Tuesday, August 17, 2010

गाँधी की खादी बाजार के हवाले

लखनऊ, अगस्त । गाँधी के नारे के सहारे सत्ता के गलियारों तक पहुँचने वाली कांग्रेस ने अब उसकी खादी को बाजार के ताकतों के हवाले कर दिया है । कांग्रेस ने खादी से 20 फीसदी की सब्सिडी खत्म कर दी है । जिससे अब खादी लेने पर कोई छूट नहीं मिलेंगी ।
कांग्रेस सरकार ने खादी वस्त्रों पर हर साल गाँधी जयंती के उपलक्ष्य में दी जाने वाली २० फीसदी की छुट इस साल से बंद करने का निर्णय लिया है, जब की हर साल यह छूट आज़ादी मिलने के बाद से अभी तक बिना किसी रुकावट के मिलती रही है। खादी वस्त्रों पर हर साल केंद्र के अलावां उत्तर प्रदेश सरकार भी अपनी तरफ से १० फीसदी का छुट देती है जो आज भी जारी है| बहुजन समाज पार्टी की सरकार से एक बार छूट बंद करने की उम्मीद की जा सकती थी लेकिन यह निर्णय गाँधी के आदर्शों को ढोने वाली कांग्रेस सरकार ने लिया ।
यह प्रस्ताव दरअसल पूर्व में भाजपा नेतृत्व वाली (राजग) सरकार ने तैयार किया था, जिसे भाजपा ने यह सोच कर नहीं लागू कराया की उसके अपने ही संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ऊपर गाँधी की हत्या कराने के आरोप लग चुके हैं । पूर्व राजग सरकार जिस प्रस्ताव को लागू कराने का साहस नहीं कर पाई, उसको कांग्रेस सरकार ने बहुत आसान तरीके से लागू करा ।
उत्तर प्रदेश में इसे लेकर आन्दोलन शुरू हो गया है । १६ अगस्त को पुरे प्रदेश के उत्पाद और बिक्री केंद्र बंद रखे गए । २२ अगस्त से वर्धा में गाँधी वादी फिर से आन्दोलन की रूप रेखा बना रहे है । खादी पर यहे छूट आजादी के पहले १९२० से दी जा रही है, हर साल गाँधी जयंती २ अक्टूबर पर १०८ दिनों तक यह छूट दी जाती है । गाँधी आश्रम के सचिव रामेश्वर नाथ मिश्रा बताते है कि यही वो वक्त होता है, जिसमे करीब पूरे साल कि ८५ फीसदी की बिक्री होती है, शेष १५ फीसदी वर्ष भर में की जाती ।
पूरे देश में खादी के करीब १९५० मान्यता प्राप्त संस्थान है, जिसमे ५५००० से उपर वेतन भोगी कर्मचारी है,जिसमे कतिन बुनकरों की संख्या २.५ से ३लाख है और करीब उत्तर प्रदेश में २२००० समितियां है।
इन समितियों में करीब ५५ लाख स्त्री बुनकर व कातिन हैं । भारत सरकार नें राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी के खादी के प्रचार प्रसार की नीतियों पर कुठारा घात करते हुए वर्षों से खादी पर दी जाने वाली इस छूट को समाप्त कर उसके स्थान पर ०१ अप्रैल २०१० से विपणअन विकास सहायता देना लागू कर दिया है ।
इस योजना के प्रावधानों के अनुसार वर्षों से भारी छूट का लाभ उठाने के आदि हो चुके ग्राहकों को अब खादी के वस्त्रों पर अब ४ या ५ फीसदी छूट ही उपलब्ध हो पायेगी जिससे खादी की बिक्री निश्चीत तौर पर प्रभावित होगी और खादी संस्थाओं तथा उनसे जुड़े बुनकरों और कामगारों को भारी वितीय क्षति उठानी पड़ेगी । निजी और कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा अपने ग्राहकों को दी जा रही आकर्षक छूट व अन्य प्रलोभनों के चलते धीरे धीरे खादी संस्थाओं में ताले पड़ते जायेंगे ।
१४ अक्टूबर २००९ को प्रधानमंत्री को प्रतिवेदन दे कर उनकी खादी विरोधी नीतियों का विरोध करते हुए नए निर्णयों को लागू करनें में असमथर्ता प्रकट की । कुछ संस्थाओं द्वारा सरकार द्वारा खादी विरोधी नीतियाँ न वापस लेने के विरोध में असहयोग आन्दोलन की चेतावनी दे डाली|
इस पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव अशोक मिश्रा का कहना है यह खादी के ऊपर एक प्रहार है, सरकारी संरक्षण के बिना इसको नहीं चलाया जा सकता है। कांग्रेस गाँधीवाद की हत्या कर रही है और ये विश्व व्यापर के समर्थक है तथा इस उद्योग को मरनें नहीं दिया जायेगा ।
जनसत्ता में आशुतोष सिंह की रपट

Sunday, August 15, 2010

कमजोर है आमिर की पिपली लाइव


आशीष
मुम्बई .आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म पीपली लाइव की लम्बे वक़्त से प्रतीक्षा थी। इंटरनेट पर इसके लम्बे लम्बे रीव्यू मौजूद हैं जिनमे से ज्यादातर में इसे शानदार और पैसा वसूल फिल्म कहा गया है लेकिन फिर भी मैं अपनी समझ और अपने अनुभव के हिसाब से इसे एक कमज़ोर फिल्म ही कहूँगा।
सबसे बड़ी खामी है इस फिल्म की कमज़ोर पटकथा। फिल्म ठीक से बंधी हुई नहीं दिखाई देती। निर्देशक अनुषा रिज़वी ने दिखाना चाह है की किसी खबर को मीडिया इतना ज्यादा सनसनीखेज़ बना देती है की मूल खबर की संवेदनशीलता और गंभीरता ही ख़तम हो जाती है लेकिन बुरा संयोग ये है की अनुषा के साथ भी हकीकत में कुछ ऐसा ही हुआ है। मीडिया की भागमभाग और टीआरपी का चक्कर दिखाने के चक्कर में उनकी फिल्म मूल मुद्दे(किसानों की आत्महत्या) की संवेदना के साठ न्याय नहीं कर पाई है।
फिल्म का मुख्य पात्र आत्महत्या करने जा रहा है। आत्महत्या एक बड़ी विभीषिका है लेकिन अनुषा रिजवी लेकर मीडिया की भागमभाग दिखाने और राजनैतिक चूहा बिल्ली का खेल दिखाने के चक्कर में ही इतनी उलझ गयीं की उनका मुख्य किरदार नत्था आत्महत्या के मुहाने पर खड़ा होने के बावजूद दर्शकों के मन को उस तरह झकझोर नहीं पाता, आत्महत्या जिस तरह की त्रासदी है।
फिल्म अच्छी तब बनती जब नत्था की पीड़ा दर्शक उतनी ही शिद्दत से महसूस करते और उसके सापेक्ष मीडिया की भूमिका पर एक छोभ की स्थति बनती। अनुषा पत्रकार रहीं हैं इसलिए चैनल के न्यूज रूम की हकीकत और इस धंधे की मजबूरी को तो उन्होंने ठीक से उभरा है लेकिन इसको कुछ ज्यादा ठीक से दिखाने के चक्कर में नत्था पर न तो अपेक्षित तरीके से उनका ध्यान टिक पाया है न ही दर्शकों का। दूसरी बात फिल्म में मीडिया पर व्यंग्य होने की बात कही गयी है जबकि हकीकत में सारे घटनाक्रम पल दो पल का हास्य तो पैदा करते हैं लेकिन व्यंग्य की तीखी मार या पैनापन उनमें कहीं नज़र नहीं आता सिवाय एक दो जगह के।
मीडिया की भागम भाग दिखाने के चक्कर में अनुषा यही भूल गयी की उनकी फिल्म किसानों की आत्महत्या के सापेक्ष मीडिया और सियासत की भूमिका पर है या उनकी फिल्म मीडिया की भागमभाग और टीआरपी के खेल पर है।आत्महत्या के मुद्दे पर फिल्म पर्याप्त संवेदना हासिल नहीं कर पाती. इसी वजह से पूरी फिल्म में किसानसे सिर्फ एक ही जगह वास्तविक सहानुभूति होती है, और वो किसान भी नत्था न होकर वो होरी महतो है जो फिल्म में सिर्फ गड्ढा खोदते ही नज़र आता है।
अनुषा ने मीडिया की आपाधापी तो खूब दिखाई लेकिन रिपोर्टिंग के कुछ बुनियादी पहलू भुला गयीं। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही कौन सा मीडिया भारत में किसी खबर को छोड़ देता है। कई स्पेशल बुलेटिन तो केवल इस्पे ही चलेंगे की जो मारा है क्या वो वाकई नत्था ही था। और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने के बाद एक नए सिरे से नत्था की खोज शुरू होगी। जब एक गाँव में चौबीस घंटों के लिए कई चैनलों की टीमें किसान की मौत की खबर के लिए पड़ी हों और एक दूसरे से होड़ के चक्कर में मल मूत्र त्यागने की भी खबर बना रहीं हों तब होरी की मौत को कोई चैनल नहीं छोड़ेगा। वो उसको ट्रीट कैसे भी करे।
एक जगह अंग्रेजी पत्रकार जिले के स्ट्रिंगर से कहती है की अगर खबरों को इस तरह स्वीकार करना नहीं आता तो आप गलत पेशे में हैं, ये बात कमोबेश सही भले हो लेकिन फिर भी इसके प्रति विद्रोह को लेकर उस पत्रकार का एक संवाद तो डाला ही जा सकता था ताकि मीडिया में कुछ नए तेवरों की भी सम्भावना दिखाई दे। और उसपर भी जब वो पत्रकार मरने ही वाला था।अच्छी फिल्म में सन्देश और सवाल भाषण की तरह न होकर कहानी में ही गुंथा हुआ होता है। इस फिल्म mein सिर्फ एक baar सवाल खड़ा किया जाता है और उसपर भी अंग्रेजी पत्रकार के जवाब से बात ख़तम मान ली जाती है। सबसे बड़ा व्यंग्य, सवाल, सन्देश जिस गीत के जरिये दिया जा सकता था वह भी पूरा नहीं दिखाया गया फिल्म में । फिल्म में तेवर बिलकुल नहीं हैं ।
फिल्म में गालियों की भरमार है, जबकि ये अनिवार्य हों ऐसा बिलकुल नहीं है। इनकी बजाय अम्मा जी के देसी ताने ज़रूर अनिवार्य हैं। लेकिन बेवजह की गालियों के चलते फिल्म एक खास वर्ग को असहज करेगी।
फिल्म के अभिनय और संगीत में ज़रूर किसी कमी की गुंजाइश नहीं दिखाई देती। अम्मा जी, नत्था, बुधिया और इन सबसे ऊपर दीपक कुमार का अभिनय बेजोड़ है। फिल्म जब ख़तम होती है छत्तीसगढ़ का अनुपम लोकगीत बजता है जिसे हबीब तनवीर साहब की बेटी नगीन तनवीर ने गाया है लेकिन ज्यादातर बेसबर दर्शकों को तब तक स्टैंड पर खड़ी अपनी गाडी निकालने की चिंता हो जाती है और वे सीट छोड़ने लगते हैं। इस अद्भुत लोकगीत को छोड़ने वाले दर्शक वाकई अभागे ही कहे जायेंगे।
अनुषा की जो एकमात्र उपलब्धि है वह यह है की जिस दौर में हिंदी फिल्मों से भारत के शहर ही गायब हो रहे हैं, और गानों में हिंदी बोल ही नहीं नज़र आते हों, उस दौर में उन्होंने एक छोटे से गाँव पर आधारित और लोकगीतों और लोकभाषा से सनी एक फिल्म बनाने की हिम्मत दिखाई। अगर आप फिल्मों के अर्थशास्त्र को ज़रा भी जानते हैं तो मानेंगे अनुषा की ये हिम्मत वाकई महान है।

Saturday, August 14, 2010

झारखंड में शह-मात का खेल

वीना श्रीवास्तव
रांची। झारखंड में राष्ट्रपति शासन के जरिए कांग्रेस चुनाव की तैयारी की रणनीति पर चल रही है। कांग्रेस के साथी बाबूलाल मरांडी इस चाल को समझ रहे हैं लिहाजा वे अभी से कांग्रेस पर दबाव बनाने का खेल शुरू कर चुके हैं। भाजपा झामुमो से मिले झटके से उबरने के लिए मौके की तलाश में है और झामुमो हमेशा की तरह अपनी आदिवासी पैठ के बूते निश्चिंत बैठा है। झामुमो को पता है कि शिबू सोरेन की मौजूदगी भर उसका खेल खड़ा करने के लिए काफी है।
कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रपति शासन के जरिए यदि वह सूखे के नाम पर राज्य में 250-300 करोड़ बांट देगी तो उसका बेड़ा पार हो सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो भाजपा के अर्जुन मुंडा, झाविमो को बाबूलाल मरांडी या गुरूजी (शिबू सोरे्न) के सामने खड़े होने की हैसियत रखता हो। केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय रांची से बाहर प्रभावशाली नहीं रह जाते और कांग्रेस राज्यपाल एमओएच फारुक को तो चुनाव लड़ा नहीं सकती। इसलिए कांग्रेस की रणनीति हर जिले में पैसा बांटकर अपनी स्थिति मजबूत करने की है। इसी के तहत कांग्रेस ने राज्य के 12 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जबकि बोवनी 31 अगस्त तक चलनी है। मतलब यह कि यदि 20-25 अगस्त तक भी और बारिश हो जाती है तो आराम से बोवनी हो जाएगी। यहां यह बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के विपरीत यहां धान की बोवाई 31 अगस्त तक होती है। रणनीति का अगला हिस्सा साफ-सुथरी छवि बनाने का है और इसके तहत कोड़ा कांड व अन्य प्रकरणों को सीबीआई के सुपुर्द किया जा रहा है। इसका एक फायदा कद्दावर नेताओं पर दबाव के रूप में भी कांग्रेस देख रही है।
पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी कांग्रेस की चाल को समझ रहे है। लिहाजा उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सुविधाएं वापस लेने के राज्यपाल के आदेश को मुद्दा बना दिया कि यह आदिवासी विरोधी कदम है। सभी पूर्व मुख्यमंत्री (बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा व शिबू सोरेन) आदिवासी हैं और कांग्रेस आदिवासियों को सुविधाएं लेते हुए नहीं देख पा रही है। इसके अलावा, मरांडी झारखंड दिसोम पार्टी के संस्थापक सल्खान मुर्मू, झारखंड जनाधिकार मंच के बंधु तिर्की जैसे नेताओं को पटा रहे हैं। ये लोग खुलकर कहने लगे हैं कि शिबू सोरेन को बेनकाब करना जरूरी है और इस बात का अभियान चलना चाहिए कि कैसे बाबूलाल मरांडी के हाथों ही आदिवासियों के हित सुरक्षित हैं। कांग्रेस मरांडी की चाल को समझ रही है लेकिन उसके पास इसकी कोई तोड़ फिलहाल नहीं है। मरांडी चाहते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन बना रहे लेकिन आधी सीटें कांग्रेस उनको दे। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मरांडी को 82 में सो सिर्फ 19 सीटें दी थीं। इनमें से मरांडी 11 सीटें जीतने में कामयाब रहे थे और कांग्रेस सिर्फ 14।

पत्थरों पर रोशनी ,धरोहर पर अँधेरा

अंबरीश कुमार
लखनऊ , अगस्त। मूर्तियों ,पार्कों और और स्मारकों पर अरबों रुपये खर्च करने वाली सरकार ऐतहासिक धरोहरों को भगवान् भरोसे छोड़े हुए है। आज लखनऊ से लेकर जिलो जिलों में आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर रोशनी की जा रही है पर आजादी की लडाई की बहुत सी धरोहर अँधेरे में डूबी हुई है । पृथ्वीराज कपूर के मार्गनिदेशन आजमगढ़ में जो कला भवन बना उसको राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत से लाई अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस भवन को देकर और समृद्ध कर दिया था ,उस कला भवन का ताला आज आजादी की सालगिरह की पूर्व संध्या पर टूटा मिला । आस पास के भवनों पर आजादी की सालगिरह के मोके पर रोशनी की जा रही है और यह भवन अँधेरे में डूबा है । राहुल सांकृत्यायन तिब्बत से जो पत्थर लाए थे उनका एक बक्सा खाली हो चूका है और कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ भी नदारत है । पूरा प्रदेश इस समय पत्थरों की वजह से नई पहचान बना रहा और दूसरी ओर जिलों जिलों में मौजूद इतिहास के पन्ने बिखरते जा रहे है । उदाहरण है आजमगढ़ में साहित्य, संस्कृति और कला को संजोने वाले हरिऔध कला भवन । यह भवन 1857 के कंपनी बाग जो आज कुंवर सिंह उद्यान के नाम से जाना जाता है उसके परिसर स्थापित है ।
इस कला भवन के वे दरवाजे आजादी की पूर्व संध्या पर खुले मिले जिन पर प्रशासन ने ताले लगवाए थे। इस संग्राहालय में जहां राहुल सांकृत्यायन ने अपनी दुर्लभ पांडुलिपियों और पुरातत्व की महत्व की वस्तुओं को दान किया था उसकी सुरक्षा के लिए कोई इन्तजाम नहीं है। हरिऔध कला भवन के संरक्षण के लिए लंबे समय से लड़ रहे स्थानीय रंगकर्मी अभिषेक पंडित ने बताया कि कुछ महीने पहले यहां किताबों और पांडुलिपियों के चोरी हाने का मामला सामने आया था। जिस पर लंबे आदोलन के बाद प्रशासन ने सिर्फ ताला लगवाने का काम किया। प्रशासन ने इसके संरक्षण के लिए एक बैठक बुलाने का आश्वासन दिया था जो अब तक नहीं हुयी। यहां गौरतलब है कि इस कला भवन का निर्माण 1954 में जनता के पैसे से स्थानीय कलाकारों द्वारा करवाया गया था। जिसका पृथ्वीराज कपूर ने मार्गदशन किया था। दक्षिण एशिया का इतिहास और घुमक्कड़ शास्त्र के रचयिता राहुल सांकृत्यायन जो आजमगढ़ के ही रहने वाले थे ने तिब्बत से लायी गयी अपनी उन दुर्लभ ऐतिहसिक महत्तव की वस्तुओं को इस कला भवन को देकर और समृद्ध कर दिया। आजादी की पूर्व संध्या पर इस खंडहर नुमा कला भवन पर बैठे रंगकर्मी राघवेंद्र मिश्रा, सुग्रिव विश्वकर्मा और बब्लू श्रीवास्तव ने कहा कि कला जो समाज में प्रतिरोध की भावना का विस्तार करती है उस चेतना को कुंद करने की यह कोशिश है। जिलाधिकारी कार्यालय से मात्र कुछ फर्लांग की दूरी पर स्थित होने के बावजूद जिलाधिकारी इसका हाल जानने के लिए कभी नहीं आते जबकि जिलाधिकारी इस हरिऔध कला भवन के अध्यक्ष हैं। कल स्वतंत्रता दिवस है पर यहां कोई सफाई नहीं की गयी है। आज हम लोग यहां की खुद सफाई कर रहे हैं।
पीयूसीएल के राजीव यादव और तारिक शफीक ने कहा कि जिले में कला, साहित्य और संस्कृति के लिए हरिऔध कला भवन की एक मात्र संस्थान हैं। पर इसको जिस तरह उपेक्षित किया जा रहा है वह हमारी सरकारों की मनोस्थिति को भी बताता है कि वे कला, साहित्य और संस्कृति से कितना डरती है। कई दशक से इस हरिऔध कला भवन संस्था का नवीनीकरण नहीं हुआ जिसका पदेन अध्यक्ष जिलाधिकारी है। यह तथ्य इस बात को दर्शाती है कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारों के पास कला, साहित्य और संस्कृति को लेकर जिले स्तर पर कोई नीति नहीं हैं। कभी इस कला भवन में कैफी आजमी, बादल सरकार और अशोक भौमिक जैसे नामी लोगों के बैठके यहां हुआ करती थीं। इस कला भवन का कुछ हिस्सा डह गया है। जहां एक तरफ रवींद्र नाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ मनायी जा रही है वहीं इस कला भवन के ओपेन थिएटर में रवींद्र नाथ टैगोर सहित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसी हस्तियों के आदम कद तैल चित्र के चीथड़े दीवारों पर टंगे हैं तो वहीं महात्मा गांधी और अशोक की लाट धूल फांक रही हैं। कला भवन के पुस्तकालय के आलमारियों के शीशे टूटे हुए हैं जिनमें अब भी बहुमूल्य किताबें हैं जो अपने चोरी होनी की बाट जोह रही हैं। अब यह कला भवन कुछ युवा रंगकर्मियों के भरोसे है जो इसे फिर से कला, साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रुप में स्थापित करने में लगे हैं।

Friday, August 13, 2010

काशी में भी विभूति हटाओ का नारा

विजय विनीत
वाराणसी ,अगस्त।छिनाल प्रकरण पर अब पूर्वांचल में भी विरोध तेज हो गया है।वाराणसी में ढाई सौ लेखकों ने विभूति नारायण राय के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया , बैठक की और राष्ट्रपति से इस मामले में न्यायिक जाँच करा कर उन्हें बर्खास्त करने की मांग की । ज्ञानोदय पत्रिका के 10 अगस्त के बेवफाई सुपर बेवफाई विशेषांक में विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा दिए गए साक्षात्कार पर 12 अगस्त मध्यान्ह हिन्दी विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के सभा कक्ष में काशी के सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों का कल एक सम्मेलन आयोजित किया गया। हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो श्रद्धानन्द सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए राय द्वारा महिलाओं के लिए अमर्यादित तथा अशोभनीय करार दिया। हिन्दी में इस प्रकार के विवादों तथा टिप्पणियों के विरुद्ध सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की। सभा में संचालन का दायित्व प्रो सत्यदेव त्रिपाठी को दिया गया। उन्होंने इस विषय पर चर्चा की शुरुआत कराई।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डा0 रामाज्ञा राय ने राय की टिप्पणी को स्त्रियों के विरुद्ध अशोभनीय और अमर्यादित कहा। उन्होंने श्री राय को शासन से तत्काल बर्खास्त करने की मांग की। साहित्यकार डा0 वाचस्पति ने वक्तव्य की निन्दा करते हुए कहा यह अमर्यादित वक्तव्य है। उन्होंने विष्णु खरे के पूर्वांचल के साहित्यकारों को ‘हुडुक लूलू’ लिखने की भी निन्दा की।
उर्दू लेखिका प्रो शाहिना रिजवी ने कहा कि राय की महिलाओं को छिनाल कहने की टिप्पणी बेहद घटिया है। इसके लिए उन्हें कड़ा दंड मिलना चाहिए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रो और कवि बलराज पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं राय की टिप्पणी की निन्दा करता हूँ। उन्होंने कुछ हिन्दी के पत्रिकाओं के सम्पादकों पर कुछ महिला लेखिकाओं को अयोग्य रहते हुए आवश्यकता से अधिक सह देकर प्रमोट करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने हिन्दी साहित्य में घटिया लेखन पर चिंता जताई।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की डा0 चन्द्रकला त्रिपाठी ने कहा कि महिलाओं के ऊपर श्री राय की यह अमर्यादित टिप्पणी कत्तई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। उन्होंने मांग की कि राय को केन्द्रीय सरकार उनके पद से तत्काल बर्खास्त करे ताकि भविष्य में यह दुबारा दुहराया न जाए। प्रो0 चम्पा सिंह और डा0 श्रद्धा सिंह ने श्री राय की टिप्पणी को अपमान जनक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया। युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने कहा कि राय की टिप्पणी महिला विरोधी है। समूचे स्त्री समाज को अपमानित करना चिंताजनक है और उन्हें सरकार को तत्काल पद से बर्खास्त करना चाहिए। साहित्यकार दीनबन्धु तिवारी और और डा0 वशिष्ट नारायण त्रिपाठी ने वक्तव्य को घटिया और दुर्भाग्यपूर्ण बताया। काशी विद्यापीठ के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो सुरेन्द्र प्रताप ने कहा कि राय का वक्तव्य स्त्री अस्मिता और स्त्री विमर्श के विरुद्ध है। स्त्री को छिनाल कहना उनकी सामंती, बर्बर और घटिया मानसिकता का प्रतीक है। उन्होंने राष्ट्रपति से इसकी न्यायिक जाँच कराकर उन्हें तत्काल पद से बर्खास्त करने की माँग की।
सभा में डा0 चतुर्भुज तिवारी, डा0 योगेन्द्र सिंह, डॉ0 रामआसरे यादव, विनीता सिंह, सिद्धार्थ राय ने भी विचार व्यक्त किया। सभा की आम राय यह रही कि स्त्र्ाियों का अपमान और असंसदीय टिप्पणी के कारण कुलपति का पद कलंकित हुआ है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार तत्काल प्रभाव से श्री राय को बर्खास्त कर न्यायिक जांच कराए अन्यथा उनके विरुद्ध शिक्षकों-साहित्यकारों का आन्दोलन जारी करेगा। श्री राय के कारनामों के विरुद्ध पूर्वांचल में व्यापक स्तर पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है, जिसे राष्ट्रपति तथा मानव संसाधन मंत्रालय को प्रेषित किया जायेगा। सभा के अन्त में संयोजक प्रो0 सत्यदेव त्र्ािपाठी ने इस अभियान को आगे जारी रखने का संकल्प लिया और आगन्तुओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।पूर्वांचल के साहित्यकारों द्वारा 250 हस्ताक्षर करके मानव संसाधन मंत्री और राष्ट्रपति को शीघ्र ही प्रेषित किया जाएगा ।

Thursday, August 12, 2010

जेपी के सिपाही भी मैदान में


अंबरीश कुमार
लखनऊ अगस्त । लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जनता सरकार की परिकल्पना को अमलीजामा पहनाने की वजह से क्रांतिकारी कवि नागार्जुन के साथ १९ महीने जेल काटने वाले महात्मा भाई को बिहार के नवगठित समाजवादी मोर्चा सिवान में जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव में उतारने जा रहा है । उनके चुनाव में बिहार आंदोलन के साथ जयप्रकाश नारायण की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के पुराने कार्यकर्त्ता और बोधगया आंदोलन के लोग भी शामिल होंगे । साथ ही समाजवादी धारा के लोग महात्मा भाई के चुनाव में जुटने जा रहे है । महात्मा भाई ने आज लखनऊ में कई जन संगठनो के लोगो से मुलाकात कर जीरादेई आने की अपील की । उतर प्रदेश से कुछ विधायक और जन संगठन के नेताओं ने भी जीरादेई जाने का कार्यक्रम बनाया है ।
समर्थन जुटाने की मुहिम में उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए महात्मा भाई ने कई संगठनो के नेताओं से मुलाकात की । गौरतलब है कि महात्मा बिहार आंदोलन के लिए बनी संचालन समिति के सदस्य थे और बाद में वाहिनी के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थे।जब जयप्रकाश नारायण ने जनता सरकार की की कल्पना की तो उसकी शुरुवात सिवान में महत्मा ने ही की थी जिसमे नागार्जुन शामिल हुए । महात्मा भाई ने बताया - अभी प्रखंड स्तर तक ही जनता सरकार का गठन किया गया था कि हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया । बाबा नागार्जुन भी साथ गिरफ्तार हुए और फिर छपरा ,सीवान और बक्सर जेल में १९ महीने कटे । उस दौर में नितीश कुमार भी
साथ थे पर आज जेपी सम्मान पेंशन योजना के लिए बक्सर जेल का रिकार्ड तक नहीं मिल रहा जिसमे नागार्जुन से लेकर नितीश कुमार ,सुशील कुमार मोदी आदि थे
खुद नितीश अब मुख्यमंत्री है । महात्मा यहाँ अपने पुराने समाजवादी साथी व समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से मुलाकात कर पुराणी यादें ताजा की ।
इसी बीच उन्हें पटना से लोक मोर्चा के बिहार के प्रभारी विजय प्रताप ने बताया कि समाजवादी धारा के संगठनो और दलों की बैठक में संयुक्त लोकतान्त्रिक समाजवादी मोर्चा का गठन किया जा चुका है जो उन्हें जीरादेई से मैदान में उतारेगा ।
इस बैठक में रघु ठाकुर की लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी ,लोकतान्त्रिक समता दल ,सोशलिस्ट पार्टी ( लोहिया ) ,लोकमोर्चा ,समाजवादी जनता पार्टी समेत छोटे बड़े दस संगठन और दल शामिल हुए । महात्मा भाई के मुताबिक यह मोर्चा करीब पचास सीटों पर चुनाव लडेगा । चुनाव को लेकर मोर्चा कई दलों से बात करेगा ।
बिहार विधान सभा के चुनाव में समाजवादी धारा के लोग कुछ क्षेत्रों में जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े लोगों को ताकत देकर नई पहल करने के मूड में है । जीरादेई उसी प्रयोग की दृष्टि से देखा जा रहा है । युवा भारत के राजीव के मुताबिक देश के अलग अलग हिस्सों से आंदोलनों से जुड़े लोग महात्मा भाई की मदद में आने वाले है । राजनैतिक दलों को भी चाहिए कि जयप्रकाश आंदोलन के इस सिपाही को ताकत दे और उमके खिलाफ कोई उमीदवार नहीं खड़ा करें ।
जनसत्ता

कश्मीर को बफर स्टेट बना देंगे ?

कृष्ण मोहन सिंह
नईदिल्ली,अगस्त ।क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूरी तरह अमेरिका के इशारे पर चल रहे हैं। अमेरिका निर्देशित रक्षा नीति ,कृषि नीति,शिक्षा नीति ,आर्थिक नीति और विदेशनीति यानी त्वमेव सर्वमम देव देव: ।अमेरिका चाहता है जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र बफर स्टेट बन जाय। केवल कहने के लिए भारत का अंग रहे। सारा संसाधन-खर्चा भारत से ले,लेकिन रहे स्वतंत्र।भारत का उसपर कोई लगाम,कन्ट्रोल नहीं रहे। अमेरिका यह काम करवाना चाहता है अपने यसमैन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से। जिस दिन मनमोहन सिंह यह करदेंगे उस दिन उनको(मनमोहन) विश्वशांति पुरस्कार मिलना पक्का। वैसे अब तक मनमोहन ने भारत में जो भी नीतियां लागू की हैं उनसे सबसे अधिक फायदा अमेरिका व उसकी लाबी के देशों को ही हुआ है। न्यूकडील से सबसे अधिक फायदा किसको होगा, अमेरिका को। उसके परमाणु रियेक्टर बनाने वाले कारखाने बंद हो गये थे,उसमें काम करने वाले लोग बेरोजगार हो गये थे, इस समझौते के बाद जितने परमाणु रियेक्टर बनाने के आर्डर अमेरिका व उसकी लाबी देशों की कम्पनियों को मिलेंगे उतना ही उन देशों को फायदा होगा। परमाणु रियेक्टर आधारित पावर प्लांट लगाने के लिए अमेरिका व उसकी लाबी वाले देशों से भारत ऋण लेगा और ऊंचे व्याज दर पर लंबे समय तक चुकाता रहेगा। यानी अमेरिका मंहगे व्याज से भी कमायेगा और परमाणु रिएक्टर बेच करके भी कमायेगा। कोई दुर्घटना हुई तो रिएक्टर सप्लाई करने वाली कम्पनी की कोई जिम्मेदारी नहीं वाला बिल मनमोहन संसद के इस सत्र में पास कराने की साम-दाम दंडी योजना बना ही रहे हैं।पूरी तरह उसके ट्रेप में गुलाम रहेगी भारतीय परमाणु शोध व अर्थव्यवस्था। इसी तरह मंहगे और एकबार प्रयोग होने वाले बीज का प्रयोग करने के लिए भारत में जो सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर जोर-शोर से योजनायें चल रही हैं ,सब अमेरिकी व उसकी लाबी वाले देशों की बीज , कीटनाशक दवा व खाद कम्पनियों को भारी लाभ पहुंचाने और उनका भारत में बड़ा बाजार बनाने के लिए हो रहा है। यही शिक्षा के क्षेत्र में हो रहा है। भारत में जो भी बड़े विश्वविद्यालय हैं चाहे वह काशी हिन्दू विश्व विद्यालय वाराणसी ,अलीगढ़ मुस्लीम विश्वविद्यालय या शांतिनिकेतन हो, सबके सब अपने समय के बड़े लोगों ने भीख मांगकर बनाया था। आज मनमोहन और कपिल सिब्बल भारत को देशी –विदेशी शिक्षा माफियाओं का लूट का केन्द्र बनाने में लगे हैं।ये भारत में शिक्षा इतनी मंहगी करते जा रहे हैं कि आम आदमी व गरीब का बच्चा पढ़ ही नहीं सकता। जो पढ़ेगा वह ऋण में गले तक डूब जायेगा। यह सिब्बल नकलची शिक्षकों को नियुक्त करने वाले भ्रष्टाचारी व महिलाओं को छिनाल कहने वाले कुलपतियों तक को बचाने में लगे हैं,ऐसे कुलपतियों को नतो सस्पेंड करा उनके खिलाफ जांच करा रहे हैं ,नहीं उसके बर्खास्तगी के लिए राष्ट्रपति के यहां फाइल भेज रहे हैं। इस सिब्बल और इनके जातीय अमेरिका परस्त मनमोहन का एक मात्र एजेंडा भारतीय शिक्षा को देशी-विदेशी शिक्षा धंधेबाजो के हाथों में सौंपने के अमेरिकी एजेंडा को लागू करना है।इनसे आमगरीब जनता की भलाई का क्या उम्मीद किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक जम्मू –कश्मीर के मामले में भी मनमोहन वही करने की कोशिश कर रहे हैं जो अमेरिका चाहता है। जिस दिन जम्मू-कश्मीर पूरा आटोनोमस हो गया उस दिन वह अमेरिका के ट्रेप में आ जायेगा। अमेरिका चाहता है कि जम्मू-कश्मीर एक स्वायत्त देश की तरह हो जाये।उसके अन्दर उसका अपना राज हो।भारत की सेना उस के अन्दर नहीं घुसे । भारत की सेना जम्मू-कश्मीर से सटे भारत की सीमा पर रहे। जम्मू-कश्मीर सीधे अमेरिका व उसके लाबी के देशों से तरह-तरह के संधि कर ले। वहां यूनाइटेड नेशंस की कुछ फौज शांति बनाये रखने व निगरानी के बहाने रहें। इस तरह जम्मू-कश्मीर पूरी तरह अमेरिका के अघोषित कब्जे में आ जाये।
मनमोहन सिंह ने 10 अगस्त की देर शाम को जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी दलों के साथ बैठक के बाद जब यह कहा कि जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक ढ़ांचे के तहत स्वायत्तता देने पर विचार किया जा सकता है ,तो मनमोहन के इस कहे का निहितार्थ स्पष्ट हो गया है। वह है जम्मू-कश्मीर पर अमेरिकी एजेंडा लागू करने की दिशा में पहल। उनके इस कहे के बाद अब यह आशंका होने लगी है कि मनमोहन सिंह व उनके सजातीय चहेते गृहमंत्री पी.चिदम्बरम अमेरिकी रणनीति व सोची-समझी योजना के तहत जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़कने दिये। मामला खूब तूल पकड़ लिया तो अब स्वायत्तता देने की बात करने लगे हैं।
सवाल है कि जब स्वायतत्ता ही देनी थी तो इसके रक्षार्थ अब तक हजारों-लाखों जवानों की बलि क्यों दी गई । क्या इसलिए कि उन जवानों में कोई किसी मनमोहन,चिदम्बरम,फारूख अब्दुल्ला, एंटोनी के लड़के ,दामाद नहीं थे।इनके तरह अमीर नहीं थे।
और जब जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दे देंगे तब पूर्वोत्तर भारत के भी कई राज्यों को कैसे मना करेंगे मनमोहन सिंह जी ?