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राजबब्बर ने कहा - मीडिया को तो मायावती पहले पत्र देती है फिर प्रधानमंत्री को भेजती है । मायावती ने जब भी प्रधानमंत्री को ख़त लिखा मीडिया को जानकारी दी गई और आमतौर पर प्रेस कांफ्रेंस कर यह जानकारी दी जाती रही है । आज वे इस तरह का आरोप लगा रही यह उन्हें शोभा नहीं देता ।
जाहिर है अब कांग्रेस मायावती के राजनैतिक हथियारों से ही मुकाबला कर रही है। जयराम रमेश के पत्र के बाद जिस तरह उत्तर प्रदेश सरकार में बैठको का सिलसिला चला और मनरेगा को लेकर विभिन्न जिलों से जानकारिय जुटाई गई वह सरकार की बेचैनी को दर्शाता है । सरकार यह भी नहीं चाहती कि इस घोटाले को लेकर सीबीआई जांच तक मामला पहुंचे वर्ना सत्तारूढ़ दल की मुश्किलें बढ़ सकती है इसलिए मायावती जयराम रमेश के पत्र के बावजूद केंद्र से कोई टकराव लेने के मूड में नहीं है । जिसका राजनैतिक फायदा कांग्रेस को मिलता नजर आ रहा है । जनसत्ता

Thursday, October 20, 2011

कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है अन्ना आंदोलन


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश के कई जन संगठन आगामी विधान सभा चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों को हराओ का की अपील करेंगे। उत्तर प्रदेश केविधन सभा चुनावों में बड़े पैमाने पर बाहुबली और दागी उम्मीदवार खड़े होने वाले है । जिसके चलते अगर बड़े स्तर पर बाहुबली और दागी नेताओं के खिलाफ माहौल बना तो राजनीति का काफी कचरा साफ़ हो जाएगा । इन जन संगठनों का यह भी मानना है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का जिस तरह राजनैतिक रूप ले रहा है उससे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हराओं के नारे का अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा जैसे दलों को होगा इसलिए चुनाव सुधार की मूल अवधारणा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रखने के लिए बिना किसी दल के साथ या विरोध में खड़े हुए समाज को जागरूक करना होगा। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े कई जन संगठन और नेताओं ने टीम अन्ना की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि जब भी जन संगठन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे तो वे हाशिए पर चले गए। उसके लिए अलग राजनैतिक ओउजार बनाना चाहिए । भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत लाखो की रैली करते थे पर राजनीति में आए तो कोई चुनाव नहीं जीता पाए ।कर्णाटक में रैय्यत संघ और महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन उदाहरण है। इसलिए टीम अन्ना को कोर कमेटी की बैठक बुलाकर इस पर अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए। हिसार में राजनैतिक दखल के चलते ही एकता परिषद के पीवी राजगोपाल और जल बिरादरी के राजेंद्र सिंह अलग हो चुके है और कई लोग विरोध जता चुके है। वाराणसी के सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज ने चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों के खिलाफ अभियान छेड़ने साथ टीम अन्ना से कहा है कि वह भी कोर कमेटी में यह मुद्दा उठाकर चुनाव सुधर के अपने वायदे पार आगे बड़े और किसी एक दल का समर्थन या विरोध न करे ।
गौरतलब है कि राजनैतिक दखल को लेकर टीम अन्ना और उनके समर्थकों में भी मतभेद सामने आ चुके है । हालाँकि टीम अन्ना के कोर कमेटी के एक सदस्य सुनीलम ने कहा - चुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील का वे ही लोग विरोध कर रहे है जो या तो कांग्रेस के समर्थक है या सरकार की कमेटियों में बैठे है या फिर कोई लाभ ले रहे है। जबकि आंदोलन के दूसरे सहयोगी संदीप पांडेय ने कहा- जन संगठनों और जन आंदोलनों के तौर तरीको से उलट अन्ना आंदोलन अब कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है।लोकतांत्रिक तरीके से कोई फैसला नहीं हो रह़ा । कुछ लोग फैसले करते है तो उसकी जानकारी नहीं मिलती। फिर हिसार में कांग्रेस हराने का फैसला कोर कमेटी का का नहीं था । ऐसी ही कुछ मुद्दों को लेकर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय के राष्ट्रीय समन्वय यानी एनएपीएम ने अन्ना के आंदोलन को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया है । बेहतर तो यह हो कि उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चलते हुए दागी और बाहुबली उम्मीदवारों को हराने की अपील की जाए ।
इसी तरह गांधीवादी नेता और सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज भी हताश नजर आए।वे भी एक पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ने के पक्ष में नहीं है बल्कि चुनाव सुधारों का एजंडा लागू करने के समर्थक है । राम धीरज ने कहा - जो लोग भी जन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे वे हाशिये पर चले गए और एक सीट नही जीत पाए। चाहे लाखों की रैली करने वाले महेंद्र सिंह टिकैत हो या शेतकरी संगठन के शरद जोशी या फिर बकर्णाटक में रैय्यत संघ के नंजदुंग स्वामी ।ऐसे में आंदोलन को राजनैतिक दखल से पहले विचार विमर्श करना चाहिए था । इस मुद्दे पर एकता परिषद जैसा बड़ा जन संगठन अलग हो गया ,राजेंद्र सिंह की जल बिरादरी अलग हो गई। उसके बाद उत्तर प्रदेश में भी वही नारा दिया जा रहा है । राजनीति करनी है तो जन उम्मीदवार उतारे । पिछली बार लखनऊ में जन आंदोलनों के जन उम्मीदवार को लोकसभा में ४२१ वोट मिले थे। क्या यही हश्र अन्ना आंदोलन के को इतने बड़े आंदोलन का करना चाहते है ।
संघर्ष वाहिनी मंच के राजीव ने कहा -हम लोग तो शुरू से बाहुबलियों को हराने की अपील करते रहे है और फिर करेंगे । पर कांग्रेस पर दबाव बहुत जरुरी है क्योकि यह पार्टी बहुत शातिर पार्टी है और लोकपाल बिल लाएगी इस पर हमें संदेह है ।
ऎसी ही राय कई अन्य जन संगठनों के लोगो की थी । दरअसल कोई भी आंदोलन कई दशक बाद खड़ा होता है पर कुछ समय तक उसका असर समाज पर बना रहता है। जेपी आंदोलन से वीपी सिंह का आंदोलन उदाहरण है । कई दशक बाद अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते देश का मध्य वर्ग बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरा था ,यह टीम अन्ना का बड़ा योगदान है पर आंदोलन की दृष्टि , विचारधारा और ठोस कार्यक्रम के अभाव में इसी मध्य वर्ग का मोहभंग होने लगा है। जन संगठनों का मानना है कि जिस देश के अस्सी फीसद गांवों और छोटे शहरों में बिजली न आती हो उस देश में सिर्फ सोशल नेट वर्किंग ,फेस बुक ,ई मेल और एसएमएस व अन्य संचार साधनों से बड़े आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते है। इसके लिए प्रतिबद्ध जमीनी कार्यकर्ताओं की कतार तैयार करना जरुरी है ।
अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी के प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास ने जनसत्ता से कहा -अन्ना आंदोलन के दौरान देश का एक बड़ा तबका सड़क पर आया था ।पर उसके बाद जिस तरह के सवाल खड़े हुए उसका असर यकीनन जन मानस पर पड़ेगा।पर हम नए सिरे से प्रयास कर रहे है । जबकि मनीष सिसोदिया ने कहा-अन्ना का आंदोलन किसी राजनैतिक दल के खिलाफ नही है । कांग्रेस के खिलाफ जन दबाव इसलिए बनाया जा रहा है क्योकि वह केंद्र की सत्ता में है । यह बिल भाजपा , बसपा या समाजवादी दल अपने बूते पास नहीं करा सकते है । इसी वजह से हम कांग्रेस पर ज्यादा दबाव बना रहे है । उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में प्रदेश सरकार पर जो आरोप लग रहे है उससे टीम भी पूरी तरह सहमत है । हमने बांदा में भ्रष्टाचार का जो मुद्दा उठाया वह प्रदेश सरकार से ही जुड़ा हुआ था । आगे भी हम राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे । हमारा मानना है कि बसपा ,सपा ,कांग्रेस और भाजपा सभी में भ्रष्ट लोग मौजूद है इसलिए किसी एक दल को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता ।
जनसत्ता

Wednesday, October 19, 2011

हजारे के आंदोलन से दूर जा रहे है जन संगठन

अंबरीश कुमार
लखनऊ 19,अक्तूबर। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन संगठनों और आमजन का मोहभंग होता नजर आ रहा है । टीम अन्ना के वैचारिक भटकाव और बिखराव के चलते अब उसे वह समर्थन नहीं मिल रहा जो अगस्त में मिला था।इसका अहसास उत्तर प्रदेश के दौरे पर निकली टीम अन्ना के सदस्यों को भी होने लगा है। अगस्त में अन्ना के अनशन के दौरान जो लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे थे उनके लिए सैलाब और जन सैलाब जैसे विशेषण का इस्तेमाल किया गया था पर पिछले दो दिन में उत्तर प्रदेश में पश्चिम से पूरब तक का दौरा करने वाली टीम अन्ना की सभाओं में कही पांच सौ लोग आए तो कही हजार। यह अगस्त क्रांति का दूसरा पहलू है।बांदा,कानपुर,लखनऊ ,फैजाबाद से लेकर गोरखपुर टीम अन्ना ने दौरा किया और कांग्रेस विरोध की मजबूरी भी बताई साथ ही सपा ,बसपा और भाजपा पर भी निशाना साध कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि वे किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं खड़े है। अन्ना समर्थको का नया नारा है -न हाथ न हाथी ,हम है अन्ना के साथी । न साइकिल न कमल ,हम करेंगे अन्ना पर अमल । पर हिसार में जो गलती टीम अन्ना ने की उसका खामियाजा सामने आने लगा है । मंगलवार को जिस झूलेलाल पार्क में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का कार्यक्रम हुआ वह लखनऊ विश्विद्यालय समेत तीन बड़े और ऐतिहासिक कालेजों और दर्जन भर छात्रावासों से घिरा हुआ है । पर शाम छह बजे भी सारी कुर्सियां नहीं भर पाई थी । अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता मुन्ना लाल शुक्ल जो पिछली बार आमरण अनशन पर बैठे थे इस बार हताश थे । मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता से कहा - सौ बच्चों को तो मै हरदोई से लाया था पर फिर भी पांच सौ कुर्सियां नहीं भर पाई क्योकि हमारे नेता कई खेमे में बंट गए है। सौरभ ने तो एलान कर रखा था कि अगर सक्सेना के लोगों ने मंच पर जाने की कोशिश की तो हमारे लड़के उन्हें तोड़ डालेंगे ।वैसे भी वह गांधी की अहिंसा और मद्य निषेध आदि को फालतू मानता है,कहता है आजादी तो गरम दल वालों ने दिलवाई थी। यह बानगी है आंदोलन का संचालन करने वाले नेताओं की दृष्टि की।
अन्ना आंदोलन के एक नेता ने नाम न देने क शर्त पर कहा -अगस्त में जब अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ तो सभी विचारधाराओं के लोग उसमे शामिल हुए और बड़ी संख्या में जन संगठनों के कार्यकर्त्ता थे। पर जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ा आंदोलन में शामिल नेताओ का टकराव और वैचारिक संकट भी बढ़ा। पहली आपति आंदोलन के तौर तरीकों को लेकर हुई। आंदोलन और नेता को एक एकरांड बनाने के सवाल पर पहला मतभेद हुआ तो दूसरा विचारधारा को लेकर । वंदेमातरम के नारे से लेकर दक्षिणपंथी ताकतों से संबंधो पर अगर पहले सफाई दे दी जाती तो आंदोलन पर संघ का ठप्पा तो नहीं लगता। दूसरे चुनावी दखल से हर हालत में बचाना चाहिए था क्योकि यह लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की थी किसी दल को हराने की नहीं।jansatta