Sunday, October 5, 2008

बैलेट का विकल्प नहीं बुलेट-माओवादी

काठमांडू से राजकुमार सोनी
काठमांडू .माओवादियों को मुख्यधारा में लाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका का निभा चुके नेपाल की संसद एवं संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष सुभाष चंद्र निमांग का यह मानना है कि जनता की आकांक्षाओं की असली अभिव्यक्ति बैलेट ही है। बुलेट के जरिए कभी भी विकास के रास्ते पर चला नहीं ज सकता। कुछ यही विचार भारत और नेपाल के विभिन्न हिस्सों में लंबे समय तक भूमिगत रहने वाले माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक दीनानाथ शर्मा का है। शर्मा छत्तीसगढ़ के पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे . निमांग एवं शर्मा ने कहा- नक्सली जिस रास्ते पर चल रहे हैं उस रास्ते से उन्हें सौ सालों में सफलता नहीं मिल सकती। उनका मानना है कि नेपाल में माओवादियों ने बैलेट के जरिए ही सफलता पाई है, इसलिए बुलेट को विकल्प नहीं माना ज सकता।  
  निमांग एवं शर्मा ने कहा कि नेपाल में नए गणतंत्र की स्थापना से एक अच्छा संदेश गया है। अब नेपाल को इज्जत की निगाहों से देखा जने लगा है।नए नेपाल के गठन की तैयारी में जुटे नेताओं ने बताया कि राजशाही से देश की जनता परेशान हो चुकी थी। राजशाही ने नेपाल में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे जनता का भला होता। उन्होंने बताया कि राजशाही के खिलाफ संघर्ष के दौरान लगभग १४ हजर लड़ाकों की जनें चली गई है। इन लड़ाकों को अब शहीद का दज्र देते हुए उनके परिजनों को दस-दस लाख रूपए का मुआवज देने की तैयारी चल रही है। लोकतंत्र की नई व्यवस्था के बारे में जनकारी देते हुए नेताओं ने बताया कि नेपाल किसी भी देश की लोकतंत्रीय व्यवस्था की फोटोकापी लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने बताया कि राजशाही में नेपाल का तराई वाला इलाका, गरीब-दलित सभी छूट गए थे, लेकिन नए नेपाल में 21 वीं सदी का लोकतंत्र गढ़ा ज रहा है जिसमें हर हाल में जनता के अधिकार और सम्मान की गारंटी होगी। छह सौ एक सदस्यीय संविधान सभा नेपाल को बदलने तैयारी में लगी हुई है। इस सभा की अब तक 20 से ज्यादा बैठकें हो चुकी है।
नक्सलियों द्वारा तिरुपति से पशुपति तक रेड कारीडोर बनाए जने की बात को अस्वीकार करते हुए नेताओं ने कहा कि भारत में यह प्रचार भारतीय जनता पार्टी के द्वारा किया गया था। नेताद्वय ने माना कि भ्रम के आधार पर जनता के बीच यकीन की जड़े जमाई नहीं ज सकती।
नेपाल के हिन्दू राष्ट्र नहीं रहने के सवाल पर शर्मा ने कहा कि धर्म हमेशा से व्यक्ति मसला होता है। वे धार्मिक नहीं है, लेकिन किसी से यह नहीं कहेंगे कि जओं अमुक जगह की मस्जिद तोड़ दो।www.janadesh.in 

Saturday, October 4, 2008

छवि खराब की -जज ने कहा

संजीत त्रिपाठी

रायपुर , सितंबर। बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में फैसले से जुडे होने का दावा करती एक सीडी बुधवार को जारी होने के बाद आज जज बी एल तिड़के के पुत्र अजय तिड़के ने सीडी जारी करने वालों के खिलाफ पुलिस में रपट लिखाई हैं। वहीं देर शाम दूसरे पक्ष के अनवर ढेबर व उमंग गोयल ने रपट दर्ज करवा दी है। दोनो ही पक्ष ने एक दूसरे पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया हैं।
अपनी रपट में अजय तिड़के ने कहा है कि 6-7 महीने पहले राक्सी रेस्टारेंट में उसकी मुलाकात अनवर ढेबर व उमंग गोयल से हुई । तब उसे यह नही पता था कि ये दोनो जग्गी मर्डर केस में आरोपियों के भाई हैं। जब मालूम चला तो इनसे अलग हो गया । अलग होने के बाद इन लोगों ने जान से मारने की धमकी दी। अलग होने पर जब पहले दोस्ती हुई थी तब 4-5 बार इन लोगों ने शराब पिलाकर परिवार वालों के बारे में पूछताछ की। सिविल लाइन थाने में अनवर ढेबर व उमंग गोयल के खिलाफ धारा 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया हैं।
 वहीं आज शाम में अनवर ढेबर व उमंग गोयल ने भी थाने पहुंचकर जज बी.एल. तिड़के के पुत्र अजय तिड़के पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए रपट लिखाई । पुलिस ने मामले को जांच में ले लिया हैं।
गौरतलब है कि बुधवार को एक प्रेस कान्फेंस में अनवर ढेबर व उमंग गोयल ने जग्गी मर्डर केस में अमित जोगी की रिहाई में लेन-देन का आरोप लगाते हुए एक सीडी जारी की थी।

दूसरी तरफ जज बीएल तिड़के ने एक अखबार में छपे बयान में  है कि फर्जी सीडी के जरिए उनकी छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है।  उन्होंने कहा है कि बिना स्पष्टीकरण लिए पत्रकारवार्ता में आरोप लगाना और उसे छापना न्यायालय की अवमानना है। ऐसे लोगों को प्रोत्साहित नही किया जाना चाहिए। प्रकरण के फैसले से पूर्व     भी मुझे धमकियां मिल रही थी। शिकायत करने पर एसपी ने मुझे सुरक्षा गार्ड उपलब्ध करवाए थे। सीडी में चालाकी से आवाज की नकल  की गई है ताकि वे न्यायाधीश को बदनाम कर सकें। ऐसे लोगों को वे कानूनी नोटिस भेज रहे हैं।





Friday, October 3, 2008

टाटा के जाने से टूट गए सपने

प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता, अक्तूबर। सिंगूर से टाटा मोटर्स के हाथ खींचने की वजह से पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीरण की प्रक्रिया को तो करारा ङाटका लगा ही है, कई सपने टूट गए हैं। इस बात का अंदेशा तो उसी समय पैदा हो गया था जब दो सितंबर को टाटा मोटर्स ने ¨सगुर संयंत्र का काम औपचारिक तौर पर बंद रखने का फैसला किया था। लेकिन बुधवार को रतन टाटा ने औपचारिक तौर पर सिंगूरसे वापसी का एलान कर उन तमाम सपनों पर पानी फिर गया, जो इस परियोजना के इर्द-गिर्द पनपने लगे थे। नैनो टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा के सपनों की कार तो थी ही, इस कार संयंत्र के आसपास बसे लोगों की आखों में भी इसने कई नए सपनों को जन्म दिया था। इलाके के नवधनाढच्यों के पैसों को भुनाने के लिए इलाके में कार व मोटरसाइकिलों के शोरूम तो खुले ही थे, बैंकों की कई शाखाएं भी खुल गई थीं। दिसंबर 2006 तक ¨सिंगूरमें महज दो बैंकों की ही शाखाएं थी, लेकिन अब यह तादाद सात तक पहुंच गई थी। इन बैंकों का टर्नओवर भी लगातार बढ़ रहा था।
वैसे, सिंगूर से टाटा की रवानगी की उल्टी गिनती तो उसी समय शुरू हो गई थी जब अगस्त के आखिर में तृणमूल के लोगों ने कर्मचारियों के साथ मारपीट की और उनको संयंत्र में काम पर जने से रोक दिया था। बीते २२ अगस्त को रतन टाटा ने जब यहां ¨सगुर से हाथ खींचने की चेतावनी दी थी, तब उन्होंने इसके लिए कोई समयसीमा नहीं तय की थी। शायद उनको उस समय भी हालात बदलने की उम्मीद रही होगी। टाटा ने आज माना भी कि उनको हालत सुधरने की उम्मीद थी। लेकिन डेढ़ महीने के इंतजर के बावजूद गतिरोध टूटते नहीं देख टाटा का धैर्य जवाब दे गया। टाटा ने कहा था कि भारी निवेश के बावजूद अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए वे इस परियोजना को कहीं और ले ज सकते हैं।। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा था कि अगर वे ¨सगुर से हाथ खींचते हैं तो राज्य में निवेश की टाटा समूह की भावी योजनाओं का प्रभावित होना तय है। सिंगुर में काम बंद होने से सिर्फ यहां से लखटकिया निकालने का टाटा समूह का सपना ही नहीं टूटा, बेशुमार लोगों के सपने टूट गए हैं। इनमें इस संयंत्र को जरिए राज्य में औद्योगिकीकरण अभियान को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाने का मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का सपना है तो इस संयंत्र में रोगजर पाने और इससे इलाके का कायाकल्प होने का लोगों का सपना भी टूटा है। टाटा के इस फैसले से राज्य में जरी औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को भारी ङाटका लगेगा। 
हुगली जिले के इस अनाम-से कस्बे में लखटकिया कार के लिए जमीन देने वाले ज्यादातर किसान भी चाहते थे कि नैनो इसी संयंत्र से बाहर निकले। इस परियोजना ने स्थानीय लोगों का जीवन और रहन-सहन का स्तर ही बदल दिया है। टाटा मोटर्स की इस परियोजना में सैकड़ों स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिला ही था, जमीन के बदले किसानों को जितने पैसे मिले, उसकी तो उन लोगों ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। लेकिन अब उन लोगों के सामने वजूद का सवाल खड़ा हो गया है। जमीन के एवज में मिले लाखों रुपए ने दो जून भरपेट भात के लिए तरसने वाले इन किसानों की ¨जदगी में पहिए लगा दिए थे। जिस जमीन की कीमत कल तक कौड़ियों में थी, वह रातोंरात आसमान चूमने लगी थी। परियोजना के जमीन देवे वाले कृष्णोंदु दास का कहना था कि इस परियोजना ने इलाके के लोगों में रोजगार और समृद्धि की उम्मीदें जगाई थी। इलाके के कई युवक तो इसमें काम भी कर रहे हैं। लेकिन अब तो हम न घर के रहे और न घाट के। 
इलाके के ज्यादातर लोगों का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद इलाके में विकास की प्रक्रिया और तेज हो जती। लेकिन अब बेहतर भविष्य के स्थानीय लोगों खासकर युवकों के सपने धुंधलाने लगे हैं।यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टाटा को अपने इस फैसले से सिर्फ आर्थिक नुकसान ही उठाना पड़ेगा। लेकिन उनके इस फैसले से ¨सगुर समेत पूरे राज्य और इसकी साख को जो नुकसान होगा उसकी भरपाई कर पाना काफी मुश्किल होगा। टाटा ने भले कहा हो कि राज्य में निवेश के माहौल से इस फैसले का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इसका असर भावी निवेशकों पर भी पड़ना तय है। इस फैसले के दूरगामी नतीजे तो बाद में सामने आएंगे, लेकिन इससे व्यावसायिक तबके में जो उथल-पुथल शुरू हो गई है, उसके ङाटके तो अभी से महसूस होने लगे हैं।जनसत्ता से

Thursday, October 2, 2008

रायपुर से कांग्रेस का 'सेनापति' पत्रकार?

संदीप पुराणिक/संजीत त्रिपाठी

रायपुर , अक्टूबर। रायपुर की चारों विधानसभा में सबसे कठिन मानी जा रही दक्षिण विधानसभा सीट पर कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता अपनी-अपनी चौसर बिछाकर प्यादों के नाम आगे पीछे करने में लगे हुए हैं पर बृजमोहन पिछले चार चुनावों से अजेय बने हुए हैं। कहीं न कहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ एक ऐसा प्रत्याशी ढूंढने में लगे हुए हैं जो भले ही उन्हें पराजित न कर पाए लेकिन ऐसी टक्कर देकर यह महसूस करवा दे कि उनके अभेद्य दुर्ग में सेंध लग चुकी है और उनकी 'बादशाहत' अब सुरक्षित नहीं रही। इसी तारतम्य में कांग्रेस के बूढ़े शेर कहलाने वाले एक वरिष्ठ नेता ने दक्षिण विधानसभा सीट से एक वरिष्ठ पत्रकार अनल प्रकाश शुक्ला का नाम आगे बढ़ाया है जिसके नाम का विरोध अन्य कोई वरिष्ठ नेता नहीं कर सकता।  क्योंकि इस वरिष्ठ पत्रकार ने अपने 30 साल के साफ सुधरे बेदाग कैरियर में एकाध को छोड़कर बाकी सभी नेताओं को नेता बनते देखा है। कांग्रेस में प्रत्याशी चयन को लेकर छानबीन समिति की बैठक 3 अक्टूबर को है। संभवत: बैठक में श्री शुक्ला का नाम तय कर केन्द्रीय समिति को भेज दिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल लगातार चार बार से रायपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जा रहे हैं। नए परिसीमन में रायपुर के दो विधानसभा क्षेत्र बढ़कर चार हो गए हैं। कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले रायपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी की हैसियत से बृजमोहन अग्रवाल ने ही फतह हासिल की थी। बृजमोहन अग्रवाल ने इस सीट को भाजपा का गढ़ बना दिया है। रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट को कांग्रेस प्रतिष्ठा की सीट मानकर चल रही है, इस बार कांग्रेस यहां जीत हासिल करना चाहती है। कांग्रेस में दक्षिण विधानसभा सीट से टिकट के लिए संतोष दुबे, योगेश तिवारी, प्रमोद दुबे, हाजी नाजिमुद्दीन, पप्पु फरिश्ता सहित अन्य कई नाम चर्चा में रहे हैं। रायपुर दक्षिण सीट से प्रदेश के एक बड़े नेता ने काफी सोच विचार कर वरिष्ठ पत्रकार अनल प्रकाश शुक्ला का नाम सामने कर दिया। श्री शुक्ला का नाम सामने आने से प्रदेश के बाकी नेताओं ने भी कोई विरोध नहीं किया है। उनके नाम पर सभी सहमत बताए जाते हैं। जानकारों का कहना है कि रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट में सर्वाधिक ब्राम्हण समाज के मतदाता हैं। ब्राम्हण समाज के मतदाताओं के अलावा मूल छत्तीसगढ़िया अन्य जाति भी इस क्षेत्र में निवास करते हैं। शहरी क्षेत्र में जातिवाद व छत्तीसगढ़िया वाद कभी हावी नहीं रहा है, लेकिन यदि कांग्रेस श्री शुक्ला को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारती है तो यहां मुकाबला काफी दिलचस्प होगा और राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के लिए यह सीट आसान नहीं होगी। श्री शुक्ला की छवि साफ-सुथरी है, वे राजनीति में सक्रिय नहीं है, लेकिन समाज में उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है। यदि श्री शुक्ला को प्रत्याशी बनाया जाता है तो इस चुनाव में श्री अग्रवाल को काफी संघर्ष करना पड़ेगा।
रायपुर की एक सीट ओबीसी को दिया जाना लगभग तय है। इनमें चंदशेखर यादव, सुधीर कटियार और मोतीलाल साहू का नाम चर्चा में है। बाकी दो सीटों में एक पर सत्यनारायण शर्मा का नाम तय हो गया है। एक अन्य सीट पर रमेश वर्ल्यानी के नाम पर सहमति मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार छानबीन समिति की आखरी बैठक शुक्रवार को होगी। बैठक में अंतिम रूप से नाम छटनी कर केन्द्रीय समिति को भेज दिया जाएगा। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक 8 व 9 अक्टूबर को होगी। प्रत्याशियों की सूची दशहरे के बाद जारी होने की संभावना है।

Wednesday, October 1, 2008

योग गुरु बाबा रामदेव का खेल

 नई दिल्ली,  अक्टूबर - रामायण में चर्चित हुई संजीवनी बूटी की फिर से तलाश कर लेने का स्वामी रामदेव का दावा खतरे में है। रामदेव और उनकी पतंजलि योग पीठ तो संजीवनी बूटी के पेटेंट की भी तैयारी कर चुकी थी। यह वही बूटी है जिसके बारे में रामायण में कहा गया है कि युद्व में बेहोश पड़े लक्ष्मण को जीवित करने के लिए हनुमान पूरा पहाड़ ही उठा लाए थे।  

पतंजलि पीठ के आचार्य बाल कृष्ण ने मीडिया से कहा था कि हमने संजीवनी बूटी खोज ली है और अब संसार की किसी भी बीमारी का इलाज असंभव नहीं रह गया। लेकिन वैज्ञानिक और खास तौर पर वनस्पति वैज्ञानिक इस दावे को बेहूदा बता रहे है और कह रहे है कि यह स्वामी रामदेव का प्रचार का एक और टोटका है। जिन प्रोफेसर आरडी गौर को स्वामी रामदेव खुद बहुत बड़ा विद्वान मानते हैं और जो अभी हाल तक हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविधालय के वनस्पति विभाग के प्रमुख थे, खुद इस दावे के खिलाफ खड़े हो गए।  श्री गौर ने कहा है कि जो बूटी कही जा रही है वह असल में वनस्पति विज्ञान की भाषा में सैलिनम कैडोलिल और गॉसीफिफोरा नाम के वे पौधे हैं जो हिमालय में सदियों से पाए जाते हैं और इनके औषधिय गुणों की जानकारी इलाके के बच्चे बच्चे को है। उन्होंने यह भी कहा कि रामायण के अनुसार संजीवनी बूटी में वे रसायन है जिनकी वजह से वह रात को जगमगाती है, इसमें बेहोशी दूर करने के गुण है और यह स्नायु तंत्र को ताकतवर बनाती है। श्री गौर के अनुसार जो पौधे संजीवनी बूटी बताए जा रहे हैं उनमें इनका एक भी गुण नहीं है। 

इतना ही नहीं हिमालय की औषधीय वनस्पतियों और अन्य पौधों के विशेषज्ञ और पदम श्री प्राप्त प्रोफेसर ए एन पूरोहित ने भी रामदेव की मंडली की इस दावे को बड़बोलपन और जनता को मुनाफे के लिए बेवकूफ बनाने की कोशिश बताया है। इस झगड़े में उत्तराखंड सरकार भी फंस गई है क्योंकि तीन महीने पहले स्वास्थ्य मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने संजीवनी बूटी खोजने के लिए एक सरकारी अभियान शुरू किया था लेकिन पतंजलि पीठ के दावे से इस अभियान पर भी सवालिया निशान लग गया है। श्री निशंक ने आज कहा कि सरकार संजीवनी बूटी खोजने का अपना कल्याणकारी कार्यक्रम जारी रखेगी। डेटलाइन इंडिया

Saturday, September 20, 2008

राजनीति में सफारी की सवारी, कितनी भारी 

संजीत त्रिपाठी 
रायपुर,सितंबर। टाटा की पैसेंजर श्रेणी में सफारी भले ही सबसे उन्नत कहलाने वाली टाटा सफारी भले ही सबसे आरामदेह मानी जाती हो लेकिन राजनीतिक लोगों के लिए इसकी  सवारी एक अभिशाप की तरह साबित हो रही है। कुछ दिलचस्प आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि  सफारी का उपयोग करने वाले राजनीतिज्ञों का कैरियर इस दौरान धूमिल होता गया। जबकि कुछ मामलों में धूमिल होते कैरियर के बीच जब इन दिग्गजों ने सफारी छोड़कर दूसरी गाड़ी पर  सवारी शुरु की तो उनका कैरियर फिर से रास्ते पर आ गया। यह सिर्फ़ एक संयोग है या फिर वास्तु का प्रभाव या फिर कुछ और, कहना मुश्किल है,  लेकिन ये आंकड़े कम से कम राजनीतिज्ञों को तो इससे दूर रहने के संकेत दे रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ पर नज़र डालें तो यहा के राजनीतिज्ञ दिग्गज वीसी शुक्ल नें 1998 में टाटा सफारी की सवारी शुरु की, तब से लेकर  2007 तक वे सफारी में ही चलते थे।  लेकिन इस दौरान उनका राजनीतिक कैरियर डूबता ही चला गया। कांग्रेस छोड़कर उन्होनें एनसीपी से नाता जोड़ा लेकिन यहां भी खास सफलता नही मिली। राज्य विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता पाने से रोका जरुर लेकिन खुद का सिर्फ़ एक ही विधायक चुना गया। इसके बाद वे भाजपा में चले गए। वहां भी उन्नति कहलाने जैसा कुछ नही हुआ। भाजपा के बाद वे कांग्रेस में आने के लिए लंबे समय तक दरवाजा खटखटाते रहे। ठीक इसी दौरान  उन्होनें सफारी छोड़कर लैंड क्रूज़र में सवारी शुरु की। सफारी से अलग होते ही न केवल कांग्रेस के दरवाजे उनके लिए खुल गए बल्कि प्रभाव में भी दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती गई।  इसी तरह राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद ताकतवर माने जाने वाले गृहमंत्रालय की कमान बृजमोहन अग्रवाल को मिली। इसी समय उन्होनें अपने बेड़े में टाटा सफारी  शामिल की और उसमे सवारी शुरु की। सफारी के सफर के दौरान उनका प्रभाव तो कम हुआ ही उनके हाथ से गृह जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय भी फिसल गया। इसके बाद वे भी सफारी से तौबा करते हुए अंबेसडर पर सवार हो गए। इससे न केवल उनका प्रभाव बढ़ा बल्कि  उनके विभागों ने नए कीर्तिमान रचते हुए पूरे देश में पहचान बनाई। इस बीच उन्हें मालखरौदा और केसकाल विधानसभा उपचुनावों
की जिम्मेदारी मिली,इसमें मालखरौदा में तो भाजपा की हालत बहुत खराब थी लेकिन इसके बाद भी वहां पार्टी विजयी हुई। इसके अलावा सरकार के दूसरे वजनी मंत्री अमर अग्रवाल ने भी  मंत्री बनने के बाद सफारी का सफर शुरु किया। सफारी नें उन्हें भी गच्चा दिया, वे भी जब तक सफारी में चले परेशान ही रहे। बताया जाता है कि वे इस्तीफा देने गए  तो भी सफारी में ही गए। इसके बाद उन्होनें सफारी  को नमस्ते कह दिया और दूसरी गाड़ी पकड़ी। दूसरी गाड़ी पकड़ते ही  उन्हें फिर से मंत्री पद मिला और राजनीति में प्रभाव भी बढ़ा। 
इधर छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत ने भी पहली बार राज्य कांग्रेस की जवाबदारी मिलने पर सफारी में सफर करना शुरु कर दिया। नतीजा यह हुआ कि कामयाबी  उनके दरवाजे का रास्ता ही भूल गई। पार्टी में गुटबाजी बढ़ी, हालत यह हो गई कि कांग्रेस में संगठन नाम की चीज न के बराबर होकर रह गई। उस दौरान हुआ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कोई खास कामयाबी नहीं मिली। महंत आखिर तक अपनी कार्यकारिणी ही नही बना पाए और अंतत: उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष तक ही सीमित कर दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि महंत भी ही सफारी में ही सफर करते हैं। इसी तरह पीसीसी के नए अध्यक्ष धनेंद्र साहू भी सफारी में ही चल रहे हैं। अभी तक तो न ही उनकी कोई उपलब्धि है न ही आगे दिख रही है। उनके अध्यक्ष बनने के बाद भी कांग्रेस न तो किसी मुद्दे पर  भाजपा को घेर पा रही है न ही  अपनी उपलब्धियां जनता को बता पा रही है। अन्य नामों में देखें तो धमतरी के पूर्व विधायक गुरुमुख सिंह होरा ने भी  सफारी के आरामदेह सफर का आनंद लेना शुरु किया तो महापौर का चुनाव ही हार गए।  होरा जब तक सफारी में चले  हाशिए पर ही रहे, अलबत्ता खबरों की मानें तो उन्होनें अब जाकर सफारी को अलविदा कह दिया है। भाजपा के छत्तीसगढ़ अध्यक्ष विष्णुदेव साय भी  सफारी में ही चलते हैं।  उनके खाते में भी उपलब्धि का कोई तमगा नही है। पूर्व सांसद पीआर खूंटे ने भी जब से सफारी का सफर चुना तब से ऐसे हाशिए पर चले गए कि अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए ही उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। 
अब बात मुख्यमंत्री रमन सिंह की करें तो उनका काफिला भी सफारी से भरपूर है, वे खुद सफारी में ही चलते हैं। लेकिन दिलचस्प यह है कि  औसत रूप से रमन का कैरियर और प्रभाव दोनो ही बढ़े हैं।
 चाहे वह राज्य भाजपा  में हो या आलाकमान के सामने। जनता के सामने भी उनकी इमेज बेदाग और सरल बना हुआ है। लेकिन सफारी के आंकड़ों को मानने वालों का कहना है कि अभी तक रमन सफारी पर भारी पड़े हैं लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में यह सफारी फैक्टर  भारी पड़ गया तो…………………।
इसी तरह विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडे भी सफारी  पर ही चलते हैं। प्रभाव उनका भी बढ़ा है, सारी दुनिया घूम आए हैं। सदन में नई परंपराओं का कीर्तिमान उन्होनें रचा है लेकिन कहा जाता है कि उनकी सीट पर उनका असर कम होता जा रहा है, मतलब यह कि इन पर भी सफारी फैक्टर असर दिखा सकता है। 
सफारी फैक्टर पर नज़र डालने लायक तो यह पुराने लेकिन दिलचस्प तथ्य भी हैं केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने सफारी पर सवार हो कर ही सीधी और होशंगाबाद से चुनाव लड़ा था, और पराजित हुए। कांग्रेस नेता कमलनाथ उपचुनाव में क्षेत्र में सफारी पर ही घूमे थे, चुनाव हार गए। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सफारी से ही राज्य भर में घूमे, राज्य भर में कांग्रेस हारी और सत्ता छूट गई।
 अशोक गहलोत ने भी सफारी पर चढ़कर ही चुनाव लड़ा और हार गए।जयललिता ने मुख्यमंत्री रहते हुए सफारी की सवारी की, उनकी पार्टी ही सत्ता से बाहर हो गई।कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ में सफारी से ही रोड शो किया, जहां-जहां किया वहां-वहां कांग्रेस हार गई।

Monday, March 10, 2008

गांधी ने तो देश को तोड़ने का काम किया-योगी

लखनऊ, मार्च। महंत योगी आदित्य नाथ ने आज महात्मा गांधी पर हमला बोलते हुए कहा- जिन्हें राष्ट्रपिता का दज्र दिया गया है उन्होंने तो देश और समाज को तोड़ने का काम किया। वे राष्ट्रपिता के सम्मान के हकदार नहीं हैं। योगी आदित्य नाथ आज यहां नौजवानों के एक सम्मेलन में बोल रहे थे। आज का सम्मेलन भाजपा की गोरखपुर में हुई प्रांतीय कार्य समिति के जबाब के रूप में देखा ज रहा है। योगी आदित्य नाथ पूर्वाचल में अपने उग्र हिन्दुत्व की प्रयोगशाला का विस्तार करते ज रहे हैं। लखनऊ में युवाओं का सम्मेलन इसी की एक कड़ी है।
योगी आदित्य नाथ ने सम्मेलन में आगे कहा-देश को राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम भगवान श्रीराम और कृष्ण ने किया। और यही दोनों राष्ट्रपिता का सम्मान पाने के हकदार हैं। जिन्हें राष्ट्रपिता का दज्र दिया गया है, देश की आजदी में भी उनका कोई खास योगदान नहीं है। उन्होंने कहा कि देश की आजदी में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अगर सुभाष चंद्र बोस की आजद हिन्द फौज न होती और वीर सावरकर जसे क्रांतिकारियों ने अपनी जवानी न बरबाद की होती तो देश को आजदी नहीं मिल पाती।
योगी का ये सम्मेलन राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका विषय पर था। इसका आयोजन योगी की हिन्दू युवा वाहिनी ने सरस्वती शिशु मंदिर के उस प्रांगण में कराया था जहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
और भाजपा के राजनैतिक कार्यक्रम होते रहते हैं। हिन्दू युवा वाहिनी के मंच पर योगी आदित्य नाथ का राजधानी में यह पहला कार्यक्रम था। योगी आदित्य नाथ पूर्वाचल के कई जिलों मसलन गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, गोण्डा, बलरामपुर, श्रावस्ती और सिद्धार्थनगर जसे कई जिलों में अपना आधार बढ़ाया है। पिछले विधानसभा चुनाव में इन इलाकों में टिकट बंटवारे को लेकर उनका भाजपा से तीखा विवाद भी हो गया था। इस लिहाज से योगी आदित्य नाथ की लखनऊ में उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी ज रही है। आज के सम्मेलन में जहां लखनऊ विश्वविद्यालय के काफी संख्या में छात्र इकट्ठा हुए थे, वहीं योगी समर्थक विधायक भी मौजूद थे। आज के सम्मेलन में पत्रकार योगेश मिश्र विशिष्ट अतिथि थे और सम्मेलन की अध्यक्षता लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा ने की। बहरहाल महात्मा गांधी पर योगी आदित्य नाथ की टिप्पणी से मंच पर बैठे लोग भी हैरान रह गये।