Thursday, October 20, 2011

कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है अन्ना आंदोलन


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश के कई जन संगठन आगामी विधान सभा चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों को हराओ का की अपील करेंगे। उत्तर प्रदेश केविधन सभा चुनावों में बड़े पैमाने पर बाहुबली और दागी उम्मीदवार खड़े होने वाले है । जिसके चलते अगर बड़े स्तर पर बाहुबली और दागी नेताओं के खिलाफ माहौल बना तो राजनीति का काफी कचरा साफ़ हो जाएगा । इन जन संगठनों का यह भी मानना है कि अन्ना हजारे के आंदोलन का जिस तरह राजनैतिक रूप ले रहा है उससे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हराओं के नारे का अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा जैसे दलों को होगा इसलिए चुनाव सुधार की मूल अवधारणा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रखने के लिए बिना किसी दल के साथ या विरोध में खड़े हुए समाज को जागरूक करना होगा। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े कई जन संगठन और नेताओं ने टीम अन्ना की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि जब भी जन संगठन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे तो वे हाशिए पर चले गए। उसके लिए अलग राजनैतिक ओउजार बनाना चाहिए । भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत लाखो की रैली करते थे पर राजनीति में आए तो कोई चुनाव नहीं जीता पाए ।कर्णाटक में रैय्यत संघ और महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन उदाहरण है। इसलिए टीम अन्ना को कोर कमेटी की बैठक बुलाकर इस पर अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए। हिसार में राजनैतिक दखल के चलते ही एकता परिषद के पीवी राजगोपाल और जल बिरादरी के राजेंद्र सिंह अलग हो चुके है और कई लोग विरोध जता चुके है। वाराणसी के सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज ने चुनाव में बाहुबलियों और दागी उम्मीदवारों के खिलाफ अभियान छेड़ने साथ टीम अन्ना से कहा है कि वह भी कोर कमेटी में यह मुद्दा उठाकर चुनाव सुधर के अपने वायदे पार आगे बड़े और किसी एक दल का समर्थन या विरोध न करे ।
गौरतलब है कि राजनैतिक दखल को लेकर टीम अन्ना और उनके समर्थकों में भी मतभेद सामने आ चुके है । हालाँकि टीम अन्ना के कोर कमेटी के एक सदस्य सुनीलम ने कहा - चुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील का वे ही लोग विरोध कर रहे है जो या तो कांग्रेस के समर्थक है या सरकार की कमेटियों में बैठे है या फिर कोई लाभ ले रहे है। जबकि आंदोलन के दूसरे सहयोगी संदीप पांडेय ने कहा- जन संगठनों और जन आंदोलनों के तौर तरीको से उलट अन्ना आंदोलन अब कारपोरेट संस्कृति में ढल गया है।लोकतांत्रिक तरीके से कोई फैसला नहीं हो रह़ा । कुछ लोग फैसले करते है तो उसकी जानकारी नहीं मिलती। फिर हिसार में कांग्रेस हराने का फैसला कोर कमेटी का का नहीं था । ऐसी ही कुछ मुद्दों को लेकर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय के राष्ट्रीय समन्वय यानी एनएपीएम ने अन्ना के आंदोलन को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया है । बेहतर तो यह हो कि उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चलते हुए दागी और बाहुबली उम्मीदवारों को हराने की अपील की जाए ।
इसी तरह गांधीवादी नेता और सर्व सेवा संघ के सचिव राम धीरज भी हताश नजर आए।वे भी एक पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ने के पक्ष में नहीं है बल्कि चुनाव सुधारों का एजंडा लागू करने के समर्थक है । राम धीरज ने कहा - जो लोग भी जन आंदोलन से भटक कर चुनावी राजनीति में फंसे वे हाशिये पर चले गए और एक सीट नही जीत पाए। चाहे लाखों की रैली करने वाले महेंद्र सिंह टिकैत हो या शेतकरी संगठन के शरद जोशी या फिर बकर्णाटक में रैय्यत संघ के नंजदुंग स्वामी ।ऐसे में आंदोलन को राजनैतिक दखल से पहले विचार विमर्श करना चाहिए था । इस मुद्दे पर एकता परिषद जैसा बड़ा जन संगठन अलग हो गया ,राजेंद्र सिंह की जल बिरादरी अलग हो गई। उसके बाद उत्तर प्रदेश में भी वही नारा दिया जा रहा है । राजनीति करनी है तो जन उम्मीदवार उतारे । पिछली बार लखनऊ में जन आंदोलनों के जन उम्मीदवार को लोकसभा में ४२१ वोट मिले थे। क्या यही हश्र अन्ना आंदोलन के को इतने बड़े आंदोलन का करना चाहते है ।
संघर्ष वाहिनी मंच के राजीव ने कहा -हम लोग तो शुरू से बाहुबलियों को हराने की अपील करते रहे है और फिर करेंगे । पर कांग्रेस पर दबाव बहुत जरुरी है क्योकि यह पार्टी बहुत शातिर पार्टी है और लोकपाल बिल लाएगी इस पर हमें संदेह है ।
ऎसी ही राय कई अन्य जन संगठनों के लोगो की थी । दरअसल कोई भी आंदोलन कई दशक बाद खड़ा होता है पर कुछ समय तक उसका असर समाज पर बना रहता है। जेपी आंदोलन से वीपी सिंह का आंदोलन उदाहरण है । कई दशक बाद अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते देश का मध्य वर्ग बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरा था ,यह टीम अन्ना का बड़ा योगदान है पर आंदोलन की दृष्टि , विचारधारा और ठोस कार्यक्रम के अभाव में इसी मध्य वर्ग का मोहभंग होने लगा है। जन संगठनों का मानना है कि जिस देश के अस्सी फीसद गांवों और छोटे शहरों में बिजली न आती हो उस देश में सिर्फ सोशल नेट वर्किंग ,फेस बुक ,ई मेल और एसएमएस व अन्य संचार साधनों से बड़े आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते है। इसके लिए प्रतिबद्ध जमीनी कार्यकर्ताओं की कतार तैयार करना जरुरी है ।
अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी के प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास ने जनसत्ता से कहा -अन्ना आंदोलन के दौरान देश का एक बड़ा तबका सड़क पर आया था ।पर उसके बाद जिस तरह के सवाल खड़े हुए उसका असर यकीनन जन मानस पर पड़ेगा।पर हम नए सिरे से प्रयास कर रहे है । जबकि मनीष सिसोदिया ने कहा-अन्ना का आंदोलन किसी राजनैतिक दल के खिलाफ नही है । कांग्रेस के खिलाफ जन दबाव इसलिए बनाया जा रहा है क्योकि वह केंद्र की सत्ता में है । यह बिल भाजपा , बसपा या समाजवादी दल अपने बूते पास नहीं करा सकते है । इसी वजह से हम कांग्रेस पर ज्यादा दबाव बना रहे है । उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में प्रदेश सरकार पर जो आरोप लग रहे है उससे टीम भी पूरी तरह सहमत है । हमने बांदा में भ्रष्टाचार का जो मुद्दा उठाया वह प्रदेश सरकार से ही जुड़ा हुआ था । आगे भी हम राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे । हमारा मानना है कि बसपा ,सपा ,कांग्रेस और भाजपा सभी में भ्रष्ट लोग मौजूद है इसलिए किसी एक दल को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता ।
जनसत्ता

Wednesday, October 19, 2011

हजारे के आंदोलन से दूर जा रहे है जन संगठन

अंबरीश कुमार
लखनऊ 19,अक्तूबर। उत्तर प्रदेश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन संगठनों और आमजन का मोहभंग होता नजर आ रहा है । टीम अन्ना के वैचारिक भटकाव और बिखराव के चलते अब उसे वह समर्थन नहीं मिल रहा जो अगस्त में मिला था।इसका अहसास उत्तर प्रदेश के दौरे पर निकली टीम अन्ना के सदस्यों को भी होने लगा है। अगस्त में अन्ना के अनशन के दौरान जो लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे थे उनके लिए सैलाब और जन सैलाब जैसे विशेषण का इस्तेमाल किया गया था पर पिछले दो दिन में उत्तर प्रदेश में पश्चिम से पूरब तक का दौरा करने वाली टीम अन्ना की सभाओं में कही पांच सौ लोग आए तो कही हजार। यह अगस्त क्रांति का दूसरा पहलू है।बांदा,कानपुर,लखनऊ ,फैजाबाद से लेकर गोरखपुर टीम अन्ना ने दौरा किया और कांग्रेस विरोध की मजबूरी भी बताई साथ ही सपा ,बसपा और भाजपा पर भी निशाना साध कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि वे किसी राजनैतिक दल के साथ नहीं खड़े है। अन्ना समर्थको का नया नारा है -न हाथ न हाथी ,हम है अन्ना के साथी । न साइकिल न कमल ,हम करेंगे अन्ना पर अमल । पर हिसार में जो गलती टीम अन्ना ने की उसका खामियाजा सामने आने लगा है । मंगलवार को जिस झूलेलाल पार्क में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का कार्यक्रम हुआ वह लखनऊ विश्विद्यालय समेत तीन बड़े और ऐतिहासिक कालेजों और दर्जन भर छात्रावासों से घिरा हुआ है । पर शाम छह बजे भी सारी कुर्सियां नहीं भर पाई थी । अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता मुन्ना लाल शुक्ल जो पिछली बार आमरण अनशन पर बैठे थे इस बार हताश थे । मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता से कहा - सौ बच्चों को तो मै हरदोई से लाया था पर फिर भी पांच सौ कुर्सियां नहीं भर पाई क्योकि हमारे नेता कई खेमे में बंट गए है। सौरभ ने तो एलान कर रखा था कि अगर सक्सेना के लोगों ने मंच पर जाने की कोशिश की तो हमारे लड़के उन्हें तोड़ डालेंगे ।वैसे भी वह गांधी की अहिंसा और मद्य निषेध आदि को फालतू मानता है,कहता है आजादी तो गरम दल वालों ने दिलवाई थी। यह बानगी है आंदोलन का संचालन करने वाले नेताओं की दृष्टि की।
अन्ना आंदोलन के एक नेता ने नाम न देने क शर्त पर कहा -अगस्त में जब अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ तो सभी विचारधाराओं के लोग उसमे शामिल हुए और बड़ी संख्या में जन संगठनों के कार्यकर्त्ता थे। पर जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ा आंदोलन में शामिल नेताओ का टकराव और वैचारिक संकट भी बढ़ा। पहली आपति आंदोलन के तौर तरीकों को लेकर हुई। आंदोलन और नेता को एक एकरांड बनाने के सवाल पर पहला मतभेद हुआ तो दूसरा विचारधारा को लेकर । वंदेमातरम के नारे से लेकर दक्षिणपंथी ताकतों से संबंधो पर अगर पहले सफाई दे दी जाती तो आंदोलन पर संघ का ठप्पा तो नहीं लगता। दूसरे चुनावी दखल से हर हालत में बचाना चाहिए था क्योकि यह लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की थी किसी दल को हराने की नहीं।jansatta

किरण बेदी ने छूट की टिकटों पर संस्थाओं से वसूले पूरे पैसे


अजमेर सिंह
नई दिल्ली,अक्तूबर। संसद सदस्यों को अपने रामलीला घुंघट के अभिनय से चिढ़ाने वाली और अण्णा टीम की सबसे मुखर सदस्य किरण बेदी को कुछ स्पष्टीकरण देना पड़ सकता है। मसला है सेमिनार और सभाओं के लिए बुलाए जाने पर एनजीओ और संस्थाओं से यात्रा खर्च बढ़ाकर वसूलने का।
द इंडियन एक्सप्रेस के पास उपलब्ध बिलों,रसीदों और चैक की प्रतिलिपियों के रिकार्ड बताते हैं कि बहादुरी पुरस्कार प्राप्त बेदी को एअर इंडिया की टिकटों के किराए में छूट मिलती है, इसके बावजूद उन्होंने मेजबान संस्थाओं से पूरे पैसे वसूले। यही नहीं इकानामी क्लास में सफर कर उन्होंने बिजनेस क्लास का किराया भी वसूला।द इंडियन एक्सप्रेस के पास ऐसे 12 उदाहरणों के रिकार्ड हैं। इनमें से कई पुराने 2006 के भी हैं जब बेदी आईपीएस अधिकारी के रूप में सेवारत थीं।

उनकी हाल की ऐसी यात्रा का बिल 29 सितंबर को भेजा गया, जिसमें किराए की रकम बढ़ा कर दी गई है।
इन किराए के चैकों का भुगतान एनजीओ इंडिया वीजन फाउंडेशन को किया गया, बेदी इसकी प्रमुख हैं। उसके चार्टर्ड एकाउंटेंट सुरेश व्यास ने कहा कि जिसे आप गड़बड़ी कह रहे हैं, वह दरअसल उनकी ‘बचत’ है, क्योंकि बेदी ने उससे कम खर्च किया जितना उनको भुगतान किया गया। इस रकम का उपयोग मुद्दों से जुड़ी उन यात्राओं पर किया जाता है जिसके लिए बेदी को कोई भुगतान नहीं होता।
फरवरी, 2001 के सरकारी दिशानिर्देश के मुताबिक बहादुरी पुरस्कार विजेताओं को एअर एंडिया के विमान के इकानामी क्लास के टिकटों पर 75 फीसद की छूट मिलेगी। बेदी को 1979 में बहादुरी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया था। उनका जीए(बहादुरी पुरस्कार) क्रमांक 433 है।जनसत्ता से

सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ


अंबरीश कुमार
लखनऊ अक्टूबर। असरार उल मजाज अगर जिंदा होते तो जिंदगी के सौंवे साल में आज कदम रखते, जिसे आमतौर पर आदमी की उम्र का पूर्णांक माना जाता है। लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह सुब्ह-ए-नौ मनाने की तैयारी शुरू हो गई है । इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। लखनऊ मजाज के जीवन के सौ साल पर उन्हें याद करने जा रहा है जिन मजाज लखनवी को जिंदगी से सिर्फ 44 साल ही मिल सके। इसके बावजूद मजाज़ लखनवी को उर्दू अदब में उनके दीर्घायु होकर रूखसत हुए तरक्कीपसंद समकालीनों फैज अहमद फैज,अली सरदार जाफरी,और मजरूह सुल्तानपुरी आदि के बराबर या कई मायनों में अधिक रूतबा हासिल है।
खुद फैज अहमद फैज उर्दू के तरक्कीपसंद इंकलाबी शायरों में मजाज़ को सबसे अनोखा और सहज मानते थे। मजाज़ के एकमात्र काव्य संग्रह आहंग की भूमिका में फैज अहमद फैज ने मजाज के बारे में लिखा है- ‘मजाज़ की इन्कलाबियत आम इंकलाबी शायरों से अलग है। आम इंकलाबी शायर इन्कलाब को लेकर गरजते हैं,सीना कूटते हैं इन्कलाब के मुताल्लिक गा नहीं सकते। वे इन्कलाब की भीषणता को देखते हैं उसके हुस्न को नहीं पहचानते’ आज भले ही फैज अहमद फैज को बीसवी सदी के सबसे लोकप्रिय उर्दू शायर के रूप में पहचाना जाता हो लेकिन उर्दू के सभी जानकार इस बात को मानते हैं कि अपनी जिंदगी में जो लोकप्रियता मजाज़ लखनवी को हासिल थी वैसी तबतक किसी दूसरे शायर के हिस्से में नहीं आई थी। मजाज की इस लोकप्रियता के साथ उनके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दिनों की कहांनियां भी जुड़ी हैं जिनके बारे में इस्मत चुगताई और अली सरदार जाफरी समेत उर्दू के तमाम बड़ी हस्तियों ने लिखा है। १९ अक्टूबर १९११ को बाराबंकी के रूदौली कस्बे में जन्मे असरार उल हक मजाज ने लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़नी तब शुरू की जब वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे। बेहद कम उम्र में मजाज़ लखनवी ने जिस तरह साम्राज्यवाद,पूंजीवाद के विरोध में और स्त्री-मुक्ति के विषय में जैसी नज्में कहीं उसने जानकारों को हैरत में डाल दिया। मजाज के बारे में आलोचकों की ये हैरत आज भी कायम है।मजाज़ के साथ कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके चुनिंदा लोगों में से एक प्रो. शारिब रूदौलवी ने कहा- ‘यकीनन अगर मजाज को उतनी उम्र मिली होती जितनी जोश,फिराक, फैज या जाफरी को मिली तो न जाने वे उर्दू को और क्या क्या दे चुके होते.’ मजाज के बारे में ये बात भी चौंकाती है कि कालजयी इंकलाबी नज्मों के रचयिता होने के साथ ही उनकी शायरी की रूमानियत भी इतनी गहरी है कि उन्हे उर्दू शायरी का कीट्स भी कहा जाता है। यहां ये जान लेना जरूरी है कि मजाज़ के अविस्मरणीय होने की वजह सिर्फ उनकी शायरी ही नहीं बल्कि उनकी हाजिरजवाबी भी है जिसकी मिसालें उनके शहर लखनऊ में आज भी सुनने को मिल जाती हैं। गौरतलब है कि लखनऊ में मजाज का जन्म शताब्दी समारोह, सुब्ह-ए-नौ आगामी २४ अक्टूबर को भारतेंदु नाट्य अकादमी के सभागार में मनाया जाएगा। इस आयोजन में देश और विदेश की कई नामचीन अदबी हस्तियां शिरकत करेंगी। समारोह का आयोजन लखनऊ सोसाइटी की तरफ से किया जा रहा है जो कि लखनऊ की तहजीब के प्रति युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से काम कर रही है। संस्था के सदस्य आरजू ने बताया- ‘मजाज लखनवी का मकाम उर्दू साहित्य में बहुत बड़ा है लेकिन दुर्भाग्य से आज युवा पीढ़ी उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती। जन्मशताब्दी वर्ष में भी युवाओं में उनको लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं दिख रही। इस आयोजन के जरिए मजाज को श्रद्धांजलि देने के साथ ही लोगों में उनके प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश होगी।’ कार्यक्रम का शीर्षक मजाज के लखनऊ पर कहे गए मशहूर शेर से निकलता है- ‘अब इसके बाद सुब्ह है और सुब्ह-ए-नौ मजाज,हमपर है खत्म शाम-ए-गरीबान-ए-लखनऊ’ ।jansatta

Monday, October 17, 2011

मायावती सरकार के भ्रष्टाचार पर टीम अन्ना की ख़ामोशी


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर।टीम अन्ना ने आज उत्तर प्रदेश के बांदा से अपना अभियान शुरू किया पर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी मायावती सरकार के खिलाफ कोई एलान नहीं किया। इस पर उत्तर प्रदेश के राजनैतिक दलों के साथ उत्तर प्रदेश में अन्ना आंदोलन के प्रमुख नेता राम धीरज ने भी हैरानी जताई है।समाजवादी पार्टी ने साफ़ कहा कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी मायावती सरकार से डर कर अन्ना हज़ारे भाग गए। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई मायावती सरकार के खिलाफ कोई कार्यक्रम लिए बिना अधूरी है और ऎसी लड़ाई पाखंड मानी जाएगी । बांदा में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस के खिलाफ अपना अभियान जारी रखते हुए लोगों से अपील की कि जन लोकपाल बिल अगर शीतकालीन सत्र में पास नहीं होता है तो कांग्रेस को एक भी वोट नहीं मिलना चाहिए। ख़ास बात यह थी कि जिस बांदा से टीम अन्ना ने अपना अभियान शुरू किया वहा पर सत्तारूढ़ दल के असरदार मंत्री के भ्रष्टाचार के चलते एक पुल भी टूट चूका है और एक स्कूल की छत भी । पर टीम अन्ना ने इस सबको नजरंदाज कर दिया जिससे विपक्ष हैरान था ।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - यह टीम अन्ना क्या होती है ,जो कुछ है अन्ना हजारे है और वे मायावती सरकार से डर कर भाग चुके है । भ्रष्टाचार की कोई लड़ाई इस तरह के पाखंड से नहीं होती है । हम लोग यहाँ लाठी गोली खाकर भ्रष्टाचार से लड़ रहे है । इस लड़ाई की कीमत समाजवादी कार्यकर्ताओं ने प्रदेश की सड़कों पर निकल कर चुकाई है । हमारे नौजवान नेताओं के सर पर पुलिस अफसरों ने बूट रखकर कुचला है । हम हवा हवाई लड़ाई नहीं लड़ते है । इस बीच जयप्रकाश आंदोलन के नेता और अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सर्वसेवा संघ के सचिव राम धीरज ने टीम अन्ना के कांग्रेस विरोध पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है । राम धीरज ने जनसत्ता से कहा -अगर भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो किसी एक पार्टी के खिलाफ ही अभियान क्यों । उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के खिलाफ जन आक्रोश बढ़ रहा है और अगर हमारे साथी सिर्फ कांग्रेस के विरोध की बात करेंगे तो हां सब की साख ख़त्म हो जाएगी। बेहतर तो यही होगा कि आमजन को हर भ्रष्ट नेता के खिलाफ लामबंद किया जाए । इस बात से अन्ना आंदोलन के कई साथी सहमत भी है । जन संघर्ष मोर्चा ने भी टीम आन्ना के एक तरफ़ा कांग्रेस विरोध पर हैरानी जताई है । मोर्चा के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा -अन्ना के आंदोलन को बड़ा समर्थन मिला था पर अब उसकी दिशा बदल रही है जिससे आंदोलन और बदलाव की ताकतों को धक्का लगा है ।
इस बीच कांग्रेस ने भी टीम अन्ना के रुख पर हैरानी जताई है । प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि अन्ना हजारे की टीम उत्तर प्रदेश में यदि आती है तो कांग्रेस पार्टी उनका स्वागत करती है, लेकिन टीम अन्ना को प्रदेश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करना होगा, जिससे प्रदेश की जनता त्रस्त है और कांग्रेस पार्टी उस भ्रष्टाचार के विरोध में संघर्ष कर रही है। उन्होने कहा कि यदि टीम अन्ना बसपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगी तो कांग्रेस पार्टी और प्रदेश की जनता टीम अन्ना का समर्थन करेगी। उन्होने कहा कि स्वयं अन्ना हजारे के जरिए यह संदेश आया है कि यदि संसद शीतकालनी मजबूत जनलोकपाल बिल आती है तो वह कांग्रेस के साथ काम करेंगे। ऐसे में अन्ना टीम को मायावती जी के भ्रष्टाचार के विरोध में ध्यान केन्द्रित करना करना चाहिए।
जनसत्ता

Saturday, October 15, 2011

टीम अन्ना मुश्किल में ,कांग्रेस के तेवर बदले


अंबरीश कुमार
लखनऊ , अक्तूबर। कार्नाटक के मुख्यमंत्री यदयुरप्पा के जेल जाते ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को नई उर्जा मिल गई है । बदलते राजनैतिक माहौल से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर उम्मीद नजर आने लगी है जो भ्रष्टाचार को लेकर चारो और से घिरी हुई थी ।एक तरफ टीम अन्ना तो दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था । भ्रष्टाचार के मामले में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री यदयुरप्पा को जेल और उत्तर प्रदेश में फीकी पड़ी आडवाणी की रथ यात्रा के बाद बचाव की मुद्रा में चल रही कांग्रेस अब आक्रामक हो गई है ।कांग्रेस ने आज कहा -भ्रष्टाचार पर भाजपा की कलई खुल गई है। भ्रष्टाचार पर भाजपा का बड़ा नेता जेल जाता है और आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ उत्तर प्रदेश में अभियान छेड़ने का आवाहन करते है । प्रदेश की जनता सब देख रही है। इस मामले से राजनैतिक एजंडा में फंसी टीम अन्ना की भी मुश्किलें बढ़ गई है जो उत्तर प्रदेश में अभियान छेड़ने की तैयारी में है क्योकि भजनलाल की संसदीय सीट रही हिसार में कांग्रेस का विरोध बहुत आसान था पर उत्तर प्रदेश की राजनीति काफी जटिल है। यहां अन्ना की टीम भी कई खेमो में बंटी है और नेताओं का अपना कोई जनाधार भी नहीं है। हिसार चुनाव में दखल देने पर टीम अन्ना के उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश के नेता भी काफी खरी खरी सुना चुके है । संतोष हेगड़े और मेधा पाटकर का विरोध भी सार्वजनिक हो चुका है ।इन सबके चलते कांग्रेस को ज्यादा राहत मिली है ।
कांग्रेस को ज्यादा दिक्कत भाजपा समर्थक अगड़ी जातियों के साथ समाजवादी पार्टी की तरफ बढ़ते मुस्लिम समुदाय को लेकर थी ।भाजपा की रथ यात्रा को ज्यादा समर्थन न मिलने से कांग्रेस ने राहत की सांस ली है । पर मुस्लिम समुदाय को लेकर पार्टी अभी निश्चिन्त नहीं है । हालांकि पीस पार्टी के जरिए समाजवादी पार्टी के मुस्लिम जनाधार को में सेंध लगाने की कोशिश भी हो रही है जिसे परदे के पीछे से शह भी दी जा रही है।इस सबके बावजूद राहुल गांधी ने बुंदेलखंड से दोबारा जो अभियान शुरू किया है उससे भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को काफी ताकत मिली है।इस बीच भाजपा की रथ यात्रा को कोई बड़ा जन समर्थन न मिलने से भी कांग्रेस का राजनैतिक फायदा हुआ है । दरअसल भाजपा और कांग्रेस का वोट बैंक मिला जुला है और एक फायदा दूसरे के नुकसान की कीमत पर होता है । इसी वजह से कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाली टीम अन्ना के साथ भाजपा पर और आक्रामक हो गई है ।
पार्टी महासचिव और प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे को उत्तर प्रदेश में आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करने की लगातार चुनौती देते रहे है पर इसे कोई स्वीकार नहीं कर रहा। राजनैतिक टीकाकार सीएम शुक्ल ने कहा -दरअसल हिसार चुनाव जहां कांग्रेस की हार पहले से तय मानी जा रही थी वहां पर टीम अन्ना का कांग्रेस हराओ का नारा लोगों को कुटिल राजनैतिक चाल जैसा लगा जिसमे कांग्रेस के हारते ही श्रेय मिल जाता। जबकि बच्चा बच्चा जनता है कि भजनलाल की सीट पर उनके पुत्र के जितने की संभावना सबसे ज्यादा होगी। इसी मुद्दे पर अन्ना की टीम भी बंट गई । अब उत्तर प्रदेश में मायावती को छोड़ अगर कांग्रेस को हराने का नारा दिया जाता तो और फजीहत होती । दूसरी तरफ कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा -भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वालों की कलई खुल गई है। यदयुरप्पा के जेल जाने के बाद कसी ने भाजपा के खिलाफ भी अनशन का एलान नहीं किया । आडवाणी रथयात्रा निकाल रहे है और उनके आभियान की कमान जिनके हाथों में है वे भ्रष्टाचार को लेकर ही मंत्रिमंडल से हटाए गए थे । आने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा और उनके समर्थको को भी पता चल जाएगा जो संघ के साथ आंदोलन कर रहे थे ।
साफ़ है कि कांग्रेस नए हालात में भाजपा के साथ टीम अन्ना पर भी निशाना जरुर साधेगी । यह भी संयोग है कि इतने बड़े विवाद के छिड़ते ही अन्ना ने मौन व्रत धारण कर लिया है । वैसे भी कर्नाटक के बारे में उन्होने कोई टिपण्णी से इनकार कर दिया था । जनसत्ता

Friday, October 14, 2011

रथ यात्रा को लेकर उत्साह नही

अंबरीश कुमार
मिर्जापुर , अक्तूबर । उत्तर प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री पद के मुख्य दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा बिना कोई राजनैतिक असर डाले चली गई। रथ यात्रा को लेकर आमजन में तो कोई उत्साह नही ही था पार्टी कार्यकर्ताओं का भी उत्साह पहले जैसा नहीं रहा । इसका बड़ा श्रेय उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेताओं का टकराव ,अंह और राजनैतिक प्रबंधन को भी जाता है। ख़ास बात यह है कि आडवाणी की यात्रा उत्तर प्रदेश के एक किनारे से बाहर निकल गई वरना और फजीहत होती । मुगलसराय ,वाराणसी और फिर मिर्जापुर में आडवाणी की जन सभा हुई पर उस काशी में मंदिर आंदोलन के नायक की सभा फ्लाप हो जाना जो पार्टी के एजंडा में रहा है सभी को हैरान करने वाला है । वाराणसी के सांसद भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी है तो पार्टी के दो मौजूदा विधायक भी यही के है। अफसरों से गाली गलौच के साथ बात करने वाला बिगडैल मेयर भी भाजपा का है । इस सबके बावजूद बनारस के भारत माता मंदिर परिसर में आडवानी की जन सभा में करीब चार हजार लोगों का इकठ्ठा हो पाना जन चेतना यात्रा की हवा बिगाड़ने के लिए काफी है।यह संख्या भी कुछ ज्यादा मानी जा रही है । गनीमत यह हुई की मिर्जापुर में बहुजन समाज पार्टी की तरफ से दागी मंत्री रंगनाथ मिश्र का टिकट कर एक मुस्लिम उम्मीदवार को दे दिया गया जिसके चलते मजहबी ध्रुवीकरण और बसपा के बागी नेता व उनके समर्थकों ने परदे के पीछे से आडवाणी की सभा को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई । इससे यह भी साबित होता है कि पार्टी के नेता अगर ताकत लागाते तो काशी से आडवाणी का बड़ा राजनैतिक संदेश जाता।
उत्तर प्रदेश में आडवाणी की मुगलसराय में होने वाली जन सभा को लेकर दिन भर नाटक चला क्योकि प्रशासन ने पहले रेलवे मैदान में जन सभा की इजाजत दी फिर रद्द कर दी अंततः दबाव बढ़ने पर इजाजत देनी पड़ी । इस सबके चलते लोग उस जन सभा में पहुंचे भी। पर काशी से आडवाणी जिस जोश खरोश के साथ समूचे देश को राजनैतिक संदेश देना चाहते थे वह नही हो पाया । शहर के बीच में जन सभा रखी गई जिसमे आम लोग कम और पार्टी कार्यकर्त्ता ज्यादा थे । मुरली मनोहर जोशी यहाँ के सांसद तो है ही साथ ही पार्टी पर भी उनका काफी असर है ।वे भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाते है । दबी जबान में भाजपा के नेता इशारा भी करते है कि जोशी ने कोई दिलचस्पी इस यात्रा के कार्यक्रम में नही ली । भाजपा के एक नेता ने नाम न देने की शर्त पर कहा -उत्तर प्रदेश में हर बड़ा नेता जब एक दूसरे की टांग खीचेगा तो क्या होगा । सभी जानते है कि जनसभा में भीड़ लाना एक राजनैतिक प्रबंधन का काम होता है जो सभी दल करते है । फिर भीड़ लेन बाद वह उसे कुछ देर बैठाने का इंतजाम करना पड़ता है । यहां तपती धूप में न तो शामियाना लगाया गया और न पानी का इंतजाम था । यह सब तो भाजपा के स्थानीय नेताओं को करना था और इसकी निगरानी कार्यकर्ताओं के पैसे पर पलने वाले संगठन मंत्रियों को करनी थी । यह सब नहीं किया गया वर्ना काशी की सभा फ्लाप नहीं होती ।
पर इससे बड़ा सवाल यह भी खड़ा हुआ कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवाणी की रथ यात्रा को कोई बड़ा जन समर्थन क्यों नहीं मिला । अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी उत्तर प्रदेश में उस तरह का जन उभार सामने नही आया था जिस तरह दिल्ली में दिखलाया जा रहा था। उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल बन रहा है जिसमे भाजपा और कांग्रेस सपा-बसपा से पीछे है। मुख्य लड़ाई सपा और बसपा में मानी जा रही है और यही दोनों दल जमीन पर टकरा रहे है ऐसे में कांग्रेस और भाजपा की राजनैतिक जगह काफी कम होती जा रही है। फिर उत्तर प्रदेश की राजनैतिक लड़ाई में जाति और संप्रदाय की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है । फिलहाल कोई मजहबी टकराव का माहौल नहीं है इसलिए भाजपा की कोई बड़ी भूमिका नहीं बन पा रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के राजनैतिक माहौल पर भाजपा के नेताओं का कोई ज्यादा असर भी नहीं पड़ पा रहा है। मिर्जापुर की जनसभा में आए एक बुजुर्ग सूरज प्रसाद ने कहा - आडवाणी कई बार रथ यात्रा कर चुके और उनसे एक वर्ग की यह अपेक्षा थी कि वे अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण करा देंगे जो उनका नारा और वादा था। पर जब यह नहीं हो पाया तो मान लिया गया कि सत्ता में आने के लिए पार्टी ने राम के नाम का इस्तेमाल किया। इसीलिए आडवाणी या किसी भी भाजपा नेता की रथ यात्रा का अब असर होता दिखाई नहीं पड़ता । दूसरे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने से पहले आडवानी को पार्टी से भ्रष्ट नेताओं को बाहर करना होगा । दोहरे मानदंडों की वजह से ही पार्टी की साख खराब हुई है जिसके चलते लोगों का आडवाणी से भी मोहभंग हुआ है ।
वाराणसी के बाद आडवानी जब मिर्जापुर में बोले तो फिर मंदिर के मुद्दे पर भी लौट आए। मिर्जापुर काफी समय से भाजपा का गढ़ रहा है जिसके चलते यहां आडवाणी को लोग सुनने भी पहुंचे । दूसरे बसपा ने दागी मंत्री रंगनाथ मिश्र का टिकट काट कर मुस्लिम उम्मीदवार को दे दिया जिसकी प्रतिक्रिया भी हुई। इस मामले में मिर्जापुर को संवेदनशील भी माना जाता है । यह स्थानीय वजह है जिससे कोई राजनैतिक आकलन करना उचित नहीं होगा ।पर कुल मिलकर आडवाणी की रथ यात्रा का उत्तर प्रदेश के राजनैतिक अरिद्रिश्य पर कोई असर पड़ता नजर नहीं आता है ।