Monday, October 31, 2011

गागा को तालियां,किसानो को गालियां



अंबरीश कुमार
लखनऊ । पिछले चौबीस घंटे में गोरखपुर में जापानी बुखार से तीन बच्चों की मौत के साथ ही इस वर्ष गोरखपुर में इस बीमारी से मरने वालों की संख्या पांच सौ तक पहुँच गई । पूर्वांचल में जापानी बुखार और जल जनित बीमारियों से हर साल की तरह इस बार भी मौत का सिलसिला जारी है । इसकी मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकार की बेरुखी और स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर पर्याप्त पैसा न दिया जाना है । दूसरी तरफ ग्रेटर नोयडा में फार्मूला -१ रेस के लिए अरबो रुपए फूंक दिए गए और दलितों की सबसे बड़ी नेता और देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री मायावती भी इसमे शामिल हुई । बाद में लेडी गागा का कार्यक्रम हुआ । शैम्पेन ,शराब और शबाब का दौर चला और लोग भूल गए कि यह वाही राज्य है जहाँ कुछ घंटे पहले ही करछना में किसानो पर लाठी गोली चली और गालियों से नवाजा गया । यह वही राज्य है जिसके एक छोर पर बच्चों की मौत का सिलसिला इसलिए नहीं थम पा रहा है क्योकि उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं है । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस विरोधाभास पर कहा -यह चिंतनहीन राजनीति की अय्यासी का अय्यासी का दौर है जो मध्यकाल के सुल्तानों को भी मात कर रहा है । समाजवादी पार्टी ने इसे दलितों के नाम पर क्रूर मजाक बताया और एलान किया कि सत्ता में आने पर इसकी जाँच करई जाएगी।
दरअसल इस खेल में जिस तरह सत्तारूढ़ दल ने दिलचस्पी दिखाई है उससे राजनैतिक हलकों में हैरानी जताई जा रही है । भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा -यह वोट की राजनीति और भ्रष्टाचार की काली कमाई का नतीजा है । इस सरकार को समाज का यथार्थ नहीं दिखता,गरीबी और भुखमरी नहीं दिखती । यह बात कभी हदतक सही भी नजर नजर आती है । पूर्वांचल में जिस तरह स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बच्चे मर रहे है उसे देखते हुए ग्रेटर नोयडा का कार्यक्रम किसी के गले के नीचे नहीं उतरपा रहा है । इस आभिजात्य वर्गीय खेल को लेकर प्रदेश का जेपी समूह भी फिर विपक्ष के निशाने पर आ गया है। विपक्ष का आरोप है कि एक तरफ यह समूह किसान की जमीन छीनकर सरकार के जरिए निहत्थे किसानो पर लाठी गोली चलवाता है तो दूसरी तरफ गरीबों का मजाक उड़ाते हुए पैसे का भौंडा प्रदर्शन इस तरह के खेल के नाम पर करता है ।फार्मूलावन रेस की तैयारी के साथ शनिवार को करछना (इलाहाबाद) में प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए जमीन लिए जाने का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस ने जमकर लाठियां चलाई और फायरिंग भी की। महिलाओं और बच्चों पर भी जुल्म ढाये गए। क्षेत्र के आठ गांव इस योजना से प्रभावित होने जा रहे है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - कल फार्मूला-1 सत्र की 17वीं और भारत की पहली रेस सिनेसितारों और पाप सिंगर लेडी गागा की उपस्थिति में सम्पन्न हुई और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी रेस की दर्शकों में रहीं। उनके द्वारा पुरस्कार भी बांटे गए। इस रेस के आयोजन पर 20 अरब रूपए से ज्यादा खर्च हुए हैं। रेस खत्म होने पर शराब और शबाब का खुलकर प्रदर्शन हुआ। भारत में, जहां 80 प्रतिशत आबादी आज भी 20 रूपए रोज पर गुजर-बसर करती है, दो जून पेट भरने लायक जिसकी कमाई नहीं, उस देश-प्रदेश मे राजसी खेल का आयोजन शमशान में शाही दावत के इंतजाम जैसा है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश की मुख्यमंत्री की दौलतमंदों के खेल में दिलचस्पी दलितों के साथ क्रूर मजाक है। झुग्गी-झोपड़ी में बीमारी, तंगहाली और कर्ज के शिकार दलितों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेंमाल करनेवाली मुख्यमंत्री ने बड़े पूंजीघरानों से दोस्ती के लिए ही इस खेल में सक्रिय दिलचस्पी ली है। इसमें उनकी ओर से भी लम्बी रकम का पूंजीनिवेश किया गया है। उनके इस खेल प्रेम की बलि चढ़े है ग्रेटर नोएडा के वे किसान जिनकी 875 एकड़ जमीन जबरन छीनकर फार्मूला वन रेस की सर्किट तैयार की गई है। इन गांवों के बुजुर्ग हतप्रभ थे कि ये क्या हो रहा है, यह कोई खेल है या अमीरो की चोंचलेबाजी। उनसे जबरन छीनी जमीन पर विदेशी कारों का फर्राटा और साथ में नशे में झूमती युवतियां। jansatta

सौ चिठ्ठियों के जवाब में एक ख़त

अंबरीश कुमार
लखनऊ । उतर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रधानमंत्री के नाम लिखे सौ से ज्यादा पत्रों के जवाब में कांग्रेस के एक पत्र ने सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाल दिया है । यह सौ सुनार की बनाम एक लुहार की वाली कहावत को चरितार्थ भी करता है । इस पत्र के साथ ही विधान सभा चुनाव की तैयारी में जोर शोर से जुटी कांग्रेस मायावती को बचाव की मुद्रा में लाती दिख रही है ।सत्ता में आने के बाद मायावती ने अबतक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को करीब सौ पत्र लिख चुकी है पर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के पत्र ने मायावती की राजनैतिक घेरेबंदी कर दी है। जयराम रमेश का यह पत्र राजनैतिक मकसद में कामयाब होता नजर आ रहा है। किसी भी प्रदेश में किसी घोटाले की सीबीआई जांच सत्तारूढ़ दल के लिए परेशानी का सबब बन जाती फिर जब मामला उत्तर प्रदेश का हो जहां सभी दल चुनावी तैयारी में जुटे हों तो उसके राजनीति मायने भी होते है।उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ,सांसदों और मंत्रियों से जुड़े कई मामले जांच के घेरे में है जिनमे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम का बड़ा घोटाला भी है जिसमे एक हिस्ट्रीशीटर सांसद,दो दागी मंत्री के साथ कई और नेता भी घेरे में है। पर मनरेगा का घोटाला विधान सभा चुनाव के मद्देनजर ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि इसका दायरा काफी बड़ा है और इसका राजनैतिक असर भी ज्यादा पड़ेगा ।
इस समय करीब दर्जन भर जिलों से मनरेगा को लेकर गंभीर शिकायते सामने आई है और चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी लूट का मुद्दा कांग्रेस जोर शोर से उठाएगी । यही सवाल सत्तारूढ़ दल को सांसत में डाले हुए है जिसका जनाधार राजनीति के अपराधीकरण के साथ राजनैतिक लूट और वसूली के चलते खिसक रहा है । मायावती वर्ष २००७ में जब २०६ सीटों के साथ सत्ता में आई थी तो बसपा को ३०.४३ फिसद वोट मिला था पर उसके बाद कांग्रेस ने बढ़त ली और २००९ के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक तीन फीसद गिरकर २७.४२ फीसद पर पहुँच गया था। विधान सभा की सीटों में इसे तब्दील करने पर लोकसभा चुनाव में बसपा अपनी आधी क्षमता पर पहुँच चुकी थी । ऐसे में बसपा का संकट बढ़ सकता है। अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जो कांग्रेस पहले पशोपेश में थी अब आगे बढ़ कर सत्तारूढ़ दल पर हमला कर रही है। यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा भी है । कांग्रेस की मीडिया कमेटी के प्रभारी राजबब्बर ने कहा -पहले की तुलना में कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव आया है ,अब कांग्रेस चुनावी संघर्ष में आ चुकी है । लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जिस तरह लोगों को चौकाया था वैसे ही नतीजे विधान सभा चुनाव के होंगे। सरकारी लूट खसोट और राजनैतिक गुंडागर्दी के खिलाफ कांग्रेस गांव गांव तक लोगों को लामबंद करेगी । यह सवाल उठाएगी कि गैर कांग्रेसी दलों ने इस प्रदेश को किस जगह पहुंचा दिया है ।
फिलहाल मुद्दा मायावती और केंद्र के बीच चिठ्ठी पटरी को लेकर शुरू हुए विवाद का है। मायावती अबतक अपने राजनैतिक एजंडा को लेकर पत्र भेजती रही है। चाहे उत्तर प्रदेश के बंटवारे का मामला हो या फिर बुंदेलखंड पॅकेज का मामला या फिर विभिन्न समुदायों के आरक्षण का मुद्दा हो इनका मकसद कांग्रेस की राजनैतिक घेरेबंदी ज्यादा रहा है। आज मायावती मीडिया को लेकर जो आरोप जयराम रमेश पर लगा रही है वे खुद यह करती रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राजबब्बर ने कहा - मीडिया को तो मायावती पहले पत्र देती है फिर प्रधानमंत्री को भेजती है । मायावती ने जब भी प्रधानमंत्री को ख़त लिखा मीडिया को जानकारी दी गई और आमतौर पर प्रेस कांफ्रेंस कर यह जानकारी दी जाती रही है । आज वे इस तरह का आरोप लगा रही यह उन्हें शोभा नहीं देता ।
जाहिर है अब कांग्रेस मायावती के राजनैतिक हथियारों से ही मुकाबला कर रही है। जयराम रमेश के पत्र के बाद जिस तरह उत्तर प्रदेश सरकार में बैठको का सिलसिला चला और मनरेगा को लेकर विभिन्न जिलों से जानकारिय जुटाई गई वह सरकार की बेचैनी को दर्शाता है । सरकार यह भी नहीं चाहती कि इस घोटाले को लेकर सीबीआई जांच तक मामला पहुंचे वर्ना सत्तारूढ़ दल की मुश्किलें बढ़ सकती है इसलिए मायावती जयराम रमेश के पत्र के बावजूद केंद्र से कोई टकराव लेने के मूड में नहीं है । जिसका राजनैतिक फायदा कांग्रेस को मिलता नजर आ रहा है । जनसत्ता

Thursday, October 20, 2011

कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है अन्ना आंदोलन


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश के कई जन संगठन आगामी विधान सभा चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों को हराओ का की अपील करेंगे। उत्तर प्रदेश केविधन सभा चुनावों में बड़े पैमाने पर बाहुबली और दागी उम्मीदवार खड़े होने वाले है । जिसके चलते अगर बड़े स्तर पर बाहुबली और दागी नेताओं के खिलाफ माहौल बना तो राजनीति का काफी कचरा साफ़ हो जाएगा । इन जन संगठनों का यह भी मानना है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का जिस तरह राजनैतिक रूप ले रहा है उससे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हराओं के नारे का अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा जैसे दलों को होगा इसलिए चुनाव सुधार की मूल अवधारणा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रखने के लिए बिना किसी दल के साथ या विरोध में खड़े हुए समाज को जागरूक करना होगा। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े कई जन संगठन और नेताओं ने टीम अन्ना की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि जब भी जन संगठन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे तो वे हाशिए पर चले गए। उसके लिए अलग राजनैतिक ओउजार बनाना चाहिए । भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत लाखो की रैली करते थे पर राजनीति में आए तो कोई चुनाव नहीं जीता पाए ।कर्णाटक में रैय्यत संघ और महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन उदाहरण है। इसलिए टीम अन्ना को कोर कमेटी की बैठक बुलाकर इस पर अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए। हिसार में राजनैतिक दखल के चलते ही एकता परिषद के पीवी राजगोपाल और जल बिरादरी के राजेंद्र सिंह अलग हो चुके है और कई लोग विरोध जता चुके है। वाराणसी के सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज ने चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों के खिलाफ अभियान छेड़ने साथ टीम अन्ना से कहा है कि वह भी कोर कमेटी में यह मुद्दा उठाकर चुनाव सुधर के अपने वायदे पार आगे बड़े और किसी एक दल का समर्थन या विरोध न करे ।
गौरतलब है कि राजनैतिक दखल को लेकर टीम अन्ना और उनके समर्थकों में भी मतभेद सामने आ चुके है । हालाँकि टीम अन्ना के कोर कमेटी के एक सदस्य सुनीलम ने कहा - चुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील का वे ही लोग विरोध कर रहे है जो या तो कांग्रेस के समर्थक है या सरकार की कमेटियों में बैठे है या फिर कोई लाभ ले रहे है। जबकि आंदोलन के दूसरे सहयोगी संदीप पांडेय ने कहा- जन संगठनों और जन आंदोलनों के तौर तरीको से उलट अन्ना आंदोलन अब कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है।लोकतांत्रिक तरीके से कोई फैसला नहीं हो रह़ा । कुछ लोग फैसले करते है तो उसकी जानकारी नहीं मिलती। फिर हिसार में कांग्रेस हराने का फैसला कोर कमेटी का का नहीं था । ऐसी ही कुछ मुद्दों को लेकर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय के राष्ट्रीय समन्वय यानी एनएपीएम ने अन्ना के आंदोलन को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया है । बेहतर तो यह हो कि उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चलते हुए दागी और बाहुबली उम्मीदवारों को हराने की अपील की जाए ।
इसी तरह गांधीवादी नेता और सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज भी हताश नजर आए।वे भी एक पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ने के पक्ष में नहीं है बल्कि चुनाव सुधारों का एजंडा लागू करने के समर्थक है । राम धीरज ने कहा - जो लोग भी जन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे वे हाशिये पर चले गए और एक सीट नही जीत पाए। चाहे लाखों की रैली करने वाले महेंद्र सिंह टिकैत हो या शेतकरी संगठन के शरद जोशी या फिर बकर्णाटक में रैय्यत संघ के नंजदुंग स्वामी ।ऐसे में आंदोलन को राजनैतिक दखल से पहले विचार विमर्श करना चाहिए था । इस मुद्दे पर एकता परिषद जैसा बड़ा जन संगठन अलग हो गया ,राजेंद्र सिंह की जल बिरादरी अलग हो गई। उसके बाद उत्तर प्रदेश में भी वही नारा दिया जा रहा है । राजनीति करनी है तो जन उम्मीदवार उतारे । पिछली बार लखनऊ में जन आंदोलनों के जन उम्मीदवार को लोकसभा में ४२१ वोट मिले थे। क्या यही हश्र अन्ना आंदोलन के को इतने बड़े आंदोलन का करना चाहते है ।
संघर्ष वाहिनी मंच के राजीव ने कहा -हम लोग तो शुरू से बाहुबलियों को हराने की अपील करते रहे है और फिर करेंगे । पर कांग्रेस पर दबाव बहुत जरुरी है क्योकि यह पार्टी बहुत शातिर पार्टी है और लोकपाल बिल लाएगी इस पर हमें संदेह है ।
ऎसी ही राय कई अन्य जन संगठनों के लोगो की थी । दरअसल कोई भी आंदोलन कई दशक बाद खड़ा होता है पर कुछ समय तक उसका असर समाज पर बना रहता है। जेपी आंदोलन से वीपी सिंह का आंदोलन उदाहरण है । कई दशक बाद अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते देश का मध्य वर्ग बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरा था ,यह टीम अन्ना का बड़ा योगदान है पर आंदोलन की दृष्टि , विचारधारा और ठोस कार्यक्रम के अभाव में इसी मध्य वर्ग का मोहभंग होने लगा है। जन संगठनों का मानना है कि जिस देश के अस्सी फीसद गांवों और छोटे शहरों में बिजली न आती हो उस देश में सिर्फ सोशल नेट वर्किंग ,फेस बुक ,ई मेल और एसएमएस व अन्य संचार साधनों से बड़े आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते है। इसके लिए प्रतिबद्ध जमीनी कार्यकर्ताओं की कतार तैयार करना जरुरी है ।
अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी के प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास ने जनसत्ता से कहा -अन्ना आंदोलन के दौरान देश का एक बड़ा तबका सड़क पर आया था ।पर उसके बाद जिस तरह के सवाल खड़े हुए उसका असर यकीनन जन मानस पर पड़ेगा।पर हम नए सिरे से प्रयास कर रहे है । जबकि मनीष सिसोदिया ने कहा-अन्ना का आंदोलन किसी राजनैतिक दल के खिलाफ नही है । कांग्रेस के खिलाफ जन दबाव इसलिए बनाया जा रहा है क्योकि वह केंद्र की सत्ता में है । यह बिल भाजपा , बसपा या समाजवादी दल अपने बूते पास नहीं करा सकते है । इसी वजह से हम कांग्रेस पर ज्यादा दबाव बना रहे है । उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में प्रदेश सरकार पर जो आरोप लग रहे है उससे टीम भी पूरी तरह सहमत है । हमने बांदा में भ्रष्टाचार का जो मुद्दा उठाया वह प्रदेश सरकार से ही जुड़ा हुआ था । आगे भी हम राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे । हमारा मानना है कि बसपा ,सपा ,कांग्रेस और भाजपा सभी में भ्रष्ट लोग मौजूद है इसलिए किसी एक दल को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता ।
जनसत्ता

Wednesday, October 19, 2011

हजारे के आंदोलन से दूर जा रहे है जन संगठन

अंबरीश कुमार
लखनऊ 19,अक्तूबर। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन संगठनों और आमजन का मोहभंग होता नजर आ रहा है । टीम अन्ना के वैचारिक भटकाव और बिखराव के चलते अब उसे वह समर्थन नहीं मिल रहा जो अगस्त में मिला था।इसका अहसास उत्तर प्रदेश के दौरे पर निकली टीम अन्ना के सदस्यों को भी होने लगा है। अगस्त में अन्ना के अनशन के दौरान जो लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे थे उनके लिए सैलाब और जन सैलाब जैसे विशेषण का इस्तेमाल किया गया था पर पिछले दो दिन में उत्तर प्रदेश में पश्चिम से पूरब तक का दौरा करने वाली टीम अन्ना की सभाओं में कही पांच सौ लोग आए तो कही हजार। यह अगस्त क्रांति का दूसरा पहलू है।बांदा,कानपुर,लखनऊ ,फैजाबाद से लेकर गोरखपुर टीम अन्ना ने दौरा किया और कांग्रेस विरोध की मजबूरी भी बताई साथ ही सपा ,बसपा और भाजपा पर भी निशाना साध कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि वे किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं खड़े है। अन्ना समर्थको का नया नारा है -न हाथ न हाथी ,हम है अन्ना के साथी । न साइकिल न कमल ,हम करेंगे अन्ना पर अमल । पर हिसार में जो गलती टीम अन्ना ने की उसका खामियाजा सामने आने लगा है । मंगलवार को जिस झूलेलाल पार्क में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का कार्यक्रम हुआ वह लखनऊ विश्विद्यालय समेत तीन बड़े और ऐतिहासिक कालेजों और दर्जन भर छात्रावासों से घिरा हुआ है । पर शाम छह बजे भी सारी कुर्सियां नहीं भर पाई थी । अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता मुन्ना लाल शुक्ल जो पिछली बार आमरण अनशन पर बैठे थे इस बार हताश थे । मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता से कहा - सौ बच्चों को तो मै हरदोई से लाया था पर फिर भी पांच सौ कुर्सियां नहीं भर पाई क्योकि हमारे नेता कई खेमे में बंट गए है। सौरभ ने तो एलान कर रखा था कि अगर सक्सेना के लोगों ने मंच पर जाने की कोशिश की तो हमारे लड़के उन्हें तोड़ डालेंगे ।वैसे भी वह गांधी की अहिंसा और मद्य निषेध आदि को फालतू मानता है,कहता है आजादी तो गरम दल वालों ने दिलवाई थी। यह बानगी है आंदोलन का संचालन करने वाले नेताओं की दृष्टि की।
अन्ना आंदोलन के एक नेता ने नाम न देने क शर्त पर कहा -अगस्त में जब अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ तो सभी विचारधाराओं के लोग उसमे शामिल हुए और बड़ी संख्या में जन संगठनों के कार्यकर्त्ता थे। पर जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ा आंदोलन में शामिल नेताओ का टकराव और वैचारिक संकट भी बढ़ा। पहली आपति आंदोलन के तौर तरीकों को लेकर हुई। आंदोलन और नेता को एक एकरांड बनाने के सवाल पर पहला मतभेद हुआ तो दूसरा विचारधारा को लेकर । वंदेमातरम के नारे से लेकर दक्षिणपंथी ताकतों से संबंधो पर अगर पहले सफाई दे दी जाती तो आंदोलन पर संघ का ठप्पा तो नहीं लगता। दूसरे चुनावी दखल से हर हालत में बचाना चाहिए था क्योकि यह लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की थी किसी दल को हराने की नहीं।jansatta

किरण बेदी ने छूट की टिकटों पर संस्थाओं से वसूले पूरे पैसे


अजमेर सिंह
नई दिल्ली,अक्तूबर। संसद सदस्यों को अपने रामलीला घुंघट के अभिनय से चिढ़ाने वाली और अण्णा टीम की सबसे मुखर सदस्य किरण बेदी को कुछ स्पष्टीकरण देना पड़ सकता है। मसला है सेमिनार और सभाओं के लिए बुलाए जाने पर एनजीओ और संस्थाओं से यात्रा खर्च बढ़ाकर वसूलने का।
द इंडियन एक्सप्रेस के पास उपलब्ध बिलों,रसीदों और चैक की प्रतिलिपियों के रिकार्ड बताते हैं कि बहादुरी पुरस्कार प्राप्त बेदी को एअर इंडिया की टिकटों के किराए में छूट मिलती है, इसके बावजूद उन्होंने मेजबान संस्थाओं से पूरे पैसे वसूले। यही नहीं इकानामी क्लास में सफर कर उन्होंने बिजनेस क्लास का किराया भी वसूला।द इंडियन एक्सप्रेस के पास ऐसे 12 उदाहरणों के रिकार्ड हैं। इनमें से कई पुराने 2006 के भी हैं जब बेदी आईपीएस अधिकारी के रूप में सेवारत थीं।

उनकी हाल की ऐसी यात्रा का बिल 29 सितंबर को भेजा गया, जिसमें किराए की रकम बढ़ा कर दी गई है।
इन किराए के चैकों का भुगतान एनजीओ इंडिया वीजन फाउंडेशन को किया गया, बेदी इसकी प्रमुख हैं। उसके चार्टर्ड एकाउंटेंट सुरेश व्यास ने कहा कि जिसे आप गड़बड़ी कह रहे हैं, वह दरअसल उनकी ‘बचत’ है, क्योंकि बेदी ने उससे कम खर्च किया जितना उनको भुगतान किया गया। इस रकम का उपयोग मुद्दों से जुड़ी उन यात्राओं पर किया जाता है जिसके लिए बेदी को कोई भुगतान नहीं होता।
फरवरी, 2001 के सरकारी दिशानिर्देश के मुताबिक बहादुरी पुरस्कार विजेताओं को एअर एंडिया के विमान के इकानामी क्लास के टिकटों पर 75 फीसद की छूट मिलेगी। बेदी को 1979 में बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया था। उनका जीए(बहादुरी पुरस्कार) क्रमांक 433 है।जनसत्ता से

सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ


अंबरीश कुमार
लखनऊ अक्टूबर। असरार उल मजाज अगर जिंदा होते तो जिंदगी के सौंवे साल में आज कदम रखते, जिसे आमतौर पर आदमी की उम्र का पूर्णांक माना जाता है। लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह सुब्ह-ए-नौ मनाने की तैयारी शुरू हो गई है । इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। लखनऊ मजाज के जीवन के सौ साल पर उन्हें याद करने जा रहा है जिन मजाज लखनवी को जिंदगी से सिर्फ 44 साल ही मिल सके। इसके बावजूद मजाज़ लखनवी को उर्दू अदब में उनके दीर्घायु होकर रूखसत हुए तरक्कीपसंद समकालीनों फैज अहमद फैज,अली सरदार जाफरी,और मजरूह सुल्तानपुरी आदि के बराबर या कई मायनों में अधिक रूतबा हासिल है।
खुद फैज अहमद फैज उर्दू के तरक्कीपसंद इंकलाबी शायरों में मजाज़ को सबसे अनोखा और सहज मानते थे। मजाज़ के एकमात्र काव्य संग्रह आहंग की भूमिका में फैज अहमद फैज ने मजाज के बारे में लिखा है- ‘मजाज़ की इन्कलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इन्कलाब को लेकर गरजते हैं,सीना कूटते हैं इन्कलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वे इन्कलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते’ आज भले ही फैज अहमद फैज को बीसवी सदी के सबसे लोकप्रिय उर्दू शायर के रूप में पहचाना जाता हो लेकिन उर्दू के सभी जानकार इस बात को मानते हैं कि अपनी जिंदगी में जो लोकप्रियता मजाज़ लखनवी को हासिल थी वैसी तबतक किसी दूसरे शायर के हिस्से में नहीं आई थी। मजाज की इस लोकप्रियता के साथ उनके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दिनों की कहांनियां भी जुड़ी हैं जिनके बारे में इस्मत चुगताई और अली सरदार जाफरी समेत उर्दू के तमाम बड़ी हस्तियों ने लिखा है। १९ अक्टूबर १९११ को बाराबंकी के रूदौली कस्बे में जन्मे असरार उल हक मजाज ने लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़नी तब शुरू की जब वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे। बेहद कम उम्र में मजाज़ लखनवी ने जिस तरह साम्राज्यवाद,पूंजीवाद के विरोध में और स्त्री-मुक्ति के विषय में जैसी नज्में कहीं उसने जानकारों को हैरत में डाल दिया। मजाज के बारे में आलोचकों की ये हैरत आज भी कायम है।मजाज़ के साथ कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके चुनिंदा लोगों में से एक प्रो. शारिब रूदौलवी ने कहा- ‘यकीनन अगर मजाज को उतनी उम्र मिली होती जितनी जोश,फिराक, फैज या जाफरी को मिली तो न जाने वे उर्दू को और क्या क्या दे चुके होते.’ मजाज के बारे में ये बात भी चौंकाती है कि कालजयी इंकलाबी नज्मों के रचयिता होने के साथ ही उनकी शायरी की रूमानियत भी इतनी गहरी है कि उन्हे उर्दू शायरी का कीट्स भी कहा जाता है। यहां ये जान लेना जरूरी है कि मजाज़ के अविस्मरणीय होने की वजह सिर्फ उनकी शायरी ही नहीं बल्कि उनकी हाजिरजवाबी भी है जिसकी मिसालें उनके शहर लखनऊ में आज भी सुनने को मिल जाती हैं। गौरतलब है कि लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह, सुब्ह-ए-नौ आगामी २४ अक्टूबर को भारतेंदु नाट्य अकादमी के सभागार में मनाया जाएगा। इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। समारोह का आयोजन लखनऊ सोसाइटी की तरफ से किया जा रहा है जो कि लखनऊ की तहजीब के प्रति युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से काम कर रही है। संस्था के सदस्य आरजू ने बताया- ‘मजाज लखनवी का मकाम उर्दू साहित्य में बहुत बड़ा है लेकिन दुर्भाग्य से आज युवा पीढ़ी उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती। जन्मशताब्दी वर्ष में भी युवाओं में उनको लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं दिख रही। इस आयोजन के जरिए मजाज को श्रद्धांजलि देने के साथ ही लोगों में उनके प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश होगी।’ कार्यक्रम का शीर्षक मजाज के लखनऊ पर कहे गए मशहूर शेर से निकलता है- ‘अब इसके बाद सुब्ह है और सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ’ ।jansatta

Monday, October 17, 2011

मायावती सरकार के भ्रष्टाचार पर टीम अन्ना की ख़ामोशी


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर।टीम अन्ना ने आज उत्तर प्रदेश के बांदा से अपना अभियान शुरू किया पर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मायावती सरकार के खिलाफ कोई एलान नहीं किया। इस पर उत्तर प्रदेश के राजनैतिक दलों के साथ उत्तर प्रदेश में अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता राम धीरज ने भी हैरानी जताई है।समाजवादी पार्टी ने साफ़ कहा कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी मायावती सरकार से डर कर अन्ना हज़ारे भाग गए। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई मायावती सरकार के खिलाफ कोई कार्यक्रम लिए बिना अधूरी है और ऎसी लड़ाई पाखंड मानी जाएगी । बांदा में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस के खिलाफ अपना अभियान जारी रखते हुए लोगों से अपील की कि जन लोकपाल बिल अगर शीतकालीन सत्र में पास नहीं होता है तो कांग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए। ख़ास बात यह थी कि जिस बांदा से टीम अन्ना ने अपना अभियान शुरू किया वहा पर सत्तारूढ़ दल के असरदार मंत्री के भ्रष्टाचार के चलते एक पुल भी टूट चूका है और एक स्कूल की छत भी । पर टीम अन्ना ने इस सबको नजरंदाज कर दिया जिससे विपक्ष हैरान था ।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - यह टीम अन्ना क्या होती है ,जो कुछ है अन्ना हजारे है और वे मायावती सरकार से डर कर भाग चुके है । भ्रष्टाचार की कोई लड़ाई इस तरह के पाखंड से नहीं होती है । हम लोग यहाँ लाठी गोली खाकर भ्रष्टाचार से लड़ रहे है । इस लड़ाई की कीमत समाजवादी कार्यकर्ताओं ने प्रदेश की सड़कों पर निकल कर चुकाई है । हमारे नौजवान नेताओं के सर पर पुलिस अफसरों ने बूट रखकर कुचला है । हम हवा हवाई लड़ाई नहीं लड़ते है । इस बीच जयप्रकाश आंदोलन के नेता और अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सर्वसेवा संघ के सचिव राम धीरज ने टीम अन्ना के कांग्रेस विरोध पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है । राम धीरज ने जनसत्ता से कहा -अगर भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो किसी एक पार्टी के खिलाफ ही अभियान क्यों । उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के खिलाफ जन आक्रोश बढ़ रहा है और अगर हमारे साथी सिर्फ कांग्रेस के विरोध की बात करेंगे तो हां सब की साख ख़त्म हो जाएगी। बेहतर तो यही होगा कि आमजन को हर भ्रष्ट नेता के खिलाफ लामबंद किया जाए । इस बात से अन्ना आंदोलन के कई साथी सहमत भी है । जन संघर्ष मोर्चा ने भी टीम आन्ना के एक तरफ़ा कांग्रेस विरोध पर हैरानी जताई है । मोर्चा के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा -अन्ना के आंदोलन को बड़ा समर्थन मिला था पर अब उसकी दिशा बदल रही है जिससे आंदोलन और बदलाव की ताकतों को धक्का लगा है ।
इस बीच कांग्रेस ने भी टीम अन्ना के रुख पर हैरानी जताई है । प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि अन्ना हजारे की टीम उत्तर प्रदेश में यदि आती है तो कांग्रेस पार्टी उनका स्वागत करती है, लेकिन टीम अन्ना को प्रदेश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करना होगा, जिससे प्रदेश की जनता त्रस्त है और कांग्रेस पार्टी उस भ्रष्टाचार के विरोध में संघर्ष कर रही है। उन्होने कहा कि यदि टीम अन्ना बसपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगी तो कांग्रेस पार्टी और प्रदेश की जनता टीम अन्ना का समर्थन करेगी। उन्होने कहा कि स्वयं अन्ना हजारे के जरिए यह संदेश आया है कि यदि संसद शीतकालनी मजबूत जनलोकपाल बिल आती है तो वह कांग्रेस के साथ काम करेंगे। ऐसे में अन्ना टीम को मायावती जी के भ्रष्टाचार के विरोध में ध्यान केन्द्रित करना करना चाहिए।
जनसत्ता