Thursday, September 30, 2010

और खिल उठे भगवा ब्रिगेड के चेहरे


अंबरीश कुमार
लखनऊ, ।अयोध्या विवाद के साठ साल बाद आए फैसले से हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को नई ऊर्जा मिल सकती है। अयोध्या से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक भगवा ब्रिगेड के चेहरे खिल उठे हैं। फैसले की खबर मिलते ही अयोध्या के कारसेवक पुरम में महंत नृत्य गोपाल दास साधू-संतों से निपट गए। तो दूसरी तरफ उमा भारती से लेकर कल्याण सिंह तक ने तहे दिल से अदालत का आभार जताया। भारतीय जनता पार्टी ने फैसले पर ख़ुशी जताते हुए आम जनता से संयम से काम लेने की अपील की । कल तक जो यह कहते थे की अयोध्या में विवादित स्थल में राम लला का जन्म हुआ था आज अदालत ने उसपर मोहर लगा दी। हालांकि वाम दल इस फैसले को सबको संतुष्ट करने वाला राजनैतिक फैसला मान रहे हैं। पर हिंदुत्ववादी ताकतें अब अगले कदम की तैयारी में जुट गयीं हैं। इन ताकतों के मुताबिक यह तो साफ़ हो गया कि अयोध्या में मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई थी और उसी जगह पर रामलला का जन्म हुआ था। अब अगला कदम राम मंदिर का होगा। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कहा- 'अयोध्या में रामलला का मंदिर आस्था और विश्वास का मुद्दा रहा है। हिन्दुओं का ये मानना रहा है कि रामलला का जन्म यहाँ हुआ था। आज अदालत ने भी इसे स्वीकार कर लिया है । अब अयोध्या में रामलला का मंदिर बनाने का रास्ता साफ़ हो गया है।
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा-अयोध्या विवाद पर आज के फैसले से हिन्दुत्ववादी ताकतों के हौसले बुलंद हो सकते हैं। वैसे भी यह फैसला सभी को संतुष्ट करने वाला फैसला प्रतीत होता होता है। दूसरी तरफ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने कहा है कि अयोध्या विवाद का संतोषजनक हल देने में इलाहाबाद हाईकोर्ट असफल साबित हुआ है।
भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में कहा कि यह फैसला स्थापित कानूनी मान्यताओं के परे जाकर राजनैतिक नज़र आता है। उन्होंने कहा कि असंतुष्ट पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय में जाने का पूरा अधिकार है और देश को धैर्य और संयम के साथ अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने अयोध्या मामले में उच्च न्यायालय इलाहाबाद की विशेष पीठ के फैसले का स्वागत किया है। शाही ने कहा-हाईकोर्ट का फैसला आनन्द का विषय है साथ ही इस निर्णय से अयोध्या में रामलला के भब्य मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। शाही ने आग्रह करते हुये कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किये जाने को जय पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शाही ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्णय ने वर्षो से चली आ रही मान्यता की पुष्टि की है कि अयोध्या में जहां पर रामलला विराजमान हैं वही पर उनका जन्मस्थान है। उन्होंने कहा कि आज का निर्णय अयोध्या में भब्य राम मन्दिर बनाने की दिशा में निर्णायक कदम होगा मैं इसका स्वागत करता
हूँ। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने कहा कि आज का दिन एतिहासिक है क्योंकि अयोध्या मामले में बहुप्रतिक्षित मुकदमें का हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में विवादित भूमि को लेकर विवाद होते रहे हैं तरह-तरह की बातें कहीं जाती रही हैं लेकिन आज के निर्णय में तीनों ही माननीय न्यायाधीशों ने यह माना कि विवादित स्थल ही रामजन्म स्थल है। मिश्र ने कहा कि न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही विवादित स्थल को रामजन्म स्थल माना। उन्होंने कहा कि हम न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हैं एवं समाज के सभी धर्म-पंथ के लोगों से अपील करते हैं कि वे मन्दिर निर्माण के लिए आगे आएं।

अयोध्या में न्याय की षष्टिपूर्ति

आलोक तोमर
अयोध्या कांड में न्याय ने मामले की षष्ठिपूर्ति कर दी और इस अवसर पर काफी संशय दूर कर दी। यह जरूर है कि खुद उच्च न्यायालय को मालूम था कि अपील की जाएगी और इसके लिए तीन महीने का समय दे दिया गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा हालांकि समय सीमा पूरी हो जाने के कारण खारिज किया गया मगर वैसे भी कानूनन इसे पात्र नहीं माना जा रहा था। विस्तार मे फैसला आप अखबार और टीवी पर पढ़ चुके हैं और राम या अल्लाह में से जिसमें आपकी आस्था हो, उससे दुआ कीजिए कि न्याय का यह अवसर षष्टिपूर्ति के बाद शतायु होने के मौके तक नहीं पहुंचे।
पूरा देश दम साध कर इंतजार कर रहा था और फैसला कुल मिलाकर इस विवादित जमीन को राम जन्मभूमि मानने वालों के पक्ष में गया है। दो तिहाई जमीन निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि न्यास को दी गयी है और बाहर की एक तिहाई जमीन मस्जिद के पक्षधरों को। फैसला जाहिर है कि अभी आखिरी नहीं है लेकिन बहुत वर्षों बाद न्यायपालिका की निर्णायकता पर फिर से मुहर लग गयी है। जो लगभग अज्ञात लोग सुलह की बात कर रहे थे और जिन्हें अदालत ने फटकार कर बाहर कर दिया, वे भी इससे बेहतर फैसला शायद नहीं ला सकते थे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राम जन्म भूमि का वाकई राम जन्म भूमि होना भी कानूनी रूप से पहली बार प्रमाणित किया गया और भगवान राम को राम चबूतरे का मालिक बनाया गया। उम्मीद है कि सदभाव का जो माहौल दिखाई दे रहा है इसमें फैसला सामाजिक रूप से मंजूर किया जाएगा और देश अपनी उर्जा ढंग के काम में लगाएगा।
न्यायपालिका अयोध्या को लेकर हमेशा असमंजस और आपराधिक संशय में रही है। मामले शुरू हुए और पहली याचिका डालने वाले गोपाल चंद्र विशारद और दूसरे पक्ष के सारे पांच लोग अब दुनिया में नहीं हैं। फैजाबाद अदालत ने तो 1989 में ही कह दिया था कि इस मुद्दे पर सब कुछ कानून के दायरे में नहीं आ सकता, कुछ जनविश्वास औऱ आस्था पर भी छोड़ना पड़ेगा।
ऐसा भी कई बार हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय को इस विवाद का अधिकार क्षेत्र और कानूनी आधार निर्धारित करने के लिए खासतौर पर कहा औऱ एकबार तो आज से बीस साल पहले मामला अपने हाथ में ले लेने के संकेत भी दिए। कुछ तो वजह रही होगी कि उच्च न्यायालय ने अपवाद स्वरूप ही सही, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को मानने से इंकार कर दिया। मुद्दा ही ऐसा था कि बहस बढ़ी तो बवाल हुआ।
सवाल सबसे बड़ा ये था कि पहली याचिका करने वाले और उसका जवाब देने वाले सारे मर गये। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने राम मंदिर में हस्तक्षेप नहीं करने का आदेश देने की अपील की और मामला 1886 में वापस पहुंच गया। उस समय अंग्रेज जज कर्नल चेमियर ने कहा था कि यह सही है कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनी है लेकिन इतना वक्त बीत गया कि अब उसको आधार नहीं माना जा सकता। साठ साल तक कानून न हिंदुओं की मदद कर सका न इस्लाम मानने वालों की, और अब भी यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा, सात हजार से ज्यादा पन्नों की गवाहियां, डेढ़ हजार दस्तावेज औऱ वकीलों के तर्क पढ़े जाएंगे औऱ तब जाकर मामला शुरू होगा। जाहिर है कि न्यायपालिका अयोध्या के मामले में अपनी मति औऱ गति ठीक नहीं कर पायी है।
रही बात सुन्नी वक्फ बोर्ड की अपील की तो यह आजाद भारत का एक विचित्र किंतु सत्य तथ्य है । वक्फ बोर्ड भारत में इस्लामी संपत्तियों की रक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा गठित संस्था है। इसको आईएएस अधिकारी चलाते हैं। मुकदमे का मतलब यह है कि भारत सरकार खुद भारत सरकार के खिलाफ अदालत में खड़ी है। इतना ही नहीं जिस मीर बाकी ने मंदिर गिरा कर मस्जिद बनाई थी, वह शिया संप्रदाय का था और सिर्फ इसी आधार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज किया जा सकता था।
इसी कहानी में आगे यह सुनना भी जरुरी है कि मस्जिद के मामले में कोई भी कानूनी कार्रवाई मस्जिद के संरक्षक यानी मुतवल्ली ही कर सकते हैं। और बाबरी मस्जिद के मुतवल्ली मीर जावेद हसन मीर बाकी के वंशज हैं और अपने पूर्वज की मजार के पास अयोध्या से दस किलोमीटर दूर अंग्रेजों से मिली चालीस एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। मीर जावेद हसन ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका में शामिल होने से इंकार कर दिया था क्योंकि उन्होने कहा था कि वे शिया हैं। उन्होने तो यह भी कहा था कि मस्जिद को उनके गांव में स्थापित कर दिया जाय ताकि वे अपने पूर्वजों की बनाई मस्जिद में नमाज पढ़ सकें। मगर जहां मजहब से ज्यादा जरूरी सियासत हो, वहां तर्क कौन सुनता है।
यह सब इसके बावजूद है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड खुद औपचारिक औऱ सरकारी तौर पर जावेद हसन को बाबरी मस्जिद का मुतवल्ली करार दे चुका है। यह भी सही है कि वक्फ बोर्ड की याचिका तय समय सीमा से ग्यारह साल औऱ तीन सौ साठ दिन देरी से दायर की गई थी। इसलिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका को सुना ही क्यों गया यह आश्चर्य की बात है। आश्चर्य की बात तो यह भी है कि वक्फ बोर्ड की पंजीकृत संपत्तियों में बाबरी मस्जिद का कहीं नाम ही नहीं है। मगर जैसा कि पहले कहा कि जहां सिर्फ बात के लिए बात की जा रही हो, वहां तर्क कौन सुनता है।
1989 में पहली जुलाई को देवकी नंदन अग्रवाल ने राम मंदिर की मालकियत के लिए मंदिर की ओर से अपील की थी औऱ इस पर राजीव गांधी की सरकार की उदारता कहें या एक सोची समझी नासमझी, दो दिन के अंदर फैसला हो गया, मंदिर के ताले खुल गये, वहां पूजा भी होने लगी औऱ वहां रखी मूर्तियों को को भी वैध मान लिया गया। यह सब कुछ दिल्ली के इशारे पर हुआ था इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि कुछ ही घंटे में ताले खुलने का दृश्य दिखाने के लिए दूरदर्शन के कैमरे अखिल भारतीय प्रसारण की व्यवस्था के साथ अयोध्या में मौजूद थे।
जहां तक मंदिर के अस्तित्व का सवाल है तो 1767 में यहूदी पादरी जोसेफ टिफिन थेलर ने राम नवमी के दिऩ हिंदू और मुस्लिम दोनों को मस्जिद के अहाते में राम नाम गाते हुए देखने का दावा किया। उनके वर्णन में मंदिर औरंगजेब ने गिराया औऱ इसके पहले यहां जो महल बना था उसका नाम रामखोट यानी राम का महल था। राम चबूतरा पर पूजा होने की पूष्टि तो 1870 में ब्रिटिश पर्यटक औऱ इतिहासकार पी कारनेगी ने भी की है। और तो औऱ 1858 में बाबरी मस्जिद के मुख्य मौलवी ने भी माना है कि मस्जिद के प्रांगण में राम की पूजा भी होती है। वैसे भी अयोध्या की बजाय फैजाबाद में ज्यादा औऱ अधिक भव्य मस्जिदें हैं औऱ वहां बाबरी मस्जिद से ज्यादा नमाज पढ़ने वाले और हज़ पर जाने वाले जायरीन पहुंचते रहे हैं। राम जन्म भूमि बनी रहे और अजान के सुर गूंजते रहें, इसमें ही देश का वाकई भला है।

Thursday, September 23, 2010

अयोध्या विवाद पर पक्षकार राजी नही तो सुलह कैसी ?


अंबरीश कुमार
लखनऊ सितंबर । अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला टालकर इस मामले में सुलह की जो संभावनाएं तलाशी जा रही ही उनपर फिर पानी फिरता नज़र आ रहा है । सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले बाद फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से फिर यह यह साफ़ कर दिया गया कि इस मामले में वे देश की सबसे बड़ी अदालत में भी वही बात कहेंगे जो अब तक कहते आए है कि सुलह नही फैसला चाहिए । इस मामले के नब्बे वर्षीय मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी ने जनसत्ता से कहा - फैसला भले हफ्ते भर बाद आए पर फैसला होना चाहिए अब पंचायत या सुलह की कोई गुंजाइश नही है । यह सारा खेल कांग्रेस का है जिसने यह विवाद पैदा किया और अब फैसले को टालने की कोशिश में जुटी है । इस मामले को टलवाने में जहाँ कांग्रेस की भूमिका पर सवाल खड़ा हो रहा है वही भाजपा का भी सुर कांग्रेस के सुर में मिला हुआ है ।
राजनैतिक हलकों में माना जा रहा है कि फिलहाल यह मामला कुछ समय के लिए टल जाएगा । इस बीच कामनवेल्थ गेम्स और बिहार का चुनाव
निपट जाने से कांग्रेस को राहत मिल जाएगी । यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे पहले कांग्रेस ने स्वागत किया । पर जिस मामले में सुलह के ग्यारह प्रयास हो चुके हों और कोई हल नहीं निकला हो उसके फिर सुलझ जाने की संभावना के क्या आधार होंगे यह कोई नही जनता ।तीन -तीन प्रधानमंत्री और शंकराचार्य तक इस मामले में पहल कर चुके है । इलाहाबाद हाईकोर्ट की जिस बेंच में यह मामला चल रहा है उसने भी जुलाई के आखिरी हफ्ते में सभी पक्षकारों से सुलह के बारे बातचीत की पर कोई तैयार नही हुआ ।
इस मामले में चार मुख्य दावेदार हैं- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, रामजन्मभूमि न्यास और दिवंगत गोपाल सिंह विशारद। इनके वकीलों की भी यही राय है कि सुलह की कोई कोशिश नही की गई गई हैं। निर्मोही अखाड़ा ने जरुर फैसले की तारीख तीन दिन बढ़ा कर 27 सितंबर करने की बात की थी। पर जबतक मुस्लिम पक्षकार सुलह के लिए राजी नही होंगे सुलह होगी किससे ,यह कोई नही बता रहा । सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने पहले ही कहा था कि कांग्रेस इस मामले को टालने की साजिश में जुटी है । आज भी उन्होंने याचिका करने वाले रमेश चन्द्र त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल उठाया और कहा -इनके बारे में और भी जानकारी ली जा रही है । जिलानी ने साफ किया कि सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड का रुख वही है जो पहले था । इस मामले में सुलह की कोई गुंजाइश नही है सिर्फ मामले को लटकाया जा सकता है । दूसरी तरफ श्रीराम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने कहा -मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत हूं। इस पूरे मामले में त‍थाकथित राजनीतिक तत्वों ने वकीलों की मेहनत पर पानी फिरवा दिया है।
जनसत्ता

Monday, September 20, 2010

धान के खेतों में बत्तखों से मजदूरी




सुभाष चंद्र सिंह
आजमगढ़, सितम्बर । पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में इन दिनों किसान धान के खेतों में बत्तखों से मजदूरी करा रहे हैं । आपको इस बात पर भले ही विश्वास न हो लेकिन पिछले दस सालों से बत्तखें इस काम को बिना पैसे के बखूबी कर रही है ।
खरीफ की फसलों में धान की फसल बहुत ही मुख्य हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान की खेती बहुत ही अधिक मात्र में होती हैं । यह किसानों के लिए बहुत ही मेहनत का काम होती है । समय-समय पर पानी देना उसमें उगने वाले खर- पतवार , कीडॆ-मकोडो व काई की सफाई के लिए खेत मजदूरों एवं कीट नाशकों पर हजारों रुपये खर्च करने होते है । लेकिन जौनपुर के कई गाँव में अब बत्तखें धान के खेत में खेत मजदूरों की जगह इस काम को कर रही है ।
पानी भरे धान के खेत में तैर- तैर कर बहुत ही सफाई से खेत में उगने वाले खर - पतवार, काई के साथ ही साथ धान की फसल को नुकसान पहुचानें वाले कीडॆ-मकोडो को भी खा जाती है । इसके अलावा वह पुरे खेत की निराई - गुडाई भी कर देती है । बत्तखों से इस काम को कराने के लिए किसान बत्तख मालिक के यहाँ लाइन लगा रहे हैं ।
बत्तख पालक सुन्नीलाल राजभर ने बताया कि उसने गरीबी से तंग आकर सन् २००० में बत्तख पालन का काम शुरू किया और फिर उसके अण्डों से उसका खर्च चलने लगा । बत्तखों को चराने के लिए मज़बूरी के कारण धान के खेत में घुसा देता था. बत्तखों ने धान के खेत में उगे खर- पतवार,कीडॆ-मकोडो व काई की सफाई कर डाली. उसकी फसल आस- पास के खेतों की तुलना में सबसे अच्छी हो गई.बस बत्तखों से खेत मजदूरी कराने का सिलसिला यही से शुरू हो गया.उसके दो लड़के हैं वह दोनों भी दिन भर बत्तखे ही चरते हैं । कभी इस खेत में तो कभी उस खेत में ।
सुन्नीलाल ने बत्तखों से धान की खेती में यह नायब तरीका खोज डाला । धान की खेती के समय किसान उससे संपर्क करते है और वह अपने बत्तखों को पानी भरे उनके खेतों में घुसा देता है । बत्तखों को पानी में रोकने के लिए गेंहू बिखेर दिया जाता है । बत्तखे गेंहू खोजने के चक्कर में पुरे खेत की निराई - गुडाई कर देती हैं व खर- पतवार , कीडॆ-मकोडो को भी खा जाती हैं वह भी बिना धान की फसल को कोई नुकसान किये.सबसे बड़ी बात यह है कि इस काम को वह बिना पैसे के करती है.सुन्नीलाल कहता है कि किसान अपने खेत में बत्तख चराने देते हैं बस उसके लिए इतना खाफी हैं ।
सुन्नीलाल के पास २७०० बत्तखें है वह इन बत्तखों से प्रति माह २ से ३ हज़ार रुपये कमा लेता है और हर तीसरे साल वह पूरी बत्तखों को बेच कर १-१.५ लाख रुपये तक की कमाई करता है.सतहडा निवासी आशुतोष ने बताया कि एक एकड़ धान के खेत में सिर्फ निराई - गुडाई में कम से कम २ हज़ार रुपये लग जाते थे इसके अलावा कीडॆ-मकोडो को मारने के लिए कीट नाशको पर ५०० रुपये खर्च पड़ता है । कुल मिला कर एक एकड़ धान की खेती में २.५ से ३ हज़ार रुपये का कम से कम फायदा हो रहा हैं । वही अबबत्तखों की बीट खाद का काम कर जाती है. अब न तो हमेशा मजदूर खोजना है न ही मजदूरी का जुगाड़ करना हैं. यह काम बत्तखों के करने से काफी सहूलियत होने लगी हैं ।
सुन्नीलाल की इस खोज से जौनपुर के कई गाँव के किसानों को फायदा हो रहा हैं धीरे- धीरे उसकी पूछ भी बढ़ती जा रही हैं.लेकिन उसकी माली हालात में कोई बहुत सुधार नहीं हुआ हैं । वैसे देश के और भी भागों में इसका प्रयोग कर किसानों को फायदा पहुचाया जा सकता हैं । सुन्नीलाल कहता है कि कब किसके दिन बदल जाएँ कहा नहीं जा सकता । जनसत्ता

Sunday, September 19, 2010

मीर ,चकबस्त और बेगम अख्तर के फैजाबाद में फिर युद्ध जैसी तैयारी !




फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया
अंबरीश कुमार
अयोध्या , सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए । पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।
पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।
अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।
कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।
अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह में डाल रही थी ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।
यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि का व्यापार है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा ।
जनसत्ता

Wednesday, September 15, 2010

अयोध्या -अब सुलह नही फैसला चाहते है पक्षकार

अंबरीश कुमार / त्रियुग नारायण तिवारी
लखनऊ / अयोध्या सितंबर। उत्तर प्रदेश में अयोध्या के फैसले से पहले लखनऊ से लेकर फैजाबाद तक माहौल गरमा गया है । लखनऊ में सियासी पारा बढ़ रहा है तो अयोध्या में आशंका और तनाव । दूसरी तरफ अयोध्या मसले पर दोनों तरफ के पक्षकारों में सुलह की अंतिम कोशिश भी नाकाम होती नज़र आ रही है । इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मामले के पक्षकारों के बीच सुलह की एक और कोशिश के लिए १७ सितम्बर की तारीख़ तय की गई है ।पर कोई पक्षकार सुलह के मूड में नहीं है । दोनों पक्षकारो के वकीलों ने जनसत्ता से बातचीत में सुलह की संभावना से इनकार किया । दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल सुबह अयोध्या में राम लला के दर्शन कर साधू संतों के साथ बैठक करने जा रहे है । हालाँकि अयोध्या -फ़ैजाबाद में निषेधाज्ञा लागू कर सभी तरह के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । फैजाबाद के एसएसपी राजेश कुमार सिंह राठौर ने जनसत्ता से कहा - जिले में धारा १४४ लागू है और इसके तहत नियमो का पालन करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को अयोध्या में राम लला के दर्शन की इजाजत दी जा सकती है पर निषेधाज्ञा तोड़ने पर गिरफ्तार भी किया जा सकता है । कल्याण सिंह सुबह दस बजे अपने समर्थकों के साथ अयोध्या के लिए रवाना होंगे । उधर भाजपा के उपाध्यक्ष विनय कटियार ने इस मामले में केंद्र सरकार से दखल की मांग की । उन्होंने कहा कि आस्था और विश्वास के मामलें अदालते हल नही कर सकती। कटियार के मुताबिक अदालत ने निर्णय आने के पूर्व दोनो पक्षों को बातचीत का जो मौका दिया है वह सराहनीय है इसलिए अब केन्द्र सरकार को इस मामलें में आगे आना चाहिए।
सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारो के वकील जफरयाब जिलानी ने जनसत्ता से कहा - हमारा साफ मानना है कि इस मसले पर सुलह नहीं हो सकती अदालत अपना फैसला दे । इस तरह की कोशिशे पिछले १९ साल में कई बार हुई और कोई नतीजा नही निकला । इसलिए इस सिलसिले में जो अर्जी दी गई है उसपर विचार करने का कोई अर्थ नहीं है ।हम इस मामले में किसी भी तरह के सुलह के पक्ष में नही है।
दूसरी तरफ रामजन्म भूमि पुनरोद्धार समिति की तरफ से पेश होने वाली वकील रंजना अग्निहोत्री ने भी सुलह की संभावनाओ को ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ही सवाल खड़ा कर दिया । रंजना अग्निहोत्री ने कहा - यह तो न्यायपालिका की साख खराब करने की कोशिश है । जिस व्यक्ति ने अर्जी दी वह अब तक कहाँ सोया हुआ था । हम इस मामले में फैसला चाहते है ।
दरअसल अंतिम समय में जिस तरह का दबाव बढ़ा और यह अर्जी दी गई उससे लोग हैरान भी हुए है । लोगो का मानना है कि सभी फैसले का इन्तजार कर रहे ऐसे में इस तरह की कवायद से भ्रम हो सकता है । गौरतलब है की एक पक्षकार रमेश चन्द्र त्रिपाठी की अर्जी पर दोनों पक्षों से सुलह की कोशिश की जा रही है ।
दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह कल अयोध्या जा रहे है । कल्याण सिंह ने जनसत्ता से कहा - मै रामभक्त के रूप में रामलला के दर्शन करने अयोध्या जा रहा हूँ । वहा रामलला के दर्शन के बाद हनुमान गढ़ी जाऊंगा और उसके बाद साधू संतों के साथ सलाह मशविरा करूँगा ।
कल्याण सिंह सुबह दस बजे लखनऊ से रवाना होंगे । उनके साथ करीब डेढ़ सौ गाड़ियों का काफिला होगा । उधर अयोध्या में सुरक्षा और बढ़ा दी गई है ।कई और स्कूलों में सुरक्षा बल के जवान ठहरा दिए गए है । जिले के ५२ स्कूलों को नोटिस दी गई है कि कभी भी उनका परिसर लिया जा सकता है । अयोध्या फैजाबाद में दफा १४४ लगा दी गई है और प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है । इसके आलावा खुशी या गम का कोई कार्यक्रम भी सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा सकता है । बढ़ते तनाव का असर अब दिखाई देने लगा है । अयोध्या में लोगों ने खाने व अन्य सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । जिसके चलते शाक सब्जी का दाम भी बढ़ गया है । फैजाबाद प्रशासन कल्याण सिंह के दौरे को लेकर सतर्क है और उन्हें अपने समर्थकों के साथ जाने से रोका जा सकता है । सूत्रों के मुताबिक उन्हें राम सनेही घाट या लखनऊ सीमा में ही रोका जा सकता है ।
जनसत्ता

Sunday, September 12, 2010

रामगढ का राइटर्स काटेज









आलोक तोमर
नैनीताल की भीड़ और झील के आसपास के बाजारों के शोर से बचना हो तो रास्ते तो कई हैं मगर असली मंजिल तक पहुंचाने वाला एक ही रास्ता है जो भुवाली और गागर होते हुए रामगढ़ पहुंचता है। रामगढ़ आज भी गांव है और कल्पना ही की जा सकती है कि एक छोटे से टीले पर हिंदी की महान कवियत्री महादेवी वर्मा ने जब यहां छोटा सा मकान बनाकर साहित्य रचने के प्रयोजन शुरु किए थे तो यहां कितना सन्नाटा रहा था। मुश्किल से पांच दुकानों के बाजार रामगढ़ में पांच सितारा होटलों को मात देने वाले होटल औऱ रिसार्ट हैं औऱ पत्रकारिता से लेकर राजनीति और अफसरशाही तक के सबसे बड़े नाम यहां आकर बस गये हैं। होने को नैनीताल भी हिल स्टेशन है मगर इससे भी लगभग सात हजार फीट उपर रामगढ़ में हवाएं जब ठंडी होती हैं तो बहुत ठंडी होती हैं। बारिश होती है तो आसपास हिमालय की प्रकृति द्वारा बनाई गयी पूरी चित्रकला भीग जाती है। कोहरा आपके घर में घुस आता है और आप भूल जाते है कि आप उसी लोक में हैं जिसे मर्त्यलोक कहा जाता है।
जब तक रामगढ़ का नाम नहीं सुना था और देश और दुनिया के बहुत सारे हिल स्टेशन देख डाले थे तब तक नहीं पता था कि पहाड़ियों की खामौश पवित्रता क्या होती है? रामगढ़ पहुंचने के ठीक पहले गागर में एक बड़ा मंदिर है और उसके ठीक उपर घुमावदार सड़क के आखिरी छोर तक जहां निगाह जाती है, हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती है। जून के महीने में पके हुए खुमानी ,आलूबुखारा ,स्ट्राबेरी और आड़ू से लदे पेड़ देखते बनते है तो जुलाई के बाद सुर्ख होते सेब । एकांत को तोड़ते हुए बीच बीच में से गुजर जाने वाले स्थानीय लोग जो अब बाहरी लोगों को कौतुक से नहीं अपनी स्वभाविक आत्मीयता से देखते हैं। आप हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के उस हिस्से में है जहां दुर्गम और सुगम के बीच का फासला मिट जाता है।
पुराने लोगों के जो घर हैं वे अब भी देहाती शैली में बने हुए हैं। सड़क पर हैं तो हवेली जैसा आकार भी देने की कोशिश की गई है। अगर पीछे हैं तो गांव के मकान हैं। वैसे भी रामगढ़ अब तक नगरपालिका भी नहीं बनी , सिर्फ ग्राम पंचायत है। घाटियों और चोटियों के बीच शानदार आशियाने भी बने हैं और इस खामोशी को प्यार करने वाले ऐसे लोग भी हैं जो शेष जीवन के लिए रिटायरमेंट से बहुत पहले आकर बस गये हैं।
खास बात ये है कि इस इलाके का महानगर कहा जाने वाला नैनीताल जहां कोई सिनेमाघर तक नहीं है और जहां दर्जनों हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है, रामगढ़ से सिर्फ पौन घंटे की दूरी पर है। होने को रामगढ़ मे अब एक डाकघर भी है, डिस्पेंसरी भी है और लगभग सभी पार्टियों से जुड़े नेताओं के रईस आशियाने भी हैं। दिल्ली के सबसे भव्य इलाके सुजान सिंह पार्क में एक विराट बंगले में रहने वाले खूबसूरत पत्रकार हिरण्यमय कार्लेकर ने भी यहां घर बना लिया है। भारतीय विदेश सेवा के सर्वोच्च अधिकारी रह चुके शशांक शेखर यहां हैं हीं।
यह कल्पना करना ही सम्मोहित और चकित करता है कि अगर रामगढ़ में महादेवी वर्मा और ज्यादा वक्त बिता पाती तो " अतीत के पता नहीं कितने और चलचित्र " हमे पढ़ने को मिलते। पता नहीं सुमित्रानंदन पंत ने यहां की यात्राओं में क्या लिखा मगर उनके साहित्यिक इतिहास में रामगढ़ का वर्णन नहीं है। रवींद्र नाथ ठाकुर के संस्मरणों में रामगढ़ का वर्णन आता है ।
अगर आप नैनीताल गये और रामगढ़ नहीं गये तो कम से कम आपके जीवन का निजी इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। इस धरती पर ऐसी जगहें कम मिलती हैं जहां गर्मी नहीं, शोर नहीं, धुआं नहीं, भीड़ नहीं, पार्किंग के झमेले नहीं और जहां तक नजर जाए वहां तक घाटियां और झरने ही झरने दिखते हैं। कई बार बाघ के बच्चे रामगढ़ में आ जाते हैं और यहां के लोग उन्हे दुलारकर वापस जंगल में छोड़ देते हैं। रामगढ़ को मसूरी या दार्जलिंग की तरह होटलों का जंगल बनाने की कोशिश चल रही है और इसके पहले इस खूबसूरत दुनिया के साथ यह हादसा हो जाय, आप भी रामगढ़ हो आइए...
अंबरीश कुमार ने अपनी खबरों वाली शैली से निकलकर रामगढ़ की जो तस्वीर खींची है वह एक झरोखा है जिसे पार करके और वहां रहकर ही रामगढ़ को प्रतीत किया जा सकता है। जब आप शांति में अपनी सांस की आवाज भी सून पाते हैं तो आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि रामगढ़ में गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर शांति निकेतन का एक केंद्र खोलना चाहते थे। एक सड़क और दो मोड़ों वाले इस कस्बे में अभी शहर नहीं घुसा है और यही इसकी खासियत है। अम्बरीश कुमार सौभाग्यशाली हैं कि उनकी गिनती रामगढ़ के आधुनिक आदिवासियों में से की जा सकती है और मित्रों की एक पूरी कतार है जो उनके कृतज्ञ है कि उन्हे बसने के लिए एक बेहतर विकल्प बताया। बाकी बची कमी वे ईंट गारे से नहीं शब्दों से पूरी कर रहे हैं। उनके इस राइटर्स काटेज में मै कई बार रुका हूँ और अब आप भी एक बार यहाँ जरुर जाए । हिमालय की बर्फ से भरी चोटियाँ देखनी हो तो सितम्बर के आखिरी हफ्ते से लेकर नवम्बर तक का समय बेहतर होगा । बर्फ पर चहलकदमीकरने के लिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर फरवरी तक समय है । और फल फूल से घिरे रामगढ को देखने के लिए मई से अगस्त तक का समय ठीक रहेगा ।
राइटर्स काटेज और पास पड़ोस की कुछ फोटो अलग अलग मौसम की