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Friday, February 6, 2009

फिर उबल रहा है लालगढ़


रीता तिवारी
कोलकाता। पश्चिम मेदिनीपुर जिले का लालगढ़ वाममोर्चा सरकार और उसकी सबसे बड़ी घटक माकपा के गले की फांस बन गया है। कुछ दिनों तक शांत रहने के बाद आदिवासियों के ताजा आंदोलन के चलते वह एक बार फिर उबलने लगा है। इस बार मुद्दा है एक माकपा नेता की शवयात्रा के दौरान हुई गोलीबारी में तीन आदिवासियों की मौत का। इसके विरोध में आदिवासी एक बार फिर लामबंद हो गए हैं। माकपा की दलील है कि आदिवासियों ने उस शवयात्रा पर हमला किया था। उसी के बाद हिंसा भड़की। वाममोर्चा ने भी इस मामले में सरकार व पार्टी का यह कह कर बचाव किया है कि तृणमूल कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल सरकार विरोधी आंदोलन को हवा दे रहे हैं। मोर्चा प्रमुख विमान बोस ने कहा है कि लालगढ़ में दिन में जो लोग तृणमूल कांग्रेस और झारखंड पार्टी के बैनर तले आंदोलन कर रहे हैं, वे रात को माओवादी हो जाते हैं। वाममोर्चा ने लालगढ़ और दार्जिलिंग की समस्या सुलझाने पर सरकार के प्रयासों का समर्थन किया है। यहां आयोजित वाममोर्चा की बैठक में इस मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया गया और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मोर्चा की एका बहाल रखने पर सहमति हुई। बोस ने कहा कि सरकार धैर्यपूर्वक लालगढ़ मसले का समाधान निकालने का प्रयास कर रही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दल सरकार विरोधी आंदोलन को हवा दे रहे हैं। ममता बनर्जी के बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के ही लालगढ़ दौरे पर जाने पर टिप्पणी करते हुए बोस ने कहा कि ममता वहां अशांति फैलाने ही गई थी। लालगढ़ में अत्याचार विरोधी आंदोलन का नेतृत्व चक्रधर महतो कर रहे हैं जो तृणमूल के नेता हैं। 
लेकिन तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने तीन आदिवासियों की हत्या के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया है। उन्होंने कहा कि कई महीनों से लालगढ़ अशांत है और हालात सामान्य करने के लिए जिला प्रशासन की ओर से कोई पहल नहीं की गई। माओवादियों की धर-पकड़ के लिए लालगढ़ में तलाशी के दौरान अगर महिलाओं के साथ बदसलूकी की घटना नहीं घटती तो लालगढ़ में इस कदर विरोध नहीं बढ़ता। विपक्ष का सवाल है कि शवयात्रा में कोई बंदूक और गोली के साथ तो नहीं जाता। फिर गोलियां कैसे चलीं। उसका आरोप है कि यह सब सुनियोजित था और प्रशासन मूक दर्शक बना रहा।  ममता खुद भी दो दिन पहले लालगढ़ का दौरा कर चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि तृणमूल किसी की हत्या को उचित नहीं ठहराती लेकिन जिस ढंग से माकपा के जुलूस के दौरान आदिवासियों पर गोली चलाई गईं उससे लगता है कि प्रशासन माकपा काडरों के सामने मूकदर्शक बन गया था। अगर प्रशासन चाहता तो इन हत्याओं को रोका जा सकता था। उन्होंने कहा कि मुख्य विपक्षी दल की हैसियत से तृणमूल कांग्रेस ने कई बार केन्द्र को राज्य की कानून व व्यवस्था की स्थिति के बारे में जानकारी दी है। इसके बावजूद आज तक एक भी केन्द्रीय टीम नंदीग्राम व लालगढ़ नहीं आई। उन्होंने कहा कि वाममोर्चा के 32 वर्षो के शासन के बावजूद आदिवासियों के विकास के लिए कुछ नहीं किया गया। अब जब वे अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं तो उन पर पुलिस कार्रवाई हो रही है।
ताजा हिंसा के बाद लालगढ़ में स्थानीय लोग भी बंद बुला चुके हैं और कांग्रेस भी।  राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि लालगढ़ का जख्म अब धीरे-धीरे एक नासूर बनता जा रहा है जो अगले लोकसभा चुनाव तक रिसता रहेगा। ऐसे में यह समस्या सत्तारुढ़ वाममोर्चा और माकपा के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है।
 
 

Friday, December 19, 2008

विष्णुपुर के टेराकोटा मंदिर

रीता तिवारी
कभी मल्ल राजाओं की राजधानी रहा बांकुड़ा (पश्चिम बंगाल) का विष्णुपुर शहर टेराकोटा के मंदिरों, बालूचरी साड़ियों व पीतल की सजावटी वस्तुओं के अलावा हर साल दिसंबर के आखिरी सप्ताह में लगने वाले मेले के लिए भी मशहूर है। यह विष्मुपुर मेला कला व संस्कृति का अनोखा संगम है। यहां दूर-दूर से अपना हुनर दिखाने कलाकार आते हैं तो उनकी कला के पारखी पर्यटक भी आते हैं। साल के आखिरी सप्ताह के दौरान पूरा शहर उत्सव के रंगों में रंग जाता है। मल्ल राजाओं के नाम पर इसे मल्लभूमि भी कहा जाता था। यहां लगभग एक हजार वर्षों तक इन राजाओं का शासन रहा। उस दौरान विष्णुपुर में टेराकोटा व हस्तकला को तो बढ़ावा मिला ही, भारतीय शास्त्रीय संगीत का विष्णुपुर घराना भी काफी फला-फूला।
वैष्णव धर्म के अनुयायी इन मल्ल राजाओं ने 17वीं व 18वीं सदी में जो मशहूर टेराकोटा मंदिर बनवाए थे, वे आज भी शान से सिर उठाए खड़े हैं। यहां के मंदिर बंगाल की वास्तुकला की जीती-जागती मिसाल हैं। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से कोई दो सौ किमी दूर बसा यह शहर राज्य के प्रमुख पर्यटनस्थलों में शामिल है। खासकर मेले के दौरान तो यहां काफी भीड़ जुटती है। मल्ला राजा वीर हंबीर और उनके उत्तराधिकारियों-राजा रघुनाथ सिंघा व वीर सिंघा ने विष्णुपुर को तत्कालीन बंगाल का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। शहर के ज्यादातर मंदिर भी उसी दौरान बनवाए गए।
यहां स्थित रासमंच पिरामिड की शक्ल में ईंटों से बना सबसे पुराना मंदिर है। 16वीं सदी में राजा वीर हंबीरा ने इसका निर्माण कराया था। उस समय रास उत्सव के दौरान पूरे शहर की मूर्तियां इसी मंदिर में लाकर रख दी जाती थीं और दूर-दूर से लोग इनको देखने के लिए उमड़ पड़ते थे। इस मंदिर में टेराकोटा की सजावट की गई है जो आज भी पर्यटकों को लुभाती है। इसकी दीवारों पर रामायण, महाभारत व पुराणों के श्लोक खुदाई के जरिए लिखे गए हैं। इसी तरह 17वीं सदी में राजा रघुनाथ सिंघा के बनवाए जोरबंगला मंदिर में भी टेराकोटा की खुदाई की गई है। शहर में इस तरह के इतने मंदिर हैं कि इसे मंदिरों का शहर भी कहा जा सकता है।
टेराकोटा विष्णुपुर की पहचान है। यहां इससे बने बर्तनों के अलावा सजावट की चीजें भी मिलती हैं। मेले में तो एक सिरे से यही दुकानें नजर आती हैं। इसके अलावा पीतल के बने सामान भी यहां खूब बनते व बिकते हैं। इन चीजों के अलावा यहां बनी बालूचरी साड़ियां देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर हैं। इन साड़ियों पर महाभारत व रामायण के दृश्यों के अलावा कई अन्य दृश्य कढ़ाई के जरिए उकेरे जाते हैं। बालूचरी साड़ियां किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इन साड़ियों ने अपनी अलग पहचान कायम की है। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि इन रंग-बिरंगी चमकीली साड़ियों को बनाने वाले कलाकारों की जिंदगी में अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं है। छोटे-अंधेरे कमरों में बैठ कर अपने दक्ष हाथों व पावर लूम की सहायता से बालूचरी साड़ियों पर पौराणिक गाथाएं उकेरने वाले इन कलाकारों को एक साड़ी बनाने के लिए महज दो से तीन सौ रुपए ही मिल पाते हैं। एक बालूचरी साड़ी बनाने में कम से कम एक सप्ताह का वक्त लगता है। दो लोग मिल कर इसे बनाते हैं। लेकिन  सरकारी उपेक्षा, कच्चे माल के अभाव व बिचौलियों की सक्रियता के चलते इन कलाकारों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल  हो रहा है। राज्य के मुर्शिदाबाद जिले के बालूचर गांव में शुरूआत करने वाली बालूचरी साड़ियों ने बीती दो सदियों के दौरान एक लंबा सफर तय किया है। नवाब मुर्शीद अली खान 18वीं सदी में बालूचरी साड़ी की कला को ढाका से मुर्शिदाबाद ले आए थे। उन्होंने इसे काफी बढ़ावा दिया। बाद में गंगा नदी की बाढ़ में बालूचर गांव के डूब जाने के बाद यह कला बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर पहुंची। अब विष्णुपुर व बालूचरी एक-दूसरे के पर्ययाय बन गए हैं। पहले विष्णुपुर में मल्ल राजाओं का शासन था। उस दौरान यह कला अपने निखार पर थी। मल्ला राजाओं ने इलाके में टेराकोटा कला को काफी बढ़ावा दिया था। वहां टेराकोटा के मंदिर हर गली में बिखरे पड़े हैं। बालूचरी साड़ियों पर भी इन मंदिरों का असर साफ नजर आता है। इन साड़ियों की खासियत यह है कि इन पर पौराणिक गाथाएं बुनी होती हैं। कहीं द्रौपदी के विवाह का प्रसंग है तो कहीं राधा-कृष्ण के प्रेम का। महाभारत के युध्द के दौरान अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए भगवान कृष्ण की तस्वीर भी इन साड़ियों पर नजर आती है।
लेकिन  रेशम के बारीक धागों से इन कहानियों को साड़ी पर उकेरना कोई आसान नहीं है। दो मजदूर मिल कर एक सप्ताह में एक साड़ी तैयार करते हैं। काम की बारीकी के हिसाब से उस साड़ी की कीमत एक से दस हजार रुपए तक होती है। लेकिन बुनकरों या कलाकारों को इसका फाययदा नहीं मिल पाता। एक कलाकार रमेन तांती का कहना है कि हाल में कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। लेकिन हम मजबूरी में दाम नहीं बढ़ा पाते। ऐसे में हमें दो से तीन सौ रुपए ही मिल पाते हैं। असली मुनाफा बिचौलिए लूट लेते हैं। विष्णुपुर से निकल कर बड़े शहरों की दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते इन साड़ियों की कीमत दोगुनी से ज्यादा हो जाती है। रमेन के मुताबिक, सरकार ने इस कला को बढ़ावा देने या कलाकारों के संरक्षण की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाया है। बुनाई के बाद साड़ियों पर चमक लाने के लिए उनकी पालिश की जाती है। किसी जमाने में यह साड़ियां बंगाल के रईस या जमीदार घरानों की महिलाएं ही पहनतीं थी। अब भी शादी-ब्याह के मौकों पर यह साड़ी पहनी जाती है। 
बालूचरी साड़ी बनाने वालों का कहना है कि राज्य सरकार को इस कला के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए। 
यहां अगस्त में एक सांप उत्सव भी आयोजित किया जाता है। कोलकाता से विष्णुपुर पहुंचने के लिए कई ट्रेनें और बसें चलती हैं जो लगभग चार घंटे में पर्यटकों को यहां पहुंचा देती हैं। विष्णुपुर मेले के दौरान पांच दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यहां मेले के प्रति पर्यटकों की बढ़ती दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए कई नए होटल बन गए हैं। इसलिए रहने की कोई दिक्कत नहीं है।

 

Friday, December 12, 2008

शांति तलाश रहा शांतिनिकेतन



शांति तलाश रहा शांतिनिकेतन
रीता तिवारी
कोलकाता।शांतिनिकेतन का चेहरा तेजी से बदल रहा है। कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में बोलपुर नामक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर एक गांव में जब इसकी स्थपना की थी तब यह अपने नाम को सार्थख करता था। लेकिन अब यह अपने नाम को ही मुंह चिढ़ाता नजर आ रहा है। बीते एक-डेढ़ दशक के दौरान इस कस्बे के शहरीकरण की प्रक्रिया इतनी तेज हो गई है कि इसमें शांतिनिकेतन को तलाशना मुश्किल है। यहां अब सब कुछ है सिवाय शांति के। अभी दस साल पहले तक यहां किसी भी घर की खिड़की से सरसों के पीले फूलों से भरे खेत नजर आते थे। लेकिन अब वहां उन खेतों में फूलों की जगह बहुमंजिली इमारतें उघ आई हैं। 
बीते खास कर 10 वर्षों में शांतिनिकेतन का चेहरा ही बदल गया है। कभी गांव जैसा रहा यह कस्बा अब शहरीकरण की पूरी चपेट में आ गया है। जाने-माने चित्रकार जोगेन चौधुरी कभी अपने बागान में पक्षियों के कलरव के बीच चित्र बनाया करते थे। लेकिन अब यह कलरव कभी सुनाई नहीं देता। इसकी जगह अब वाहनों के शोर ने ले ली है। अब स्थानीय लोगों ने शांतिनिकेतन की हवा और पानी को प्रदूषण से बचाने की पहल करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है।
कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस माहौल को ध्यान में रखते हुए कोलकाता से लगभग डेढ़ सौ किमी दूर बोलपुर में शांतिनिकेतन की स्थापना की थी, वह माहौल बीते तकरीबन एक दशक में तेजी से बदला है। किसी जमाने में अपनी शांति और प्रदूषणमुक्त माहौल और विश्वभारती विश्विद्यालय के  लिए दुनिया भर में मशहूर रहे शांतिनिकेतन की छवि अब पर्यटकों के सैरगाह के तौर पर विकसित  हो रही है। क्रांकीट के तेजी से पसरते जंगल में इसका असली ग्रामीण स्वरूप कहीं खो गया है।  कच्चे मकानों की जह अब रोज नए सेटेलाइट टाउनशिप बन रहे हैं। राजधानी कोलकाता के धनाढय लोगों ने यहां अपने फार्म हाउस व पक्के मकान बनवा लिए हैं जहां वे महीने में दो-चार दिन अपने मित्रों व परिजनों के साथ छुट्टियां मनाने चले आते हैं। बोलपुर स्टेशन से बाहर निकलते ही अब या तो क्रांकीट की बड़ी-बड़ी इमारतें नजर आती हैं या फिर होटलों के बोर्ड। बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने से लाज व होटलों की तादाद और कमाई बढ़ी है लेकिन साथ ही इस छोटे से  शहर का प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। यह कस्बा तेजी से शहर में बदल रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत सीवरेज की है। यह कस्बा न तो पंचायत समिति के अधीन है और न ही यहां कोई नगरपालिका है।
रवीद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने वर्ष  1863 में सात एकड़ जमीन पर एक आश्रम की स्थापना की थी। वहीं आज विश्वभारती है। रवीद्रनाथ ने 1901 में सिर्फ पांच छात्रों को लेकर यहां एक स्कूल खोला। इन पांच लोगों में उनका अपना पुत्र भी शामिल था।  1921 में  राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पाने वाले विश्वभारती में इस समय लगभग छह हजार छात्र पढ़ते हैं।  इसी के ईर्द-गिर्द शांतिनिकेतन बसा था। बोलपुर रेलवे स्टेशन से इस विश्व विद्यालय तक तीन किमी लंबी पतली  सड़क पर पहले जहां सिर्फ रिक्शे नजर आते थे वहीं अब  तिपहिया स्कूटरों और कारों की भीड़ लगी रहती है।  
  अब इसे शहरीकरण के चंगुल से बचाने की पहल के तहत स्थानीय नागरिकों ने शांतिनिकेतन अंचल आवासिक समिति का गठन किया है। समिति ने इस इलाके का पर्यावरण, स्वरूप और धनी सांस्कृतिक  विरासत बचाने के  लिए कलकत्ता हाईकोरट में एक याचिका भी दायर की है। बीरभूम जिले में स्थित शांतिनिकेतन तक कोलकाता से मजह ढाई घंटे के ट्रेन के सफर में पहुंचा जा सकता है।  समिति के सुशांत टैगोर बताते हैं कि शांतिनिकेतन को व्यावसायिक नजरिए से कांक्रीट के जंगल में बदलने की सुनियोजित साजिश हो रही है। अब न्यायापालिका ही इसे बचा सकती है। कविगुरू ने अपनी आत्मकथा जीवन-स्मृति और आश्रमेर रूप ओ विकास में जिस खोवाई इलाके का बार-बार जिक्र किया था वह अब झोपड़ियों से पट गया  है और जल्दी ही  वहां नौ एकड़ जमीन पर एक आवासीय परियोजना शुरू होने वाली है। इसके अलावा वहां अब डुप्लेक्स मकानों की  लंबी कतारें भी नजर आने लगी हैं।  स्थानीय लोग 
कहते हैं कि अगर तेजी से हो रहे निर्माणों पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया तो दस साल बाद यह जगह रहने लायक नहीं रह जाएगी। 
स्थानीय लोग मौजूदा हालात के लिए श्रीनिकेतन शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण (एसए सडीए) को  जिम्मेवार ठहराते हैं। उनका आरोप है कि प्राधिकरण को सिर्फ मुनाफा कमाने की चिंता है,स्थानीय विरासत को  बचाने की नहीं। प्राधिकरण अब यहां लाहाबंद में 24 एकड़ जमीन पर एक  मनोरंजन पार्क बनाने में जुटा है। इसे एक निजी कंपनी को सौंपा गया  है।  इस जमीन पर 17 एकड़ में फैला एक तालाब भी था। लोग बताते हैं कि इस तालाब के किनारे हर साल प्रवासी पक्षियों की भीड़ जुटती थी लेकिन अब उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है।  बीते कुछ वर्षों से दूर-दराज से आने वाले पक्षियों की तादाद काफी कम हो चुकी है। लोकसभा अध्यक्ष और माकपा सांसद सोमनाथ चटर्जी ही उक्त प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हैं। उसके गठन के बाद हाल में इस्तीफा देने तक। प्राधिकरण के एक अधिकारी कहते हैं कि हमने तो मनमाने तरीके से होने वाले निर्माण पर अंकुश लगाया है। प्राधिकरण को अदालतों में कई मामलों पर काफी रकम खर्च करनी पड़ रही है लेकिन हम अपना काम जारी रखेंगे।  विश्वभारती से चार किमी दूर प्रांतिक रेलवे स्टेशन के  पास अब कई  नए रिसार्ट और सोनार तरी नामक आवासीय परियोजनाएं तैयार हो गई हैं।
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो विकास को सही मानते हैं। विश्वभारती के वाइस-चांसलर सुजीत बसु कहते हैं कि अब हर जगह बदलाव की लहर चल रही है और शांतिनिकेतन भी कोई अपवाद नहीं है। वे कहते हैं कि आखिर हम घड़ी की सुईयों को उल्टा तो नहीं घुमा सकते न। विश्वभारती में पहले यह अलिखित परंपरा थी कि शांतिनिकेतन में कोई भी मकान कविगुरू के दोमंजिले मकान उदयन से ऊंचा नहीं होना चाहिए। लेकिन अब यह नियम भी बदल रहा है। अब हर मकान में तीन मंजिल की नींव देने की बात कही जा रही है।
विश्वभारती भी हाल के दिनों में गलत वजहों से सुर्खियों में रहा है। कभी टैगोर के नोबेल पदक की चोरी की वजह से तो कभी प्रेम प्रसंग के चलते परिसर में होने वाली हत्याओं के। इन घटनाओं ने विश्वविद्यालय में सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
 लेकिन क्या शांतिनिकेतन को शहर में बदलने से बचाना संभव है। इसका जवाब  फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन बाहर से यहां आकर बसने वालों को यहां  मकान बनवाने में कुछ भी गलत नहीं लगता। 65 वर्ष के राजा भट्टाचार्य ने बीते साल ही यहां एक फ्लैट खरीदा है। वे सवाल करते हैं कि अगर बाकी लोग यहां मकान खरीद और बनवा सकते हैं तो हम ऐसा  क्यों नहीं कर सकते?स्थानीय लोगों, पुराने वाशिंदों और प्रशासन के बीच शुरू इस तितरफा लड़ाई के क्या नतीजे होंगे और यह कब तक जारी रहेगी, यह तो बताना मुश्किल है लेकिन आने वाले दिनों में  इस मुद्दे के और तूल पकड़ने का अंदेशा है।

खतरे में है शांतिनिकेतन की सांस्कृतिक विरासत-महाश्वेता देवी
बांग्ला की जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी शांतिनिकेतन के बदलते स्वरूप से चितिंत हैं। वे कहती हैं कि पर्यटन केंद्र बनाने के ना म पर शांतिनिकेतन का बेतरतीब तरीके से विकास किया जा रहा है। बहुमंजिली इमारतों के कारण पुरानी और ऐतिहासिक स्मृतियां मिट रही हैं। इसके चलते विश्वभारती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। यह दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तरह महज एक विश्वविद्यालय बन कर रह गया है। बीते कुछ  वर्षों के दौरान शांतिनिकेतन और आसपास के इलाके में बड़े पैमाने पर होने  वाले निर्माण के चलते कविगुरू का आश्रम और खोवाई इलाका संकट में पड़ गया है। बसंतोत्सव और पौष मेला का ऐतिहासिक महत्व है लेकिन प्रशासन इनका इस्तेमाल पर्यटकों को लुभाने के लिए कर रहा है। सोनार तरी नामक आवासीय परियोजना से पर्यावरण के लिए खतरा पैदा हो गया है क्योंकि इन फ्लैटों का कूड़ा-कचरा और गंदगी साफ करने के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं।
लाहाबांध में 17 एकड़ इलाके में फैला तीन सौ साल पुराना जलाशय पाट कर एक  मनोरंजन पार्क और गोल्फ कोर्स बनवाया जा रहा है। यह जलाशय टैगोर और उनके शिष्यों का प्रिय रहा है। इलाके से चुन-चुन कर इस तरह की ऐतिहासिक यादों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। तमाम नियमों की अनदेखी  कर विश्वभारती के  पास ही शराब की चार दुकानों को लाइसेंस दिए गए हैं। इससे 
विश्वभारती की संस्कृति नष्ट होगी। मैंने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया है और जरूरत पड़ने पर राज्य सरकार से भी बात करूंगी। तेजी से बन रही आधुनिक इमारतों के कारण शांतिनिकेतन का मूल स्वरूप ही नष्ट हो गया है।
फोटो-एक छात्र की हत्या के बाद शोक जुलुस

Thursday, November 20, 2008

एक और नंदीग्राम बनता लालगढ़


रीता तिवारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल के माओवादी सक्रियता वाले पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ और झारग्राम समेत कई आदिवासी बहुल इलाके नंदीग्राम में बदलते जा रहे हैं। बीते दो नवंबर को केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले पर बारूदी सुरंग के विस्फोट के जरिए हमले के बाद मामले की जांच के लिए पुलिस की कथित ज्यादातियों के खिलाफ इलाके के आदिवासी संगठनों ने राज्य सरकार और प्रशासन के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। दो हफ्ते बाद भी यह आंदोलन जस का तस है। सरकार को इससे निपटने का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है। आदिवासियों ने तमाम सड़कें या काट दी हैं या फिर उन पर पेड़ रख कर आवाजाही ठप कर दी है। नतीजतन इलाके का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से कट गया है। सरकार की दलील है कि इस आंदोलन के पीछे माओवादियों का हाथ है। लेकिन वह इससे आगे कुछ कर नहीं पा रही है। स्थानीय संगठनों ने पुलिस ज्यादातियों के लिए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने को कहा है।
झारग्राम अनुमंडल के बेलपहाड़ी, जामबनी, ग्वालतोड़, गड़वेत्ता और सालबनी स्थानों पर अनेक जगह सड़कें काट दी गई हैं और 600 पेड़ों को काट कर गिरा दिया गया है। जिला प्रशासन की दलील है कि झारखंड से लगभग सौ संदिग्ध माओवादी लालगढ़ के कठपहाड़ी इलाके में घुस आए हैं। पूरे क्षेत्र में प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। 
लालगढ़ मुद्दे पर अब राजनीति भी गरमाने लगी है। पक्ष व विपक्ष दोनों खेमे के नेता परस्पर विरोधी बयान दे रहे हैं। वाममोर्चा का नेतृत्व करनेवाली माकपा ने जहां आदिवासी आंदोलन के पीछे माओवादियों का हाथ बताया है वहीं तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आंदोलन का समर्थन किया है। बनर्जी ने लालगढ़ मुद्दे पर भी केंद्र से राज्य की वाममोर्चा सरकार को बर्खास्त करने की मांग की है। उन्होंने सरकार के खिलाफ कड़ा कदम नहीं उठाने के लिए केंद्र के प्रति नाराजगी जतायी है। ममता बनर्जी ने कहा है कि पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार सिंह व माकपा की मिलीभगत के कारण स्थानीय ग्रामीण आतंकित है। बाध्य होकर निर्दोष ग्रामीणों को आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस ग्रामीणों के आंदोलन का समर्थन करती है। उन्होंने लालगढ़ समस्या के लिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को भी जिम्मेदार ठहराया और उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। 
माकपा राज्य सचिव विमान बोस ने भी दूसरे अंदाज में लालगढ़ मुद्दे पर केंद्र पर निशाना साधा है। बोस ने कहा कि आदिवासियों के आंदोलन को केंद्र से भी समर्थन मिल रहा है। राज्य को बांटने की साजिश चल रही है। बोस ने कहा कि वामपंथी दलों ने जब केंद्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सशर्त समर्थन दिया। शर्त के मुताबिक अब पुरुलिया, बांकुड़ा, और पश्चिम मेदिनीपुर को झारखंड में शामिल करने की कोशिश की जा रही है। इसमें केंद्र की भी मदद है। 
लालगढ़ में राजनीतिक दबदबा रखनेवाले वाममोर्चा के महत्वपूर्ण घटक दल भाकपा को अपने पैरों तले की जमीन खिसकने का भय है। भाकपा राज्य परिषद के एक नेता का कहना है कि माओवादियों को पकड़ने के नाम पर पुलिस ने आदिवासियों के साथ ज्यादती की जिससे मसला गंभीर हो गया। आदिवासियों के साथ पुलिस की ज्यादती होती है तो इसकी भी जांच होनी चाहिए। भाकपा राज्य परिषद की दो दिवसीय बैठक के बाद प्रदेश सचिव मंजू कुमार मजूमदार ने कहा कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य के काफिले को लक्ष्य कर सालबनी में बारूदी सुरंग विस्फोट की पार्टी निंदा करती है लेकिन दोषियों की धर-पकड़ के नाम पर आदिवासियों पर किसी तरह का जुल्म नहीं होना चाहिए। लालगढ़ में आदिवासी महिलाओं के साथ दु‌र्व्यवहार की भी खबर है। यदि इस तरह की घटना हुई है तो उसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
सीआईडी ने इस मामले में गिरफ्तार कुछ लोगों में से सात के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस लेने व जेल से रिहा करने की बात कही है। इसके लिए उसने कोर्ट में याचिका दायर की है और कहा है कि गिरफ्तार सात लोगों के खिलाफ विस्फोट में शामिल होने के पर्याप्त सबूत व तथ्य नहीं मिले हैं जिसकी वजह से यह फैसला किया गया है। सीआईडी सूत्रों ने बताया कि मंत्रियों के काफिले पर हमले के मामले में दस लोगों को गिरफ्तार किया गया था जबकि एक फरार है। इनमें से तीन लोगों को हथियार के साथ गिरफ्तार किया गया था। इसी बीच लालगढ़ समेत जिले के विभिन्न इलाकों में इन लोगों को गिरफ्तारी को लेकर आंदोलन शुरू हो गया जो फिलहाल जारी है। सीआईडी के स्पेशल आपरेशन ग्रुप के एक अधिकारी ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों में से सात के खिलाफ गहन पड़ताल की गयी लेकिन ऐसा एक भी सबूत हाथ नहीं लगा जिससे यह प्रमाणित होता हो कि वे विस्फोट में शामिल थे। उन लोगों के खिलाफ पहले से भी पुलिस के रजिस्टर में ऐसी कोई आपराधिक व उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े मामले नहीं दर्ज हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुये सात लोगों को इस मामले से मुक्त करने का फैसला किया गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका महाश्वेता देवी ने कहा है कि सरकार लालगढ़ में आदिवासियों को माओवादी बताकर अत्याचार नहीं करे। अगर प्रशासन अत्याचार करेगा तो आदिवासी अपने अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार बिना किसी साक्ष्य के किस आधार पर लालगढ़ वआसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को माओवादी करार दे रही है जबकि जिंदल के स्टील प्लांट के लिए लगभग चार सौ एकड़ भूमि आदिवासियों की बिना अनुमति के ले ली गई है। अगर आदिवासी अपनी जिंदगी जंगल के सहारे और प्राकृति के करीब रहकर गुजारना चाहते हैं तो सरकार उन्हें भूमि से बेदखल क्यों कर रही है। उन्होंने कहा कि नंदीग्राम व सिंगुर की घटनाओं के बावजूद सरकार सचेत नहीं हुई है। लालगढ़ को भी रणक्षेत्र बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियों में आदिवासियों को नौकरी नहीं मिलती और अधिकांश नौकरियां सत्तारूढ़ दलों के समर्थकों के पास चली जाती उन्होंने कहा कि अपने आपको वामपंथी कहने वाली सरकार को आमलोगों से अधिक चिंता पूंजीपतियों की है।
इसबीच, कोलकाता के दौरे पर आए केन्‍द्रीय इस्पात और रसायन मंत्री रामविलास पासवान ने सालबनी में दो अक्‍टूबर को अपने काफिल पर हुए माओवादी हमले का पूर्वानुमान नहीं लगा पाने के लिए पूरी तरह पश्चिमी मिदनापुर के स्थानीय प्रशासन को जिम्‍मेदार ठहराया है। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम और पश्चिम बंगाल खनिज विकास और वाणिज्य निगम के बीच सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद पत्रकारों से बातचीत में पासवान ने कहा कि इसकी वजह से स्थानीय प्रशासन द्वारा कानून व्यवस्था की स्थिति का सही आकलन नहीं किया जाना और जरुरी कदम नहीं उठाया जाना हैं।
उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद अतिविशिष्ट व्यक्तियों के बीच संवादहीनता रही, जिससे पूरे घटनाक्रम में भ्रम की स्थिति बनी। उन्होंने कहा कि मुठभेड़ के बाद मुख्‍यमंत्री ने मुझे उच्चशक्ति के तार के बारे में बताया, जबकि बाद में बारुदी सुरंग की पुष्टि हुई।
दो नवम्‍बर को सालबनी में इस्पात संयंत्र का उद्घाटन करने के बाद लौट रहे पासवान, राज्यमंत्री जितिन प्रसाद, उद्योगपति सज्जन जिंदल और मुख्‍यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य उस समय बाल-बाल बचे थे, जब माओवादियों ने उनके काफिल पर बारुदी सुंरग में विस्फोट करके हमला कर दिया था।
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